सामयिकी

Posted By: admin on April 19, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

मै न्यायिक सक्रियता के विरूद्ध रहा हॅू। साथ साथ मै विधायिका की अति सक्रियता के भी विरूद्ध रहा हॅू। विधायिका की अति सक्रियता से परेशान न्यायपालिका ने संवैधानिक तरीके से जनहित याचिकाओ की अनुमति दी थी और पूरे भारत ने उसकी प्रशंसा की थी, भले ही वह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का आदेश नही था। स्वाभाविक है कि जनहित याचिकाओ का जमकर दूरूपयोग हुआ। पेशेवर मानवाधिकारवादी पर्यावरण वादी या एन जी ओ ने जनहित याचिकाओ को अपने व्यवसाय का एक माध्यम बना लिया। आज सुप्रीम कोर्ट ने अपनी उस भूल को सुधारते हुए यह टिप्पणी की है कि जनहित याचिकाओ का खुलेआम दूरूपयोग हो रहा है । वैसे तो यह बात लम्बे समय से अनुभव की जा रही थी किन्तु पिछले कुछ वर्षो से तो यह एक फैशन सरीखे बन गई थी। जनहित की परिभाषा न्यायालय नही कर सकता । जनहित की परिभाषा तो एकमात्र विधायिका ही कर सकती है और यदि विधायिका जनहित की गलत परिभाषा करती है तो विधायिका पर नियंत्रण जन का ही हो सकता है, न्यायपालिका का नही। न्यायपालिका सिर्फ व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारो की संरक्षक होती है इससे अधिक न्यायपालिका की भूमिका तभी होती है जब संविधान के विरूद्ध कोई कार्य हो रहा हो। अभी भी न्यायपालिका ने अपनी भूल मे आंषिक संशोधन ही किया है । वास्तविक सुधार तो तब माना जायेगा जब न्यायपालिका जनहित को परिभाषित करना बंद करके यह कार्य विधायिका पर छोड देगी और जनहित याचिकाओ पर पूरा प्रतिबंध लगा देगी।
जबसे न्यायपालिका सर्वोच्च का अलोकतांत्रिक विचार न्यायाधीशो तथा अधिवक्ताओ के मन मे आया तब से ही ये संभावना दिखने लगी थी कि न्यायपालिका मे भ्रष्टाचारा भी बढेगा और गुटबंदी भी होगी। धीेरे धीरे दोनो बाते साफ होती गई । न्यायपालिका मे सर्वोच्च स्तर पर दो गुट बने जिसमे एक गुट का नेतृत्व वरिष्ठ वकील प्रशान्त भूषण ने संभाला तो दूसरे गुट का नेतृत्व कुछ छोटे वकीलो के पास रहा। सर्वोच्च न्यायाधीश भी दो गुटो मे बट गये। राजनीति भी इस न्यायिक विवाद मे शामिल हो गई। गुटबंदी स्वाभाविक थी क्योकि प्रशान्त भूषण एक ऐसे वकील माने जाते है जिनकी सोच वामपंथ की तरफ अधिक झुकी हुई है। वे इमानदार है हिम्मती है किन्तु न्याय और व्यवस्था के संतुलन के विरूद्ध न्याय के पक्ष मे अधिक झुक जाते है। परिणाम होता है अव्यवस्था और अन्याय । न्यायपालिका के बीच टकराव तो जनहित मे है क्योकि लोकतंत्र मे किसी को सर्वोच्चता का घमंड नही पालना चाहिये। साथ ही प्रशांत जी से मेरी अपेक्षा है कि न्याय और व्यवस्था का संतुलन न बिगडे उस दिशा मे भी उन्हे सोचना चाहिये।

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