मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता

Posted By: admin on April 25, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाजिक कर्तब्य बन जाता है । प्राचीन समय से यही परिपाटी चलती आ रही है। भारतीय जीवन पद्धति विज्ञान और धर्म के संतुलन के रूप मे विख्यात है। गाय गंगा मंदिर पीपल के पेड या तुलसी को पौधो को समाज मे यथोचित सम्मान मिलना इसी प्रणाली का प्ररिणाम है। गाय एक ऐसा उपयोगी पशु है जिसकी उपयोगिता पर अब भी नये नये शोध हो रहे है। गाय को माता के समान स्थान दिया गया। गो हत्या को निशिद्ध कार्य मे सम्मिलित किया गया। गंगा नदी की वैज्ञानिक उपयोगिता देखकर ही उसे अधिकतम पवित्र और साफ रखने की धार्मिक व्यवस्था हुई। गंगा नदी को पार करते समय उसमे तांबे का पैसा फेकना भी एक वैसा ही प्रयत्न माना जाना चाहिये। मंदिरो को आस्था का केन्द्र माना गया। गाय गंगा मंदिर जैसे वैज्ञानिक प्रतीको को आम लोगो के जन मानस मे इस तरह शामिल किया गया, जैसे वह उनके जीवन मरण का प्रश्न हो । विचारवान लोग तर्क के आधार पर रिसर्च करते थे और उस रिसर्च के परिणाम भावना प्रधान समाज तक श्रद्धा के माध्यम से पहुचाते थे। विचार और श्रद्धा के बीच एक अदभूत तालमेल था।

चाहे गाय गंगा मंदिर हो या पीपल का पेड सभी एक बेहतर सामजिक व्यवस्था के लिये उपयोगी थे। मनुष्य एक मात्र ऐसा जीव था जिसे मौलिक अधिकार प्राप्त हुए । गाय की सम्पूर्ण उपयोगिता और श्रद्धा होते हुए भी गाय को पशु माना गया क्योकि उसे मौलिक अधिकार प्राप्त नही थे। इसी तरह गंगा को पवित्र नदी तथा मंदिर को एक पवित्र उपासना केन्द्र के रूप मे स्वीकार किया गया। मै स्पष्ट कर दू कि सिर्फ मनुष्य को ही मौलिक अधिकार प्राप्त होते है क्योकि मनुष्य सम्पूर्ण विश्व समाज के साथ जुडा हुआ है और गाय गंगा या मंदिर का अब तक वैसा स्थान प्राप्त नही है । इसका अर्थ हुआ कि गाय हमारे लिये आस्था का केन्द्र हो सकती है और किसी दूसरे के लिये नही भी हो सकती है । भारतीय जीवन पद्धति मे अपनी आस्था को किसी दूसरे पर बल पूर्वक नही थोपा जा सकता । जिस तरह गाय के नाम पर व्यक्तियो की हत्याए हो रही है अथवा गंगा के नाम पर जल के अन्य उपयोग मे रूकावट के आंदोलन हो रहे है वे भारतीय संस्कृति के हिस्से नही है क्योकि ये सुविचारित नही है, तर्क संगत नही है, विज्ञान विरूद्ध है तथा पूरी तरह भावनाओ पर आधारित है। बल्कि कभी कभी तो ऐसा लगता है कि गाय गंगा मंदिर का मुददा सुविचारित तरीके से राजनैतिक हथकंडे के रूप मे उपयोग करने का प्रयत्न हो रहा है।

स्पष्ट तथ्य है कि भारत मे भारतीय संस्कृति मे निरंतर गिरावट आ रही है । हिन्दुओ की संख्या लगातार घट रही है और गाय गंगा मंदिर विरोधियो की बढ रही है। यदि हिन्दूओ की संख्या घटती गई तो गाय गंगा मंदिर भी नही बचेगा । किन्तु यदि हिन्दू और हिन्दुत्व बच गया तो गाय गंगा मंदिर खत्म होने के बाद भी फिर से विस्तार पा सकते है। इसका अर्थ हुआ कि गाय गंगा और मंदिर की सुरक्षा की तुलना मे हिन्दुत्व की सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है किन्तु हमारे रणनीति कार गाय गंगा मंदिर को हिन्दुत्व की तुलना मे अधिक महत्वपूर्ण मानने का प्रयत्न कर रहे है। वास्तविक स्थिति यह है कि भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति मे गाय गंगा मंदिर की तुलना मे समान नागरिक संहिता की अधिक उपयोगिता है, क्योकि भारतीय जीवन पद्धति इतनी अधिक सुविचारित और वैज्ञानिक आधार पर स्थापित है कि कोई अलग उसका मुकाबला नही कर सकेगा। समान नागरिक संहिता की तुलना मे हिन्दू राष्ट्र शब्द पूरी तरह घातक और अनुपयुक्त है क्योकि विचार धाराए वैज्ञानिक तथ्यो पर विस्तार पाती है। भावनात्मक प्रचार पर नही। पिछले तीन वर्षो से मै देख रहा हॅू कि हमारे समान नागरिक संहिता के पक्षधर अनेक मित्र भी हिन्दू राष्ट अथवा गाय गंगा मंदिर को अधिक प्राथमिक मानने लगे है। कुछ लोगो ने समान नागरिक संहिता शब्द का अर्थ भी बदलने का प्रयास किया। उन्होने समान नागरिक संहिता को समान आचार संहिता बना दिया जबकि दोनो एक दूसरे के विपरीत है। यदि भारत मे समान नागरिक संहिता लागु हो जाये तो भारत की अधिकांश समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी तथा भारत दूनिया मे मानवाधिकार के नाम पर अग्रणी देशो मे गिना जाने लगेगा । जबकि गाय गंगा और मंदिर आंदोलन कुछ लोगो के अहम की तुष्टि भले ही कर दे लेकिन दुनियां मे भारतीय जीवन पद्धति अथवा हिन्दू धर्म का सिर उंचा नही हो सकेगा।

जो मित्र गाय गंगा मंदिर के नाम पर कटटर पंथी इस्लाम से टकराने के पक्षधर है वे भूल रहे है कि भावनात्मक मुददो पर टकराव टिकाउ नही हो सकता। ऐसे मुद्दो पर विश्व समर्थन भी नही मिल सकेगा। भारत की राजनैतिक सत्ता के लिये भले ही ऐसे मुद्दे उपयोगी हो किन्तु विश्व व्यवस्था मे इनका उपयोग नही हो सकता। दूसरी ओर समान नागरिक संहिता एक ऐसा विषय है जिसपर भारत के मुसलमान सहमत भी नही होंगे और विरोध भी नही कर सकेगे। विश्व जनमत भी समर्थन कर सकता है। यदि जल छिटने से साप मर जाये तो लाठी डंडे गोली बंदूक की आवश्यकता क्या है। गाय गंगा मंदिर जैसे मामलो मे सरकार को किसी प्रकार का कोई कानूनी हस्तक्षेप नही करना चाहिये। जिस तरह सत्तर वर्ष बीत गये उस तरह दो चार वर्ष और बीत सकते है।

मै फिर से निवेदन करता हॅू कि हमे भावनाओ मे बहकर तथा जोश मे आकर कुछ करने की मूर्खता छोड देनी चाहिये और वैचारिक तथा होश मे आकर एक मात्र समान नागरिक संहिता के पक्ष मे वातावरण बनाना शुरू करना चाहिये।

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