सामयिकी-बजरंग मुनि

Posted By: admin on April 25, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

जब कोई भौतिक पहचान ही किसी की योग्यता और श्रद्धा का मापदंड बन जाती है तब धूर्त और अपराधी उस भौतिक पहचान का सहारा लेकर अपने को आगे बढाते है। यही स्थिति राजनीति मे खादी की हुई तो धर्म मे सन्यासी शब्द और उसकी वेश भूषा की। आशाराम रामरहीम सरीखे सैकडो अपराधी सन्यासी वेश भूषा मे अपना गुजर बसर और शाही सम्मान सुख सुविधा का भोग करते रहे है। कुछ समय पहले तक मुझे भी ऐसा लगता था कि वास्तव मे ईश्वर यहां न्याय नही है तभी तो ईश्वर के नाम पर भोले भाले भक्तो को धोखा देने मे ये लोग सफल है । ऐसे नकली साधु संत धर्म की आड मे अनेक गंभीर अपराध तक करते रहे है। यहां तक कि हिंसा और षणयंत्र मे भी पीछे नही रहे। वर्तमान घटना क्रम से विश्वास हो चला है कि ईश्वर है। ऐसे साधु संत बडे बडे अपराध करके साफ बचते रहे है किन्तु छोटे अपराध मे भी वे आजीवन कारावास का दंड भोगने को मजबूर हो रहे है। स्पष्ट है कि अपराधियो को उचित दंड तो मिल रहा है भले ही हत्या हिंसा षणयंत्र धोखा के बदले महिला उत्पीडन के नाम पर ही क्यो न मिले। मै इस प्रकार गलत तरीके से हो रहे सही कार्य का समर्थन करता हॅू। अन्य आपराधिक प्रवृत्ति के साधु संतो को सबक सीखना चाहिये कि वे बडे बडे षणयंत्र करके भले ही बच रहे हो किन्तु पाप का घडा कभी भी भरकर फूट जायेगा और उन्हे आभाष भी नही होगा यह किसी को पता नही है। ईश्वर का उपयोग करना ही पर्याप्त नही है उसकी शक्ति से डरना भी चाहिये।

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