सामयिकी– कसडोल छत्तीसगढ की एक घटना के अनुसार–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 8, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

पति की प्रताडना से परेशान होकर शादीशुदा बेटी घर बैठी है। उसे ससुराल मे जलाने की कोशिश हुई तो मामला पुलिस तक और फिर कोर्ट कचहरी तक जा पहॅुचा । इसी से नाराज होकर समाज ने विवाहिता के पूरे परिवार को समाज से बहिष्कृत कर दिय। परिवार मे दो और बेटियां शादी के लायक हो गई है। लेकिन बहिष्कार के चलते रिश्ते नही आ रहे । इससे परेशान उनके माता पिता समाज प्रमुख के पास न्याय मांगने पहुचे तो जवाब मिला कि पहले केश वापस लो तभी बहिष्कार खत्म होगा । यह सदमा मां बर्दाश्त नही कर सकी । वह बेहोश हो गई और उसकी मृत्यु हो गई।
पूरी घटना को इस तरह प्रस्तुत किया गया जैसे मृतक महिला के पूरे परिवार के साथ पूरा स्थानीय समाज मिलकर अत्याचार कर रहा हो। आजकल महिला सशक्तिकरण के नाम पर परम्पाए और समाज व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने का पूरे देश मे एक फैशन चल पडा है। इस घटना को भी आधार बनाकर मानवाधिकारवादी आगे आने लगे । एक परिवार के पति पत्नि मे विवाद होता है। बिना जांच किये यह कैसे मान लिया गया कि पति गलत था? क्या पत्नि गलत नही हो सकती? गांव की पंचायत होती है । पंच लोगो ने कुछ निर्णय दिये और न मानने पर महिला के परिवार का बहिष्कार किया । क्या गांव के भी सब लोग गलत थे जिन्होने कुछ निष्कर्ष निकाले। क्या किसी समूह को किसी व्यक्ति का बहिष्कार करने का भी अधिकार नही होगा? प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता है कि वह किसी भी अन्य का किसी भी सीमा तक बहिष्कार कर सकता है। यह स्वतंत्रता व्यक्ति समूह को भी प्राप्त है। यह स्वतंत्रता कैसे छीनी जा सकती है। दुर्भाग्य है कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर हमारे कानून बनाने वाले तथा समाज व्यवस्था के कुछ पेशेवर ठेकेदार अब समाज के बहिष्कार के अधिकार को भी छीनने का प्रयास कर रहे है। एक समय था जब मुसलमानो मे महिलाओ की भूमिका को आधा माना जाता था। उस समय भी भारत मे सबको समान अधिकार प्राप्त थे। अब एक नयी व्यवस्था आ रही है जिसमे महिलाओ को पूरूषो की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय बनाने का प्रयास हो रहा है। अधिकारो के मामले मे सब समान होने चाहिये। यह नही हो सकता कि महिला समूह सही होता है या पुरूष।
स्थानीय समाज ने यदि किसी को केश वापस लेने की सलाह दी तो यह किसी भी आधार पर गलत नही कहा जा सकता। सलाह मानना न मानना उनकी स्वतंत्रता है और न मानने पर बहिष्कार करना समाज की स्वतंत्रता । यदि इसके कारण उसकी दो बहने अविवाहित है तो क्या अब समाज के लोग इसके लिये दोषी माने जायेगे। महिला सशक्तिकरण के नाम पर वर्ग विद्वेष फैलाने का जो प्रयत्न हो रहा है उसपर गंभीर विचार मंथन की आवश्यकता है। मै तो इस मत का हॅू कि चाहे महिला हो या पूरूष सबके अधिकार समान हो । सबका महत्व समान हो साथ ही समाज की सामाजिक गतिविधियों पर सरकार का कोई अंकुश न हो। सरकार स्वयं को समाज से भी उपर मानने की भूल न करे।

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal