सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 13, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

जो काम जान बूझकर बुरी नीयत से किये जाये वही अपराध होते है, अन्य नही । यदि पूरे भारत की कुल आबादी का आकलन करे तो अपराधियो की संख्या एक प्रतिशत से भी कम हो सकती है। इसमे भी हिंसा और मिलावट या जालसाजी करने वाले का प्रतिशत अधिक होता है, जबकि चोरी डकैती करने वालो का कम। बलात्कार तो और भी बहुत कम होते है । अपराध रोकने के लिये दो अलग अलग प्रयत्न होते है। 1 समाज द्वारा हृदय परिवर्तन अथवा अपमान का भय। 2 राज्य द्वारा दंड का भय। समाज को अपना कार्य अपनी सीमाओ मे रहकर करना चाहिये। और राज्य को अपनी सीमाओं मे । दुर्भाग्य से भारत मे समाज अपनी सीमाए तोडकर अपराध नियंत्रण के लिये दंड का उपयोग करने का अभ्यस्त हो रहा है तो दूसरी ओर राज्य अपनी सीमाए तोडकर हृदय परिवर्तन या अपराधियो मे सुधार का कार्य करता है। राज्य का काम अपराधियो मे सुधार करना नही है किन्तु ये हमेशा ही सुधार का कार्य करने का प्रयास करता है। राज्य शराब बंदी गो हत्या बंदी छुआछूत उन्मूलन गरीबी उन्मूलन शिक्षा का विस्तार जैसे अनावश्यक कार्यो को बढचढ कर करता है दूसरी ओर राज्य लोगो को अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिये हथियार के लाइसेंस देता है अथवा अपने शहर मे पहरा करने की सलाह देता है। शर्म की बात है कि हमारी पुलिस रात को गस्त करते समय जागते रहो की आवाज लगाती है जबकि राज्य को यह घोषणा करनी चाहिये कि लोग सुख की नींद सोवे। किसी प्रकार के अपराध से उन्हे चिंता करने की आवश्यकता नही है।
समय आ गया है कि अब समाज अपनी सीमाए समझे और राज्य अपनी। यदि दोनो ने अपनी अपनी सीमाओ का उलंघन किया तो वर्तमान अव्यवस्था मे कोई निर्णायक बदलाव कठिन दिखता है। 99 प्रतिशत आबादी एक प्रतिशत अपराधियो पर नियंत्रण न कर सके यह संभव नही किन्तु 99 प्रतिशत लोगो की विपरीत रणनीति के कारण एक प्रतिशत अपराध समाज के लिये सिरदर्द बने हुए है।

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