सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 24, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

लम्बे समय से दुनियां की अर्थ व्यवस्था श्रम शोषण के आधार पर अपनी योजनाएं बनाती रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत भी उनकी नकल करता रहा । भारत की सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था मे गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान के विरूद्ध पूंजीपति शहरी बुद्धिजीवी किसानो के उत्पादन तथा उपभोग की सभी वस्तुओ पर भारी कर लगाकर आवागमन या संचार माध्यमो को सस्ता करने पर खर्च किया गया। शिक्षा का बजट लगातार बढाया गया और पूर्ति के लिये रोटी कपडा मकान दवा जैसी मूल भूत आवश्यक वस्तुओ पर भारी कर लगाये गये।
आज भारत की सभी आर्थिक समस्याओ का मुख्य कारण डीजल पेट्रोल की बढती खपत के साथ जुडा है। कृत्रिम उर्जा की बढी खपत पर्यावरण प्रदूषण बढाती है, विदेशी आयात बढाने के लिये मजबूर करती है, श्रम की मांग और मूल्य बढने नही देती, ग्रामीण उधोग धंधे खत्म करती है। यह भी निर्विवाद है कि कृत्रिम उर्जा के मंहगा होने से उसकी खपत घटती है, श्रम की मांग और मूल्य बढता है, ग्रमीण उधोग उन्नति करते है, पर्यावरण प्रदूषण घटता है। फिर भी भारत मे कोई सरकार इतनी हिम्मत नही कर पा रही कि वह सीधे सीधे डीजल पेट्रोल का मूल्य ढाई गुना करके भारत की सभी आर्थिक परेशानियों से मुक्ति पा जावे। उसे डर लगता है शहरी, बुद्धिजीवियो, पूंजीपतियों के संगठित आक्रोश का। डीजल पेट्रोल की थोडी सी मूल्य वृद्धि होते ही सभी श्रम शोषक एक स्वर से उसके विरूद्ध चिल्लाना शुरू कर देते है। अमीरो के एजेन्ट बुद्धिजीवी मीडिया कर्मी तथा चैनल वाले एक स्वर से उसके विरूद्ध अभियान छेड देते है। विपक्ष इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है और सरकार डरकर मूल्य वृद्धि से राहत की योजना बनाने लगती है। अब इस समस्या से निपटने का अभियान छिडना चाहिये। श्रम शोषको के विरूद्ध ग्रामीणो गरीबो श्रमजीवियो कृषि उत्पादको का एक मजबूत प्रेशर ग्रुप बनना चाहिये जो कृ़ित्रम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि के लिये सरकार पर दबाव बना सके तथा डीजल पेट्रोल के बढते आयात के विरूद्ध जनमत खडा कर सके।

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