मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा

Posted By: admin on May 26, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।
1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।
2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष की जन्मदर लगभग बराबर होती है। किसी प्रकार का असंतुलन होने पर प्रकृति स्वयं संतुलन बना लेती है।
3 प्रत्येक महिला और पुरूष के बीच एक प्राकृतिक आकर्षण होता है जिसकी तुलना लोहा और चुम्बक से होती है।
4 प्रत्येक व्यक्ति मे लोहा और चुम्बक दोनो की मात्रा अवश्य होती है भले ही वह अलग अलग और असमान होती है चाहे महिला हो या पुरूष।
5 सवर्णो या धनवानो मे यौन शुचिता को आर्थिक प्रगति की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता हैं जबकि गरीबो और अवर्णो मे आर्थिक आवश्यकता को यौन शुचिता से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
6 आजतक यह निश्चित नही हो सका कि सैद्धान्तिक रूप से महिला और पुरूष के बीच दूरी घटनी चाहिये या बढनी चाहिये। दूरी का घटना बढना व्यक्ति की शारीरिक आवश्यकता पारिवारिक वातावरण, तथा सामाजिक व्यवस्था के सम्मिलित मापदंड से बनती है।
स्पष्ट है कि महिला और पुरूष के बीच यदि दूरी घटेगी तो यौन शुचिता से आंशिक मझौता करना ही पडेगा । यदि यौन शुचिता अधिक महत्वपूर्ण है तो दोनो के बीच दूरी बढाना आवश्यक है। इसीलिये समाज मे कभी भी यह नियम नही बना कि दोनो के बीच दूरी घटनी चाहिये या बढनी चाहिये। सिद्धान्त रूप से यह स्वतंत्रता प्रत्ये्यक्ति को अथवा परिवार को प्राप्त है। कोई अन्य स्वतंत्रता मे बाधक नही बन सकता। स्त्री और पुरूष के बीच आकर्षण इतना अधिक तीव्र होता है कि उसकी गति प्रकाश या बिजली की गति से भी अधिक मानी जाती है। इस आकर्षण को कभी बल पूर्वक नही रोका जा सकता। यह अवश्य है कि इसे परिस्थिति अनुसार अनुशासित किया जा सकता है। इसी अनुशासन की प्रथा के रूप मे विवाह और पर्दा प्रथा प्रचलित हुई। पर्दा प्रथा इस तीव्र आकर्षण के बीच एक कुचालक का काम करती है। इस तरह पर्दा प्रथा कोई कुव्यवस्था नही है । न ही कोई सामाजिक कुरीति है क्योकि यह बाध्यकारी नही है, नियमानुसार नही है और कानून सम्मत भी नही है। अपनी अपनी परिस्थिति अनुसार स्वैच्छिक है।
कुछ लोगो का यह मानना है कि प्राचीन समय मे पर्दा प्रथा नही थी बल्कि यह मुगल काल से भारत मे आयी क्योकि मुगलो मे पहले से पर्दा प्रथा थी और मुगल अन्य महिलाओ पर तुलनात्मक रूप से अधिक लालायित होते थे। इसलिये सुरक्षा की दृष्टि से पर्दा प्रथा विकसित हुई। मेरे विचार से यह धारणा गलत है क्योकि मुगलो के पूर्व भी उच्च वर्ण मे यह धारणा थी कि बालिग या वयस्क भाई-बहन, मां-बेटा अथवा जेष्ठ और बहू भी कभी एकांत वास न करे न ही कभी अनावश्यक एकांत बात चीत करे बल्कि दोनो के बीच एक संतुलित दूरी रहनी चाहिये। स्पष्ट है कि यही से पर्दा प्रथा का अस्तित्व समझ मे आता है।
यौन शुचिता के आधार पर ही समाज मे यह धारणा विकसित हुई कि उच्च वर्ग की महिलाओ को बिना किसी सुरक्षा के अकेले मे बाहर नही निकलना चाहिये। उसके साथ साथ उचित पर्दा और सामान्य ड्रेस की भी सलाह दी जाती थी। उच्च वर्ग के बीच महिलाओ को कभी रोजगार मे लगाना भी अच्छा नही माना जाता था क्योकि पर्दा प्रथा के कारण उनका रोजगार करना भी कठिन था तथा बच्चो की जन्मदर अधिक होने के कारण उन्हे बाहर निकलने के अवसर भी कम मिलते थे। परिस्थितियां बदली जब भारत मे पश्चिम की गुलामी आयी तब यहां यौन शुचिता को कम महत्व दिया जाने लगा। महिला और पुरूष के बीच दूरी घटायी गई । बच्चो की जन्म दर कम की गई । महिलाओ को रोजगार मे लगाया गया। जब भारत साम्यवाद की तरफ बढा और साम्यवाद ने वर्ग समन्वय के स्थान पर वर्ग संघर्ष को अपना प्रमुख आधार बनाया, तब भारत मे महिला सशक्तिकरण का एक नया प्रयोग शुरू हुआ। इस तरह पर्दा प्रथा जो पहले स्वैच्छिक थी वह समाज सुधार के नाम पर एक नये व्यवासाय का आधार बन गयी। योजना पूर्वक पर्दा प्रथा को एक सामाजिक कुरीति के रूप मे प्रचारित किया गया। साथ ही महिला और पुरूष के बीच की दूरी भी घटाई गई। स्वाभाविक है कि ये दोनो प्रयत्न पश्चिम की संस्कृति के भी अनुकूल थे और साम्यवादी लक्ष्य की ओर भी बढाने वाले थे। यह नया व्यवसाय राजनैतिक आश्रय पाकर खूब फला फूला । अब स्वतंत्रता के बाद भी भारत इन दोनो बीमारियों से ग्रस्त है। अब भी पर्दा प्रथा को एक बुराई के रूप मे प्रचारित किया जाता है और महिला पुरूष के बीच दूरी कम करना भी एक सामज सुधार का कार्य माना जाता है । किन्तु इसके साथ साथ इसमे होने वाले दुष्परिणामो को भी बढा चढाकर एक गंभीर समस्या के रूप मे इस तरह पेश किया जाता है कि साम्यवादियो की एक मात्र इच्छा वर्ग संघर्ष से भारत के महिला और पुरूष किसी भी रूप मे बच न सके। मै किसी भी रूप मे पर्दा प्रथा का समर्थक नही हॅू । मै महिला और पुरूष के बीच दूरी घटाने या बढाने मे से भी किसी एक का पक्षधर नही हॅू । मेरे विचार मे प्रत्येक व्यक्ति परिवार या समाज को यह स्वतंत्रता होनी चाहिये कि वे इस संबंध मे अपनी अपनी परिस्थिति अनुसार निर्णय कर सके। किसी को यौन शुचिता की अपेक्षा धन की अधिक आवश्यकता है तो वह धन का उपयोग कर सकता है और किसी को यौन शुचिता महत्वपूर्ण लगे तो वह धन का मोह छोड सकता है। अपने अपने निर्णय की स्वतंत्रता होनी चाहिये। महिला और पुरूष के बीच दूरी या पर्दा प्रथा के मामले मे भी परिवारो को पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिये। बलात्कार के गंभीर अपराधो को छोडकर अन्य किसी भी प्रकार के महिला पुरूष संबंधो पर राज्य को कोई कानून नही बनाना चाहिये। यहां तक कि छेडछाड की घटनाएं भी यदि सामाजिक नियंत्रण से बाहर न हो तब तक सरकारो को हस्तक्षेप नही करना चाहिये। यह नही हो सकता कि महिलाएं जान बूझकर महिला पुरूष के बीच की दूरियों को घटाती जाये और उसके स्वाभाविक आकर्षण रूपी परिणाम का दोष एक पक्ष पर डालते जाये। यह उचित नही है । मेरे विचार से पर्दा प्रथा एक पुरानी व्यवस्था है जिसमे परिस्थिति अनुसार सुधार किया जा सकता है किन्तु ऐसा सुधार स्वैच्छिक होना चाहिये । किसी कानून के आधार पर नही किसी अभियान के आधार पर नही।

मंथन का अगला विषय कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित होगा

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