सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on July 4, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने के प्रयास हुए। टी वी मे बैठकर सबने किसी न किसी तरह की हत्या का संदेह व्यक्त करना शुरू किया। कुछ लोगो ने उच्च स्तरीय जांच की भी मांग की। रिश्तेदारों ने भी हत्या कहना शुरू कर दिया। कुछ लोगो ने किसी तांत्रिक का हाथ बताया तो किसी ने और कई संदेह व्यक्त किये जबकि मामला बिल्कुल सीधा दिखता है कि परिवार का कोई एक सदस्य मोक्ष की कामना से प्रभावित होकर धीरे धीरे पूरे परिवार की सोच उस दिशा मे मोडता रहा और पूरा परिवार उसके प्रभाव मे आकर उसकी सलाह से आत्महत्या के लिये तैयार हो गया।
किसी काल्पनिक सुख की कामना से खुशी खुशी आत्महत्या करने का यह पहला मामला नहीं है। आतंकवादी मुसलमान तो आम तौर पर ऐसा ही करते है। उन्हे स्वर्ग मे अनेक सुविधाओ का विश्वास करा दिया जाता है और वे उन कल्पनाओ को यथार्थ मानकर जान देने के लिये तैयार रहते है। फर्क यह है कि हिन्दुओ मे ये काल्पनिक सुविधाए सात्विक होती है तो मुसलमानो मे तामसी । हिन्दुओ मे ऐसे प्रचार का दुरूपयोग कुछ स्वार्थी धर्मगुरू अपने लिये करते है तो मुसलमानो मे अपने संगठन विस्तार के लिये। यह ग्यारह आत्म हत्याओ का मामला कुछ भिन्न है क्योकि इसके पीछे कोई स्वार्थ नही है।
अनेक अन्ध श्रद्धा उन्मूलन संस्थाएं समाज मे लगातार प्रयास रत है और अन्ध श्रद्धा बढती जा रही है। सच्चाई यह है कि इन संस्थाओ का स्वयं का तरीका ठीक नही। ये संस्थाएं प्रायः व्यावसायिक है। खास बात यह है कि जब तक आप पर रोगी का विश्वास नही होगा तब तक आपका प्रभाव नही होगा। अन्ध श्रद्धा दूर करने का सरल उपाय है तर्क शक्ति जागरण। आज समाज मे एक वर्ग ऐसा है जो लगातार समझाता है कि तर्क से दूर रहना उचित है क्योकि तर्क किसी नतीजे तक नही पहुचने देता। दूसरी ओर बडी मात्रा मे लोग हर प्रकार की श्रद्धा का विरोध करते रहते है । ऐसे लोग ईश्वर तक का विरोध करने लगते है। दोनो ही अतिवाद घातक है। समन्वय की आवश्यकता है । हमलोगो ने एक छोटे से शहर मे प्रयोग किया। तर्क या अंध श्रद्धा का विरोध बिल्कुल नही किया और धीरे धीरे विचार मंथन का अभ्यास कराया तो परिणाम अच्छे आये । यदि कोई तर्क का विरोध करे तो उससे बचने की जरूरत है। कोई श्रद्धा को भी गलत बतावे तो दूरी बनाइयें। बीच का मार्ग ही ठीक है।

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