सामयिकी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on July 5, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली सरकार हाइकोर्ट उप राज्यपाल या केन्द्र सरकार । यह निर्णय उच्चतम न्यायालय का नही था बल्कि संविधान पीठ का निर्णय था।
सब जानते है कि भारत मे संविधान का शासन है। संविधान की जो व्याख्या केन्द्र सरकार ने की थी उसके अनुसार वह जो कर रही थी वह सही कदम था। उप राज्यपाल भी जो कर रहे थे उसमे कुछ भी गलत नही था क्योकि वे भी संविधान के अनुसार ही कार्य कर रहे थे। उच्च न्यायालय मे भी संविधान की सही व्याख्या की थी। उच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या नही कर सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मामले मे कोई हस्तक्षेप नही किया और मामला संविधान पीठ मे भेज दिया। संविधान पीठ ने इस मामले मे संविधान के शब्दो का भौतिक अर्थ और मूल भावना के बीच अंतर की व्याख्या की और निर्णय दिया की चुनी हुई सरकार जनता की प्रतिनिधि होती है । उसे कोई अन्य इकाई सहायक के रूप मे उपयोग नही कर सकती। इसका अर्थ हुआ कि केजरीवाल भी अपनी जगह पर सही थे जो संविधान की मूल भावना को समझ रहे थे।
अब यह विवाद निपट जाना चाहिये परन्तु निपटेगा नही क्योकि केजरीवाल जी का संघर्ष दिल्ली सरकार चलाने तक सीमित नही है बल्कि प्रधान मंत्री की दौड मे स्वयं को आगे रखने का है। केजरीवाल नरेन्द्र मोदी के विरूद्ध सबसे आगे रहने के लिये नये नये विवाद खोजते रहेंगे दूसरी ओर केन्द्र सरकार उनकी इच्छा के अनुसार उनपर कोई ऐसा प्रत्यक्ष आक्रमण नही करेगी जिससे उन्हे सहानुभूति मिले। केन्द्र सरकार चाहेगी कि किसी भी परिस्थिति मे केजरीवाल सरकार को बर्खास्त न किया जाय जो केजरीवाल लम्बे समय से प्रतिक्षा कर रहे है । दिल्ली की आम जनता से किसी को कोई मतलब नही है। क्योकि राजनेताओ की तो यह दुकानदारी है और संविधान उस दुकानदारी मे काम आने वाला तराजु और बांट। सारा दोष संविधान मे था जिसके कारण ये सारा विवाद पैदा हुआ और आज तक बना हुआ है।

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal