मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on August 27, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ सिद्धान्त हैः-

1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश का मिला जुला स्वरूप होता है।
2. गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर यदि आॅकलन किया जाये तो चार अलग-अलग क्षमताओं के लोग मिलते है। इन्हें हम विचारक, प्रबंधक, व्यवस्थापक और श्रमिक के रूप में विभाजित कर सकते है। इस विभाजन को ही प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था कहा जाता था।
3. भारत की वर्ण व्यवस्था दुनियाॅ की एक मात्र ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जो आदर्श है। यदि यह व्यवस्था विकृत होकर योग्यता की जगह जन्म का आधार नहीं ग्रहण करती तो अब तक सारी दुनियां इसे स्वीकार कर चुकी होती।
4. बहुत लम्बे समय के बाद सामाजिक व्यवस्थाएं रूढ होकर विकृत हो जाती है और उसके दुष्परिणाम उस पूरी व्यवस्था को ही सामाजिक रूप से अमान्य कर देते है।
5. वर्ण और जाति अलग-अलग व्यवस्था है। जातियाॅ सिर्फ कर्म के आधार पर बनती है तो वर्ण गुण, कर्म, स्वभाव को मिलाकर। प्रत्येक वर्ण में कर्म के आधार पर अलग-अलग जातियाॅ बनती है।
6. वर्ण व्यवस्था से विकृति दूर करने की अपेक्षा वर्ण व्यवस्था का समाप्त होना अव्यवस्था का प्रमुख कारण है।
7. स्वामी दयानंद महात्मा गांधी सरीखे महापुरूष वर्ण व्यवस्था की विकृतियों को दूर करना चाहते थे। भीमराव अम्बेडकर, नेहरू आदि ने वर्ण व्यवस्था की विकृतियों पर अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का प्रयास किया। उसका दुष्परिणाम भारत भोग रहा है।
8. वर्ण व्यवस्था में योग्यता और क्षमतानुसार कार्य का विभाजन होता है और सामाजिक व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग वर्ण को अलग-अलग उपलब्धियाॅ भी प्राप्त होती है।
9. वर्ण व्यवस्था एक सामाजिक व्यवस्था है। उसका राजनीति से किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं। सामाजिक व्यवस्था में राजनीति का प्रवेष जितना ही बढता है उतनी ही अव्यवस्था बढती है जैसा भारत में हो रहा है।
10. वर्ण व्यवस्था में विचारक को सर्वोच्च सम्मान, प्रबंधक को शक्ति, व्यवस्थापक को अधिकतम आर्थिक सुविधा और श्रमिक को अधिकतम सुख की गारंटी और सीमा निर्धारित होती है।

प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण विचार प्रधान होता था, क्षत्रिय शक्ति प्रधान, वैश्य कुशलता तथा श्रमिक सेवा प्रधान जाना जाता था। सबके गुण और स्वभाव के आधार पर वर्ण निर्धारित होते थे। जन्म के अनुसार सबको शून्य अर्थात शुद्र माना जाता था और धीरे-धीरे जन्म पूर्व के संस्कार पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश के आधार पर वह अपनी योग्यता सिद्ध करता था तब उसे ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य का विशेष वर्ण दिया जाता था। ऐसी भी बात सुनी जाती है कि आठ वर्ष की उम्र में जो बालक ब्राह्मण की योग्यता की परीक्षा पास कर लेता था उसे ब्राह्मण का यज्ञोपवीत देकर ब्राह्मण घोषित किया जाता था। वह भविष्य में ब्राह्मण की पढाई विशेष रूप से करता था और उस एक दिशा में ही निरंतर आगे बढता जाता था। दस वर्ष की उम्र में शेष बच्चों की एक अलग तरह की परीक्षा होती थी। उस परीक्षा में उत्तीर्ण बच्चों को क्षत्रिय का यज्ञोपवीत दिया जाता था। बारह वर्ष की उम्र में वैश्य की परीक्षा होती थी और ऐसे बालक वैश्य का यज्ञोपवीत लेते थे। जो बालक तीन परीक्षाओं में पास नहीं होते थे उन्हें श्रमिक माना लिया जाता था और उन्हें यज्ञोपवीत से वंचित कर दिया जाता था। ब्राह्मणों के लिए जीवन पद्धति क्रियाकलाप तथा उपलब्धियाॅ सीमित होती थी। जो ब्राह्मण सम्मान के अतिरिक्त धन या राजनैतिक सत्ता की ओर प्रयत्न करता था उसे असामाजिक मान लिया जाता था अथवा उसका वर्ण बदल भी दिया जाता था। इसी तरह अन्य वणों के लिए भी था यदि कोई बढी उम्र में भी कोई विशेष योग्यता प्राप्त कर लेता था तो उसका वर्ण बदलने की भी व्यवस्था थी। इसी तरह क्षत्रिय को ब्राह्मण की तुलना में कम सम्मान और सामान्य धन के आधार पर जीवन बिताना पडता था। वैश्य को सबसे कम सम्मान तथा राजनैतिक शक्ति शून्य पर संतोष करना था। श्रमिक को सर्वोच्च सुख की सुविधा प्राप्त थी उसे सम्मान, पाॅवर और धन से मुक्त होकर सेवा के माध्यम से अधिकतम सुख की व्यवस्था थी। उसकी सामान्य जीवन उपयोगी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करने की गारंटी थी। ब्राह्मण को दान या भीख, क्षत्रिय को टैक्स, वैश्य को व्यापार तथा शुद्र को श्रम के आधार पर अपनी सुविधाएं इकठ्ठी करने की सीमाएं बनी हुयी थी। इन सीमाओं को न कोई तोड सकता था न ही उनकी तोडने की मजबूरी थी क्योंकि सामाजिक व्यवस्था इतनी मजबूत और सुचारू ढंग से चल रही थी कि किसी के सामने कोई संकट या मजबूरी कभी आती ही नही थी। कार्य विभाजन सबका अलग-अलग था और व्यवस्थित था। कोई किसी दूसरे के कार्य में न हस्तक्षेप करता था न प्रतिस्पर्धा करता था। कोई भी व्यक्ति एक से अधिक कार्य अपने पास केन्द्रीत नहीं कर पाता था। परिणामस्वरूप किसी भी वर्ण में बेरोजगारी का खतरा नही था। महिलाओं के संबंध में उच्च वर्ण के पुरूष निम्न वर्ण की महिलाओं के साथ विवाह और संतान उत्पत्ति कर सकते थे। निम्न वर्ण के पुरूष द्वारा उच्च वर्ण की महिलाओं से विवाह या संतान उत्पत्ति वर्जित था। यह सब सामाजिक व्यवस्था एक आदर्श सामाजिक संरचना के आधार पर चल रही थी। जब यह रूढ बनी और बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के उद्देश्य से इस वर्ण व्यवस्था में आरक्षण लागू किया और योग्यता की परीक्षा की अपेक्षा जन्म के आधार पर वर्ण निश्चित करना शुरू कर दिया तब इसका दुरूपयोग शुरू हुआ और अव्यवस्था असंतोष बढने लगा। जब मूर्ख लोग ब्राह्मण बनकर ज्ञान और सम्मान के केन्द्र बनने लगे तब स्वाभाविक ही था कि समाज में असंतोष बढे। स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी ने इस वर्ण व्यवस्था की विकृति को ठीक करने का प्रयास शुरू किया और उसके बहुत अच्छे परिणाम आये लेकिन स्वतंत्रता के बाद नेहरू और भीमराव अम्बेडकर ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इस विकृति का लाभ उठाना चाहा और उन्होंने वर्ण व्यवस्था को तोडकर जाति व्यवस्था को स्थायी बनाने की पूरी-पूरी कोशिश की। परिणाम हुआ कि वे कोई नई व्यवस्था तो नहीं बना सके किन्तु पुरानी बनी हुई विकृत या अच्छी व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर गये। वर्तमान समय में समाज व्यवस्था को तोडकर राज्य व्यवस्था को अधिक से अधिक मजबूत बनाने का उनका षणयंत्र सफल हो गया। धीरे-धीरे परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर हो रही है, टूट रही है और राज्य व्यवस्था अधिक से अधिक शक्तिशाली होती जा रही है।

मैं अच्छी तरह समझता हूॅ कि समाज व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए वर्ण व्यवस्था से अच्छी कोई अन्य व्यवस्था नहीं हो सकती किन्तु वर्तमान समय में वर्ण व्यवस्था को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के नाम से संशोधित या प्रचलित करना न संभव है न उचित। कुछ नये नामों पर विचार करके फिर से वर्ण व्यवस्था को सक्रिय और प्रभावी बनाने का प्रयास होना चाहिए। ब्राह्मण की जगह विचारक विद्वान या मार्गदर्शक नाम दिया जा सकता है। क्षत्रिय की जगह सुरक्षाकर्मी, प्रबंधक, राजनैतिक, राजनेता सरीखे नाम दिया जा सकता है। वैश्य की जगह व्यापारी, व्यवस्थापक या और नाम दे सकते है। शुद्र की जगह श्रमिक उपयुक्त नामकरण है किन्तु वर्ण व्यवस्था नये ढंग से विकसित होनी चाहिये और वह जन्म के आधार पर न होकर गुण और स्वभाव के आधार किसी परीक्षा के बाद घोषित होनी चाहिए।

ऐसी कोई सामाजिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिये जो फिर से सम्मान, शक्ति, सुविधा और सेवा को योग्यता और क्षमतानुसार अपनी-अपनी सीमाओं में बिना किसी राजनैतिक कानून के दबाव में बांधने और संचालित करने में सक्षम हो सके। मैं पूरी तरह वर्ण व्यवस्था के पक्ष में हूॅ। मैं समझता हूॅं कि ऐसी कोई नई व्यवस्था बनाना बहुत कठिन कार्य है किन्तु इसकी शुरूआत इस तरह हो सकती है कि वर्तमान समय में बने हुए व्यावसायिक बौद्धिक राजनैतिक या श्रमिक समूहों को मान्यता देकर उन्हें अपनी आंतरिक व्यवस्था को मान्यताएं दी जाये। इसका अर्थ हुआ कि अधिवक्ता समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था स्वयं तय करे तो वस्त्र व्यवसायी अपनी स्वयं । इसी तरह संत समाज के लोग भी अपने आंतरिक व्यवस्था स्वयं बना ले श्रमिक समूह भी बना सकते है। शिक्षक समूह अपनी आंतरिक व्यवस्था और नियमावली स्वयं बना सके। मैं तो इस मत का हूॅ कि विवाह शादी तथा अन्य सामाजिक संबंधो में भी यदि जाति और वर्ण को प्राथमिकता दी जाए तो व्यवस्था और अच्छी होगी यदि वकील लडके का विवाह वकील लडकी से हो और श्रमिक का विवाह श्रमिक कन्या से हो तो इसमें लाभ ही होगा हानि नहीं। इस तरह धीरे-धीरे नये तरह की आदर्श वर्ण व्यवस्था एक स्वरूप ग्रहण कर सकती है। सरकार को भी ऐसे समूहों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

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