मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on October 31, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

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कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-
1. पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तरह बनी हुयी है।
2. संगठन विचारों की कब्र होता है। संगठन महापुरूष के विचारों को दीर्घकालिक बनाता है, रूढ बनाता है और किसी संशोधन के विरूद्ध उसी तरह टकराता है जिस तरह उक्त महापुरूष को टकराना पडा था।
3. संगठन मृत महापुरूषों के विचार समाज तक पहुॅचाने का सबसे सफल और घातक माध्यम होता है इसलिए मृत महापुरूषों के विचार बिना विचारे कभी अक्षरशः स्वीकार नहीं करना चाहिए।
4. जब वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित होती है तब महाजनों येन गतः स पन्थाः का आंख मूंदकर अनुकरण करना चाहिए और जब जन्म पर आधारित हो तब बिल्कुल स्वीकार नहीं करना चाहिए।
5. गांधी समस्याओं के समाधान कर्ता थे और विनोबा संत। गांधी समझदार थे और विनोबा शरीफ। गांधी ने स्वतंत्रता दिलाई और विनोबा ने राजनेताओं की गुलामी।
6. गांधी और लोहिया में बहुत फर्क था राजनैतिक मामलों में लोहिया गांधी के समान सत्ता के अकेन्द्रीयकरण के पक्षधर थे और आर्थिक मामलों में सत्ता के केन्द्रीयकरण केे जबकि गांधी दोनों मामलों में अकेन्द्रीयकरण चाहते थे।
7. जयप्रकाश, विनोबा और लोहिया में बहुत फर्क था। विनोबा सत्ता से बाहर रह कर आचार्य कुल के माध्यम से राजनीति पर अंकुश रखने तक सीमित रहना चाहते थे तो जयप्रकाश सत्ता के साथ तालमेल करके उसका शुद्धिकरण चाहते थे और लोहिया उसमें घुसकर।
8. नाथुराम गोडसे और नेहरू में बहुत फर्क था। एक ने गांधी की शरीर की हत्या कर दी तो दूसरे ने विचारों की।
9. गोडसे का मार्ग गलत था और नेहरू की नीयत। गोडसे यदि गलत विचारों से प्रभावित न होता गांधी के साथ जुडा होता तो नेहरू की तुलना में अच्छा प्रधानमंत्री बन सकता था।
10. गोडसे का कार्य समाज के लिये घातक और अक्षम्य अपराध था साथ ही हिन्दू धर्म के लिए कलंक भी था।
जब भी समाज में कोई विचारक गंभीर विचार मंथन के बाद कुछ निष्कर्ष निकालता है तो वह निष्कर्ष समाज की प्रचलित मान्यताओं से कुछ भिन्न होता है। यदि उक्त निष्कर्ष समाज की तात्कालिक समस्याओं के समाधान में निर्णायक परिणाम देता है तो उक्त विचारक महापुरूष बन जाता है। उक्त महापूरूष के निष्कर्षो को सामान्य लोग बिना विचार किये ही स्वीकार करने लग जाते है। विचारक से महापुरूष बनने तक के बीच के कालखंड में विचारों को समाज तक पहुंचाने के लिये एक संगठन की आवश्यकता होती है। ऐसा संगठन उक्त विचारक के जीवन काल में भी बन सकता है और जीवन पश्चात भी। संगठन विचारों को समाज तक पहुॅचाने की व्यवस्था करता है और जब उक्त विचार सफल प्रमाणित हो जाता है तब उक्त विचार को धीरे-धीरे रूढ बनाकर उन पर संगठन कुन्डली मारकर बैठ जाता है। इस तरह संगठन विचारों की कब्र होता है। संगठन के माध्यम से विचार सुरक्षित, अदृष्य, दीर्घकालिक और अनुपयोगी हो जाते है। संगठन विचारों को पुनर्विचार से दूर कर देते है। तात्कालिक समस्याओं के समाधान के लिये जब कोई नया विचार सामने आता है तो उक्त संगठन के महापुरूष को आक्रमण झेलने पडते है। प्रत्येक संगठन अपने महापुरूष के साथ किये गये दुर्ष्यवहार को अत्याचार घोषित करता है जबकि वह स्वयं भी आगे वाले विचारकों के साथ बिल्कुल वैसा ही अत्याचार करना शुरू कर देता है।
महात्मा गांधी ने गुलाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। उन्होंने इस संग्राम के लिये सत्य और अंहिंसा को मुख्य मार्ग घोषित किया। विदेशी वस्तु बहिष्कार उनका सहायक मार्ग था। धार्मिक, सामाजिक, जातीय एकता उक्त संग्राम के उपमार्ग थे, चर्खा, खादी और गांधी टोपी उक्त संग्राम की पहचान स्वरूप थे. लक्ष्य सिर्फ एक था, बिल्कुल स्पष्ट और सर्वमान्य था राष्ट्रीय स्वराज्य। स्वराज्य के लिये उन्होने मार्ग, सहायक मार्ग, उपमार्ग, सहायक उपमार्ग आदि तय किये और तदनुसार ही वे इन मार्गों की उपयोगिता भी मानते थें। गांधी जी ने सत्य और अंहिसा से कभी समझौता नहीं किया क्योंकि यह उनका मुख्य मार्ग था। चर्खा, खादी, गांधी टोपी से वे समझौते के लिये तैयार थे। यदि कोई व्यक्ति भिन्न वस्त्र टोपी या भिन्न संगठन वाला भी हो तो वे उसका बहिष्कार नहीं करते थें। गांधी के आन्दोलन में सब प्रकार के लोग शामिल थे चाहे वे गांधी जी के बताये कुछ उप मार्गो से असहमत ही क्यो न हों। गांधी जी ने अपने जीवन में किसी को अछूत नहीं माना क्योंकि उनके विचारों में अछूत कार्य होता है कर्ता नहीं। उन्होंने नारा दिया पाप से घृणा करो पापी से नहीं। गांधी जी ऐसे ऐसे बीमारों की भी सेवा करते थे जिनकी बीमारी गांधी जी को नुकसान कर सकती थी किन्तु उन्होंने ठीक करने का भरसक प्रयास किया।
गांधीजी के बाद उनके विचारों ने गांधीवाद का स्वरूप ग्रहण किया। गांधीवाद की एक सर्वमान्य परिभाषा थी तत्कालीन समस्याओं का सत्य और अंहिसा के मार्ग से समाधान का प्रयत्न। इसमें तत्कालीन समस्याओं का समाधान लक्ष्य था और सत्य अंहिंसा मार्ग। गांधी के बाद गांधीवाद विचारों से दूर होने लगा और धीरे-धीरे विचारों से हटकर संस्कार बन गया। अब उसकी परिभाषा बदल कर हो गई सत्य औेर अहिंसा के आधार पर ही समस्याओं के समाधान का प्रयत्न। सत्य और अंहिसा लक्ष्य बन गया, समाधान गौण। समस्याओं की पहचान के लिये तात्कालिक परिस्थियों के साथ कोई तालमेल नहीं रहा और धीरे-धीरे गांधी से दूर होता चला गया।
गांधी की मृत्यु के बाद राजनेताओं ने पंडित नेहरू के नेतृत्व में गांधीवाद के दुरूपयोग की योजना बनाई। गांधी संस्थाओं के पक्षधर थे और नेता संगठन बनाना चाहते थे। उन लोगों ने सीधे-साधे विनोबा को धोखा देकर एक सर्व-सेवा-संघ नाम से गांधीवादियों का संगठन बना दिया। बिचारे विनोबा जीवन भर समाज सुधार का कार्य करते रहे और देशभर के राजनेता सारे हिन्दुस्तान को राजनैतिक आधार पर गुलाम बनाने में सफल हो गये। सर्वोदय के लोग आज भी देशभर में समाज सेवा के उच्चकीर्ति मान बनाते देखे जाते है और सारा मालमलाई 70 वर्षो से देश के नेता खा रहे है लेकिन सर्वोदय के लोगों की या तो आंख बंद है या असहाय है अथवा हो सकता है जूठन से संतुष्ट हो।
इसमें शामिल अधिकांश लोग बहुत त्यागी चरित्रवान पद और धन के प्रलोभन से दूर उच्च संस्कारवान है किन्तु उनमें विचार एवं चिन्तन शक्ति का सर्वथा अभाव है। वे समस्याओं का ठीक-ठीक आॅकलन नहीं कर पातें। वे समस्याओं के समाधान के लिये अहिंसा को शस्त्र के रूप में प्रयोग न करके अपने पलायन की ढाल के रूप में उपयोग करते है। वे विपरित विचार वालों से तर्क नहीं कर सकते। विचार मंथन इनके आचरण में दूर-दूर तक नहीं है।
गांधी विपरीत विचार रखने वाले को अछूत नहीं मानते थें गांधीवादी उन्हें अछूत मानकर घृणा करते है। गांधी जी स्वयं को इतना दृढ मानते थे कि उन पर असत्य के प्रभावी होने का कोई भय नहीं था परिणाम स्वरूप वे सबके बीच अपनी वात रखने का साहस करते थें। गांधीवादी इतने भयभीत है कि वे दुसरों के विचारों से प्रभावित होने के डर से उनसे दूर भागते है। गांधी जी वैचारिक विस्तार के पक्षधर थे। गांधीवादी संगठन की सुरक्षा में ही परेशान रहते है। गांधी जी इस्लाम के खतरे को भली भांति समझते हुए भी एक रणनीति के अन्तर्गत उनसे समझौता करते थे। गांधीवादी इस्लाम के खतरे को न समझते है न समझना चाहते है। गांधी जी पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष थे। वे साम्प्रदायिकता को कभी स्वीकार नहीं करते थे। गांधीवादी धर्मरिपेक्षता का एक ही अर्थ समझते है संघ का विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण। गांधी जी साम्यवाद को घातक विचार मानते थे गांधीवादी साम्यवाद को समझते ही नहीं। मुझे तो आश्चर्य होता है कि हिंसा का सैद्धान्तिक रूप से भी और व्यावहारिक रूप से भी समर्थन करने वाले साम्यवादियों और आतंकवादी मुसलमानोें के विरूद्ध गांधीवादियों का न कभी प्रत्यक्ष विरोध दर्ज होता है और न परोक्ष। किन्तु यदि प्रषासन इनके विरूद्ध कोई कठोर कदम उठाता है तो गांधीवाद अवश्य ही विरोध में हल्ला करना शुरू कर देते है। गांधी जी सरकारीकरण के बिल्कुल विरूद्ध थे और समाजीकरण के पक्षधर थे गांधीवादी सरकारीकरण के पक्षधर है और समाजीकरण को समझते ही नहीं। वे तो व्यापारीकरण के स्थान पर सरकारीकरण की वकालत तक करते है। गांधी जी निजीकरण के स्थान पर समाजीकरण चाहते थे। गांधीवादी निजीकरण का विरोध तो करते है परन्तु वे सरकरी कारण को या तो समझते नहीं या उनके संस्कार उनकी समझदारी में बाधक है।
आज देश में ग्यारह समस्याएँ बढ रहीें है। भारत के सभी राजनैतिक दल इन ग्यारह समस्याओं के समाधान की अपेक्षा दस प्रकार के नाटकों में संलग्न है। इन राजनैतिक दलो की नीतियाँ तो गलत है ही नीयत भी गलत है। साम्यवादी भी अपने राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये इन दस नाटकों को प्रोत्साहित करते रहते हैं। संघ परिवार की नीयत अर्ध राजनैतिक है। उसकी नीतियाँ साम्प्रदायिकता से भी प्रभावित है और पूूँजीवाद से भी। परिणाम स्वरूप वे सात समस्याओं के तो समाधान की चिन्ता करते है किन्तु आर्थिक असमानता और श्रम शोषण पर नियंत्रण की वे कभी नहीं सोचतें। मिलावट की रोकथाम के विषय में भी वे चुप ही रहते है। क्योंकि मिलावट और व्यापार का चोली दामन का संबंध बन गया है। सबसे दुखद है कि संघ परिवार साम्प्रदायिकता के विषय में भी स्पष्ट नहीं है। उसके अनेक कार्य तो साम्प्रदायिकता को मजबूत करने मे ही सहायक होते है। गांधीवादियों का वर्ग ही एक ऐसी जमात है जो राजनीति से संबंध नहीं रखती किन्तु हमारा दुर्भाग्य है कि इनकी नीयत ठीक होते हुए भी नीतियाँ देश की सभी ग्यारह समस्याओं के विस्तार में सहायक हो रही है। राजनीतिज्ञ जानबूझकर नाटक करते रहते हे और गांधी वादी अनजाने में उसके पात्र बन जाते हैं। मेरा यह आरोप अत्यन्त ही गंभीर हैं और हो सकता हैं कि यह गलत ही हो किन्तु अब तक मैंने जो समझा वह ऐसा ही है और यदि इस संबंध में कोई बहस छिडती है तो मैं उसका स्वागत ही करूँगा।
मैंने गांधी को बहुत सुना और समझा है। गांधीवाद को भी प्रयोग करके पूरी तरह सफल होता देखा है और गांधीवादियों से भी खूब चर्चा की हैं। गांधीवादी तर्क से बहुत भागते है। वे स्वयं को अन्य लोगों से अधिक श्रेष्ठ और आचरणवान मानकर दुसरों से घृणा करते है। किसी भी मामले मे अपनी बात कहीं नहीं कहते बल्कि जो भी कहते है उसमें गांधी, विनोबा, जयप्रकाश का नाम जोडे बिना न एक लाईन लिख सकते है, न बोल सकते है और न भाषण दे सकते हेै। उन्होंने गांधी, विनोबा, जयप्रकाश को कभी समझने का प्रयास किया हो तब तो वे उनकी बात को अपने शब्दों में वर्तमान स्थितियों के साथ जोडकर कह पातें। उन्हे तो सभी समस्याओं के समाधान के रूप में गांधी, विनोबा, जयप्रकाश के उस समय की परिस्थितियों में कहे गये शब्दों के आधार पर बने उनके संस्कार ही पर्यात्त दिखते है और यही आज की सबसे बडी समस्या है। अधिकांश गांधीवादी इन बातों को समझते भी है और गुप्त रूप से चर्चा भी करते है किन्तु संस्कारित गांधीवादियों के समक्ष वैचारिक गांधीवादी हमेशा भयभीत रहते है। कितनी चिंता की बात है कि जो गांधी गुजरात से अहिंसा की शिक्षा लेकर सारी दुनियां का मार्गदर्शन करने में सफल हुआ उसी गुजरात से हिंसा का पाठ सीखकर नरेन्द्र मोदी सारी दुनियां में लगातार सफल होते जा रहे है। क्योंकि सर्वोदय के पास मृत गांधी, विनोबा, जयप्रकाश का नाम मात्र है, अपने विचार नहीं। वे संघ की आलोचना तक सीमित है, विकल्प नहीं बता सकते। चितंन का विषय है कि जो गांधी अंहिसा और सत्य को सर्वोच्च स्थान देते थे वहीं गांधीवादी अब नक्सलवादियों और मुस्लिम उग्रवादियों के पक्ष में खडे दिखते है। जिस गांधी को हिन्दुओं के बहुमत का समर्थन प्राप्त था उन हिन्दुओं को गांधीवादियों ने धक्का देकर संघ परिवार के पक्ष में खडा कर दिया क्योंकि गांधी के पास मौलिक चिंतन था और सर्वोदय के पास मात्र नकल। गांधी के पास समझदारी थी तो सर्वोदय के पास शराफत। सर्वोदय के लोग साम्यवादियों के जाल में फॅसकर इतने अंधे हो गए थे कि उन्हें साम्यवादी गांधी व विनोबा के समान दिखते थे। एक बाद ठाकुरदास बंग, सिदराज ढडडा आदि ने इस संगठनात्मक ढाॅचे को तोडने का प्रयास किया तो कुमार प्रशांत ने आगे आकर साम्यवादियों के पक्ष में इस सुधार का भरपूर विरोध किया और सफलता पायी।
मैं महसूस करता हूँ कि स्वतंत्रता के बाद जिन ग्यारह समस्याओं का विस्तार हुआ है उसका समाधान सिर्फ गांधीवाद के पास है। न तो इसका समाधान पूंजीवाद के पास है न ही साम्यवाद के पास। ये दोनों ही या तो समस्याओं को बढा सकते है या उससे लाभ उठा सकते हैं। गांधीवाद ही इनके समाधान का मार्ग निकाल सकता है और आज की समस्याओं के समाधान के निमित्त गांधीवाद को कोई गांधी ही परिभाषित कर सकता है गांधीवादी नहीं। क्योंकि गांधी दाण्डी यात्रा समस्या के समाधान के लिये करते थे और ये गांधी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए नकल करते है। गांधी जी के वस्त्र किसी पूर्व महापुरूष की नकल न होकर भारत के आम निवासियों के दुख दर्द की असल थें। ये लोग नकल करके गांधी चश्मा,उनके कपडे और उनकी दाण्डी यात्रा करके गांधी बनना चाहते हैै। ये गांधी को कभी समझे नहीं तो गांधीवाद को क्या समझेगें। इस लिए आज भारत को एक गांधी की जरूरत है, एक ऐसे गांधी की जो अपना नाम गांधी रखे या कोई और, वह चाहे खादी पहने या कुछ और, वह दाण्डी यात्रा करे या कोई और यात्रा करे यह महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि वह गांधी के सत्य और अहिंसा का डण्डा ओर झण्डा उठाकर ग्यारह समस्याओं के समाधान के लिए निकल पडे और भारत की सभी हिंसक, साम्प्रदायिक, जातीय स्वार्थान्ध, राजनैतिक शक्तियों को एकसाथ चुनौती देकर घोषणा करें कि अब तक हमने बहुत सहा अब सहेगें नही, हम चुप रहेंगे नहीं, झंडा उठा लेगे हम।
मै जानता हूँ कि स्थापित संगठन ऐसे विचारों को बरदाश्त नहीं कर सकते। यदि किसी गांधी ने आकर गांधीवाद को इस ढंग से परिभाषित किया तो उक्त विचारक गांधी को सबसे पहले टकराव संस्कारित गांधीवादियों का ही झोलना पडेगा और वह टकराव किसी भी सीमा तक जा सकता है। यदि गांधी ने इन संस्कारित गांधीवादियों को समझाकर कोई मार्ग निकाल लिया तब तो उसके जीते जी ग्यारह समस्याओं के समाधान का मार्ग निकल सकता हे अन्यथा उनका भी वही हाल होगा जो इशुमसीह का हुआ गांधी का हुआ और तब उनके बाद उनके नाम से एक नया संगठन नयावाद खडा होगा औंर दुनियां में वादों के साथ एक नया वाद जुडकर वाद-विवाद में सहायक बन जायेगा।

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