मंथन क्रमाँक107- भारत की राजनीति और राहुल गांधी–बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 6, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः-

1. धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में। धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है और राजनीति व्यवहार प्रधान। धर्म में नैतिकता प्रमुख होती है तो राजनीति में कूटनीति प्रमुख होती है

2. लोकतंत्र तानाशाही की तुलना में अच्छा तथा लोकस्वराज की तुलना में बुरा समाधान माना जाता है। लोकतंत्र में लम्बे समय बाद अव्यवस्था निश्चित होती है और उसका समाधान होता है तानाशाही

3. भारत की राजनीतिक व्यवस्था लोकतंत्र न होकर संसदीय तानाशाही के रूप में कार्यकर रही है। तंत्र मालिक है और लोक गुलाम

4. स्वतंत्रता के बाद मनमोहन सिंह सबसे अधिक लोकतांत्रिक और सफल प्रधानमंत्री माने जाते है। पुत्रमोह में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को अस्थिर किया।

भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी के कार्यकाल से ही कांग्रेस पार्टी कोई राजनैतिक दल न होकर एक पारिवारिक सत्ता के रूप में स्थापित हो गयी थी जो आज तक यथावत है। जो लोग इसे दल मानते है वे पूरी तरह से भ्रम में है। किन्तु यदि नैतिकता और राजनीति के समन्वय की बात करे तो नेहरू और इंदिरा गांधी अधिक अनैतिक तथा कूटनीतिज्ञ के रूप में माने जाते है जबकि राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल अपेक्षाकृत अधिक नैतिकता के पक्षधर। इंदिरा गांधी, पंडित नेहरू और संजय गांधी के व्यक्तिगत आचारण के साथ यदि राजीव और सोनिया के अचारण की तुलना की जाये तो जमीन आसमान का फर्क दिखता है। युवा अवस्था में विधवा होने के बाद भी सोनिया गांधी की प्रंशसा करनी चाहिये। यह प्रंशसा तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब सोनिया जी विदेशी संस्कार में पली बढी हैं। इस मामले में राहुल गांधी की भी प्रशंसा करनी चाहिये कि जहॉ 16 से 20 वर्ष के बीच के भारतीय नवयुवक और धर्मगुरू अपने को सुरक्षित नही रख पा रहे हो वही 48 वर्ष का नौजवान अविवाहित राहुल गांधी अच्छा आचरण प्रस्तुत कर रहे हो। सोनिया जी ने जिस तरह प्रधानमंत्री पद का मोह छोडकर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया वह उनकी राजनीति में नैतिकता की पराकाष्ठा कही जा सकती है किन्तु बाद में उन्होंने पुत्रमोह में पडकर जिस तरह मनमोहन सिंह को कमजोर किया वह उनकी नैतिकता के लिये एक अनैतिक आचरण ही माना जाना चाहिये। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जितनी अव्यवस्था बढी उसका बडा भाग सोनिया गांधी की चालाकी से पैदा हुआ था। उस समय मैनें ज्ञान तत्व क्रमॉक 279 और 282 में लिखकर सोनिया जी को सलाह दी थी कि वे राहुल को अभी आगे स्थापित करने की जल्दबाजी न करे अन्यथा नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना निश्चित हो जायेगा। मैंने यह भी लिखा था कि अभी राहुल गांधी शराफत के मामले में बहुत परिपक्व है किन्तु कूटनीति का अभाव है जो किसी राजनेता का अनिवार्य गुण माना जाता है। मेरी बात नहीं सुनी गयी और परिणाम जो होना था वह हुआ। यदि कोई उक्त अंक फिर से पढना चाहे तो मैं आवश्यकतानुसार फेसबुक या व्हाटसअप एप में डाल सकता हूॅ।

पांच वर्ष बीत चुके है और अभी भी मेरी धारणा वहीं बनी हुयी है कि राहुल गांधी में गांधी के गुण अधिक है और नेहरू के कम। राहुल गांधी सफलतापूर्वक कांग्रेस अध्यक्ष का कार्य तो कर सकते है किन्तु प्रधानमंत्री के पद के लिये अभी पूरी तरह अयोग्य है क्योंकि उनमें कूटनीति का अभाव है शराफत बहुत अधिक है। वैसे भी राजनैतिक सूझबुझ यही कहती है कि राहुल गांधी की जगह किसी अन्य विपक्षी नेता अथवा सत्तारूढ दल में से किसी को भी आगे करके पांच वर्षो के लिये राहुल गांधी को प्रतीक्षा करनी चाहिये। यह प्रतीक्षा देश हित में भी होगी, कांग्रेस पार्टी के हित में भी होगी और राहुल गांधी के हित में तो होगी ही।

वर्तमान समय में देश की राजनीति ठीक दिशा में जा रही है। नरेन्द्र मोदी बिल्कुल ठीक दिशा में जा रहे है। प्रतिपक्ष की भूमिका में भी नितिश कुमार और अखिलेश यादव तक राजनीति केन्द्रीत हो रही है। राहुल गांधी इस राजनैतिक ध्रुवीकरण के बीच अनावश्यक पैर फंसा रहे हैं। सत्ता के लालच में जाति संघर्ष अथवा क्षेत्रीयता का उभार अल्पकालिक लाभ दे सकता है किन्तु उससे दीर्घकालिक नुकसान संभावित है। गुजरात में अलपेश ठाकुर के माध्यम से जो लाभ उठाया गया उसका नुकसान भी स्वाभाविक है।

राहुल गांधी के आचरण से भारत की राजनीति मे आमूल चूल बदलाव दिख रहा है। अब तक भाजपा और संघ हिन्दुत्व के अकेले दावेदार थे। साथ ही मुस्लिम कट्टरवाद वोट बैंक के रूप में अन्य सभी राजनीतिक दलों की ढाल बना हुआ था। राहुल गांधी ने पहल करके इस समीकरण की पूरी तरह से बदल दिया है। अब भाजपा और संघ हिन्दू-मुस्लमान के बीच ध्रुवीकरण करने में कठिनाई महसूस कर रहे है क्योंकि राहुल की पहल के बाद अन्य सभी राजनीतिक दलों ने भी हिन्दू वोट बैंक का महत्व समझ लिया है। मैं पांच वर्ष पहले भी स्पष्ट था और आज भी मानता हूॅ कि इस बदलाव में राहुल गांधी की कोई राजनैतिक योजना न हो कर यह उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है जो पहले स्पष्ट नहीं दिख रही थी। राहुल गांधी हिन्दू मंदिरों में अधिक जाकर कोई ढोंग नही कर रहे है क्योंकि राहुल गांधी मे दीर्घ कालिक ढोग की समझ ही नही है। राहुल के जीवन में वास्तविक हिन्दुत्व की धारणा मजबूत हो रही है।

इस हिन्दुत्व के नवजागरण मे भी राहुल गांधी से एक भूल हुई है। नरेन्द्र मोदी एक राजनीति के सफल खिलाडी है तो राहुल गांधी एक असफल अनाडी। एक वर्ष पहले तक यह स्पष्ट दिख रहा था कि संघ परिवार ओर नरेन्द्र मोदी एक साथ नही रह सकेगे । टकराव अवश्य ही होगा और वह टकराव राहुल गांधी के लिये लाभदायक होगा। किन्तु राहुल गांधी ने जिस तरह अल्पकालिक लाभ के लिये संघ के समक्ष प्रवीण तोगडिया का सहारा लिया उसके कारण संघ और मोदी के बीच की दूरी समाप्त हो गयी। अब राहुल गांधी के सामने यह संकट है कि वे कट्टरवादी हिन्दुत्व और जातिय टकराव को एक साथ कैसे रख पायेगे । संघ ने तो पंद्रह दिन पूर्व मोहन भागवत के भाषण के माध्यम से स्पष्ट कर दिया कि वह नरेन्द्र मोदी के साथ नरम हिन्दुत्व की ओर बढेगे। राहुल गांधी के अलावा अन्य सभी विपक्षी दल भी नरम हिन्दुत्व की ओर जाने को लालायित है। राहुल गांधी मे इतनी समझ नही है कि वे कट्टरपंथी इस्लाम और कट्टरपंथी हिन्दुत्व की दो नावो की सवारी एक साथ कर सके। राहुल को चाहिये था कि वे संघ परिवार और मोदी के बीच की दूरी को हवा दें। किन्तु ऐसा लगता है कि वे चूक गये। मैं अभी भी इस मत का हॅू कि सोनियां गांधी के आगे आकर यह घोषणा कर देनी चाहिये कि अगले पांच वर्ष के लिय किसी भी परिस्थिति मे नेहरू इंदिरा परिवार का कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बनेगा। शायद यह घोषणा नरेन्द्र मोदी की सफलता मे बाधक बन सके। शायद पांच वर्ष बाद राहुल गांधी का नम्बर आ जाये अन्यथा अधिक सम्भावना यही दिखती है कि राहुल गांधी माया मिले न राम की तरह न गांधी जैसे सम्मानित स्थान पा सकेगे और न ही नेहरू और इंदिरा सरीखे राजनीतिक शक्ति पा सकेगें।

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