मंथन क्रमांक- ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on November 19, 2018 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः

1. दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;
2. धर्म शब्द के अनेक अर्थ प्रचलित है। व्यक्ति के दुसरों के हित में किये जाने वाले निस्वार्थ कार्य को भी धर्म कहते है तो समाज को उचित मार्गदर्शन करने वाली प्रणाली भी धर्म कही जाती है;
3. धर्म के दस लक्षणों में ईश्वर अथवा कोई पूजा पद्धति शामिल नहीं है। धर्म गुण प्रधान जीवन पद्धति हैं तो सम्प्रदाय संख्या विस्तार प्रधान संगठन होता है;
4. हिन्दु विचार तर्क और श्रद्धा के समन्वय से आगे बढता है, ईसाई प्रेम, सेवा, करूणा, सहायता और सदभाव से और इस्लाम संगठन शक्ति से;
5. धर्म जीवन पद्धति है सम्प्रदाय संख्या विस्तार। धर्म में न्याय प्रधान होता है सम्प्रदाय में अपनत्व प्र्रधान। धर्म का चरित्र संस्थागत होता है सम्प्रदाय का संगठनात्मक;
6. धर्म कर्तव्य प्रधान होता है सम्प्रदाय अधिकार प्रधान, धर्म समाज व्यवस्था का सहयोगी होता है सम्प्रदाय समाज का सहभागी;
7. धर्म किसी विचार अथवा धर्मग्रन्थ को अतिंम सत्य नहीं मानता, देश काल परिस्थिति अनुसार संशोधन सम्भव है। सम्प्रदाय में संशोधन सम्भव नहीं है;
8. धर्म का न कोई प्रारम्भकर्ता होता है न कोई प्रारंभिक समय। धर्म शास्वत चलता है। सम्प्रदाय किसी व्यक्ति अथवा किसी धर्म ग्रन्थ द्वारा किसी खास समय से शुरू होता है;
9. धर्म व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मान्यता देता है, सम्प्रदाय ऐसी मान्यता नही देता। सम्प्रदाय व्यक्ति को अपनी संगठनात्मक सम्पत्ति मानता है;
10. धर्म में अनुशासन अनिवार्य नही है और विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। सम्प्रदाय में अनुशासन भी अनिवार्य है और वैचारिक स्वतंत्रता भी नहीं है;
11. धर्म समाज को सर्वोच्च मानता है और राज्य का मार्ग दर्शन करता है। सम्प्रदाय संगठन को सर्वोच्च मानता है और राज्य पर नियंत्रण करता है;
12. धर्म का मूल स्रोत दर्शन है तो सम्प्रदाय का संस्कृति। हिन्दु धर्म का अधिकांश आज भी दर्शन को महत्व देता है तो इस्लाम में दर्शन को महत्व देने वाले सूफी लगातार कमजोर किये जा रहे हैं। ईसाईयत में लगभग बीच की स्थिति है;
13. धर्म में आस्था पर विज्ञान भारी होता है। परिस्थिति अनुसार आस्था में संशोधन संभव है। सम्प्रदाय में आस्था विज्ञान पर भारी होती है और आस्था में संशोधन संभव नही है;
14. धर्म के नाम पर पूरी दुनियां में सम्प्रदायों ने जितनी हिंसा और अत्याचार किये है उतना अपराधियोें ने भी नहीं किये।

सम्प्रदाय का तो अर्थ कठिन नहीं किन्तु धर्म की व्याख्या बहुत कठिन हेै। धर्म के अनेक अर्थ हैैं। धर्म के अर्थ परम्परागत भी होते हैं और शास्त्र सम्मत भी। धर्म का अर्थ व्यक्तिगत, पारिवारिक या राष्ट्र के लिये किये जाने वाले कर्तव्य से भी जुड सकता है तो सम्पूर्ण मानव समाज से भी। धर्म वर्ण आश्रम व्यवस्था के परिपालन से भी जुड सकता है। यही कारण है कि धर्म का कोई निश्चित अर्थ नहीं निकल पाता और सम्प्रदाय भी धर्म शब्द के साथ स्वयं को जोडने में सफल हो जाता है।

वर्तमान दुनियां में हम पिछले तीन हजार वर्षो की समीक्षा करे तो दो ही धर्म सनातन दिखते है एक आर्य सनातन हिन्दू जीवन पद्धति दूसरा पाश्चात्य व यहूदी जीवन पद्धति। हिन्दू जीवन पद्धति से कुछ संगठन निकलकर तेजी से बढे जो प्रारम्भ में संगठन रहे, जब उनका विस्तार कई वर्षो तक जारी रहा तब वे सम्प्रदाय कहे जाने लगे और ऐसे सम्प्रदाय जब कई हजार वर्षो तक विस्तार करते रहे तो उन्होंने अपने को धर्म कहना शुरू कर दिया। ऐसे सम्प्रदायों में ही जैन, बौद्ध अथवा सिख माने जाते है। इसी तरह की प्रक्रिया यहूदियों में भी दोहरायी गयी और कालांतर से उसी तरह ईसाई और इस्लाम नामक सम्प्रदाय धर्म के रूप में आगे आये। हिन्दू और यहूदी मान्यताएं अलग-अलग प्रवृत्तियों में समन्वय को महत्व देती थी और सम्प्रदाय समन्वय की जगह किसी एक दिशा को अधिक महत्व देने लगे। जैन और बौद्ध ने अहिंसा को अधिक महत्व दिया तो सिखों ने हिंसा को, उसी तरह ईसाईयों ने अंहिसा को अधिक महत्व दिया तो इस्लाम ने हिंसा को। इन विपरित विचारधाराओं के वैचारिक टकराव ने हिन्दू और यहूदियों की धार्मिक समन्वय की नीतियों को गंभीर क्षति पहुॅचायी। गुण प्रधान धर्म कमजोर होता गया और संगठन प्रधान धर्म मजबूत होता रहा।

ऐसे ही कालखण्ड में एक नये धर्मविहीन संगठन का ’साम्यवाद’ के नाम से उदय एवं प्रवेश हुआ। उसने वर्ग संघर्ष और ईश्या, द्वेष को मुख्य आधार बनाकर बहुत तेजी से विस्तार किया। यद्यपि उतनी ही तेजी से साम्यवाद का पतन भी हुआ और वह संगठन से आगे बढकर धर्म का नाम ग्रहण नहीं कर सका। आज मजबूरी में साम्यवाद यहूदियों के इस्लाम और हिन्दुओं के गांधीवाद का सहारा लेकर अपना अस्तिव बचा रहा है।

पूरी दुनियां में धर्म और सम्प्रदाय इतने समानार्थी हो गये है कि दोनों के बीच अंतर करना ही कठिन हो गया है। गुण प्रधान धर्म संकट में है और संगठन प्रधान सम्प्रदाय समाज से लेकर राज्य व्यवस्था तक में धर्म के नाम पर स्थापित हो गया है। भारत की स्थिति तो और भी जटिल है। धर्म निरपेक्षता के नाम पर भारत में सम्प्रदायों ने हिन्दुत्व प्रधान धर्म व्यवस्था को ही संकट में डालना शुरू कर दिया है। यदि धर्म का अर्थ गुण प्रधान है तो कोई भी राजनीतिक व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकती। किन्तु यदि धर्म का अर्थ साम्प्रदायिक संगठन से जुडा हो, पूजा पद्धति अथवा किसी संस्कृति को आधार मानता हो तो उस आधार पर राज्य व्यवस्था को पूरी तरह ही धर्मनिरपेक्ष होना चाहिये। धर्म के दोनों विपरीत अर्थ यह निष्कर्ष नही निकलने देते कि राज्य को धर्मप्रधान होना चाहिए अथवा धर्मनिरपेक्ष। यह टकराव लम्बे समय से जारी है और अब वास्तविक धर्म के समक्ष संकट के रूप में खडा है। साम्प्रदायिक समूह आपस में एक-दूसरे से हिंसा टकराव करते है और परिणाम स्वरूप बीच मे रहने वाले वास्तविक धार्मिक लोग उसका नुकसान उठाते है। परिणामस्वरूप गुण प्रधान धर्म कमजोर होता है और साम्प्रदायिकता मजबूत।

वर्तमान दुनियां में इस्लाम सर्वाधिक खतरनाक सम्प्रदाय के रूप में चिन्हित हो रहा है। सूफी सरीखे धार्मिक मान्यता वाले संत किनारे किये जा रहे हैं। इस्लाम की धार्मिक पांच प्रतिबद्धताओं की जगह विवादास्पद साम्प्रदायिक प्राथमिकताएं मजबूत हो रही हैं। हिन्दू धर्म वाले भी असमंजस के शिकार हैं कि वे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये संघ परिवार की बात मानकर संगठनात्मक साम्प्रदायिकता के मार्ग की ओर बढ जावें अथवा गुण प्रधान हिन्दुत्व के मार्ग पर चलते हुए संगठनात्मक इस्लाम से मुक्ति के प्रयत्न को मजबूत करें। जिस तरह संगठित इस्लाम की आशा की एकमात्र किरण चीन ने इनके खिलाफ अमानवीय कदम उठाये हैं तथा जिस तरह सारी दुनियां में संगठित इस्लाम के समक्ष धार्मिक मार्ग पर लौटने या समाप्त होने का स्पष्ट विकल्प दिखने लगा है उससे स्पष्ट दिखता है कि गुण प्रधान हिन्दुत्व को धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिये। वैसे भी हिन्दुओं के सामान्य जनजीवन में सहजीवन का धार्मिक पाठ इतने अन्दर तक प्रवाहित है कि उन्हें बदलना आसान नहीं। ऐसी स्थिति में हिन्दुओं को अपनी सनातन धर्म की विचार धारा को छोडकर साम्प्रदायिक होने की जल्दबाजी क्यों करनी चाहिये? अच्छा होगा कि हम साम्प्रदायिकता के विरूद्ध जारी विश्वव्यापी प्रयत्नों के साथ तालमेल करें।

फिर भी सतर्कता आवश्यक है। अब तक मानवता के नाम पर साम्प्रदायिकता के खतरनाक सांपों को दूध पिलाया गया उन्हें अब जहर देने की जरूरत है। जो साम्प्रदायिक तत्व किसी संकट के कारण विदेशों से भारत का रूख करते हैं वैसे धर्म विरोधियों से मानवता का व्यवहार कैसा? सरकारों को मजबूर किया जाये कि वे अब पुनः वैसी भूल न करें।

धर्म एक पवित्र शब्द है जिसे साम्प्रदायिकता ने कलंकित कर दिया है। साम्प्रदायिकता से मुक्ति भारत के प्रमुख लक्ष्य में से एक होना चाहिये। मुस्लिम साम्प्रदायिकता ने जिस तरह धार्मिक हिन्दुत्व के समक्ष असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है उससे मुक्ति के किये भारत सरकार को तत्काल पहल करनी चाहिये।

1. सम्पूर्ण भारतीय संविधान से धर्म शब्द को निकालकर समान नागरिक संहिता लागू कर देना चाहिये। राज्य के समक्ष व्यक्ति एक इकाई हो। कोई अल्पसंख्यक बहुसंख्यक न हो;
2. धर्म परिवर्तन कराने के प्रयत्नों को दण्डनीय अपराध घोषित किया जाये;
3. जो मुसलमान संगठनात्मक इस्लाम से हटकर धार्मिक इस्लाम की ओर बढें उन्हें सम्पूर्ण संरक्षण दिया जाना चाहिये;
4. विदेशों से चोरी छिपे आये लोगों को अमानवीय तरीके से भारत से बाहर करके दुनियां को स्पष्ट संदेश दिया जाये कि भारत मानवता के नाम पर अपने सहजीवन को खतरे में नहीं डाल सकता।

जो मित्र धैर्य छोडने की बात कर रहे है उनसे मेरा निवेदन है कि वे अपना धर्म छोडने की गलती करने की अपेक्षा साम्प्रदायिक तत्वों को साम्प्रदायिकता छोडने के लिये मजबूर करने हेतु राज्य को प्रेरित करें। जिस तरह राहुल, ममता, अखिलेश ने हिन्दुत्व के पक्ष में यू टर्न लिया है उससे आशा की किरण मजबूत होती है कि धर्म की जडे पाताल तक हैं और रहेंगी।

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