मंथन क्रमाँक-117 ’’भारतीय राजनीति मे अच्छे लोग’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on January 3, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

समाज मे अच्छे शब्द की जो परिभाषा प्रचलित है उस परिभाषा मे भी राजनीति को कोई अच्छा स्थान प्राप्त नही हैं। राजनीति कभी भी न समाज सेवा का सर्वश्रेष्ठ आधार बनी न ही व्यवस्था परिर्वतन का। इसलिये राजनीति का नाम आते ही बहुत से अच्छे लोग उसके प्रति नफरत का भाव दिखाना शुरू कर देते है। किन्तु राजनीति समाज व्यवस्था का एक अनिवार्य अंग होने से हम उस प्रक्रिया से बिल्कुल अलग नही हो सकते क्योकि हम चाहे राजनीति से कितनी भी दूरी क्यो न बना लें किन्तु उसका तो हमारे जन जीवन पर प्रभाव पडना ही है। शौच कर्म और शौचालय से हम चाहे कितनी भी घृणा क्यो न करते हों किन्तु वह हमारे जीवन प्रणाली का अभिन्न अंग होने से उसकी चिन्ता और व्यवस्था तो हमें करनी ही होगी।

राजनीति मे अच्छे शब्द की परिभाषा देशकाल परिस्थिति अनुसार बदलती रहती है। स्वतंत्रता के पूर्व राजनीति मे अच्छे लोग की परिभाषा यह थी कि वह व्यक्ति स्वतंत्रता संघर्ष के लिये किस सीमा तक संघर्ष और त्याग करता है। उस समय लाभ या भोग की तो कोई कल्पना ही नही थी। स्वतंत्रता के बाद यह परिभाषा बदली ओैर अच्छे लोग वे कहे जाने लगे जो अपने अपने परिवार के या अपने संगठन के लिये आर्थिक लाभ उठाने से दूर रहकर अन्य सम्मान या सुविधाएॅ लेते रहे । वर्तमान समय मे राजनीति मे अच्छे शब्द की परिभाषा और संकुचित होकर सिर्फ अपने या परिवार के आर्थिक लाभ से दूरी तक आकर सिमट गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि कोई व्यक्ति अपने संगठन, दल, जाति या धर्म के लाभ तक ही सीमित रहकर स्वय अपने या परिवार के लिये आर्थिक लाभ से बच जाता है तो वह अच्छा आदमी है। अब तो धीरे-धीरे यह परिभाषा भी और संकुचित होने की स्थिति में है क्योकि अब तो ऐसे लोग भी राजनीति मे अपवाद स्वरूप ही बचे है। इसलिये धीरे-धीरे अच्छे लोग की परिभाषा बदलकर यह बन गई है कि जो व्यक्ति अपने व्यक्तिगत या पारिवारिक लाभ के लिये बलात्कार, हत्या, लूटपाट, जालसाजी आदि का सहारा लिये बिना राजनीति मे सक्रिय रह सके वह अच्छा आदमी है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि कोई व्यक्ति कितना भी भ्रष्टाचार करे किन्तु उसमे हिंसा, जालसाजी या लूटपाट आदि न हो तो वह अच्छा आदमी है अथवा वह चाहे कितनी भी हिंसा बलात्कार हत्या क्यो न करें किन्तु वह व्यक्तिगत या पारिवारिक हित मे न होकर दल हित या जन हित मेे हो तो भी वह अच्छा आदमी माना जा सकता है। अब तो यह परिभाषा और भी संकुचित होकर ऐसी बन गई है कि जो व्यक्ति ऐसे हत्या बलात्कार डकैती के जघन्य आरोपों मे न्यायालय द्वारा दण्डित न हो जावे तब तक वह अच्छा आदमी है। लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश चैटाला आदि भी अब बुरे आदमी नहीं माने जा रहे हैं। पप्पू यादव, शिब्बू सोरेन तो अच्छे आदमी घोषित ही है। इस तरह यदि हम स्वतंत्रता के तत्काल बाद की अच्छे आदमी की वर्तमान राजनीति मे तलाश करें तो वह संख्या पूरी तरह शून्य हो चुकी है। यदि हम मध्य काल की परिभाषा मे आॅकलन करे तो अब राजनीति मे बहुत थोडे ही लोग बचे है जो स्वयं भ्रष्ट या अपराधी नही है किन्तु दल हित मे किये जा रहे भ्रष्टाचार या अपराध कार्य के विरूद्ध नही। यदि हम वर्तमान की परिभाषा से आॅकलन करे तो वर्तमान मे दस-पांच प्रतिशत प्रत्यक्ष दण्ड प्राप्त नेताओं अपराधियो को छोडकर सभी राजनीतिज्ञ अच्छे लोग है।

समाजशास्त्र के नियम कुछ अलग होते है। जब राजनीति मे अच्छे लोगो की संख्या नगण्य हो जावे अथवा अच्छे लोगो की परिभाषा औसत से नीचे चली जावे तब राजनीति मे समाज के हस्तक्षेप की जरूरत आ जाती है। यह हस्तक्षेप बिल्कुल भिन्न प्रकार का होता है। इस हस्तक्षेप के आधार पर समाज राजनीति मे सुधार के प्रयत्नो को असंभव मानकर पूरी राजनैतिक व्यवस्था को ही बदल देने की सोच शुरू कर देता है। ऐसे समय मे एक जन शक्ति खडी होती है जो समाज मे स्पष्ट विभाजन करके राजनीति से संबद्ध और उससे संघर्षरत जैसे दो गुट बनाती है। इस ध्रुवीकरण मे जो अच्छे लोग राजनीति को सुधारने की कोशिश मे लगे रहते है वे भी शत्रु पक्ष ही माने जाते है चाहे वे कितने भी अच्छे क्यो न हो। सीधा विभाजन होता है जिसमें एक पक्ष होता है राजनीति से जुडे लोगो का और दूसरा होता है व्यवस्था परिवर्तन वालो का। तीसरा कोई पक्ष होता ही नही। जब रामायण काल मे युद्ध की स्थिति आई तो जो लोग रावण को सुधारने के प्रयत्न मंे लगे थे वे सब शत्रु पक्ष मानकर आज भी अपमानित है। जो लोग रावण को छोडकर आये वे सम्मानित है भले ही वे राज परिवार के ही क्यो न हो। उचित अनुचित की सामाजिक परिभाषा को शिथिल करके देशकाल परिस्थिति अनुसार नई परिभाषा बनी जिसमें आंशिक छल कपट को भी मान्य किया गया। महाभारत काल मे भी जो अच्छे लोग कंस के खेमे में रह गये वे आज तक कलंकित है। विदुर और भीष्म पितामह की भूमिका अलग-अलग रही है। बलराम भी चूंकि तटस्थ थे इसलिये कृष्ण के परिवार होते हुए भी सम्मानित नही हुए। कृष्ण ने आवश्यकतानुसार छल कपट का भी सहारा लिया किन्तु वे पूज्य माने गये।

वर्तमान स्थिति मे राजनीति मे अच्छे लोगो की संख्या भी नगण्य हो गई है और परिभाषाएं भी लगातार सिकुडती जा रही है। राजनीति को सुधारने के प्रयत्न असफल सिद्ध हो रहे है। भविष्य मे भी सुधार की कोई संभावना न के बराबर ही है। इसके विपरीत ये नाम मात्र के अच्छे लोग स्पष्ट धु्रवीकरण में बाधक ही हो रहे है। जब महमूद गजनी ने भारत पर आक्रमण किया था तब अपने मुठ्ठी भर सैनिक के आगे गायो का एक झुंड रखकर इसलिये बढा कि ये गाये ही उसकी ढाल बन सकेंगी। आज भी सच्चाई यह है कि राजनीति मे नाम मात्र के अच्छे लोग इन दुष्टो के सुरक्षा कवच का काम कर रहे है।

अटल जी, मनमोहन सिंह सरीखे अच्छे प्रधानमंत्री अब तक राजनीति में सुधार करते-करते शहीद हो चुके है। नीतिश कुमार, नरेन्द्र मोदी और अखिलेष यादव सरीखे अच्छे लोग भी निरन्तर पूरी सक्रियता और ईमानदारी से राजनीति की गुणवत्ता को सुधारते-सुधारते शहादत की कगार पर खडे है। राहुल गांधी भी यह बेमतलब की कसरत करते हुये स्पष्ट ध्रुवीकरण में बाधक ही बनेंगे क्योंकि वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में व्यक्ति बुरे नहीं, व्यवस्था बुरी है जो व्यक्ति को बुरा बनने के लिए प्रेरित या मजबूर कर रही है। एक सीधा सा सिद्धान्त है कि कोई भी राजनैतिक शक्ति किसी व्यक्ति के पास इकठ्ठी होती है तब बुरे लोग उस शक्ति को प्राप्त करने के लिये अधिक सक्रियता से प्रयत्न करते है। परिणाम होता है अच्छे लोगो का पलायन और बुरे लोगो वर्चस्व। यदि व्यवस्था खराब नहीं होती और अच्छे लोग ही व्यवस्था बनाते तो सन् 1947 में राजनीति ने अच्छे लोगो प्रतिशत आज की तुलना में कई गुना अधिक था फिर भी अच्छे लोगों प्रतिशत घटता चला गया तो अब यह मुठ्ठी भर अच्छे लोग बदलाव की मृग तृष्णा में स्पष्ट ध्रुवीकरण में बाधक क्यों बन रहे है। बाबा रामदेव, मोहन भागवत सरीखे लोगो को भी राजनीति से नारदमोह भंग नहीं हो रहा है। ये भी भविष्य में भीष्म पितामाह के सरीखे पूज्य माने जायेगे, विभीषण सरीखे कलंकित नहीं क्योंकि पूरी व्यवस्था कलंक और पूज्य होने की मनमानी परिभाषाएं बनाती रहती है। 70 वर्षो तक कुछ नासमझों और बुरे लोगों ने मिलकर समाज को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के भ्रम जाल में उलझाये रखा तो अब कुछ नये नासमझ और बुरे लोग मिलकर बहुसंख्यक तुष्टिकरण का नया प्रयोग कर रहे है। अब कुछ महीनों से राहुल गांधी फिर से अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की मुहिम को आधार बनाकर सारे बुरे राजेताओं के सुरक्षा कवच बन रहे है। मैं लम्बे समय से महसूस कर रहा हूॅ कि व्यक्ति गलत नहीं है भारत की राजनैतिक व्यवस्था गलत है और व्यवस्था में मौलिक संशोधन ही इसका समाधान हो सकता है।

लोकतंत्र हमारा आदर्श न था न है। विकल्प के अभाव में हमने लोकतंत्र का मार्ग चुना क्योकि लोक स्वराज्य की अवधारणा ही कभी साफ नही हुई और तानाशाही या लोकतंत्र मे एक को हमने चुना। अब हम लोक स्वराज्य को आधार बनाकर लोकतंत्र को चुनौती दे रहे है। लोकतंत्र लगातार या तो अव्यवस्था की दिषा मे बढ रहा है या तानाशाही की दिशा में। भारत में संविधान का शासन है कानून का नहीं। दुर्भाग्य से हमारे राजनेताओं ने स्वतंत्रता के तत्काल बाद ही संविधान और कानून दोनो पर अपना नियंत्रण कर लिया है। मेरे विचार में इसमें प्रमुख भूमिका निभाने वाले संविधान निर्माताओं की नीयत खराब थी तभी उन्होंने संविधान संशोधन के असीम अधिकार भी उसी संसद को दे दिये जो कानून भी बनाती है और पालन भी कराती है। पूरा तंत्र संविधान के अंतर्गत काम करने का ढोंग भी करता है और संविधान को अपनी मुठ्ठी में कैद भी रखता है। भारत में संसदीय लोकतंत्र कहा जाता है किन्तु वास्तव में संसदीय तानाशाही है क्योंकि संविधान का शासन लोकतंत्र होता है और शासन का संविधान तानाशाही। समय आ गया है कि अब समाज इन बुरे लोगों पर नियंत्रण के लिये सीधा हस्तक्षेप करे जिसकी शुरूआत भारतीय संविधान को तंत्र की गुलामी से मुक्त कराने के प्रयत्नों से हो सकती है। हमारे तथाकथित नासमझ अच्छे लोग इस बीमार लोकतंत्र को जीवित रखने मे ही अपनी सफलता समझ रहे है। कोई इसे मजबूत होने का खिताब दे रहा है तो कोई दूसरा मतदान के महापर्व का। भारत मे लोक प्रति पांच वर्ष मे घर से बाहर निकलकर या निकाला जाकर इस लोकतंत्र पर मुहर लगा देता है। यह मोहर ही हमारी गुलामी की स्वीकृति की प्रतीक होती है तो यही इस लोकतंत्र की एकमात्र सफलता भी मानी जाती है और इस मुहर लगवाने मे हमारे सभी अच्छे लोग परेशान है। अब यह खेल या भूल लम्बे समय तक नही चल सकती और न चलनी चाहिये। मैं पिछले बीस वर्षो से अपनी गुलामी की स्वीकृति सहमति रूपी इस महापर्व से दूर रहा और वोट देने दिलाने नहीं गया। मुझे अपने कार्य पर संतोष है। लोकतंत्र पूरी तरह असफल हो चुका है। लोक स्वराज्य ही उसका एकमात्र विकल्प है। राजनीति मे जो अपने को अच्छे लोग मानते है वे अब लोकतंत्र की ढाल बनने का पाप न करे। यथाशीघ्र ध्रुवीकरण मजबूत करने की आवश्यकता है। आशा है कि हमारे अच्छे लोग इस आवष्यकता को समझने का प्रयास करेगें।

संसद मंदिर, संविधान भगवान।
नेता पुजारी, सफल दुकानदारी।।

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