मंथन क्रमांक 119 ’’व्यक्ति, परिवार और समाज’’–बजरंग मुनि,

Posted By: admin on February 8, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में व्यक्ति और सरकार को मिलाकर व्यवस्था बनती है। सरकार को ही समाज मान लिया जाता है। इस्लामिक व्यवस्था में परिवार और धर्म को मिलाकर व्यवस्था बनती है। साम्यवाद राज्य के अतिरिक्त किसी को मानता ही नहीं। न साम्यवाद व्यक्ति को मानता है, न परिवार, धर्म, समाज या किसी अन्य को। राज्य ही व्यवस्था की एक मात्र इकाई है। भारतीय व्यवस्था में व्यक्ति, परिवार और समाज को मिलाकर व्यवस्था बनती है। भारतीय व्यवस्था सीढीनुमा होती है जिसमें व्यक्ति, परिवार, कुटुम्ब, ग्राम या नगर से होते हुये समाज तक जाती है। राज्य को व्यवस्था की अंतिम इकाई न मानकर सहायक इकाई के रूप में माना जाता है। भारतीय व्यवस्था में राज्य को समाज का प्रतिनिधि नहीं माना जाता किन्तु व्यक्ति और परिवार को समाज का प्रतिनिधि माना जाता है। इस तरह भारत के अतिरिक्त अन्य सभी व्यवस्थाओं में राज्य समाज से भी उपर की भूमिका रखता है, जबकि भारत में नहीं।

पुराने जमाने में व्यवस्था की अंतिम इकाई नगर को माना जाता था इसलिये नगर के साथ नागरिक शब्द बना। अंग्रेजी में सिटी के साथ सिटीजन शब्द बना। स्पष्ट होता है कि नगर व्यवस्था की अंतिम इकाई थी। ऐसे अनेक नगरों को मिलाकर एक सम्मलित इकाई भी बन जाया करती थी जिसमें नगरों की विशेष भूमिका होती थी। आज भी विदेशों में काउंटि शब्द से कन्ट्री बन जाता है। स्पष्ट होता है कि कन्ट्री का अर्थ नगर से लिया जाता होगा। भारतीय व्यवस्था में परिवार एक संम्प्रभुता सम्पन्न इकाई थी जिसमें राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था। नीचे की इकाई उपर वालों को कुछ दायित्व सौंपकर व्यवस्था बनाती रहती थी किन्तु उपर की इकाई नीचे वाली इकाई के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी। मैं यह कह सकता हूॅ कि व्यक्ति, परिवार और समाज का भारतीय संतुलन भारतीय सामाजिक व्यवस्था में ही देखने को मिलता है, दुनियां की किसी अन्य सामाजिक व्यवस्था में नहीं। सीढीनुमा व्यवस्था अन्य व्यवस्था की तुलना में अधिक आदर्श और सुविधाजनक मानी जाती है। राज्य का काम सुरक्षा और न्याय देने तक सीमित होता है। इस सुरक्षा और न्याय में ही परिवार, गांव, नगर, जिला तथा समाज राज्य की सहायता करता है। इस तरह राज्य की भूमिका विशेष परिस्थितियों में ही होती है। इसका अर्थ हुआ कि राज्य के अतिरिक्त अन्य इकाईयां भी किसी प्रकार का अपराध होने की स्थिति में अपराध नियंत्रण का उस सीमा तक प्रयत्न करती है जब तक व्यक्ति को दंडित करने की कोई मजबूरी न हो अर्थात आपसी समझौते द्वारा अथवा सामाजिक बहिष्कार के भय का उपयोग करके व्यक्ति की उच्श्रृंखलता को नियंत्रित करने का प्रयास होता है। इसलिये परिवार की आदर्श परिभाषा यह होती है कि परिवार संयुक्त संपत्ति और संयुक्त उत्तरदायित्व के आधार पर एक साथ रहने के लिये सहमत व्यक्तियों का समूह होगा। मैं मानता हूॅ कि अब तक भारतीय परिवार व्यवस्था में भी यह धारणा स्पष्ट नहीं दिखती है। हो सकता है कि गुलामी के बाद भारत की पारिवारिक व्यवस्था में यह कमी आई हो। यदि यह इसके पहले भी कभी रही होगी तो अब बदलने की आवश्यकता है। इसका अर्थ हुआ कि परिवार की संपूर्ण चल-अचल सम्पत्ति सामूहिक होगी, व्यक्तिगत नहीं। व्यक्तिगत सम्पत्ति का पश्चिम का सिद्धांत पूरी तरह गलत है। परिवार एक संस्था है और उस संस्था में सभी सदस्यों का अधिकार दायित्व और सम्पत्ति सामूहिक होती है अर्थात व्यक्ति परिवार छोडते समय अपना बराबर का हिस्सा लेकर जा सकता है तथा नये परिवार में सम्मलित करना अनिवार्य है। कोई भी व्यक्ति न अकेला रह सकता है न अपनी सम्पत्ति अलग रख सकता है। व्यक्तिगत सम्पत्ति की मान्यता घातक है जो भारत में पश्चिम से आई और खतरनाक रूप से शामिल हो गयी।, इसी तरह परिवार के प्रत्येक सदस्य के अधिकार और दायित्व भी सामूहिक होते है। इसका अर्थ हुआ कि परिवार का सदस्य परिवार में रहते हुये कोई अपराध करता है जिस अपराध में परिवार की भी मौन सहमति प्राप्त है तो उस अपराध के लिये पूरे परिवार को भी दंडित किया जा सकता है। परिवार का सामूहिक उत्तरदायित्व है व्यक्तिगत नहीं। यदि परिवार का कोई सदस्य मनमानी करता है तो या तो परिवार उसे परिवार से निकाल दे या सामूहिक दंड के लिये तैयार रहे। इसी तरह यदि कोई परिवार किसी रूप में सामाजिक व्यवस्था को नुकसान पहुॅचाता है तो पूरे परिवार का भी बहिष्कार संभव है। इस प्रकार परिवार तथा अन्य सामाजिक इकाईयां व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर सामाजिक नियंत्रण रखती है और कोई व्यक्ति जब किसी नियंत्रण को नहीं मानता तब विशेष परिस्थिति समझकर राज्य व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में कटौती करने का दंड देता है अन्यथा किसी स्थिति में दंड देने की आवश्यकता नहीं पडती।

परिवार में व्यक्ति को अनुशासन, समानता और सहजीवन की पूरी-पूरी ट्रैनिंग मिल जाती है। परिवार का अर्थ है सम्पूर्ण समर्पण। व्यक्ति के परिवार का सदस्य बनते ही उसके सभी अधिकार उसकी सहमति तक परिवार में समाहित हो जाते हैं। इसका अर्थ हुआ कि परिवार में व्यक्ति सिर्फ कर्तव्य करता है, उसके कोई अधिकार तब तक नहीं जब तक वह परिवार का सदस्य है। समाज की हर इकाई में व्यक्ति कर्तव्य प्रधान तथा अधिकार शून्य होता है। व्यक्ति के अधिकार तो संवैधानिक ही होते हैं। परिवार का ढाॅचा सबकी सहमति से बनता है और नगर का ढांचा परिवारों की सहमति से बनता है। उपर की इकाईयां भी इसी तरह बनती चली जाती है। यह सभी इकाईयां व्यवस्था की इकाई होती है। एक अतिरिक्त इकाई बनती है। जिसे हम राज्य कहते है। राज्य किसी संवैधानिक इकाई का नाम है। राज्य संविधान के अंतर्गत काम करता है। संविधान निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति की समान भूमिका होती है। राज्य व्यक्ति के व्यक्तिगत, परिवार के पारिवारिक और समाज के सामाजिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता क्योंकि यह सब समाज व्यवस्था की इकाईयां है। राज्य तो सिर्फ प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा और न्याय देने तक सीमित होता है। पश्चिमी संसदीय लोकतंत्र की विभिन्न बुराईयों ने भारतीय पारिवारिक, सामाजिक व्यवस्था को भी विकृत कर दिया। यहां तक कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने पश्चिम की नकल करते हुये परिवार व्यवस्था को संवैधानिक इकाई न मानकर कानूनी इकाई घोषित करने की भूल कर दी। परिणाम हुआ कि परिवार नगर, गांव, समाज सभी प्रमुख इकाईयां राज्य के हस्तक्षेप के अंतर्गत समाहित हो गई जिसके फलस्वरूप राज्य प्रबंधक की जगह मालिक बन गया और धीरे-धीरे उसने संविधान पर भी कब्जा कर लिया। जब तक मुस्लिम शासन काल था तब तक परिवार व्यवस्था और नगर व्यवस्था में सरकार का हस्तक्षेप न के बराबर था क्योंकि मुस्लिम व्यवस्था परिवार और कुटुम्ब को महत्वपूर्ण मानती है लेकिन अंग्रेजों की गुलामी के बाद परिवार और नगर व्यवस्था पूरी तरह राज्य के नियंत्रण में आ गई। यद्यपि मुस्लिम शासन में व्यक्ति का महत्व नहीं था जो अंग्रेजी शासन काल में स्थापित हो गया।

हम कह सकते है कि भारत की सम्पूर्ण व्यवस्था में व्यक्ति को पूरी तरह उसी तरह मौलिक अधिकार प्राप्त था जिस तरह पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में है। भारत की व्यवस्था में परिवार और कुटुम्ब का भी पूरा-पूरा स्थान था जिस तरह मुस्लिम व्यवस्था में है। भारत में ग्राम और नगर व्यवस्था को भी पूरी-पूरी मान्यता थी। राज्य को विशेष परिस्थिति में न्याय और सुरक्षा तक सीमित रखा गया था। गुलामी के बाद भारत की सारी की सारी सामाजिक व्यवस्था विकृत हो गयी और स्वतंत्रता के बाद पश्चिम और साम्यवाद की नकल करने वाले संविधान निर्माताओं ने भारत की अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को पूरी तरह संविधान से बाहर कर दिया। भारत, जो व्यक्ति, परिवार और समाज के संतुलन से चलने वाली व्यवस्था का आदर्श माना जाता रहा है वही भारत इस्लाम, पश्चिम और साम्यवादी देशों के तालमेल से बनी खिचडी व्यवस्था से इतना प्रभावित हुआ कि उसकी मौलिक व्यवस्था ही समाप्त हो गई। परिवार और समाज व्यवस्था का अस्तित्व संकट में है। व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों को भी तंत्र द्वारा बनाया गया संविधान प्राकृतिक की जगह संवैधानिक मानने लगा है अर्थात व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता अभिव्यक्ति व सम्पत्ति आदि मूल अधिकारों की भी सीमाएं बनने लगी है। व्यक्ति की स्वतंत्रता क्या है, उसे संविधान परिभाषित करने लगा है। भारत की अपनी मौलिक सोच विदेशों की नकल के कारण अपनी वास्तविक स्वरूप खो रही है।

आज दुनियां एक संकटकालीन अव्यवस्था से भयभीत है। भारत तो ऐसी अव्यवस्था से दिन रात ग्रसित है। इस अव्यवस्था का सिर्फ एक ही समाधान है कि हम भारत के लोग भारत की अपनी परम्परागत व्यक्ति, परिवार और समाज के संतुलन की व्यवस्था पर लौटकर आ जाये और सारी दुनियां को यह संदेश दे सके कि व्यक्ति, परिवार और समाज का संतुलन ही वर्तमान विश्वव्यापी भय मुक्ति का तरीका है। मेरा निवेदन है कि हम इस अभिनव प्रयोग के लिये भारत में पहल करें और भारत की व्यक्ति, परिवार, समाज व्यवस्था को राजनैतिक संवैधानिक व्यवस्था के चंगुल से मुक्त करावे।

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