मंथन क्रमांक-120 ’’संगठन कितनी आवश्यकता कितनी मजबूरी’’–बजरंग मुनि,

Posted By: admin on February 8, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

सामान्यतया संगठन और संस्था को एक सरीखा ही मान लिया जाता है किन्तु दोनो बिल्कुल अलग-अलग होते हैं। संगठन को अंग्रजी में आर्गेनाईजेशन कहते है और संस्था को इंस्टीटयूशन, यद्यपि दोनो के अर्थ कभी-कभी मिला दिये जाते है। संगठन संस्था से बिल्कुल भिन्न होता है। संगठन अधिकार प्रधान होता है संस्था कर्तव्य प्रधान। संगठन अपने अधिकारों के लिये संघर्षरत रहता है जबकि संस्था ऐसे किसी संघर्ष से दूर रहती है। संगठन में आमतौर पर अपनत्व होता है। उसमें अपने जुडे हुये लोग साथी तथा सहयोगी माने जाते है और संगठन से बाहर के लोग बाहरी। संस्था में ऐसा भेद नहीं होता बल्कि संस्था अपनो की अपेक्षा दूसरों को अधिक महत्व देती है। संगठन कभी सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, संस्था को सुरक्षा की ऐसी कोई चिंता नहीं रहती। संगठन मजबूतों के शोषण से बचने के लिये बनाया जाता है किन्तु बाद में संगठन कमजोरों का शोषण करने लगता है। संस्था कभी कमजोरों का शोषण करती ही नही है बल्कि कमजोरो को शोषण से बचाने में सहायता करती है। संगठन में शक्ति होती है। जो लोग संगठित होते है वे असंगठितों की तुलना में कई गुना अधिक शक्तिशाली हो जाते है। संगठन में शक्ति केन्द्रित होती है। संस्थाओं में शक्ति अकेन्द्रित होती है। संस्थाये सेवा कार्य में लगी होती है और कभी भी शक्ति संग्रह का प्रयास नहीं करती। संगठन अपने संगठन के हित में नैतिकता की परिभाषा भी बदलते रहता है। वह दूसरों से कर्तव्य की अपेक्षा करता है और उन्हें नैतिकता की सलाह देता है किन्तु स्वयं कभी कर्तव्य की चिंता नही करता। संगठन का शक्तिशाली होना ही उसकी नैतिकता की परिभाषा होती है। संगठन प्रचार माध्यमों का भरपूर उपयोग करता है। आमतौर पर वह इसके लिये छल कपट का भी सहारा लेता है। संस्थाएं प्रचार माध्यमों से दूर रहती है। वे प्रचार के लिये कभी छल कपट का सहारा लेती ही नहीं। संगठन की सोच बहुत संकीर्ण होती है और संस्थाओं की व्यापक। संगठन दूसरे संगठनों से प्रतिस्पर्धा करते है किन्तु संस्थाएं अन्य संस्थाओं की सहायता करती है क्योंकि संस्थाओं का मुख्य उददेश्य सेवा होता है तो संगठनों का संग्रह।

दुनियां में कई प्रकार के संगठन भी बने हुये और संस्थाएं भी है। राजनैतिक, सरकारी कर्मचारियों के, किसानों और व्यापारियों के, महिला और पुरूष के, युवक वृद्धों के तथा अन्य अनेक आधार पर संगठन बने हुये है। ये संगठन दिन-रात समाज में टकराव और अव्यवस्था फैलाते रहते है। यदि हम और स्पष्ट विचार करे तो दुनियां में धर्म के नाम पर इस्लाम और राजनीति के नाम पर साम्यवाद पूरी तरह वैचारिक धरातल पर भी संगठन है और क्रियात्मक रूप में भी। संघ परिवार और सिख समुदाय भी ऐसे ही संगठन माने जाते है। रेड क्रोस सोसायटी संस्थाओं के रूप में बहुत विख्यात है। किन्तु इन सब से हटकर गायत्री परिवार, आर्य समाज, सर्वोदय जैसे कहे जाने वाले समूह संस्था माने जाते है, संगठन नही। इस्लाम, संघ, साम्यवाद, सिख तथा गायत्री परिवार, आर्य समाज, सर्वोदय आदि की कार्य प्रणाली और परिणाम ठीक से देखने पर संगठन और संस्था का अंतर साफ पता चल जाता है।

मुसलमानों और सिखों में भी कुछ सामाजिक संस्थाएं है। यद्यपि हिन्दुओं की तुलना में कम है। धीरे-धीरे भारत में संस्थाएं कम हो रही है और संगठन बढ रहे है। संगठनों का जितना ही विस्तार हो रहा है उतना ही अधिक समाज में टकराव बढ रहा है और उसी गति से अव्यवस्था भी बढ रही है। राजनैतिक दल तो लगभग पूरी तरह संगठन का रूप ले चुके है। राजनैतिक दल अप्रत्यक्ष रूप से व्यावसायिक संगठन तो है ही किन्तु धीरे-धीरे आंशिक रूप से अब आपराधिक संगठन सरीखा सा भी होते जा रहे है। आदर्ष स्थिति में राजनैतिक कार्य संस्थागत अधिक और संगठनात्मक कम माना जाता है किन्तुु वर्तमान समय में राजनीति में संस्थागत नैतिकता लगभग शून्य हो गई है और संगठनात्मक दुर्गुण हावी हो गये है।

जब आम लोगो को व्यवस्था से न्याय मिलने की पूरी उम्मीद रहती है तब संगठन नहीं बनते। यदि बनते है तो उन संगठनों को समाज में कोई सम्मान नहीं मिलता। किन्तु जब समाज में अव्यवस्था फैल जाती है, न्याय मिलना अनिश्चित हो जाता है तब हर व्यक्ति सुरक्षा के लिये किसी न किसी प्रकार से संगठित होने का प्रयास करता है। इसका अर्थ हुआ कि सभी अपराधियों के विरूद्ध सारे शरीफ लोगों को संगठित हो जाना चाहिये। यदि उसके बाद भी कोई खतरा हो तब सरकार को सक्रिय होकर न्याय और सुरक्षा की गांरटी देनी चाहिये। किन्तु जब प्रवृत्ति का आधार छोडकर अन्य आधारों पर संगठन बनने लगे तथा सरकार भी न्याय और सुरक्षा की जगह अन्य संगठनों को मान्यता और प्रोत्साहन देने लगे तब अव्यवस्था फैलती है। जब समाज में अव्यवस्था फैलती है तब धुर्त या अपराधी स्वभाव के लोग प्रवृत्ति के आधार के विपरीत अन्य आधारों पर संगठित होना शुरू कर देते है। जब सारा कार्य सरकार अपने पास संभाल लेती है और सरकार में व्यवस्था टूटकर भ्रष्टाचार में बदल जाती है तब नये-नये संगठन सामने आकर उस भ्रष्टाचार या अव्यवस्था का लाभ उठाना शुरू कर देते है। यदि मेरे घर में सांप के घुसने की कोई संभावना न हो अथवा मैं निश्चित रहूॅ कि सांप घुसेगा तो व्यवस्था के द्वारा मेरी सुरक्षा निश्चित है तब मैं अपने घर में डंडा नहीं रखूॅगा। असुरक्षा होने पर या सांप के घुसने पर मैं सतर्क भी रहूॅगा या डंडा रखूॅगा।

जब समाज में अपराधियों की बाढ आयी हुई हो और सुरक्षा का दायित्व संभाल रही सरकार जनकल्याण के आलतू फालतू कार्यो में व्यस्त हो तब स्वाभाविक है कि हर व्यक्ति अपनी सुरक्षा की स्वयं चिंता करे। ऐसी स्थिति में सुरक्षा के नाम पर संगठन बन जाते है और ऐसे संगठन बाद में कमजोरों का या असंगठितों का शोषण करते है। मैंने तो कई बार यह देखा है कि अनेक शरीफ लोग अपनी सुरक्षा के लिये अलग-अलग तरह के आपराधिक गिरोहो के साथ भी समझौता करने को बाध्य होते है। ऐसे लोग एक तरफ तो सरकार को टैक्स देते ही है दूसरी ओर संगठित गिरोह को भी टैक्स देने के लिये मजबूर रहते है। भारत में अब भी हिन्दू का बहुमत धार्मिक आधार पर संगठित नहीं होना चाहता किन्तु जिस तरह स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति ने अल्पसंख्यक तृष्टिकरण को बढावा दिया उससे हिन्दुओं के संस्थागत चरित्र को भी संगठित होने की मजबूरी दिखी। नरेन्द्र मोदी का निर्वाचन ऐसी ही मजबूरी माना जा सकता है। सरकार का काम असुरक्षितों की सुरक्षा करना होता है। यदि सरकार अपना काम ठीक से करे तो संगठन बनेगे ही नहीं किन्तु सरकार अपना काम छोडकर एक ओर तो जुआ, शराब वैश्यावृत्ति और तम्बाकू रोकने में लग गयी तो दूसरी ओर उसने संगठनों को मान्यता भी दे दी। परिणाम हुआ कि भारत में कुकरमुतों की तरह गांव गांव में संगठन बन गये। हर क्षेत्र में किसी भी आधार पर अलग-अलग प्रकार के संगठन बनने लगे और सरकारें ऐसे संगठनों को मान्यता देकर प्रोत्साहित करने लगी। यहां तक कि सरकार संगठितों को संगठित होने की सलाह भी देने लगी। कितनी बेशर्म सलाह है कि हमारी सरकार महिलाओं को कराटे की ट्रैंनिग देती है या नागरिकों को शस्त्र का लाइसेंस देती है। सुरक्षा देना उसका काम है तो वह काम नहीं करती और सामाजिक बुराईयों को दूर करने के लिये अनावश्यक हस्तक्षेप करती रहती है जो उसका काम नहीं है। दहेज प्रथा सरकार दूर करती है और अपनी शारीरिक सुरक्षा के लिये महिला को टकराव के लिये प्रेरित करती है। यह समझ में नही आता। मेरी यह मान्यता है कि सारी समस्याओं की जड मुख्य रूप से राजनैतिक व्यवस्था में है जो संस्थाओं को निरूसाहित और संगठनवाद को प्रोत्साहित करती है। यदि सरकार जनहित के काम छोडकर सुरक्षा देने में सक्रिय हो जाये तो संगठनों की बाढ रूक सकती है। फिर भी मैं यह चाहता हूॅ कि हम आप संगठनवाद को प्रोत्साहित न करे यदि संगठन बनाना हो तो अन्य सब प्रकार के भेदभाव समाप्त करके प्रवृत्ति के आधार पर अर्थात अपराधियों के विरूद्ध शेष लोगो का एक संगठन बने। अन्य सारे संगठन समाप्त कर दिये जाये चाहे किसी आधार पर क्यों न बने हो। संस्थागत चरित्र को प्रोत्साहित किया जाये। साथ ही राजनीति को इस दिषा में मजबूर किया जाये कि वह आम लोगो को संगठित होने की मजबूरी से बचा सके अर्थात सुरक्षा और न्याय सबको दे और किसी प्रकार के बने हुये वर्तमान संगठन को सरकारी मान्यता समाप्त कर दे। संगठन बनाना किसी भी परिस्थिति में अल्पकालिक मजबूरी हो सकती है किन्तु दीर्घकालिक सिद्धान्त नहीं हो सकती। इसलिये हमे दीर्घकालिक समाधान की दिशा में प्रयत्नशील रहना चाहिये।

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