मंथन क्रमांक-124 ’’मनरेगा कितना समाधान कितना धोखा’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on February 23, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

कुछ हजार वर्षों का विश्व इतिहास बताता है कि दुनियां में बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के लिए नये-नये तरीकों का उपयोग किया। श्रम शोषण के लिए ही पश्चिम के देशों ने पूंजीवाद को महत्त्व दिया तो भारतीय उपमहाद्वीप ने कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को हटाकर जन्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था को मजबूत किया। श्रम शोषण के पश्चिमी तरीको का लाभ उठाकर साम्यवाद दुनियां में मजबूत हुआ तो भारत की जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था को मनुवाद नाम देकर अम्बेडकर ने इसका लाभ उठाने की पूरी कोशिश की। साम्यवाद बहुत तेजी से बढ़ा और असफल हो रहा है। अम्बेडकर वाद अब तक भारतीय समाज व्यवस्था को ब्लैकमेल कर रहा है। आज भी भारत की संपूर्ण राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था पर गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी के विरुद्ध बुद्धिजीवी शहरी पूंजीपतियों का एकाधिकार है। सब प्रकार की नीतियां ये लोग बनाकर गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों पर थोप देते है।

भारत में पहली बार इस एकाधिकार पर अंकुश लगाने का ईमानदार प्रयास 2005 में हुआ जिसे नरेगा का नाम दिया गया। इस योजना के अंतर्गत देश के किसी भी परिवार के एक सदस्य को न्यूनतम वर्ष में 100 दिन रोजगार गारंटी दी गई थी। इसके अंतर्गत जाति, धर्म का भेद नहीं था, महिला पुरुष का भेद नहीं था, व्यक्ति के स्थान पर परिवार इकाई बनाया गया था। इसी तरह भारत में पहली बार शारीरिक श्रम को बौद्धिक श्रम से अलग किया गया। नरेगा योजना को शारीरिक श्रम तक सीमित किया गया। सन् 2005 में श्रम मूल्य 60 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन निश्चित किया गया था। उद्देश्य था कि देश में रोजगार की असमानता कम हो और पिछड़े क्षेत्र के लोगों को दूसरे क्षेत्र में पलायन करने की मजबूरी ना हो। प्रयास पूरी तरह ईमानदारी भरा था और ईमानदारी से लागू भी किया गया था। यहां तक प्रावधान था कि यदि सरकार किसी व्यक्ति को कोई काम नहीं दे सकेगी तो उसे आंशिक रूप में बेरोजगारी भत्ता देने को बाध्य होगी। कानून लागू होने के बाद ऐसा शुरू हुआ भी। इस योजना का प्रस्ताव साम्यवादियों का था और मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी की जोड़ी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करके आगे बढ़ाया। मनरेगा योजना एकमात्र ऐसी ईमानदार कोशिश रही जो मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी के राजनैतिक ईमानदारी की प्रतीक रही। तब तक किसी अन्य ने इस दिशा में कोई योजना नहीं बनाई थी। साम्यवादी श्रम शोषण की गंभीर योजनाएं बनाने के लिए सारी दुनियां में कुख्यात हैं। साम्यवादी कभी नहीं चाहते कि श्रम का मूल्य बढे क्योंकि यदि श्रम का मूल्य बढ़ जायेगा तो साम्यवाद का किला अपने आप ध्वस्त हो जाएगा। मुझे ऐसा लगता है कि साम्यवादियों को यह उम्मीद नहीं थी कि मनमोहन, सोनिया की जोड़ी इतनी ईमानदारी से इस दिशा में आगे बढ़ जाएगी। यही सोचकर उन्होंने इस प्रस्ताव पर जोर दिया था जिसके स्वीकार होते ही उनके समक्ष संकट पैदा हुआ।

स्वाभाविक था कि साम्यवादी योजना से पीछे नहीं हट सकते थे और आगे भी बढ़ने देना उनके लिए बड़ा खतरा था इसलिए उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से इस योजना को असफल करने का प्रयत्न किया। ईमानदार प्रयत्न यह होता कि न्यूनतम श्रम मूल्य जो 2005 में 60 रूपये रखा गया था उसे मुद्रास्फीति के साथ तथा कोई न्यूनतम विकास दर के साथ अपने आप बढ़ जाने की व्यवस्था होती। लेकिन कई वर्षों तक न्यूनतम श्रम मूल्य 60 रूपये ही रखा गया और उसे बढ़ाने का अधिकार भी केंद्र सरकार के पास हो गया। परिणाम हुआ कि सरकारों ने इसे मनमाने तरीके से घटाया बढ़ाया। सन् 2005 में जो न्यूनतम गारंटी मूल्य 60 रूपये था वह अविकसित क्षेत्रों की न्यूनतम मजदूरी से अधिक था। इसका अर्थ हुआ कि उस अधिक मजदूरी के कारण पिछड़े क्षेत्रों का पलायन रुका और विकसित क्षेत्रों में मजदूरों का अभाव हुआ। साम्यवादियों ने सरकार पर दबाव डालकर विकसित क्षेत्रों की मजदूरी बहुत अधिक बढ़ा दी और अविकसित क्षेत्रों की मजदूरी मुद्रा स्फीति की तुलना में भी कम बढ़ाई गई। वर्तमान समय में बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे अविकसित क्षेत्रों की मनरेगा की मजदूरी दर 170 रूपये के आसपास है। यह दर 2005 की मुद्रास्फीति के आधार पर भी कम है तथा विकास मूल्य को जोड दे तो बहुत कम है दूसरी ओर हरियाणा, पंजाब, केरल, कर्नाटक जैसे विकसित क्षेत्रों की मनरेगा की न्यूनतम मजदूरी 270 रूपये के आसपास है। स्पष्ट है कि योजना के वास्तविक लाभ को असफल करने का प्रयास किया गया। प्रारंभिक योजनानुसार इस योजना को अविकसित क्षेत्रों में लागू होना था किंतु धीरे-धीरे इसे पूरे देश में लागू करने का षडयंत्र किया गया। इस योजना को धीरे-धीरे इतना बोझिल बना दिया गया कि सरकारें इसे आगे बढ़ाने में कमजोरी अनुभव करने लगी। मनरेगा का बजट असंतुलित हुआ तो वामपंथी और शिक्षा शास्त्री सरकार पर दबाव डालकर शिक्षा का बजट बढाते रहे। शिक्षा कभी रोजगार पैदा नहीं करती बल्कि रोजगार में छीना झपटी करती है। स्वाभाविक था कि श्रम की तुलना में शिक्षा का बजट बढना श्रमिक रोजगार पर बुरा प्रभाव डालता है। नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद इस षडयंत्र की समीक्षा की। होना तो यह चाहिए था कि मोदी जी इस षड्यंत्र से बचाकर इस योजना को आदर्श स्थिति से आगे बढ़ाते किंतु मोदी जी ने इस पूरी योजना को ही अवांछित श्रेणी में डाल दिया। अब ना योजना जिंदा है, ना मरी हुई है, ना योजना से लाभ है, ना कोई नुकसान है। एक ईमानदार प्रयास जो कई हजार वर्षों के बाद शुरू हुआ था वह बुद्धिजीवी, पूंजीपति षड्यंत्र का शिकार हो गया।

इस योजना के खिलाफ किस तरह के गुप्त षडयंत्र हुए इसकी भी जानकारी देना आवश्यक है। देश के प्रख्यात बुद्धिजीवियों जिनमें 1. न्यायाधीश एस0एन0 वेंकटचलैया (भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश)। 2. न्यायाधीश जे0एस0 वर्मा (भारत के पूर्व न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय)। 3. न्यायाधीश वी0आर0 कृष्णा अयर (भारत के पूर्व न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय)। 4. जस्टिस पी0बी0 सावन्त (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीष)। 5. जस्टिस के रामास्वामी (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीष)। 6. जस्टिस सन्तोष हेगड़े (लोकायुक्त कर्नाटक व पूर्व न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय)। 7. जस्टिस ए पी शाह (पूर्व मुख्य न्यायाधीश दिल्ली उच्च न्यायालय)। 8. जस्टिस वी0एस0 दवे (पूर्व जज, राज, उच्च न्यायालय)। 9. डाॅ0 उपेन्द्र बक्षी (प्रोफेसर आफ लाॅ, दिल्ली विद्यालय)। 10. डाॅ0 मोहन गोयल (पूर्व कानून के प्रो0 लाॅ स्कूल आफ इण्डिया, बेंगलोर)। 11. फली एस नरीमन (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)। 12. कामिनी जायसवाल (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)। 13. डाॅ0 राजीव धवन (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)। 14. प्रषान्त भूषण (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय)। 15. वृन्दा ग्रोवर (अधिवक्ता दिल्ली उच्च न्यायालय) शामिल थे। उन्होंने सरकार को इस योजना के अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावहीन करने के लिए लिखित रूप में प्रभाव डाला। स्पष्ट होता है कि यह लोग मनरेगा योजना को असफल करना चाहते थे और उनमें सफल भी हुए। इसी तरह देश के संपन्न क्षेत्रों के सांसदों की एक कमेटी बनाई गई और इस कमेटी ने गुप्त रूप से यह रिपोर्ट दी कि यदि यह योजना इसी तरह लागू रही तो अविकसित क्षेत्रों के मजदूरों का विकसित क्षेत्रों में पलायन रूक जाएगा जिसके परिणाम स्वरूप कृषि उत्पादन प्रभावित होगा। भारत सरकार ने दोनों प्रस्ताव के आधार पर अप्रत्यक्ष रूप से योजना को असफल कर दिया क्योंकि उन्हें डर था कि यदि बुद्धिजीवी संपन्न वर्ग नाराज हो जाएगा तो सरकार के राजनैतिक हितो पर उसका बुरा प्रभाव पड़ेगा।
मेरा यह स्पष्ट मानना है कि मनरेगा योजना गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों को आत्मनिर्भर तथा स्वाभाविक रूप से जीवित रहने के प्राकृतिक अधिकार का संवैधानिक प्रयास थी। यह योजना हजारों वर्षों के बाद बनी थी किंतु फिर से अमीर बुद्धिजीवियों और शहरी लोगों ने पूरी योजना को असफल कर दिया। श्रम की मांग बढे और श्रम की मांग बढ़ने के परिणामस्वरूप श्रम का मूल्य बढ़े यह आदर्श अर्थव्यवस्था होती है। यदि इसमें कोई दिक्कत हो तो सरकार गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों को रोजगार उपलब्ध होने की गारंटी दे। न्यूनतम श्रम मूल्य का अर्थ होता है उक्त घोषित श्रम मूल्य पर रोजगार गांरटी। यदि श्रम मूल्य बढा दिया जाये और रोजगार गारंटी न हो तो श्रम मूल्य पर विपरीत प्रभाव पडता है। जो धन सरकारे इन गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों को सुविधा सहायता के नाम पर देती हैं अथवा श्रम मूल्य बढाने पर खर्च करती है। वही धन यदि उन्हें स्वरोजगार के आधार पर मिले तो इसमें भ्रष्टाचार भी नहीं होगा और गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवियों का आत्मसम्मान भी बचा रहेगा लेकिन पूंजीवादी, बुद्धिजीवी एकाधिकार इसमें सहमत नहीं है। वह हमेशा चाहता है कि गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी का सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक शोषण करके उसका थोड़ा सा भाग इस प्रकार सुविधा के नाम पर उन्हें दे दिया जाए कि वह बुद्धिजीवियों, पूंजीपतियों और शहरी लोगों के मुखापेक्षी बने रहे। वे हमेशा कृतग्य रहे। मनरेगा योजना इस परिणाम में बाधक थी और सबने मिलकर इस अच्छी योजना की भ्रुण हत्या कर दी। मुझे नहीं लगता कि अब भविष्य में इस तरह की कोई नई योजना आ सकेगी अथवा इस योजना में किसी तरह का बदलाव आ सकेगा। योजना निरूउद्देश्य निष्फल हो गई है।

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