मंथन क्रमांक-135 अनुशासन महत्वपूर्ण है या सहजीवन–बजरंग मुनि

Posted By: admin on June 14, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं जो एक दूसरे से जुडी होती हैं। व्यक्तियों को मिलाकर समाज बनता है और समाज के द्वारा ही किसी नये व्यक्ति की उत्पति होती है। परिवार, गांव से लेकर देश तक की इकाईयां व्यवस्था की मानी जाती हैं। परिवार व्यवस्था की सबसे पहली इकाई होती है और परिवार ही व्यक्ति को सहजीवन या अनुुुशासन सिखाने की पहली पाठशाला है। प्रत्येक व्यक्ति के लिये यह आवश्यक होता है कि वह अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में स्वतंत्रता और सहजीवन का तालमेल करके चले। दोनों एक दूसरे के विपरीत दिखते हैं, किन्तु तालमेल अनिवार्य भी होता है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के पास उसके स्वतंत्र अधिकार होते हैं और साथ ही उसके कर्तव्य भी बाध्यकारी होते हैं। परिवार और समाज व्यवस्था का ढांचा इतना जटिल और उलझा हुुआ है कि उसे ठीक ठीक बताना कठिन कार्य है। फिर भी उसपर चर्चा तो करनी ही पडती है।

व्यक्ति अपने पूरे जीवन में स्वशासन, अनुशासन, शासन और सहजीवन जैसे शब्दो के मकडजाल में उलझा रहता है। एक तरफ तो उसे मौलिक अधिकार के रूप में असीम स्वतंत्रता प्राप्त होती है, दूसरी और किसी दूसरे के साथ जुडकर परिवार बनाते ही उसकी सारी स्वतंत्रता तब तक शून्य हो जाती है जब तक वह उस परिवार से जुडा रहता है। परिवार से जुडे रहने के बाद किसी भी व्यक्ति को कोई भी संवैधानिक, सामाजिक या मौलिक अधिकार अलग से नहीं होता। उसके सारे अधिकार सामूहिक हो जाते हैं। उसे सिर्फ एक स्वतंत्रता रहती है कि वह जब चाहे परिवार को छोडकर स्वतंत्र हो सकता है और अपने सारे अधिकार पुनः जीवित कर सकता है। लेकिन यह पुनःजीवन भी लगभग क्षणिक ही होता है क्योकि उसके लिये अनिवार्य है कि वह किसी नये परिवार के साथ जुडे। व्यक्ति कभी भी अकेला नहीं रह सकता क्योंकि समाज के साथ जुडकर रहना उसकी मजबूरी है। स्वशासन, अनुशासन और शासन बिल्कुल ही अलग अलग होते हैं। व्यक्ति स्वयं उचित अनुचित का अन्तर करके तथा सोच समझकर अपने हित अहित के निर्णय लेता है तो उसे स्वशासन कहते हैं। व्यक्ति जब अपने परिवार के या समाज के प्रमुख लोगों की इच्छाओं का सम्मान करते हुये अपने कार्य सम्पादित करता है उसे अनुशासन कहते हैं। व्यक्ति अपने किसी अधिकार प्राप्त प्रमुख के भय से अपनी इच्छाओं के विरूद्ध कोई कार्य करता है उसे शासन कहते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता और प्रवृत्ति अलग अलग होती है। किसी एक ही परिवार का एक सदस्य बहुत बडा विद्वान निकल सकता है तो दूसरा बिल्कुल विपरीत प्रवृत्ति का भी हो सकता है। कोई सदस्य सामाजिक प्रवृत्ति का भी हो सकता है तो कोई आपराधिक प्रवृत्ति का भी। ये भिन्नताएं इसलिये स्वाभाविक हैं क्योंकि व्यक्ति अपने जन्म पूर्व के संस्कार लेकर आता है और जन्म के बाद पारिवारिक, सामाजिक वातावरण उस जन्मपूर्व के संस्कार से मिलकर नई प्रवृत्ति बनाते हैं। इसलिये सहजीवन और शासन बिल्कुल विपरीत होते हुये भी दोनो को समाज व्यवस्था में एक साथ कार्यान्वित करना पडता है।
परिवार व्यवस्था का स्वरूप ऐसा है कि उसमें कोई एक प्रमुख होता है और उस प्रमुख के द्वारा अन्य सदस्य अनुशासित या शासित होते हैं। आदर्श व्यवस्था में परिवार का मुखिया पूरे परिवार के सामूहिक नियंत्रण में होना चाहिये। इसका अर्थ हुआ कि परिवार का प्रत्येक सदस्य परिवार के मुखिया से अनुशासित होगा और परिवार का मुखिया परिवार के सभी सदस्यों के सामूहिक निर्णय को मानने के लिये बाध्य होगा। यही व्यवस्था सहजीवन होती है, यद्यपि भारत की वर्तमान परिवार व्यवस्था में यह कमी है कि मुखिया अन्य सदस्यों को नियंत्रित करना चाहता है किन्तु स्वयं परिवार की सामूहिकता से नियंत्रित नहीं होना चाहता। इस तरह धीरे धीरे परिवार में घुटन शुरू होती है जो कालांतर में टूटन के रूप में बदल जाती है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जिस परिवार में जितना अधिक अनुशासन होगा उस परिवार की प्रगति उतनी ही कमजोर होगी क्योंकि संवादहीनता के कारण अन्य सदस्यों का बौद्धिक और सामाजिक विकास कम होता है। दूसरी ओर यदि परिवार में अनुशासन की कमी हो तब भी उच्श्रृंखलता का खतरा बढ जाता है तथा परिवार संकट में आ जाता है। इसलिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक परिवार अपने सदस्यों का ठीक ठीक आँकलन करके अनुशासन या स्वतंत्रता का उपयोग करे और दोनों का अधिकतम तालमेल रखे। यह तालमेल ही सहजीवन माना जा सकता है।

सहजीवन की कमी परिवार में सबसे बडा संकट है। सहजीवन की ट्रेनिंग के लिये परिवार के सभी सदस्यों में आपसी तथा बेझिझक संवाद होना चाहिये। सहजीवन की जगह बचपन से ही अनुशासन का पाठ महत्वपूर्ण बन जाने से सहजीवन में कमी आती है। बचपन से ही परिवार के सदस्यों कोे बताया जाना चाहिये कि परिवार के सभी सदस्यों के अधिकार संयुक्त हैं अैर कर्तव्य या दायित्व अलग अलग। परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिये परिवार का निर्णय मानना बाध्यकारी है और यदि उसके किये स्वीकार करना असंभव है तो वह अलग हो सकता है किन्तु परिवार मे रहते हुय परिवार के निर्णय को अस्वीकार नहीं कर सकता। अधिकांश परिवार तो कभी साथ बैठते ही नहीं। अनेक भ्रम चर्चा के अभाव में जीवन भर बने रहते हैं। स्वार्थी तत्व मित्र बनकर ऐसे वातावरण का लाभ उठाते हैं। मेरा मत है कि अनुशासन की तुलना में सहजीवन का प्रशिक्षण सफल परिवार व्यवस्था के लिये अधिक उपयोगी है।

इस सहजीवन को नुकसान पहुॅचाने में भारतीय कानूनों की बहुत बडी भूमिका रहती है। किसी परिवार के साथ जुडते ही व्यक्ति के सारे अधिकार सामूहिक हो जाते है किन्तु वर्तमान कानून परिवार में रहते हुये भी व्यक्ति के सब प्रकार के अधिकार मान्य करके टकराव के बीज बोता है। जब व्यक्ति परिवार का सदस्य है तब उसकी कोई भी सम्पत्ति अथवा आय व्यय व्यक्तिगत कैसे हो सकता है? चाहे उसे संकट आवे अथवा लाभ हो किन्तु होना चाहिये सब सामूहिक ही। इसी तरह जब व्यक्ति सहमति से परिवार के साथ जुडा है तब उसमें संवैधानिक अधिकार भी अलग कैसे हो सकते हैं, लेकिन कानून ये सारे झगडे पैदा करता है। परिवार के पारिवारिक मामलों में कानून को तब तक कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये जब तक परिवार सहमति से चल रहा है। ये कानूनी हस्तक्षेप सहजीवन के प्रशिक्षण में सबसे बडी बाधा है।

इस सम्बन्ध मेें हमें दोनों दिशाओं से काम करना चाहिये। हम समाज को यह बात समझाने का प्रयास करें कि परंपरागत परिवार व्यवस्था में आयी कुछ कमजोरियां दूर करके हमें नई व्यवस्था के लिये सोचना चाहिये। दूसरी ओर हमें इस बात के लिये भी जन जागरण करना चाहिये कि राज्य परिवार व्यवस्था के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे। परिवार व्यवस्था विश्व व्यवस्था की सबसे पहली सीढी है और उस सीढी का कमजोर होना बहुत अधिक घातक है।

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