मंथन क्रमांक-136″राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, इस्लाम और साम्यवाद”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on June 14, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दुनियां में अनेक प्रकार के संगठन बने हुये है। भारत में भी ऐसे संगठनों की बाढ़ आयी हुई है। ऐसे संगठनों में से हम सिर्फ तीन संगठनों की समीक्षा कर रहे हैं। ये हैं 1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2. इस्लाम 3. साम्यवाद। कुछ बातें तीनों में समान हैं। तीनों किसी न किसी तरह किसी भी रूप में राजनैतिक सत्ता के साथ जुडने का प्रयास करते हैं। तीनों में से किसी का संस्थागत चरित्र नहीं रहा हैं यद्यपि संघ और इस्लाम अपने विचार के उददेश्य से कुछ संस्थागत गतिविधियों में भी सक्रिय रहते हैं। तीनों ही मजबूतों से सुरक्षा और न्याय का नाटक करते हैं, साथ ही तीनों कमजोरों का शोषण भी करते हैं। तीनों में से कोई भी समाज को सर्वोच्च नहीं मानता। साम्यवाद राज्य सत्ता को सर्वोच्च मानता है और इस्लाम धर्म को। संघ धर्म और राष्ट्र दोनो को समाज से उपर मानता है। तीनों का चरित्र ओर कार्यप्रणाली रक्षक अर्थात क्षत्रिय प्रवृत्ति की है। तीनों ही हिंसा पर विश्वास करते है और अपनी तुलना शेर से करने में गर्व महसूस करते हैं।

तीनों में अनेक समानताएं होते हुये भी कुछ विरोधाभाष है। हिंसक गतिविधियों में इस्लाम और साम्यवाद आमतौर पर पहल करते हैं और संघ परिवार प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसा में सक्रिय होता हैं। मुसलमान बचपन से ही क्षत्रिय प्रवृत्ति का होता है और हिन्दू बचपन से अहिंसक प्रवृत्ति का होता है। किसी मुसलमान को सूफी या अन्य अहिंसक गतिविधियों के साथ जुडने में स्वयं को बदलना पडता है और हिन्दू को संघ के साथ जुडने में अपनी मूल प्रवृत्ति बदलनी पडती है। यही कारण है कि संघ को अपने साथ हिन्दुओं को जोडने में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पडता है। साम्यवादियों की बचपन से कोई अलग प्रवृत्ति नहीं होती है क्योंकि हिन्दू मुसलमान तो बचपन से होते हैं, लेकिन साम्यवादी बाद में बनते हैं। संघ इस्लाम को सबसे अधिक घातक मानता है। लेकिन इस्लाम संघ को शत्रु नहीं मानता क्योंकि इस्लाम विस्तारवादी होता है और संघ सुरक्षात्मक। संघ और इस्लाम सांस्कृतिक धरातल के संगठन हैं तो साम्यवाद वैचारिक धरातल का। साम्यवाद की एक स्वतंत्र विचारधारा और कार्य प्रणाली है। संघ और इस्लाम में भावना प्रधान लोग अधिक होते हैं, विचार प्रधान कम। साम्यवाद में कोई भावना प्रधान तो होता ही नहीं है, जो कोई भी छोटे से छोटा साम्यवादी होगा तो वह बुद्धिप्रधान ही होगा। संघ और इस्लाम में धार्मिक भावनाओं को छोडकर अन्य सभी मामलों में शराफत की भावना होती है। साम्यवादी सिर्फ चालाक ही होता है। उसमें शराफत का भाव नहीं होता। संघ और इस्लाम धार्मिक मामलों को छोडकर अन्य सभी मामलों में वर्ग संघर्ष से दूर रखते है। साम्यवाद वर्ग संघर्ष को ही आधार बनाकर अपना विस्तार करता है। साम्यवाद हमेशा श्रम शोषण के नये नये तरीके खोजता रहता है। जबकि संघ और इस्लाम का इससे कोई सम्बन्ध नहीं होता। पूरी दुनियां में श्रमजीवियों को धोखा देने में साम्यवाद ही सबसे आगे रहा है। साम्यवादियों में यह विशेषता होती है कि वे अपनी बौद्धिक क्षमता के आधार पर किसी भी अन्य व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित कर लेते है। यहाॅ तक कि साम्यवादी किसी भी अन्य संस्था में घुसकर उसमें निर्णायक जगह प्राप्त कर लेते है, लेकिन संघ और इस्लाम में यह क्षमता नहीं है। वर्तमान समय में दुनियां में साम्यवाद सबसे अधिक खतरनाक विचारधारा है किन्तु संघ या मुसलमान साम्यवाद को उतना अधिक खतरनाक नहीं मानते।

वर्तमान विश्व में साम्यवाद असफल होकर अन्तिम सांसे गिन रहा है। भारत में भी धीरे धीरे यही स्थिति बन रही है। इसलिये साम्यवाद ने इस्लाम के कन्धे पर बन्दूक रखकर अपनी गतिविधियाॅ जारी रखने की कोशिश की है लेकिन धीरे धीरे पूरी दुनियां में इस्लाम भी संदेह के घेरे में आ गया है। मुसलमान चाहे कितना भी अच्छा क्याें न हो, लेकिन पूरी दुनियां उसपर आंशिक रूप से कट्टरता का संदेह करने लगी है। आज मुसलमान भी इस बात को समझ रहा है लेकिन उसे भी अपनी बचपन से प्राप्त प्रवृत्ति में सुधार करना कठिन हो रहा है। इस्लाम किसी भी रूप में धर्म नहीं है। उसमें धर्म का एक भी लक्षण नहीं है। इस्लाम सिर्फ संगठन है किन्तु दुनियां में सफलतापूर्वक मजबूत होते जाने के कारण वह धर्म बन गया।

मैं मानता हूॅ कि भारत में इस्लाम से हिन्दुत्व की सुरक्षा के लिये संघ परिवार ने बहुत अच्छा काम किया है। फिर भी हिन्दुओं का बहुमत आज भी संघ परिवार के पक्ष में नहीं है क्योंकि हिन्दू बचपन से ही समाज को सर्वोच्च मानता है और संघ परिवार संगठन को। हिन्दू बहुमत आज भी महसूस करता है कि कई हजार वर्ष की गुलामी के बाद भी हिन्दूत्व भारत में बचा रह सका तो अपने धार्मिक गुणों के कारण, संगठन के कारण नहीं। हिन्दू यह मानता है कि संघ परिवार इस्लामिक विस्तारवाद के विरूद्ध एक दवा के रूप में तो मान्य है किन्तु यदि हिन्दुत्व के मूल संस्कार में मुसलमानों के सरीखे ही कट्टरता आ गई तो फिर दाढी वाले मुसलमान और चोटी वाले मुसलमान में किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं रह जायेगा। आज भी भारत का आम हिन्दू संघ परिवार की कार्यप्रणाली को पसंद नहीं करता है किन्तु स्वतंत्रता के बाद के सत्तर वर्षो में जिस तरह मुसलमानों ने वोट बैंक बनकर राजनेताओं से सांठ गाॅठ की और हिन्दूओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखा उसके कारण बहुत से हिन्दू न चाहते हुये भी संघ के साथ जुडते चले गये। यदि गम्भीरता से देखा जाये तो भारत के हिन्दुओं ने स्वतंत्रता के बाद भी बहुत एकतरफा पक्षपात झेला है और अपना धैर्य नहीं खोया, लेकिन अब दुनियां की परिस्थिति को देखते हुये भारत का हिन्दू भी अपना धैर्य खो रहा है।

समस्या बहुत कठिन है। यदि हिन्दू भी संगठित हो गये तो भारत गृह युद्ध की चपेट में आ जायेगा। मुसलमान अपने विशेषाधिकार छोडेगा नहीं, अपने संख्या विस्तार की नीति से अलग नहीं होगा तो हिन्दुओं पर इसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। हो सकता है कि हिन्दू कुआँ और खाई में से किसी एक को चुनने के लिये बाध्य हो जाये, लेकिन जो भी होगा वह भले ही मजबूरी हो किन्तु अच्छा नहीं होगा। संघ भी एक संगठन है और किसी भी संगठन का विस्तार समाज के लिये घातक ही होता है। मैं देख रहा हूॅ कि जो संघ मोदी के पूर्व समान नागरिक संहिता और धारा 370 की समाप्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता देता था वहीं संघ अब हिन्दू राष्ट्र का नारा बुलन्द कर रहा है। जिस तरह संगठित इस्लाम ने 70 वर्षों से आज तक राजनीति को ढाल बनाकर हिन्दुओं को दूसरे दर्जे के नागरिक तक सीमित रख दिया गया था उसी तरह अब संघ भी मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने की सोचता है। न तो पहले की स्थिति अच्छी थी न भविष्य के कदम अच्छे दिख रहे है।

फिर भी संघ चाहे गलत हो या सही किन्तु वर्तमान स्थितियों में समाधान के लिये भारत के मुसलमानों को ही पहल करनी चाहिये। जिस तरह दुनियां संगठित हो रही है उसमें अब मुसलमानों की जिद्द उनके अस्तित्व के लिये घातक हो सकती है। भारत के मुसलमानों के लिये एक बहुत अच्छा अवसर है कि वे राजनैतिक पहल करें और स्वयं आगे आकर समान नागरिक संहिता तथा काश्मीर में धारा 370 समाप्ति की मांग करें। मैं समझता हूॅ कि यदि मुसलमान समान नागरिक संहिता की मांग करेगा तो संघ परिवार उस मांग का भरपूर विरोध करेगा क्योेंकि संघ परिवार समान आचार संहिता को ही समान नागरिक संहिता समझता है और जब वास्तव में समान नागरिक संहिता आएगी तो संघ परिवार विरोध करेगा ही। धारा 370 यदि समाप्त होती है तो भारत के मुसलमानों का उससे कोई नुकसान नहीं होगा। अब भारत के मुसलमानों को यह विष्वास कर लेना चाहिये कि भविष्य में वे धर्म के आधार पर न तो भारत का कोई नया विभाजन कराने में सफल हो पाएंगे न ही आबादी बढाकर विस्तार कर पाएंगे। चीन ने मुसलमानों के साथ किये जाने वाले व्यवहार में जो पहल की है वह दुनियां के और देषों में न हो, यह बात भारत के मुसलमानों को समझनी चाहिये। हिन्दू अब भी सावधानी पूर्वक धीरे धीरे कदम बढा रहा है। अगला कदम बढाने की जिम्मेदारी मुसलमानों की ही है।

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