मंथन क्रमांक-137 ’’राज्य के दायित्व या कर्तव्यों की समीक्षा’’–बजरंग मुनि

Posted By: admin on June 14, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

धर्म समाज और राज्य की भूमिका अलग-अलग होती है। समाज अन्तिम तथा सर्वोच्च इकाई होता है। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते हैं। कभी भी धर्म या राज्य समाज को कोई निर्देष नहीं दे सकते। धर्म व्यक्तियों का मार्गदर्शन करता है और राज्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी लेता है। इस तरह राज्य का एकमात्र दायित्व होता है प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा। दायित्व और कर्तव्य बिल्कुल अलग-अलग होते है। दायित्व हमेशा बाध्यकारी होता है और कर्तव्य स्वैच्छिक। दायित्व उसे उपर की इकाई द्वारा सौंपा जाता है और राज्य उस उपर की इकाई के लिये उत्तरदायी होता है। कर्तव्य करना या न करना उसके उपर निर्भर होता है। राज्य चाहे तो कर्तव्य कर सकता है और न चाहे तो नहीं भी कर सकता है।

प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम भी होती है और समान भी। किसी भी व्यक्ति की किसी भी स्वतंत्रता की न कोई सीमा बनाई जा सकती है और न ही कोई बाधा पैदा की जा सकती है। राज्य भी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई सीमा नहीं बना सकता। जिस तरह व्यक्ति को असीम स्वतंत्रता प्राप्त है उसी तरह उसे स्वनिर्मित परिवार रूपीसंगठन के अनुशासन में रहना उसकी मजबूरी भी है। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी व्यक्ति जिस पारिवारिक संगठन का सदस्य है, उस संगठन में रहते हुये वह पूरी तरह परतंत्र है। यह असीम स्वतंत्रता और शून्य स्वतंत्रता का तालमेल ही सहजीवन माना जाता है।
राज्य के दायित्व क्या है और उसकी सीमाएं क्या है इसको स्पष्ट करने के लिये समाज एक संविधान बना देता है जिसे मानना राज्य की मजबूरी मानी जाती है। राज्य के तीन प्रमुख न्यायपालिका, विधायिका, और कार्यपालिका मिलकर भी किसी भी परिस्थिति में संविधान द्वारा निर्मित सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते क्योंकि संविधान समाज द्वारा निर्मित होता है और राज्य उसके अनुसार चलने वाली इकाई होती है। यह अलग बात है कि वर्तमान समय में राज्य के इन तीनों अंगों ने मिलकर संविधान पर अपना कब्जा जमा लिया है। स्वतंत्रता के समय भारत गुलाम था और उस समय संविधान निर्माताओं की कुछ मजबूरियाॅ रही हांेगी कि उन्होंने संविधान निर्माण में विदेशो की नकल मात्र की। वैसे भी लम्बे समय से भारत वैचारिक धरातल पर कमजोर होता गया और हर मामले मे नकल करने के लिये मजबूर हुआ। यह नकल करने की मजबूरी आज तक बनी हुई है। यही कारण है कि हम भारत के लोग अबतक संविधान को भी तन्त्र की गुलामी से मुक्त नहीं करा सके तथा अपने उस मजबूरी में बने संविधान में एक भी संशोधन नहीं करा सके। यह नकल करने का ही परिणाम हुआ कि हम दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का अन्तर भी राज्य को नहीं बता सके।

दायित्व बाध्यकारी होता है और कर्तव्य स्वैच्छिक। कोई भी इकाई जब दायित्व और कर्तव्य का अन्तर नहीं समझती है तब वह दायित्व की जगह स्वैच्छिक कर्तव्यों को अधिक प्राथमिकता देती है क्योंकि उन कर्तव्यों से उसे लोकप्रियता भी अधिक मिलती है ओर उन्हें करना आसान ही होता है। राज्य का प्रमुख दायित्व होता है सुरक्षा ओर न्याय। पश्चिम के देशो ने सुरक्षा और न्याय के साथ साथ जनकल्याणकारी कार्य को भी अपने दायित्व में शामिल कर लिया तो भारत ने अपनी भारतीय परिस्थितियों का आँकलन किये बिना जनकल्याणकारी कार्यो को संविधान के दायित्वों में शामिल कर लिया और परिणाम हुआ कि भारत की राज्य व्यवस्था सुरक्षा और न्याय के स्थान पर जनकल्याणकारी कार्यो को अधिक प्राथमिकता देने लगी। यदि हम भारत की प्रमुख ग्यारह समस्याओं का आँकलन करें तो उनमें पांच 1. चोरी, डकैती, लूट 2. बलात्कार 3. मिलावट, कमतौल 4. जालसाजी, धोखाधडी 5. हिंसा, बल प्रयोग व आतंक ये सुरक्षा और न्याय से जुडे हुये है। अन्य छः समस्याये 1. भ्रष्टाचार 2. चरित्र पतन 3. साम्प्रदायिकता 4. जातीय कटुता 5. आर्थिक असमानता 6. श्रम शोषण ये समस्याये सामाजिक समस्याये है। सच्चाई ये है कि पांच वास्तविक समस्याये समाज में इसलिये बढ रही है क्योंकि राज्य इन्हें सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं देता। शेष छः समस्याये इसलिये बढ रही है कि इनमें राज्य दखल देता है। यदि राज्य छः समस्याओं के समाधान से स्वयं को अलग कर ले तो ये छः समस्याये अपने आप समाप्त भी हो जायेगी और राज्य को सुरक्षा और न्याय के लिये पर्याप्त शक्ति और साधन भी प्राप्त हो जायेगे। जो राज्य बलात्कार नहीं रोक पा रहा है वह वेश्यावृत्ति, बारबालाओं पर प्रतिबंध लगाने का नाटक करता है। जो राज्य आतंकवाद नहीं रोक पा रहा है, वही राज्य ब्लैक और तस्करी रोकने का प्रयत्न करता है। परिवार के पारिवारिक मामलों में राज्य को किसी भी रूप में दखल नहीं देना चाहिये। किन्तु राज्य हमेषा ही दखल देता है। जनकल्याण के सभी कार्य राज्य के लिये स्वैच्छिक कर्तव्य तक सीमित होते हैं। उनसे समाज की सुरक्षा करना धर्म का दायित्व है किन्तु राज्य इनमें अनावश्यक हस्तक्षेप करता है तथा हमारे निकम्मे धर्मगुरू भी, जो स्वयं प्रभावहीन हो चुके हैं, वे निरन्तर राज्य की चापलूसी में यह मांग करते है कि राज्य शराब जुआ, रोके या राज्य ही महिला उत्पीडन रोकेे। यहाॅ तक कि किसी भी प्रकार का शोषण रोकना या तो धर्म का काम है या समाज का। शोषण सिर्फ अनैतिक होता है अमानवीय तथा असामाजिक होता है, कोई अपराध नहीं होता न ही किसी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। निकम्मे धर्म गुरू अथवा नासमझ समाजशास्त्री सरकार से मांग करते हैं कि सरकार शोषण रोके और सरकार ऐसे निवेदन को स्वीकार कर लेती हैं। कोई व्यक्ति भूख से मर रहा है तो उसकी भूख दूर करना समाज का दायित्व है राज्य का नहीं। राज्य अनावश्यक रूप से अपने जरूरी कार्यों को छोडकर भूख दूर करने को अपना दायित्व मान लेता है। इसके दुष्परिणाम समाज को भोगने पडने है। जब सारा काम राज्य अपने उपर ले लेता है तो समाज पर भी उसका कुछ दुष्प्रभाव पडता है अर्थात समाज राज्य का मुखापेक्षी बन जाता है।

पुलिस और न्यायालय ओवर लोडेड बन गये है। गंभीर आपराधिक मुकदमें भी मृत्यु तक नहीं निपटते। न्यायालय और पुलिस राज्य की गलत प्राथमिकताओं के कारण ओवर लोडेड हैं। न्यायपालिका भी जनहित को परिभाषित और क्रियान्वित करने लगी है। न्यायपालिक भी अपनी न्यायिक प्रतिबद्धताओं से दूर हटकर जनकल्याण के नाम पर विधायी और कार्यपालिका आदेश पारित करने लगी है। राज्य की सभी इकाइयां अपने को ओवर लोडेड मानती है। क्या यह अच्छा नहीं होगा कि राज्य अपनी वर्तमान शक्ति का आँकलन करके उसके अनुसार प्राथमिकता के स्तर पर कुछ कार्यो तक स्वयं को सीमित कर ले और अन्य कार्य समाज पर छोड दे। सम्भवतः राज्य के दायित्व भी पूरे हो जायेगे और अन्य कार्यो को करने में समाज या धर्म भी सक्रिय हो सकता है। यह कैसे उचित माना जा सकता है कि आप जितना वजन नहीं उठा सकते उतना वजन उठाने की मूर्खता करें और न उठाने का बहाना बनावें। ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकती। दुनियां में क्या हो रहा है, उससे सीख लेना तो उचित हो सकता है किन्तु बिना अपनी परिस्थितियों का आँकलन किये उनकी नकल करना बहुत ही घातक होता है जैसा वर्तमान भारत में हो रहा है।

मैं नहीं कह सकता कि वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था ऐसी भूल जानबूझकर कर रही है अथवा अज्ञानतावश। किन्तु भूल तो हो रही है और उसके दुष्परिणाम से पूरा भारत प्रभावित हो रहा है। हमें चाहिये कि हम दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्यों का अन्तर समझे। हम राज्य समाज और धर्म का भी अन्तर समझे। हम अपने दायित्व और कर्तव्य छोडकर राज्य के उपर पूरी तरह निर्भर न हो जाये। समस्यायें प्राकृतिक नहीं है बल्कि हमारी और राज्य के बीच नासमझी के परिणाम हैं और हम यदि इन्हें ठीक से समझना शुरू कर देंगे तो हम दुनियां को एक नया मार्गदर्शन देने में सफल हो सकेेंगे।

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