ज्ञानोत्सव 2019, मंथन का विषय क्रमांक 1 – “ज्ञान-यज्ञ क्या क्यों कैसे?”–बजरंग मुनि

Posted By: admin on June 14, 2019 in Recent Topics - Comments: No Comments »

दिनाँक 31.08.2019 प्रथम सत्र प्रातः को होने वाले विचार
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1. राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। जहॉ एक तरफ सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुडने का प्रयास कर रहे है तो वही दूसरी तरफ सभी शरीफ समाज के साथ इकठठे हो रहे है। राज्य सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति आदि को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषा बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियों को विशेष सुरक्षा दी जा रही है और न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतों के बीच टकराव बढाया जा रहा है।

2. राज्य पूरी शक्ति से वर्ग समन्वय को समाप्त करके वर्ग निमार्ण, वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, उम्र, लिग, गरीब-अमीर, किसान-मजदूर, शहरी-ग्रामीण आदि के नाम पर राज्य योजनाबद्ध तरीके से समाज में अलग-अलग संगठन बनाकर उनमें वर्ग विद्वेष का कार्य कर रहा है।

3. शिक्षा को योग्यता का विस्तार न मानकर रोजगार के अवसर के रूप में बदलने का लगातार प्रयास हो रहा है। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है।

4. प्राचीन समय में ज्ञान और त्याग को अधिक सम्मान प्राप्त था। मध्यकाल में राज्य शक्ति और धन शक्ति ने ज्ञान और त्याग को प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। वर्तमान में भी राज्य शक्ति और धन शक्ति का ही बोलबाला है।

5. धूर्तता और स्वार्थ जैसे अवगुण सम्पूर्ण भारत में एक समान ही बढ़ रहे हैं। यह अलग बात है कि वर्तमान में गांव की अपेक्षा शहरों में यह बीमारी अधिक दिख रही है किन्तु यह भी सच है कि आज से 50-60 वर्ष पूर्व भी यह बीमारी गांव की अपेक्षा शहरों में ही ज्यादा थी।

6. सच्चाई यह है कि जितनी तेज गति से राजनीति चरित्र पतन कर रही है उसकी अपेक्षा चरित्र निर्माण की गति बहुत कम है।
ज्ञान यज्ञ बुद्धि और भावना के योग या सम्मिश्रण का व्यायाम मात्र है।

7. स्वस्थ शरीर के लिये व्यायाम और प्राणयाम विधि बताने वाले तो आपको गली-गली मिल जायेगे किन्तु स्वस्थ चिंतन के लिये मानसिक व्यायाम की आवश्यकता बताने व उसको पूरा करने वाली विधि के रूप में ज्ञान-यज्ञ अब तक ज्ञात एक मात्र उपाय है।

8. ज्ञानहीन सक्रिय लोग ज्ञानवानों से ही मार्गदर्शन प्राप्त करते है। यही हमारी परम्परा रही है। वर्तमान में इसका उल्टा हो रहा है।
9. बुद्धि प्रधान व्यक्ति मौलिक सोच रख सकता है जबकि भावना प्रधान व्यक्ति अनुसरण ही कर सकता है।

11. बुद्धि प्रधान व्यक्ति संचालन करता है चाहे वह समाज का शोषण करे या मुक्ति दिलावे। जबकि भावना प्रधान व्यक्ति संचालित होता है। फिर चाहे ऐसा शोषक द्वारा हो या शोषण मुक्तिदाता द्वारा।

12. बुद्धि प्रधान व्यक्ति सोच समझकर निर्णय करता है भावना प्रधान व्यक्ति सोचने समझने के स्थान पर भावुक होकर निर्णय करता है। भावुक व्यक्ति के निर्णय भावनाओं के अधीन होकर हुआ करते है।

13. हर बुद्धि प्रधान धूर्त प्रयास करता है कि समाज में भावनाओं का विस्तार हो।

व्यक्ति और समाज मूल इकाईयॉ होती है जहॉ व्यक्ति अंतिम इकाई है और समाज सर्वोच्च। व्यक्ति से लेकर समाज तक के बीच, व्यवस्था की अनेक इकाईयॉ होती है जिन्हें क्रमश: परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और राष्ट्र के रूप में माना जाता है। जो व्यक्ति सामाजिक अनुशासन को स्वीकार नहीं करते उन्हें नियंत्रित करने के लिये समाज एक अलग व्यवस्था बनाता है जिसे हम राज्य कहते है।

यदि हम वर्तमान सामाजिक स्थिति का ऑकलन करें तो दुनियॉ में अनेक प्रकार की समस्याएं निरन्तर बढती हुई दिख रही है। इनमें से पांच प्रमुख हैंः- 1. निरन्तर बढता भौतिक विकास और निरंतर होता नैतिक पतन। 2. लगातार होता शिक्षा का विस्तार और उसी गति से लगातार घटता हुआ ज्ञान। 3. प्रत्येक इकाई में हिंसा के प्रति बढता विश्वास और विचार-मंथन के प्रति घटता विश्वास। 4. भावना और बुद्धि के बीच लगातार बढती जा रही दूरी। 5. सत्ता का अधिकतम केन्द्रीयकरण।

हम विस्तार से चर्चा करें तो यह बात समझ में आती है कि भौतिक विकास के साथ नैतिक पतन का क्या सम्बन्ध है। भौतिक विकास की दृष्टि से, पूरा विश्व उन्नति के शिखर छूने का प्रयास कर रहा है। जीवन में शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र बचा हो जहॉ पर भौतिक उन्नति अपनी उपस्थिति न दर्ज करवा रही हो। हर रोज कोई न कोई ऐसा प्रयास अकल्पनीय सफलता प्राप्त कर रहा है जो आज से पचास-सौ वर्ष पूर्व असम्भव सरीखा लगता था। भौतिक सुख सुविधाओं की उपलब्धता हर दिन हर रोज सहज-सुलभ हो रही है। वहीं इसके उलट, आज समाज में नैतिक पतन भी उतनी ही तेजी से हो रहा है। वर्ग विद्वेष, वर्ग निर्माण, वर्ग संघर्ष भी उतनी तेजी के साथ हो रहा है। हर व्यक्ति में स्वार्थ भाव बढता जा रहा है। अधिकतम स्वतंत्रता की भूख उच्श्रृंखलता में बदल रही है और कर्तव्य की प्रेरणा कम हो रही है। शिक्षा के बढने के साथ-साथ दुनियां में ज्ञान भी बढना चाहिये था किन्तु ज्ञान घट रहा है। शिक्षा को योग्यता का विस्तार ना मानकर रोजगार के अवसर के रूप में बदलने का प्रयास लगातार हो रहा है जिसका परिणाम यह हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है। आतंकवाद की दिषा में अधिक शिक्षित लोग भी प्रेरित हो रहे है। किसी कार्य को किस तरह किया जाये इस सम्बन्ध में तो प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित हो रहा है किन्तु कौन सा कार्य करना उचित है और कौन सा अनुचित यह निर्णय करने का विवेक घट रहा है। चाहे व्यक्ति हो अथवा कोई अन्य इकाई किन्तु हिंसा के प्रति उसका विष्वास बढ रहा है। प्रथम आक्रमण को सफलता का सर्वश्रेष्ठ आधार माना जा रहा है। ईश्वरऔर समाज का भय घटता जा रहा है और व्यवस्था ऐसी हिंसा को रोकना अपनी प्राथमिकता नहीं मानती। भावना और बुद्धि भी एक दूसरे के पूरक न होकर विपरीत दिशा में जा रहे है। बुद्धि प्रधान लोग चालाकी की तरफ बढ रहे है जो अन्ततः धूर्तता में बदल जाती है। भावना प्रधान लोग शराफत की दिशा में चले जाते है जो अन्ततः मूर्खता में बदल जाती है। भावना प्रधान लोग त्याग को अधिक महत्व देते है तो बुद्धि प्रधान संग्रह को। भावना प्रधान लोग दान देकर खुष होते है तो बुद्धि प्रधान लोग दान लेकर खुश होते हैं। खुश तो दोनों ही होते है। भावना प्रधान लोग श्रद्धा से ओत प्रोत होते हैं तो बुद्धि प्रधान लोग तर्क को अधिक महत्व देते है। भावना प्रधान लोग धार्मिक संस्थाओं से जुड जाते है तो बुद्धि प्रधान लोग राजनीति से। हर धूर्त यह लगातार प्रयत्न कर रहा है कि उसके अतिरिक्त अन्य सब लोग भावना प्रधान हों, अपना कर्त्तव्य करे और शराफत को महत्वपूर्ण समझे। दुनियां में बुद्धि प्रधान लोगो की बढती धूर्तता एक बडे संकट का रूप ले रही है। राजैनतिक शक्ति भी धीरे-धीरे कुछ व्यक्तियों के पास इकठठी होती जा रही है। दुनियां के दो महत्वपूर्ण व्यक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग यदि आप में टकरा जाये तो दुनियां के सात अरब लोग भी मिलकर इन दोनो को न रोक सकते है और ना ही अपनी सुरक्षा की अलग व्यवस्था कर सकते है। राजनैतिक शक्ति का इस तरह बेलगाम होना सम्पूर्ण समाज के लिये बहुत ही खतरनाक है किन्तु सत्ता का यह केन्द्रीयकरण बढता ही जा रहा है। दुनियां की प्रमुख समस्याओं से तो भारत प्रभावित है ही किन्तु अनेक अन्य समस्याएं भी भारत को अस्थिर कर रही हैं। इनमें ये पांच प्रमुख है-
1. वर्ग समन्वय का कमजोर होकर वर्ग विद्वेष वर्ग व वर्ग संघर्ष की दिशा में बढना।
2. संसदीय लोकतंत्र का संसदीय तानाशाही में बदलना।
वैचारिक धरातल पर भारत की नकल करने की मजबूरी।
3. परिवार व्यवस्था तथा समाज व्यवस्था का लगातार कमजोर होना।
4. धर्म, राजनीति और समाज सेवा का व्यवसायीकरण।

5. भारत में लगातार वर्ग निर्माण, वर्ग विद्वेष तथा वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित किया जा रहा है। भारत का हर बुद्धिजीवी वर्ग निर्माण में जाने-अनजाने सक्रिय दिखता है। वर्ग विद्वेष बढाने के लिये वर्तमान भारत में मुख्य रूप से आठ आधारों पर सक्रियता दिखती है-
1. धर्म 2. जाति 3. भाषा 4. क्षेत्रीयता 5. उम्र 6. लिंग 7. गरीब अमीर 8. किसान मजदूर।

1. भारत का हर राजनैतिक दल सभी आठ आधारों पर वर्ग विद्वेष में सक्रिय रहता है किन्तु साम्यवादी एकमात्र ऐसे राजनीतिज्ञ होते हैं जो खुलकर वर्ग संघर्ष के पक्ष में खडे होते हैं जबकि अन्य दल छिपकर ऐसी कोशिश करते है। वर्ग समन्वय शब्द तो किसी राजनैतिक दल के एजेन्डे में है ही नहीं। अब तो अनेक धार्मिक- सामाजिक संगठन भी वर्ग विद्वेष के प्रयत्नों में सक्रिय हो गये है।

2. लोकतंत्र तथा तानाशाही में स्पष्ट अन्तर होता है। तानाशाही में तंत्र नियंत्रित संविधान होता है तो लोकतंत्र में संविधान नियंत्रित तंत्र। लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है जिसे गांधी हत्या के बाद लोक नियुक्त तंत्र के रूप में बदल दिया गया। संविधान में संशोधन के असीम अधिकार तंत्र के पास होने से भारत में संसदीय लोकतंत्र न होकर संसदीय तानाषही है जिसे लोक को धोखा देने के उद्देश्य से लोकतंत्र कह दिया जाता है। आज राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुड़ रहे है तो सभी शरीफ समाज के साथ इकठ्ठा हो रहे है। राज्य, सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषा बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियों को विशेष सुरक्षा दी जा रही है तो न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतों के बीच टकराव बढाया जा रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ कि समाज के शरीफ लोग अपनी सुरक्षा और न्याय के लिये अपराधियों की मदद लेने को मजबूर हो गये है। प्रति पांच वर्ष में वोट के माध्यम से हम ऐसी संसदीय गुलामी पर मुहर लगाकर अपनी सहमति व्यक्त करते है। परिणाम स्वरूप् यह संसदीय गुलामी निरन्तर बढती ही जा रही है।

3. बहुत प्राचीन काल में भारत विचारों का निर्यात करता था और विष्व गुरू कहा जाता था। पाणिनी सरीखे विश्व प्रसिद्ध विचारकों के मामले में भारत बहुत समृद्ध था। पिछले एक दो हजार वर्षो से भारत की वर्ण व्यवस्था विकृत हुई और धीरे धीरे भारत वैचारिक धरातल पर इतना कंगाल हुआ कि वह आज हर मामले में विदेशो की नकल करने को मजबूर हो गया। लार्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने भारत को और अधिक विदेशी विचारों पर आश्रित कर दिया। जे. कृष्णमूर्ति के बाद हम वैसा भी विचारक नहीं ला सके। वैचारिक धरातल पर तो भारत पिछडा ही किन्तु सामाजिक चिन्तन में भी भारत पिछडने लगा। गांधी की मृत्यु के बाद आंशिक रूप् से जय प्रकाश तथा उनके बाद हमें अन्ना हजारे तक ही संतोष करना पडा है। आगे तो भविष्य और भी अंधकार मय दिख रहा है। आखिर यह विचार का विषय है कि भारत में हमारी माताएं उच्चस्तर के वैज्ञानिक, पूंजीपति राजनेता अथवा कलाकारों को जन्म देने में सक्षम हैं तो हम विचारक या समाजिक चिन्तन के मामले में इतना पीछे क्यों है?

4. वैसे तो भारत में अंग्रेजों के समय से ही परिवार व्यवस्था तथा समाज व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिशे शुरू हो गई थी किन्तु स्वतंत्रता के बाद तो राज्य सुनियोजित तरीके से परिवार और समाज व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने में सक्रिय हो गया। समाज व्यवस्था की प्राथमिक इकाई परिवार तथा गांव को संवैधानिक मान्यता से बाहर कर दिया गया तो समाज तोडक धर्म और जाति को संवैधानिक मान्यता दे दी गई। परिवार के पारिवारिक मामलों में भी कानूनी हस्तक्षेप बढता गया तो समाज के सामाजिक बहिष्कार जैसे अधिकार भी छीन लिये गये। न्याय और सुरक्षा राज्य का दायित्व होता है किन्तु राज्य सुरक्षा और न्याय की तुलना में तम्बाकू और दहेज रोकने लगा।

5. भारत में स्वार्थ का महत्व निरन्तर बढ रहा है। व्यक्तिगत जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक में स्वार्थ बढा है। ज्ञान और त्याग की तुलना में राजनैतिक पद और धन का प्रभाव बढा है। अच्छे-अच्छे धर्मगुरू भी धन और सत्ता के लिये लालायित दिखते है। राजनीति पूरी तरह व्यवसाय बन गई है। मीडिया और शिक्षण संस्थाएॅ तो व्यावसायिक हैं ही किन्तु अब तो एनजीओ के नाम पर समाज सेवा तक का व्यवसायीकरण हो गया है। समाज सेवा का बोर्ड लगाकर उस नाम से अपनी राजनैतिक आर्थिक स्थिति मजबूत करने वालों की बाढ़ सी आ गई है।

भारत देश से लेकर हमारी परिवार व्यवस्था तक इन दस विकृतियों से प्रभावित हुई है। इन विकृतियों को दुष्परिणाम भी स्पष्ट दिख रहे हैं। नैतिक पतन के परिणाम स्वरूप समाज में ईश्वर और समाज का भय कम हो रहा है। कानूनों की मात्रा लगातार बढ रही है और उसी अनुपात में भ्रष्टाचार भी बढ रहा है। नैतिक पतन बढने के कारण राज्य पर निर्भरता और राज्य का हस्तक्षेप बढ रहा है। समाज अप्रत्यक्ष रूप से अस्तित्व खो रहा है। भौतिक उन्नति को ही सुख का एक मात्र आधार समझ लिया गया है। ज्ञान घटने के कारण व्यक्ति की नीर क्षीर विवेक की शक्ति घटी। अन्धानुकरण के कारण धूर्त लोग ब्रेनवाश में सफल होते जा रहे हैं। विचार और मंथन की जगह प्रचार अधिक प्रभावोत्पादक हो रहा है। शिक्षा को ही ज्ञान का पर्याय माना जाने लगा है। हिंसा पर विश्वास बढ रहा है। मानव स्वभाव ताप और स्वार्थ वृद्धि सम्पूर्ण मानवता के लिये एक बडे खतरे के रूप में प्रकट हो रही है। पर्यावरणीय ताप वृद्धि का तो समाधान खोजा जा रहा है किन्तु मानव स्वभाव में आ रहे निरन्तर बदलाव पर कहीं कोई खोज नहीं हो रही जबकि यह बदलाव कई गुना अधिक खतरनाक है। शास्त्रार्थ की जगह शस्त्रार्थ का प्रभाव बढ रहा है। विपरीत विचारों के लोग एक साथ बैठकर किसी समाधान पर चर्चा करने से भी डरने लगे हैं क्योंकि रूआ न सूत जुलाहों में लठ्ठम लठ्ठा का डर बढता जा रहा है। शराफत पर विश्वास घट रहा है क्योंकि शरीफ लोग पग पग पर धूर्तो द्वारा ठगे जा रहे हैं। कर्तव्य भाव घटकर अधिकार भाव मजबूत हो रहा है। राजनैतिक शक्ति के केन्द्रीयकरण के भी दुष्परिणाम दिख रहे हैं। दुनियां दो गुटों में धु्वीकृत हो रही है जिसमें एक तरफ तो लोकतंत्र में आस्था रखने वाले है तो दूसरी तरह इस्लाम साम्यवाद और तानाशाही को अपनाने वाले है। इन दोनों गुटों में येन केन प्रकारेण आगे बढने की होड मची है। आज तक पूरी दुनियां का कोई ’एक विश्व-संविधान’ तक नहीं बना जो इन दोनों गुटों को अपनी सीमाएॅ बता सके। ये गुट ही आपस में जब चाहें तब अपनी नैतिकता की सीमाएं बना लेते हैं और जब चाहे तब तोड देते हैं। राष्ट्रहित को समाज हित से उपर माना जाने लगा है क्योंकि ये गुट समाज का कोई अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते। दोनो ही गुट अपनी आर्थिक तथा सामाजिक शक्ति का विस्तार करने में सक्रिय हैं तथा दोनो गुटों की कार्य प्रणाली में निर्णायक भूमिका के बटन का अन्तिम अधिकार राजनेताओं तक संकुचित हो गया है। अब उसमें विचारकों या सामाजिक चिन्तकों की भूमिका लगभग शून्य है।

भारत भी इन विश्वव्यापी समस्याओं से स्पष्टतः प्रभावित है। राजनैतिक दल सिर्फ भौतिक उन्नति की भूख पैदा करके उसके समाधान की चिन्ता कर रहे हैं। भारत में भी शिक्षा को ज्ञान की कीमत पर महत्व दिया जा रहा हे। राजनैतिक दल हिंसा को प्रोत्साहित करने में सक्रिय है। अधिकारों के लिये संघर्ष की प्रवृत्ति भी बढ रही है। पूरे भारत में मजबूत और केन्द्रित सत्ता को ही अव्यवस्था का एकमात्र समाधान मान लिया गया है। इनके अतिरिक्त भी भारत में कुछ विशेष परिणाम दिख रहे हैं। वर्ग संघर्ष बढाने के परिणाम स्वरूप साम्प्रदायिकता, जातीय टकराव, महिला-पुरूष के बीच अविष्वास, गरीब-अमीर के बीच टकराव शहर-गांव के बीच असंतुलन आदि लक्षण बढ रहे हैं। संविधान तंत्र का गुलाम होने के कारण, तंत्र के ही दो सहभागी न्यायपालिका और विधायिका आपस में सर्वोच्चता की लडाई लड़ रहे है क्योंकि संविधान संशोधन का अन्तिम अधिकार जिसके पास होगा वही सर्वोच्च माना जायेगा। संसद को विचार मंथन का केन्द्र मानना चाहिये किन्तु संसद धीरे धीरे अपराधियों के अखाडे के रूप में बदलती जा रही है। अब तो न्यायपालिका भी संसदीय प्रणाली की नकल करती दिख रही है। भारत हर मामले में विदेशो की नकल कर रहा है। भारतीय संविधान पूरी तरह विदेशी संविधानों की नकल है। हमारी हालत यह है कि हम विदेशो की असत्य या अधकचरी परिभाषाओं को ही आधार बनाकर अपना समाधान खोजने के लिये प्रयत्नषील हैं। हम आज तक नहीं सोच सके कि मंहगाई, बेरोजगारी, गरीबी, अपराध, गैरकानूनी, अनैतिक, असामाजिक, समाज विरोधी, मौलिक अधिकार, संविधान और कानून, कर्तव्य और दायित्व आदि शब्दों की वर्तमान परिभाषा क्या है और क्या होनी चाहिये । हम आंख मूंदकर नकल करने की मजबूरी के कारण विचार और साहित्य का भी अन्तर नहीं समझ सके। हमने भी राष्ट्र को समाज से उपर मान लिया। हमने धर्म और सम्प्रदाय का भी अन्तर नहीं समझा क्योंकि हमने भी वैष्विक परिभाषाओं को आंख मूंदकर सही माना। मैंने ऐसी असत्य या अर्धसत्य परिभाषाओं की सूची बनाई तो वह सैकड़ों तक है। इसी तरह हम यह भी भूल गये कि देष काल परिस्थिति अनुसार परम्पराएं संशोधित भी होनी चाहिये। हम परंपराओं से इस तरह चिपके कि संशोधन के अभाव में विदेशी गलत परंपराएं हमारे बीच घुसपैठ करने में सफल हुई। हम परिवार व्यवस्था को भी ठीक से परिभाषित नहीं कर पा रहे है। हम या तो अपनी पारंपरिक परिभाषा से ही चिपके हैं या विदेशी नकल से प्रभावित सरकारी परिभाषा से ही संचालित होने के लिये मजबूर हैं। हमारी परिवार व्यवस्था सहजीवन की ट्रेनिंग की पहली पाठशाला है किन्तु परिवार व्यवस्था ही कमजोर हो रही है। हमारी सामाजिक व्यवस्था में धर्म समाज और राज्य का समन्वय महत्वपूर्ण है किन्तु इनका व्यावसायीकरण घातक स्वरूप में आ गया है। पेशेवर लोग राज्य सत्ता द्वारा सम्मानित और प्रोत्साहित किये जाते हैं। प्राचीन समय में ज्ञान और त्याग को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था। किन्तु वर्तमान समय में ज्ञान और त्याग इस सम्मान प्रतियोगिता से बाहर हो गये हैं। अब तो राजनैतिक सत्ता और धन सत्ता के बीच ही सम्मान शक्ति और सुविधा के एकत्रीकरण की प्रतिस्पर्धा चल रही है। अब तो इस प्रतिस्पर्धा में गुण्डा शक्ति भी शामिल हो गई है। जो जितना बड़ा गुण्डा; सम्मान, शक्ति और धन एकत्रीकरण में वह उतना ही ज्यादा सफल।

उपरोक्त सारी वैश्विक एवं राष्ट्रीय समस्याओं की तुलना में यदि हम आप अपनी भूमिका का ऑकलन करें तो हमारी स्थिति शून्यवत है। हमारी भूमिका एक बाल्टी से समुद्र सुखाने का सपना देखने वालों के समान है किन्तु निराशा किसी समस्या का समाधान नहीं है इसलिये समाधान तो खोजना ही होगा। हम ऐसी खराब स्थिति के कारणों पर विचार करें तो इसका सबसे प्रमुख कारण दिखता है- भारत में विचार मंथन का अभाव। प्राचीन समय में समाज का एक वर्ग वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत चयनित होकर बचपन से ही विचार मंथन करके निष्कर्ष निकालता था और शेष समाज उन निष्कर्षो के आधार पर सक्रिय होता था। योग्यता के ऑकलन की अपेक्षा, जन्म अनुसार वर्ण व्यवस्था के प्रचलन ने चिंतन का महत्व कम किया। मौलिक सोच की जगह पुरानी सोच को अन्तिम मानने से रूढिवाद आया। नई सोच के अभाव में राजनेता ही विचारक के रूप में समाज का मार्गदर्शन करने लगे। राजनेता भी पश्चिम के अधकचरे विचार समाज को देने लगे और अव्यवस्था शुरू हो गई। इस अव्यवस्था के घाव पर मक्खी के समान मड़राते हुये साम्यवादियों ने लाभ उठाया और हमारी परिवार व्यवस्था व समाज व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश की। प्राचीन समय के विचारक समस्याओं के समाधान पर चिन्तन मनन करते थे तो हमारे साम्यवादी विचारक ऐसी समस्याओं से लाभ उठाने तक ही चिन्तन मनन करते रहे। अब ऐसे साम्यवादियों से तो मुक्ति मिल गई है किन्तु नये सिरे से विचार मंथन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है। यदि हम फिर से उसी पुरानी रूढिवादी परंपराओं की नकल करने लगेगें तो कोई लाभ नहीं होगा। लाभ तो तब होगा जब नये तरीके से विचार मंथन की प्रक्रिया आगे बढे़।

जब भंयकर आग लगी हो तब तात्कालिक परिस्थितियों का ऑकलन करके तय होता है कि हम अपने सीमित संसाधन से आग बुझाने को प्राथमिक माने या अपना घर बचाने को। वर्तमान परिस्थितियां पूरी तरह समस्याओं के विस्तार करने वाली हैं और समाधान के प्रयत्न निराश करने वाले। राजनैतिक व्यवस्था इन परिस्थितियों का लाभ उठाने के लिये निरन्तर आग में घी डालने का काम कर रही हैं। ऐसे वातावरण में हम जैसे विचारकों का दायित्व है कि हम समाज का ठीक-ठीक मार्ग दर्षन करें। दो अलग-अलग दिशाओं से काम शुरू होना चाहिये 1. राज्य कमजोरीकरण। 2. समाज सशक्तिकरण। राज्य कमजोरीकरण के प्रयास के रूप में पहले भारतीय संविधान को तंत्र की गुलामी से मुक्ति के लिये समाज में इच्छा शक्ति जागृत करना होगा। इस जनजागरण में एक टीम निरन्तर सक्रिय है किन्तु इसके साथ समाज सशक्तिकरण के लिये भी जन-जागृति करनी होगी। समाज व्यवस्था एक जटिल प्रक्रिया है। इसमें अनेक विपरीत क्षमताओं के लोग रहते हैं। अलग-अलग व्यक्तियों की क्षमताओं के अनुसार अलग-अलग समूह बनना चाहिये। हम समाज को चार समूहों में विभक्त कर सकते हैं 1. मार्गदर्शक 2. रक्षक 3. पालक 4. सेवक। सब लोग अपनी-अपनी क्षमता का ऑकलन करके एक मार्ग चुनें। इस तरह समाज सशक्तिकरण की शुरूआत हो सकती है।

मेरी उम्र क्षमता और स्वास्थ के आधार पर मैं मार्गदर्शक तक सीमित हॅू। मुझे भगवान कृष्ण का कथन प्रभावित करता है कि जब समाज के समक्ष विशेष संकट काल हो तब हमें ज्ञान यज्ञ के माध्यम से समाधान का मार्ग तलाशना चाहिये। उस समय ज्ञान-यज्ञ पद्धति क्या थी यह मुझे नहीं पता किन्तु हम सबने महसूस किया कि भावना और बुद्धि अथवा शरीफ और चालाक के अलग-अलग समूह न बनकर यदि प्रत्येक व्यक्ति में दोनो का संतुलन हो तो समझदारी विकसित हो सकती है और समझदारी का बढ़ना एक अच्छा समाधान हो सकता है। समझदारी के लिये श्रद्धा और तर्क का एक साथ समन्वय होना चाहिये। उदाहरण स्वरूप, ’एक छोटे धार्मिक अनुष्ठान के साथ एक बडे़ स्वतंत्र विचार-मंथन का समन्वय’। यह प्रणाली मैंने आर्य समाज से सीखी, यद्यपि आर्य समाज में भी अब स्वतंत्र विचार-मंथन करीब-करीब बन्द हो रहा है। ज्ञान-यज्ञ का प्रयोग हम सबने एक छोटे शहर में लगातार चौसठ वर्ष तक किया और अब भी जारी है। इस प्रणाली में पहले आधे घंटे का यज्ञ अथवा कोई अन्य धार्मिक आयोजन करके उसके तत्काल बाद दो या ढाई घंटे का एक स्वतंत्र विचार मंथन होता है। विपरीत या भिन्न विचारों के लोग एक साथ बैठकर किसी पूर्व घोषित विषय पर स्वतंत्र विचार प्रस्तुत करते हैं। साथ में प्रश्नोत्तर भी होता है किन्तु वहां न कोई निष्कर्ष निकाला जाता है न प्रस्ताव पारित होता है न कोई योजना बनती है। प्रत्येक व्यक्ति भिन्न निष्कर्ष निकालने हेतु स्वतंत्र है। अन्त में ज्ञान यज्ञ प्रार्थना होती है ’’हे प्रभो, आप मुझे शक्ति दो कि मैं दूसरों को अपनी इच्छा अनुसार संचालित करने की इच्छा अथवा दूसरों की इच्छानुसार संचालित होने की मजबूरी से दूर रह सकूॅ। यदि ऐसा न हो तो सबको सहमत कर सकूॅ और फिर भी ऐसा न हो तो, ऐसी इच्छाओं का अहिंसक प्रतिरोध करूं।’’ उसके बाद प्रसाद वितरण तथा अगले कार्यक्रम का विषय घोषित करके यज्ञ समाप्त होता है। हमारे जीवन के चौसठ वर्ष के इस प्रयोग का बहुत लाभ दिखा। इस सफलता से आश्वस्त हमारे साथियों ने इसे देशव्यापी विस्तार देने की योजना पर कार्य करना शुरू किया है। माना गया कि हम समस्याओं के समाधान पर कार्य न करके समस्याओं के कारणों पर विचार-मंथन करे। आज स्थिति यह है कि अच्छे-अच्छे विद्वान यह नहीं बता पाते कि व्यक्ति और नागरिक में क्या अंतर है। समाज, राष्ट्र और धर्म में कौन अधिक महत्वपूर्ण है, शिक्षा और ज्ञान में क्या अंतर है, अपराध, गैरकानूनी और अनैतिक में क्या अन्तर है, कार्यपालिका और विधायिका में क्या अंतर है आदि आदि। आखिर हम वर्ग विद्वेष में सक्रिय समूहों का विरोध न करके सामाजिक एकता की एक ओर बड़ी लकीर खीचने का प्रयास क्यो न करें? अर्थात हम जाति, धर्म, भाषा आदि के नाम पर बने संगठित समूहों का विरोध न करके एक संयुक्त समूह की ओर बढने का प्रयास करे जैसा कि उपरोक्त चौसठ वर्षो के प्रयोग में हुआ है।

अब मैं आचार्य पंकज तथा कुछ अन्य विद्वानों के साथ ऋषिकेश में रहता हूॅ। महसूस किया गया कि ज्ञान यज्ञ को क्रांतिकारी रूप से प्रभावी और परिणाम उत्पादक बनाने के लिये कुछ अन्य चीजों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। देखा गया कि ज्ञान यज्ञ में शामिल व्यक्ति को तो लाभ होता है तथा इस प्रणाली से विचार मंथन आगे भी बढ़ता है। किन्तु जो लोग व्यस्तता या अरूचि के कारण शामिल नहीं हो पाते उनके लिये ज्ञान यज्ञ परिवार अपनी तरफ से कुछ पहल करे, ऐसा भी महसूस किया गया। यदि परिवारों के बीच आपस में संवाद प्रक्रिया विकसित हो तो कुछ बदलाव संभव है। इस संबंध में सोचा गया है कि धीरे-धीरे हर परिवार को ज्ञान यज्ञ प्रार्थना का सरल मार्ग दिया जावे। जो लोग ज्ञान यज्ञ का आयोजन नहीं कर पाते वे अपने परिवार में किसी सर्व सुलभ स्थान पर ज्ञान यज्ञ प्रार्थना को लिखकर या चिपकाकर रखें। विश्वास करें कि इस प्रार्थना से आपको अवश्य लाभ होगा। यदि कभी कहीं ज्ञान यज्ञ आयोजित हो तो उसमें शामिल होने से आपकी समझदारी और विकसित हो सकती है।

ज्ञान यज्ञ परिवार ने भारत में निरन्तर जारी असत्य प्रचार को तार्किक चुनौती देने के उद्देश्य से ऋषिकेश में बजरंग मुनि सामाजिक शोध संस्थान भी शुरू किया है जिसके निदेशक सुप्रसिद्ध विद्वान आचार्य पंकज जी है। यह संस्थान मेरे द्वारा निकाले गये अनेक निष्कर्षो के साथ साथ कुछ अन्य विद्वानों के समसामयिक निष्कर्षो पर भी व्यापक शोध कार्य आयोजित तथा प्रोत्साहित करेगा। यह शोध कार्य भी प्रारंभ हो गया है। हमारे जो साथी वर्तमान राजनैतिक व संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव हेतु सक्रिय होगे उन्हें भी ज्ञान यज्ञ परिवार सब प्रकार की सहायता करता है।

हम इस पूरे कार्यक्रम को एक जन जागरण के रूप में बढ़ा रहे है। हम चाहते हैं कि पूरे देश के अधिक से अधिक परिवारों में इस प्रार्थना का समावेश हो। लिखित प्रार्थना को आप घर में कहीं चिपका कर रखें और हमें सूचित करें तो हम आपको अपना साधारण सदस्य मान लेंगे। जो लोग कुछ अधिक करना चाहते हैं वे कम से कम वर्ष में एक बार किसी स्थान पर ज्ञान यज्ञ आयोजित करें। ऐसी घोषणा करने वालों को हम सक्रिय सदस्य मानेंगे। ऐसे वार्षिक कार्यक्रम में मैं या कोई अन्य विद्वान भी सूचना मिलने पर शामिल हो सकते है। जो साथी एक से अधिक स्थानों पर अपने परिचितों को न्यूनतम वर्ष में एक बार ज्ञान यज्ञ आयोजन हेतु प्रेरित करेगे उन्हें हम विशेष सदस्य के रूप में स्वीकार करेंगे। हम चाहते हैं कि आप अपने सारे कार्य पूर्ववत करते हुये कुछ खाली समय इस दिशा में लगाये तो संभव है कि इस विश्वव्यापी संकट से निकलने का कोई मार्ग निकल सके। यदि हम परिवार में कभी सामूहिक प्रार्थना तथा आपसी संवाद की स्थिति बनायेगे तो लाभ अवश्य होगा। यदि आप भिन्न विचारों के लोगों को एक साथ बिठाकर स्वतंत्र विचार मंथन हेतु अवसर देंगे तो इसका पूरा लाभ समाज के साथ साथ आपको भी होगा।

ऋषिकेश कार्यालय में प्रत्येक रविवार को शाम छः से साढ़े आठ तक साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ होता है। महिने में एक बार रविवार को विशेष ज्ञान यज्ञ भी शुरू हो रहा है। इसका सारा संचालन ज्ञान यज्ञ परिवार प्रमुख अभ्युदय द्विवेदी जी करते है। सोलह दिनों का विशेष वार्षिक ज्ञान यज्ञ ऋषिकेश में 31 अगस्त से 15 सितम्बर तक आयोजित है। इसमें प्रतिदिन यज्ञ, प्रार्थना, कुछ विद्वानों के प्रवचन के साथ साथ प्रतिदिन 11 घंटे का विचार मंथन भी होगा जो प्रतिदिन पांच-पांच घंटे का दो विषयों पर होगा। आप सभी लोग आमंत्रित हैं तथा अपनी अपनी रूचि और समय के अनुसार विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मिलित हो सकते है। इस सोलह दिवसीय ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था ऋषिकेश की संचालन समिति करेगी और पूरे आयोजन में यदि कोई विशेष आवश्यकता होगी तो अन्तिम निर्णय मेरा होगा।

सारांश: विश्व की सभी समस्याओं के समाधान की पहली सीढ़ी है प्रत्येक में समझदारी और ज्ञान का विस्तार। ज्ञान यज्ञ ऐसे विस्तार का एक माध्यम है।

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