परिवार व्यवस्था कितनी आवश्यक ?

Posted By: admin on June 9, 2012 in Uncategorized - Comments: 6 Comments »

व्यवस्था तथा संस्कृति एक दूसरे के पूरक होते हैं। व्यवस्था का प्रभाव संस्कृति पर पड़ता है तथा संस्कृति का व्यवस्था पर।

दुनिया में वर्तमान समय में चार संस्कृतियां प्रमुख हैं जिनका व्यवस्थाओं पर दूरगामी प्रभाव है। (1) इस्लामिक (2) पाश्चात्य (3) भारतीय (4) साम्यवादी। साम्यवाद ने संस्कृति को रौंदकर बुलडोजर प्रणाली से व्यवस्था बनाने की कोशिश की। इस्लाम, इसाइयत तथा हिन्दुत्व ने व्यक्ति, परिवार तथा समाज और धर्म के बीच कुछ तालमेल बिठाकर व्यवस्था की रूपरेखा बनार्इ तो, साम्यवाद ने व्यक्ति, परिवार, समाज, धर्म आदि को एकसाथ समाप्त करके सिर्फ बन्दूक के बल पर अपनी व्यवस्था बनाने की कोशिश की। साम्यवाद कुछ वर्षों तक सफल भी रहा किन्तु शीघ्र ही उसकी पोल खुल गर्इ तथा अब वह धीरे धीरे इतिहास के पन्नों तक सिमटता जा रहा है। अन्य तीन संस्कृतियां और उनसे प्रभावित व्यवस्था अब भी स्वस्थ प्रतियोगिता में सक्रिय है।

तीनो संस्कृतियों में व्यक्ति, परिवार, समाज और धर्म का तालमेल है। हिन्दू संस्कृति प्रभावित व्यवस्था में व्यक्ति, परिवार और समाज का पूरा पूरा समन्वय होता है। तीनो के अपने-अपने विशेषाधिकार भी होते हैं तथा सीमाएं भी। इस्लाम में परिवार व्यवस्था का स्वतंत्र असितत्व है तथा धर्म का भी। इस्लाम में व्यक्ति के मूल अधिकारों को मान्यता लगभग नहीं के बराबर है। इसाइयत में व्यक्ति और समाज को महत्व प्राप्त है। इसमें धर्म और परिवार को व्यवस्था में विशेष स्थान प्राप्त नहीं। हिन्दू संस्कृति में धर्म व्यवस्था का अंग नहीं है। हिन्दू संस्कृति में धर्म किसी भी रूप में संगठन नहीं होता। इसलिये यह व्यवस्था का सहायक मात्र तक सीमित होता है।

हिन्दू संस्कृति दुनिया की एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो बहुत पुराने तथा लम्बे समय से अपनी व्यवस्था को बचाये हुए है। प्राचीन समय में हमारी संस्कृति तथा व्यवस्था बहुत ज्यादा विकसित थी या पिछड़ी हुर्इ यह निष्कर्ष अभी भी विवादास्पद ही है, किन्तु यह बात विवाद रहित है कि यह व्यवस्था बहुत पुरानी है। उल्लेखनीय यह भी है कि हमारी व्यवस्था पिछले कर्इ सौ वर्षो तक एक एक करके दोनों व्यवस्थाओं की गुलाम रहीं। सामान्यतया गुलामी व्यवस्थाओं पर गहरा परिवर्तनकारी प्रभाव डालती है। किन्तु इतनी लम्बी गुलामी के बाद भी तथा विशेष कर इस्लामिक आक्रमणों को झेलते हुए भी हमारी संस्कृति और व्यवस्था लगभग बची रही। इससे सिद्ध होता है कि व्यक्ति, परिवार और समाज को मिलाकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था है उसमें अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा विपरीत परिसिथतियों में भी अपने संरक्षण की विशेष शक्ति है, अन्यथा इस्लाम के आधिपत्य के बाद तो कोर्इ बच सकता ही नहीं किन्तु हम बचे रह गये।

मेरे विचार में हमारे बच जाने का कारण हमारी व्यक्ति, परिवार और समाज की त्रिस्तरीय व्यवस्था है। इन तीनों का तालमेल इतना मजबूत हो जाता है कि बड़ी से बड़ी ताकत भी इसे तोड़ नहीं पाती। व्यक्ति और समाज के बीच परिवार का स्वतंत्र अस्तित्व है और परिवार एक अभेद्य दीवार होती है जिसे तोड़े बिना समाज व्यवस्था पर कोर्इ बड़ा प्रभाव डालना संभव ही नहीं होता।

गुलामी के लम्बे काल में भी हमारी त्रिस्तरीय व्यवस्था सुरक्षित रही। यधपि इस व्यवस्था में कुछ विकृतियाँ आर्इ। समाज व्यवस्था ने व्यक्ति और परिवार की सीमाओं का उल्लंघन करके अपना हस्तक्षेप बढ़ाया। परिणाम हुआ जातिवादी शोषण, धार्मिक कट्टरवाद, अन्धविश्वास, पुरूष प्रधानता आदि। ये सभी विकृतियां परिवार व्यवस्था की देन न होकर समाज सशक्तिकरण की देन रही। स्वतंत्रता के बाद भारत की राजनैतिक व्यवस्था इस त्रिस्तरीय व्यवस्था के विकल्प के रूप में सामने आर्इ। इस्लाम, पश्चिमी संस्कृति तथा साम्यवाद के बीच प्रतिस्पर्धा हुर्इ कि भारत की नर्इ राजनैतिक व्यवस्था को किस तरह प्रभावित करें। गांधी के जीवित रहते हुए भी तीनो शक्तियां समझ चुकी थीं कि नेहरू और अम्बेडकर राजनैतिक दौड़ में आगे निकल जायेंगे। तीनों ने ही इन दोनों को अपने साथ जोड़ने की जी तोड़ कोशिश की। गांधी को ये तीनो ही शक्तियां बाधक मानती थीं और नेहरू अम्बेडकर को साधक। गांधी के बाद तो इन्हें और भी सुविधा हो गर्इ। नेहरू और अम्बेडकर दोनों ही पाश्चात्य व्यक्ति और समाज व्यवस्था को मानते थे। दोनों ही परिवार व्यवस्था को अनावष्यक मानते थे। नेहरू जी के मन में हिन्दू समाज व्यवस्था के प्रति नफरत का भाव था और अम्बेडकर के मन में हिन्दुत्व के प्रति आक्रोष। अम्बेडकर इस्लाम को हिन्दुत्व की अपेक्षा ज्यादा अच्छा समझते थे तो नेहरू जी साम्यवाद को। पश्चिम को तो दोनो ही ठीक मानते थे। यही कारण रहा कि भारतीय राजनैतिक व्यवस्था से परिवार व्यवस्था को बिल्कुल गायब कर दिया गया। यदि ये प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्र इकार्इ भी मान लेते तब भी कोर्इ कठिनार्इ नहीं थी। किन्तु एक ओर तो इन्होंने परिवार व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता से अलग कर दिया तो दूसरी ओर इन्होंने समाज सुधार के नाम पर परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के भी लगातार प्रयत्न किये। हिन्दू कोड बिल, अनेक प्रकार के विवाह कानून, संपत्ति कानूनों में मनमाना बदलाव आदि ने हिन्दू परिवार समाज व्यवस्था को लगातार कमजोर किया तथा आज भी कर रहे हैं। आज भी भारत के सभी राजनैतिक दल भारत की त्रिस्तरीय व्यवस्था को द्विस्तरीय करने का लगातार प्रयत्न करते रहते हैं। अन्य राजनैतिक दल तो इस व्यवस्था को व्यक्ति, परिवार और समाज से बदलकर व्यक्ति और समाज तक ही ले जाना चाहते हैं किन्तु भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार तो इससे भी आगे जाकर इसे धर्म के अन्तर्गत करने की दिशा में अग्रसर है जो पूरी तरह हिन्दू संस्कृति के विरूद्ध इस्लामिक संस्कृति है। हमारी हिन्दू संस्कृति में धर्म हमेशा ही आचरण का भाग रहा है, व्यवस्था का नहीं। व्यवस्था में तो परिवार और समाज ही आगे रहे हैं। ये तथाकथित धर्म के ठेकेदार, धर्म और समाज का कभी अन्तर ही नहीं समझते तो भूल तो होगी ही।

व्यवस्था को ठीक रखने के लिये व्यक्ति परिवार समाज की त्रिस्तरीय व्यवस्था बहुत सफल भी है और आवश्यक भी। स्वतंत्रता के बाद परिवार व्यवस्था अलग करने के दुष्परिणाम हमारे सामने स्पष्ट हैं। अपराध लगातार बढ़े हैं। व्यक्तिगत स्वार्थ भावना बढ़ी है और सहअसितत्व का विचार घटा है। घूर्तता को सफलता का मापदण्ड माना जा रहा है। संपत्ति के विवाद बढ़ रहे हैं। अव्यवस्था का वातावरण है। समाधान स्पष्ट नहीं दिख रहा। किन्तु करना तो होगा ही। परिवार व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्रदान करना सबसे अच्छा समाधान है। व्यक्ति, परिवार और समाज के अलग अधिकार, उनकी स्वतंत्रताएं तथा सीमाएं तय करके उन्हें संवैधानिक मान्यता दे दी जाये। धर्म को व्यक्तिगत आचरण तक सीमित कर दें तथा सरकार का व्यक्ति, परिवार, समाज के आपसी सम्बन्धों की सुरक्षा के अतिरिक्त उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बिल्कुल रोक दें। परिवार व्यवस्था हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था की मेरूदण्ड है। परिवार व्यवस्था को मजबूत करना ही चाहिये। पश्चिम की परिवार विहीन प्रणाली तथा इस्लाम की समाज विहीन प्रणाली के परिणाम हम देख चुके हैं। अब हम अपनी भारतीय व्यवस्था को मजबूत करें तो अच्छा होगा।

परिवार प्रणाली की विकृतियां भी सुधार करना प्रासंगिक होगा। मेरे विचार में निम्न सुधार हो सकते हैं।

(1) परिवार की वर्तमान रक्त संबंधो वाली बाध्यता को समाप्त करके कम्यून प्रणाली के साथ सामंजस्य बिठाया जाये।

(2) प्रत्येक व्यक्ति की पारिवारिक सदस्यता अनिवार्य हो। अकेला व्यक्ति समाज का अंग तो हो, उसे मूल अधिकार भी प्राप्त हों किन्तु समाज व्यवस्था में उसकी भागीदारी तब तक रोक दी जाये जब तक वह किसी परिवार का सदस्य न हो या किसी को जोड़कर नया परिवार न बना ले। कम से कम एक व्यक्ति के साथ जुड़ना या जोड़ना आवश्यक है अन्यथा मतदान तथा संपत्ति का अधिकार तब तक निलमिबत रहेगा जब तक परिवार न बने।

(3) प्रत्येक परिवार ग्राम सभा में रजिस्टर्ड होगा। व्यक्तिगत संपत्ति पर रोक होगी। सम्पूर्ण संपत्ति पारिवारिक होगी जिसमें परिवार छोड़ते समय उसे परिवार की सदस्य संख्या के आधार पर बराबर हिस्सा मिलेगा। लड़की भी अपने माता पिता को छोड़ते समय अपना हिस्सा लेकर नये परिवार में शामिल कर देगी।

(4) परिवार के प्रत्येक सदस्य का सामूहिक उत्तरदायित्व होगा। किसी सदस्य के अपराध करने पर परिसिथति अनुसार उस पूरे परिवार को दण्ड संभव है जिस परिवार का दण्ड देते समय वह व्यक्ति सदस्य हो।

(5) माता-पिता, पति-पत्नी, बच्चे आदि के संबंध परिवार तथा समाज तक सीमित होंगे। कानून में इन शब्दों का कोर्इ महत्व नहीं होगा। विवाह, तलाक, संतानोत्पत्ति आदि की व्यवस्था आंतरिक रहेगी। कोर्इ अन्य तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकता जब तक किसी के मूल अधिकारों का उल्लंघन न हो।

(6) किसी अन्य परिवार के किसी सदस्य के विरूद्ध अपने परिवार के मुखिया की सहमति से ही थाने या कोर्ट में शिकायत हो सकती है अन्यथा नहीं। अपने परिवार के किसी सदस्य के विरूद्ध भी थाने में शिकायत के पूर्व परिवार छोड़ना आवश्यक है।

(7) परिवार की सम्पूर्ण संपत्ति का विवरण और मूल्यांकन ग्राम सभा में प्रति वर्ष या प्रति दो वर्ष में घोषित करना अनिवार्य होगा। घोषित संपत्ति के अतिरिक्त छिपार्इ गर्इ संपत्ति सरकार की या ग्राम सभा की हो जायेगी।

(8) परिवार का एक प्रमुख होगा जो सबसे अधिक उम्र का होगा। उसकी भूमिका राष्ट्रपति या परिवार देवता के रूप में रहेगी। एक मुखिया होगा जो परिवार के लोग मिलकर चुनेंगे। मुखिया परिवार का संचालक होगा।

इस नर्इ व्यवस्था से कुछ समस्याएं सुलझेंगी और कुछ नये प्रष्न भी उठेंगे। यधपि इस प्रणाली पर देष भर के लोगों ने उन्नीस सौ निन्यानब्बे में बैठकर विचार करके निर्णय किया किन्तु अब भी इस प्रणाली में संशोधन होना संभव है।

यह आवश्यक है कि परिवार प्रणाली को किसी न किसी स्वरूप में संवैधानिक मान्यता मिले। परिवार, व्यक्ति के सहजीवन की पहली पाठशाला है। इस व्यवस्था के टूटने के कारण सहजीवन प्रणाली के अभाव के बुरे परिणाम दिख रहे हैं। परिवार प्रणाली को सशक्त करने के लिये समाज में बहस छिड़े तथा राजनेताओं पर दबाव बने कि वे परिवार प्रणाली को संवैधानिक मान्यता प्रदान करें।

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6 Responses

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  1. deep ahuja says:

    सत्यमेव जयते अमीर खान का टीवी शो है अप उसके बारे में कुछ बताने की कृपा करे..

  2. admin says:

    बजरंग मुनि !
    उत्तर- न किसी वर्ग का कभी उत्पीडन होता है न शोषण| उत्पीडन तथा शोषण व्यक्तियों का होता है| पहली बात तो यह है कि महिला या पुरुष कभी पृथक पृथक वर्ग नहीं होते| या तो वे व्यक्ति होते हैं या परिवार| परिवार कि अपनी व्यवस्था है| परिवार में कोई महिला माँ, बेटी, पत्नी, बहन तो हो सकती है किन्तु महिला नहीं| उत्पीडन करने वाला भाई, पति, पिता या बेटा हो सकता है| उत्पीडन या शोषण करने वालों में सास, बहु, ननद आदि कोई महिला भी हो सकती है| धूर्त लोग वर्ग विद्वेष फ़ैलाने के लिए वर्ग शोषण या अत्याचार कि चर्चा करते हैं, जो पूरी तरह असत्य है, समाज को कमजोर करने की नीयत पर आधारित है| सच्चाई यह है की समाज में धूर्त अपराधी लगातार मजबूत हो रहे हैं तथा शरीफ लोग कमज़ोर| धूर्त लोग नए-नए क़ानून बनवाकर वर्ग विद्वेष बढ़ाते हैं तथा उस विद्वेष का शरीफों का शोषण करने में उपयोग करते हैं| स्वतंत्रता के पूर्व धूर्त पुरुष महिलाओं के विरूद्ध नए-नए नियम कानून बनवाकर उसका लाभ उठाते थे, तो आज धूर्त महिलाएं इस दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं|

    आमिर खान जिन समस्याओं को उठा रहे हैं, वे समाज में समस्याएँ हैं ही नहीं| महिलाओं कि संख्या का घटना दहेज़, महिला शोषण, महिला उत्पीडन का कारण न हो कर समाधान है| यदि एक-दो प्रतिशत यह अनुपात और गिरे तो समाज में कोई समस्या पैदा न होकर समस्या घटेगी| मेरे विचार में भ्रूण हत्या के मामले में बालक-बालिका का भेद करना गलत है| बड़ी मुश्किल से महिलाओं कि स्थिति में सुधार आया है| अब सरकार और राजनेता चिंतित हैं की यदि महिलाओं की संख्या और कम होने से महिला-पुरुष का भेद घट गया तो वे महिला-पुरुष के बीच वर्ग विद्वेष-वर्ग संघर्ष नहीं कर सकेंगे| इसीलिए सरकार करोड़ों रूपए खर्च करके ऐसे मुद्दे उठवा रही है| में आपसे और अधिक संवाद का इच्छुक हूँ|

  3. deep ahuja says:

    कन्या भ्रूण हत्या के ज़रिये महिलाओ की संख्या का कम होना समाधान है क्या यह गन्दी सोच नहीं है?

  4. deep ahuja says:

    मै इन विचारो को अपने फसबूक अकाउंट में भी पोस्ट करना चाहता हु | पर ये बहोत बड़े है जिससे कई लोग इनको पड़ने में अपना टाइम वेस्ट समझते है| अगर अप इनको छोटे छोटे आसान वाक्यो में लिख के दे तो मै इन विचारो को कुछ और लोगो तक पंहुचा सकूँगा ,या आप लोग खुद fb मे इन विचारो को पोस्ट किया करो|

  5. admin says:

    उत्तर- हम न तो कन्या और न ही बालक भ्रूण हत्या का समर्थन कर रहे हैं| हम तो केवल समाज में पुरुष-महिला के बीच बढ़ी हुई खाई को पाटने का समाधान बता रहे हैं| समाज में महिला-पुरुष का अनुपात ऐसा होना चाहिए जिससे, समाज में महिलाओं का सम्मान तथा महत्त्व बढे| समाज में महिला और पुरुष का अनुपात ही असमानताओं का कारण है| यह अनुपात कैसे घटे इसका कोई और समाधान नहीं दिखता| यदि यह सोच गंदी है तो आप ही कोई और समाधान बताएं|

  6. admin says:

    हमें आपका सुझाव अच्छा लगा| आपके सुझाव पर शीघ्र ही अमल किया जाएगा| धन्यवाद

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