Activities

Posted By: admin on May 6, 2010 in - Comments: 6 Comments »

Munijiमौलिक चिंतक श्री बजरंग मुनि जी (मोबाइल नंबर 9617079344) के दिल्ली प्रवास का कार्यक्रम
दिनांक 25 /10 /14 से दिनांक 29 /10 /14 तक
स्थान :- उदासीन आश्रम (पंच कुईयां रोड ) ,करौलबाग ,नई दिल्ली

6 Responses

You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed.

You can leave a response, or trackback from your own site.

  1. Satyam says:

    आप देश के लिए क्या करना चाहते हैं कृपया हमारी ईमेल पर स्पष्ट रूप से अपना उद्देश्य लिख कर हमें अवगत करने की कृपा करें. आप की बातों से लगता है की आप देश के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं………..

  2. Author says:

    उत्तर- देश और राष्ट्र लगभग समान अर्थ रखते हैं किन्तु देश, धर्म और समाज बिल्कुल भिन्न अर्थ रखते हैं। स्वतंत्रता के बाद देश ने उन्नति की है। अटल जी और मनमोहन सिंह जी के समय प्रगति की रफ्तार और तेज हुई है। भारत दुनिया के उन्नत देशों के क्रम में तीसरे स्थान पर आ गया है। आर्थिक विकास संतोष जनक है। भौगोलिक सीमाओं पर भी तात्कालिक खतरा नहीं दिखता। यदि कुछ होगा तो हमारा राजनैतिक ढांचा निपट लेगा ऐसा विश्वास करना चाहिये। देश के विषय में हमें कुछ अलग से करने की आवश्यकता नहीं दिखती। किन्तु स्वतंत्रता के बाद लगातार समाज व्यवस्था कमजोर हो रही हैं ग्यारह प्रकार की समस्याए लगातार बढ़ रही हैं जिनमें (1) चोरी, डकैती, लूट (2) बलात्कार (3) मिलावट कमतौल (4) जालसाजी, धोखाधड़ी (5) हिंसा आतंक (6) भ्रष्टाचार (7) चरित्रपतन (8) साम्प्रदायिकता (9) जातीय कटुता (10) आर्थिक असमानता (11) श्रम शोषण ”शामिल हैं। पहले पांच प्रकार के अपराध इसलिये बढ़ रहे हैं कि शासन इन्हें रोकने में आवश्यकता से कम सक्रिय है और बाद की छः समस्याए इसलिये बढ़ती जा रही हैं कि शासन इनमें आवश्यकता से अधिक हस्तक्षेप कर रहा है।

    मैंने अपने साठ वर्षो के चिंतन, शोध और प्रयोगों के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि समाज की कीमत पर देश की प्रगति हमारे लिये संतोष का आधार नहीं बन सकती। राज्य व्यवस्था की नीयत ठीक नहीं। वह देश की प्रगति के लिये तो सचेष्ट है किन्तु समाज व्यवस्था को लगातार तोड़ा जा रहा है। आठ आधार (1) धर्म (2) जाति (3) भाषा (4) क्षेत्रीयता (5) उम्र (6) लिंग (7)गरीब-अमीर (8) उत्पादक-उपभोक्ता” पर वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष को लगातार हवा दी जा रही है। ये आठों आधार प्रतिदिन, चौबीसों घंटे साठ वर्षो से लगातार परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था को कमजोर करने में सक्रिय है और भारत के सभी राजनैतिक दल पूरी इमानदारी से आठों प्रकार के वर्ग निर्माण के कार्य में सक्रिय हैं। राजनेताओं ने लोकतंत्र की परिभाषा लोक नियंत्रित तंत्र को बदलकर लोक नियुक्त तंत्र बना दिया है। इस परिभाषा परिवर्तन के आधार पर ही हमारी संवैधानिक व्यवस्था हमारी प्रबंधक न होकर संरक्षक के रूप में हमसे व्यवहार कर रही है। समाज एक दिन का मालिक और शेष पांच वर्षो के लिये गुलाम बनाकर रखा जा रहा है। मैंने दो हजार चार से आठ तक के पांच वर्षो में दिल्ली में रहकर अच्छे अच्छे राजनेताओं को समझाने की कोशिश की किन्तु सबकुछ समझने के बाद भी कोई लोकतंत्र को लोकनियंत्रित तंत्र की दिशा देने हेतु सहमत नहीं हुआ।

    अन्त में मैंने वानप्रस्थ करके समाज सशक्तिकरण राज्य कमजोरीकरण का नारा दिया। दो दिशाओं में काम चल रहा है(1) रामानुजगंज सरगुजा छत्तीसगढ़ के एक सौ तीस गांवों में नई समाज रचना। यह कार्य इसी माह से शुरू हुआ है और पचीस दिसंबर से एक जनवरी तक के इसी वर्ष के आठ दिनों में रामानुजगंज में बैठकर इस रचना के परिणामों की समीक्षा और नई मार्ग दर्शक नीति की घोषणा करेंगे। ग्राम सभा सशक्तिकरण इसका आधार होगा। (2) प्रयोग क्षेत्र रामानुजगंज से बाहर पूरे देश में अनेक विषयों पर विचार मंथन। हम समाज को एक दिशा देंगे और वह है समाज सशक्तिकरण राज्य कमजोरीकरण। किन्तु हम विचार मंथन तक ही सीमित रहेंगे। इस संबंध में कोई प्रयोग, कोई आंदोलन, कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। हम कोई विचार प्रचार नहीं करेंगे। यहाँ तक कि मेरे विचार भी मंथन तक ही सीमित होंगे। इस कार्य के लिये ज्ञान तत्व पाक्षिक, काश इन्डिया डाट काम, ज्ञान कथा, प्रश्नोत्तर आदि सहायक उपादान हैं।

    आपसे निवेदन है कि आप यथा संभव रामानुजगंज आकर हमारा मार्गदर्शन करिये तथा विचार मंथन में यथाशक्ति सहयोग करिये। विचार मंथन की शुरूआत यहीं से करिये कि क्या देश, धर्म और समाज एक है। यदि अन्तर है तो इनमें से बड़ा कौन है, इस संबंध में यदि आप संवाद चाहेंगे तो काश इन्डिया आपकी मदद करेगा।

  3. भ्रष्टाचार -विवेचना एवं समाधान
    १९८० दशक में भारत का सबसे बड़ा घोटाला ‘बोफोर्स’ प्रकाश में आया | मूल्य था ६४ करोड़ रुपये |२५ वर्ष बाद आज ‘स्पेक्ट्रम’ घोटाला सामने आया है | मूल्य है १६४ हजार करोड़ रुपये | यानी 2500 गुना से अधिक की मूल्यवृद्धि | इन पच्चीस वर्षों में भारत में मुद्रास्फिति, रुपये का अवमूल्यन, मूल्यवृद्धि आदि को समेटकर भी किसी भी वस्तु का दाम २५०० गुना नही बढ़ा है | चाहे वह सोना हो, चांदी हो, दलहन हो, तिलहन हो, कपड़ा हो, वेतन हो, चाहे सबसे महंगी जमीन ही क्यों न हो | स्पष्ट है की भ्रष्टाचार बाक़ी विषयों की तुलना में जामितीय अनुपात में बढ़ रहा है | इन पच्चीस वर्षों में सत्ताएं बदली, लोग बदले, नेता बदले, या यों कहें की एक पूरी पीढी ही बदल गई | इस बीच भारत में मध्यममार्गी, वामपंथी, राष्ट्रवादी और अलावा इनके हर तरह के गठबंधन ने सत्ता संभाली |पर भ्रष्टाचार न बदला न ही थमा | जनता, और मीडिया की सामान्य प्रतिक्रिया यह होती है की ऐसे कांडों में जो व्यक्ति लिप्त पाया जाता है, उसपर भ्रष्टाचार का ठीकरा फोड़ना, उसे ‘एक्सपोस’ कर, दण्डित करने का उपक्रम चलाना आदि | पर यहाँ गौर करने लायक बात यह है की जब हर नया काण्ड एक नए व्यक्ति की करतूत है, तब तो व्यक्ति की अपेक्षा व्यवस्था को दोषी होना चाहिए |
    थोड़ी और सूक्ष्मता से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है की भ्रष्टाचार सत्ताधारी ही करते हैं | निष्ठा निरपेक्ष | तो भ्रष्टाचार की जड़ सत्ता साबित होती है | सत्ता अर्थात समाज द्वारा मान्यताप्राप्त व्यवस्था को चलानेवाले व्यवस्थापक | पर ऐसी सत्ताएं तो संसार भर मेनअनादी काल से व्याप्त हैं | पर ऐसा भ्रष्टाचार तो और किसी देश में नहीं दीखता | न ही इतिहास में | तो आखिर खोट कहाँ है ?
    खोट है हमारी व्यवस्था (सत्ता) के व्यावहारिक प्रयोग में | सत्ताधारी असल में व्यवस्थापक होते हैं, मालिक नहीं | ६० साल पहले हमने जो व्यवस्था अपनाई है उसमे सत्ताधारियों को गलती से व्यवस्थापक के बदले मालिकाना हक़ दे दिया गया है | अत: सत्ता निरंकुश हो गई है | और निरंकुशता, जो प्रस्तुत सन्दर्भ में संविधान-सम्मत केन्द्रीकरण का प्रारूप लिए हुए है, वही भ्रष्टाचार की जड़ है |
    भ्रष्टाचार का चरित्र होता है कि उसमें दो पक्ष होते हैं | एक मांगनेवाला, एक देनेवाला | यह तभी संभव है, जब दोनों अपरिचित हों| क्योंकि परिचितों के बीच भ्रष्टाचार संभव नहीं होता है | हमारा कोई मित्र या संबंधी हमारा कोई काम करे, या न करे, पर उसके एवज में कोई मांग नहीं करता है | परिचितों के बीच धोखा संभव है, भ्रष्टाचार नहीं | धोखे में हानि व्यक्ति को होती है | भ्रष्टाचार की परिधि में सम्पूर्ण समाज आ जाता है |
    कल्पना करें कि हमारे गाँव में पुलिस का काम वैधानिक तरीके से गाँव के नागरिक ही कर रहे हैं | ऐसे में गाँव में पुलिस-ग्रामवासी के बीच भ्रष्टाचार बढेगा या घटेगा ? स्वाभाविक उत्तर है, घटेगा | क्योंकि मांगेगा किस मुंह से और देगा कौन | विश्व में वर्तमान में जितने भी विकसित लोकतांत्रिक देश हैं, उनमें हूबहू यही व्यवस्था है | सुरक्षा, न्याय, नागरिक सुविधाएं आदि की व्यवस्था का भार स्थानीय नागरिकों का ही होता है | केवल विस्तृत विषय, जैसे मुद्रा, सेना, संचार, कर, विदेश नीति आदि की केंद्रीकृत होते हैं |
    भारत के संविधान में भी पंचायती राज/स्थानीय निकाय अधिनियम के रूप में ऐसे प्रावधान हैं | समस्या केवल धारा २४३ (क) और धारा २४३ (छ) के शब्दों के हेरफेर में है | २४३ (क) के अनुसार पंचायत/स्थानीय निकाय स्थापित करना राज्य के लिए अनिवार्य है | पर २४३ (छ) आते-आते उन पंचायतों/स्थानीय निकायों को क्या अधिकार देना यह राज्य का ऐच्छिक विषय बना दिया गया है | इस कारण देशभर की पंचायतें/ स्थानीय निकाय अस्तित्व में तो आ जाते हैं, पर पंगु बनकर | क्योंकि राज्य, २४३ (छ) की आड़ में उन्हें कोई अधिकार देता ही नहीं |
    इसका समाधान सीधा सा हैं कि वर्तमान की संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची में एक और सूची पंचायतों/स्थानीय निकायों के अधीकार की जूडी जाय, जिसमें अधिकाधिक दायित्व उन्हें सौंप दिए जाएं | केवल मुद्रा, दूरसंचार, सेना, कर, विदेशनीति, रेल, उड्डयन, जहाजरानी आदि ऐसे विषय जो पंचायतों/स्थानीय निकायों को लांघते हों, वे मात्र केंद्र तथा राज्य के पास रहें |

  4. author says:

    सिद्दार्थ शर्मा

    भ्रष्टाचार -विवेचना एवं समाधान
    १९८० दशक में भारत का सबसे बड़ा घोटाला ‘बोफोर्स’ प्रकाश में आया | मूल्य था ६४ करोड़ रुपये |२५ वर्ष बाद आज ‘स्पेक्ट्रम’ घोटाला सामने आया है | मूल्य है १६४ हजार करोड़ रुपये | यानी 2500 गुना से अधिक की मूल्यवृद्धि | इन पच्चीस वर्षों में भारत में मुद्रास्फिति, रुपये का अवमूल्यन, मूल्यवृद्धि आदि को समेटकर भी किसी भी वस्तु का दाम २५०० गुना नही बढ़ा है | चाहे वह सोना हो, चांदी हो, दलहन हो, तिलहन हो, कपड़ा हो, वेतन हो, चाहे सबसे महंगी जमीन ही क्यों न हो | स्पष्ट है की भ्रष्टाचार बाक़ी विषयों की तुलना में जामितीय अनुपात में बढ़ रहा है | इन पच्चीस वर्षों में सत्ताएं बदली, लोग बदले, नेता बदले, या यों कहें की एक पूरी पीढी ही बदल गई | इस बीच भारत में मध्यममार्गी, वामपंथी, राष्ट्रवादी और अलावा इनके हर तरह के गठबंधन ने सत्ता संभाली |पर भ्रष्टाचार न बदला न ही थमा | जनता, और मीडिया की सामान्य प्रतिक्रिया यह होती है की ऐसे कांडों में जो व्यक्ति लिप्त पाया जाता है, उसपर भ्रष्टाचार का ठीकरा फोड़ना, उसे ‘एक्सपोस’ कर, दण्डित करने का उपक्रम चलाना आदि | पर यहाँ गौर करने लायक बात यह है की जब हर नया काण्ड एक नए व्यक्ति की करतूत है, तब तो व्यक्ति की अपेक्षा व्यवस्था को दोषी होना चाहिए |
    थोड़ी और सूक्ष्मता से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है की भ्रष्टाचार सत्ताधारी ही करते हैं | निष्ठा निरपेक्ष | तो भ्रष्टाचार की जड़ सत्ता साबित होती है | सत्ता अर्थात समाज द्वारा मान्यताप्राप्त व्यवस्था को चलानेवाले व्यवस्थापक | पर ऐसी सत्ताएं तो संसार भर मेनअनादी काल से व्याप्त हैं | पर ऐसा भ्रष्टाचार तो और किसी देश में नहीं दीखता | न ही इतिहास में | तो आखिर खोट कहाँ है?खोट है हमारी व्यवस्था (सत्ता) के व्यावहारिक प्रयोग में | सत्ताधारी असल में व्यवस्थापक होते हैं, मालिक नहीं | ६० साल पहले हमने जो व्यवस्था अपनाई है उसमे सत्ताधारियों को गलती से व्यवस्थापक के बदले मालिकाना हक़ दे दिया गया है | अत: सत्ता निरंकुश हो गई है | और निरंकुशता, जो प्रस्तुत सन्दर्भ में संविधान-सम्मत केन्द्रीकरण का प्रारूप लिए हुए है, वही भ्रष्टाचार की जड़ है |
    भ्रष्टाचार का चरित्र होता है कि उसमें दो पक्ष होते हैं | एक मांगनेवाला, एक देनेवाला | यह तभी संभव है, जब दोनों अपरिचित हों| क्योंकि परिचितों के बीच भ्रष्टाचार संभव नहीं होता है | हमारा कोई मित्र या संबंधी हमारा कोई काम करे, या न करे, पर उसके एवज में कोई मांग नहीं करता है | परिचितों के बीच धोखा संभव है, भ्रष्टाचार नहीं | धोखे में हानि व्यक्ति को होती है | भ्रष्टाचार की परिधि में सम्पूर्ण समाज आ जाता है |
    कल्पना करें कि हमारे गाँव में पुलिस का काम वैधानिक तरीके से गाँव के नागरिक ही कर रहे हैं | ऐसे में गाँव में पुलिस-ग्रामवासी के बीच भ्रष्टाचार बढेगा या घटेगा ? स्वाभाविक उत्तर है, घटेगा | क्योंकि मांगेगा किस मुंह से और देगा कौन | विश्व में वर्तमान में जितने भी विकसित लोकतांत्रिक देश हैं, उनमें हूबहू यही व्यवस्था है | सुरक्षा, न्याय, नागरिक सुविधाएं आदि की व्यवस्था का भार स्थानीय नागरिकों का ही होता है | केवल विस्तृत विषय, जैसे मुद्रा, सेना, संचार, कर, विदेश नीति आदि की केंद्रीकृत होते हैं |
    भारत के संविधान में भी पंचायती राज/स्थानीय निकाय अधिनियम के रूप में ऐसे प्रावधान हैं | समस्या केवल धारा २४३ (क) और धारा २४३ (छ) के शब्दों के हेरफेर में है | २४३ (क) के अनुसार पंचायत/स्थानीय निकाय स्थापित करना राज्य के लिए अनिवार्य है | पर २४३ (छ) आते-आते उन पंचायतों/स्थानीय निकायों को क्या अधिकार देना यह राज्य का ऐच्छिक विषय बना दिया गया है | इस कारण देशभर की पंचायतें/ स्थानीय निकाय अस्तित्व में तो आ जाते हैं, पर पंगु बनकर | क्योंकि राज्य, २४३ (छ) की आड़ में उन्हें कोई अधिकार देता ही नहीं|
    इसका समाधान सीधा सा हैं कि वर्तमान की संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची में एक और सूची पंचायतों/स्थानीय निकायों के अधीकार की जूडी जाय, जिसमें अधिकाधिक दायित्व उन्हें सौंप दिए जाएं | केवल मुद्रा, दूरसंचार, सेना, कर, विदेशनीति, रेल, उड्डयन, जहाजरानी आदि ऐसे विषय जो पंचायतों/स्थानीय निकायों को लांघते हों, वे मात्र केंद्र तथा राज्य के पास रहें |

  5. Arpit Anaam says:

    क्या घड़ा अभी भरा नहीं
    अपराधी किस्म के लोग राज कर रहे हैं और शरीफ लोग घरों में दुबक कर बैठे हैं ।
    ये शरीफ लोग किस बात का इंतजार कर रहे हैं ।
    क्या घड़ा अभी भरा नहीं है ?

  6. Arpit Anaam says:

    … ये शरीफ लोग किस बात का इंतजार कर रहे हैं । …

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

kaashindia
Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal