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मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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भारत की आर्थिक स्थिति और मनमोहन सिंह!

Posted By: admin on June 13, 2012 in Recent Topics - Comments: No Comments »


मनमोहन सिंह जी एक कुशल अर्थषास्त्री माने जाते हैं। सन साठ से इक्यानब्बे तक चली समाजवादी अर्थव्यवस्था जब भारत की आर्थिक स्थिति को मरणासन्न बना दिया तब मनमोहन सिंह जी ने वित्तमंत्री के रूप में उसे पुनर्जीवित किया। २००४ से २००९ तक उनके ही प्रधानमंत्री काल में अर्थव्यवस्था ठीक रही। किन्तु पिछले दो वर्षों से भारत की अर्थ व्यवस्था कमजोर होती जा रही है। रूपया डालर से कमजोर हो रहा है। विकास दर गिर रही है। आयात निर्यात भी असंतुलित है। बेचारे मनमोहन सिंह कुछ नहीं कर पा रहे।
भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर हुर्इ नहीं बलिक की गर्इ। १९९१ से लेकर २०१० तक आर्थिक मामले राजनैतिक षड़यंत्र से मुक्त होते थे। सरकार में शामिल साम्यवादी निर्णायक रूकावट नहीं बन सके क्योंकि वे प्रत्यक्ष रूकावट थे। किन्तु इन दो वर्षों में राहुल गांधी के लिये मनमोहन सिंह को कमजोर करने की जो योजना बनी वह मनमोहन सिंह को डुबाने की जगह भारतीय अर्थव्यवस्था को ही कमजोर करने का आधार बन गर्इ। मनमोहन सिंह के पैरों में राष्ट्रीय सलाहकार समिति का जो पत्थर सोनिया जी की चौकड़ी ने बांधा था उस पत्थर ने भारत की अर्थव्यवस्था की गति बहुत कम कर दी। रही सही कसर बंगाल की शेरनी ने पूरी कर दी। सत्ता की भूखी ममता को न देश से मतलब था न देश की अर्थव्यवस्था से। उसे तो मतलब था सिर्फ और सिर्फ अपनी राजनैतिक ताकत बढ़ाने से। पिछली बार साम्यवादियों से मुक्त होने में मुलायम सिंह जी ने मदद की किन्तु इस बार ममता से पिण्ड छुड़ाने में मुलायम सिंह ज्यादा सतर्क हैं क्योंकि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है।
सोनिया जी को जल्द ही आभास हो गया कि मनमोहन सिंह जी को परेशान करने का दुष्प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है तथा वह प्रभाव मनमोहन सिंह जी की जगह कांग्रेस पार्टी को नुकसान पहुंचा रहा है। अर्थात यदि मनमोहन सिंह कमजोर हुए तो न वे रहेंगे न राहुल। अब वो फिर से मनमोहन सिंह के पक्ष में दिख रही हैं। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद गूंगी बहरी हो गर्इ है। ममता से भी मुकित के मार्ग तलाशे जा रहे हैं।
यद्यपि भारत की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंच चुका है किन्तु अब भी यदि अर्थव्यवस्था को राजनीति से मुक्त करके स्वतंत्रता दे दी जाये तो गाड़ी फिर से पटरी पर आ सकती है। डीजल मूल्य नियंत्रण मुक्त करने, केरासिन एल.पी.जी सब्सीडी घटाने, बीमा कम्पनियों में विदेशी भागीदारी तथा मुक्त खुदरा व्यापार जैसी कुछ बाधाओं ने अर्थव्यवस्था को संकट मे डाला है। एक टब से दूध निकालने को बाल्टी ले लेकर हजारों लोग खड़े हों किन्तु दूध डालते समय दूध की जगह सब लोग पानी ही पानी डालें तो न मनमोहन सिंह पानी को दूध बना सकते हैं न ही कोर्इ अन्य। हमे दूध डालने और निकालने के बीच समन्वय तो करना ही होगा। मैं पिछले कुछ दिनों से आश्वस्त हूं कि सोनिया जी स्थिति का समझने लगी हैं और जल्दी ही स्थिति सुधर सकती है।

टीम अन्ना का नया आंदोलन: बजरंग मुनि!

Posted By: admin on May 27, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »


 

टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध लडाइ के दूसरे चरण की घोषणा करके बहुत हिम्मत का काम किया है। लोकपाल की लडार्इ  का स्वरूप परिवर्तन होना ही चाहिये था। पंद्रह मे से कितने मंत्री भ्रष्ट है और कितने ठीक यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा किन्तु इतने स्पष्ट आरोपो के बाद जांच तो होनी ही चाहियें। इस संघर्ष मे हम टीम अन्ना का सहयोग करेंगे। यधपि मुझे विष्वास है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस जांच से बेदाग निकलेंगे।

टीम अन्ना ने अपने आंदोलन के साथ पेट्रोल की मूल्य वृद्धि तथा लगातार बढती मंहगार्इ की भी चर्चा कीं। इसके पूर्व अन्ना जी ने भी इस विषय पर आंदोलन की बात कही है। मेरे विचार मे पेट्रोल की मूल्य वृद्धि और मंहगार्इ का प्रचार सम्पन्न, बुद्धिजीवी, शहरी, तथा उपभोक्ता वर्ग द्वारा गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी तथा उत्पादक समूह के विरूद्ध साठ पैंसठ वर्षो  से जारी षडयंत्र कारी अर्थनीति का ही हिस्सा है जिस असत्य प्रचार के शिकार अन्ना जी या उनकी टीम के लोग हुए हैं।

भारत की राजनैतिक व्यवस्था मे सन इक्यान्नवे तक का अधिकांश कार्यकाल नेहरू परिवार के नेतृत्व मे रहा। इस परिवार ने प्रारंभ से ही ऐसी अर्थ नीति का विकास किया जो गरीब ग्रामीण श्रमजीवी उत्पादको के विरूद्ध अमीर शहरी बुद्धिजीवी उपभोक्तावाद को प्रश्रय देती रही। पंडित नेहरू एक बहुत ही चालाक राजनेता माने जाते रहे हैं। उनके पूंजीवादी चेहरे ने समाजवादी मुखौटा लगाकर अर्थव्यवस्था को अधिकतम राज्य केँद्रित करने का प्रयास किया। उन्होने हमेशा ही कृत्रिम उर्जा के मूल्य को श्रम मूल्य से नीचे ही रखने की कोशिश की। वे जानते थे कि यदि कृत्रिम उर्जा के मूल्य श्रम की तुलना मे उपर हो गये तो श्रम खरीदने वाला वर्ग तबाह हो जायेगा। नेहरू जी जानते थे कि पशचिम के अनेक देश श्रम अभाव देश हैँ।  वहां श्रम और बुद्धि के मूल्यो के बीच बहुत ज्यादा अंतर नही। वहां के लोगो को पेट भरने के लिये श्रम न करके सुविधा के लिये श्रम  करना है। इसलिये वहां कृत्रिम उर्जा को बहुत सस्ता रखना आवश्य़क है। दूसरी ओर भारत एक श्रम बहुल देश है। यहा यदि कृत्रिम उर्जा मंहगी नही होगी तो श्रम और बुद्धि के बीच का अंतर बहुत बढ जायगा। सब कुछ जानते हुए भी उन्होने न जाने क्या सोचकर कृत्रिम उर्जा को श्रम मूल्य से नीचे रखने का आत्मघाती मार्ग चुना। परिणाम जो होना था वही हुआ। श्रम, बुद्धि और धन के बीच लगातार दूरी बढती चली गर्इ। आवागमन सस्ता हुआ। लघु उधोगों का स्थान बडे-बडे दैत्याकार उधोगों ने ले लिया। गांवों से शहरों की ओर पलायन बढा। विकास दर उल्टी हो गर्इ। उसे नीचे के वर्ग के लिये अधिक तथा उपर वालों के लिये कम होना चाहिये था। किन्तु इसके ठीक उलट गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान की विकास दर एक से पांच प्रतिषत के बीच तक रही तो मध्यम श्रेणी बुद्धिजीवी की विकास दर पांच से दस के बीच तथा उच्च श्रेणी पूंजीपति वर्ग की विकास दर दस से पंद्रह के बीच। इस सारे षडयंत्र के लिये सिर्फ एक ही काम किया गया कि कृत्रिम उर्जा के मूल्यों को श्रम मूल्य की तुलना मे कम से कम रखा जावे। श्रम बहुल भारत के गांव तक के कार्यो मे मशीनों का लगातार विस्तार इसी का परिणाम तो है। भारत मे कृषि उत्पादन तेजी से बढा है और गरीब किसान आत्महत्या कर रहा है यह सोचनीय है। भारत जैसे देश मे जहा वार्षिक विकास दर दुनिया मे उल्लेखनीय है वहां के श्रमजीवियों को नरेगा और गरीबो को सस्ता चावल दे देकर मरने से बचाया जा रहा है। विचारणीय है कि हमारे भारत का बुद्धिजीवी यदि सारी दुनिया मे प्रतिस्पर्धा करने मे सफल है या भारत के पूंजीपति अमेरिका और ब्रिटेन के पूंजीपतियों से भी आगे निकलने की दौड मे शामिल है उस देश के श्रमजीवी की यह दुर्दशा कि अमेरिका मे श्रमजीवी का एक दिन का जितना श्रम मूल्य है उतना भारतीय श्रमिक को एक माह मेँ भी नही मिलता। भारत मे नरेगा का अधिकतम श्रम मुल्य चार हजार रूपया मासिक है तो अमेरिका मे एक दिन का श्रम मूल्य इससे भी कही ज्यादा ही होगा।

नेहरू जी ने एक घपला और किया कि उन्होने गरीब ग्रामीण श्रम उत्पादन उपभोक्ता वस्तुओ पर भारी अप्रत्यक्ष कर लगा दिये। जिससे कुछ प्रत्यक्ष सब्सीडी देकर मियां की जूती मिंया का सर की कहावत भी चरितार्थ हो जाय और गरीब किसान अपने आंसू पोछते देखकर ऐसे नेताओ के प्रति कृतज्ञता भी प्रकट करता रहे। अन्ना जी और उनकी टीम को जिस पेट्रोल की मूल्य वृद्धि की आज इतनी गंभीर याद आर्इ है उस टीम को क्या यह नहीं पता कि सम्पूर्ण भारत मे साइकिल पर चार साढे चार सौ रूपये कर लगाकर रसोर्इ गैस पर सब्सीडी दी जाती है, जहां बैलों की खाने वाली खली पर टैक्स लगाकर ट्रेक्टर को छूट मिलती है। क्या अन्ना जी नही जानते कि भारत मे वायु प्रदुषण करता है स्कूटर और कार वाला तो सफार्इ कर देता है पेड वाला। उन्हे यह भी जानना चाहिये कि हमारे छत्तीसगढ के गन्ना उत्पादक अपने खेत का गुड नही बना सकते। इतना ही नही, किसी षडयंत्र के अन्र्तगर्त हमारे पिछडे जिले सरगुजा या बस्तर का कोर्इ व्यकित अपने ही जिले मे जमीन खरीदकर न घर बना सकता है न खेती के अलावा कोर्इ छोटासा भी उधोग लगा सकता है। बडे-बडे शहरों मे या विकसित क्षेत्रों मे बेरोक टोक उधोग लगाये जा सकते है किन्तु पांचवी अनुसूची के क्षेत्र भी यदि विकसित हो गये तो हम अजायब घर दिखाने से वंचित रह जायेंगे।

अरविन्द जी, अन्ना जी ने मंहगार्इ के बढने की भी चर्चा की है। सच तो यह है कि बढती आर्थिक विशमता या श्रम शोषण पर से आम आदमी का ध्यान हटाने के लिये एक मंहगार्इ का झूठ बार बार बोला जा रहा है। दो वर्ग है (1) क्रेता (2) विक्रेता । हम अपनी कोर्इ चीज किसी दूसरे को देते है और हमे पहले की अपेक्षा कम वस्तु मिले तब हम उस वस्तु को मंहगा कह सकते है। साठ पैंसठ वर्षो मे सोना, चांदी जमीन को छोडकर कुछ भी मंहगा नही हुआ है। यदि साठ वर्ष पूर्व रूपया चांदी का था तो आज के रूपये के आधार पर उस तरह सामान मिलने की चर्चा करना मूर्खता है। महगांर्इ नाम की कोर्इ चीज नहीं है किन्तु स्वार्थ वश मंहगार्इ को भूत के रूप मे खडा किया गया है। सन साठ मे भी हर राजनेता या मध्यम वर्ग के लोग इसी तरह मंहगार्इ-मंहगार्इ चिल्लाते थे और आज भी। न उस समय मंहगार्इ थी न आज है।

एक चौथा षडयंत्र यह भी है कि उसी समय से नेताओं ने दोहरी चाल चली। एक तरफ तो वे कृत्रिम उर्जा सस्ती करके गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान के उत्पादन उपभोग की वस्तुओ पर भारी कर लगाकर तथा मंहगाइ-मंहगार्इ का भ्रम फैलाकर इनके शोषण की पृष्ठभुमि तैयार करते रहे हैं तो दूसरी ओर गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान को अमीर शहरी बुद्धिजीवी उपभोक्ता के विरूद्ध संघर्ष के लिये भी लगातार प्रोत्साहित करते रहते हैं। इस वर्ग के बिचौलिये लगातार घूम-घूम कर गरीब  ग्रामीण श्रमजीवी उत्पादक के हितैषी बनकर उनके वकील बने रहते हैं। उचित तो यही था कि वैचारिक बहस खडी करके ऐसे षडयंत्र को उजागर किया जाय किन्तु दुख होता है कि ऐसा करने की क्षमता रखने वाले लोग ही इस असत्य प्रचार के शिकार हो गये हैं।

अभी-अभी मै ए टू जेड न्यूज चैनल मे पेट्रोल की मूल्य वृद्धि पर चर्चा के लिये था। उपसिथत सौ लोगों मे मै अकेला था जो इस मूल्य वृद्धि को निरर्थक कह रहा था। मेरा विचार था कि भारत की सभी आर्थिक समस्याओ का एक ही समाधान है कि डीजल, पेट्रोल, गैस, बिजली, मटटी–तेल तथा कोयले के दाम कम से कम दो गुना करके ग्रामीण गरीब  श्रमजीवी किसान के उत्पादन उपभोग की वस्तुएं कर मुक्त कर दें, सब प्रकार के निजी वनोपज भी कर मुक्त कर दें तथा प्रत्येक व्यकित को शेष बची रकम प्रति व्यकित प्रति माह दो हजार रूपया उर्जा सब्सीडी के रूप मे दे दें। वहा एक भी व्यकित ऐसा नही मिला जो मेरी बात से सहमत हो। अनेक लोगो ने तो यहां तक कहा कि आज हमे खोजने से भी मजदूर नही मिलता। इस तरह तो मजदूर कभी मिलेगा ही नहीं। कुछ लोगो ने दलील दी कि गरीब तो अपने भाग्य की सीमाए समझकर संतुष्ट है और अमीर को कोर्इ फर्क नही पडेगा। वास्तव मे तो हम बीच वाले परेशान होंगे। मै देख रहा था कि वहा बैठा एक भी व्यकित ऐसा नही था जो श्रम खरीदने वाला न हो। वे स्वयं तो पंद्रह-बीस हजार रूपया का काम करना चाहते है और अपने घरेलू काम के लिये चार पांच हजार का मजदूर चाहते है। स्वाभाविक है कि कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि ऐसे मध्यम वर्ग पर भी बुरा प्रभाव डालेगी जो पांच लोगों के परिवार मे पांच हजार रूपया मासिक से भी अधिक की उर्जा उपभोग करते हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या ऐसे उच्च माध्यम वर्ग के हितो के लिये निम्न वर्ग की बलि चढा दी जावे। वर्तमान सरकार कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि न कर रही है न करना चाहती है। वह भी चाहती है कि गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान की कीमत पर उसका उच्च मध्यम बुद्धिजीवी वर्ग खुश रहे। इस वर्ग की शिक्षा, चिकित्सा आदि पर भारी खर्च की भरपार्इ के लिये मामूली सी पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि पर भी इतनी हाय तौबा मचती है जैसे कोर्इ बडा खतरनाक तूफान आने वाला हो। मुरार जी के कार्यकाल तथा विश्वनाथ प्रताप सिह जी के या अटल जी के गैर नेहरू परिवार शासन काल मे भारी डीजल, पेट्रोल, बिजली की मूल्य वृद्धि हुर्इ थी। तब नेहरू परिवार के नेतृत्व मे ही तो ऐसी मूल्य वृद्धि और मंहगार्इ के विरूद्ध आंदोलन करके सत्ता परिवर्तन हुआ। यदि अब विपक्ष के भाग्य से वही समय आया है तो हम उस विपक्ष को क्यों कोसें? किन्तु हमे तो अपनी बात रखने मे सत्य असत्य का भी ख्याल रखना होगा और जनहित का भी। इसके पूर्व भी टीम अन्ना सोने पर लगने वाले टैक्स का विरोध करके संदेह के घेरे मे आ चुकी है। अब प्रेट्रोल की मूल्य वृद्धि के विरोध ने तो सिथति को और खराब कर दिया है । आवष्यक नही कि हर मुददे पर अपनी राय व्यक्त ही की जावे। जो विषय ऐसे है उन पर बहुत सोचकर ही बोला जावे और यदि कोई विषय गरीब ग्रामीण किसान से जुडा हो तो और भी ज्यादा सतर्कता आवष्यक है।

हम जे पी आंदोलन के साथ लगातार जुडे रहे। वह आंदोलन भी धीरे धीरे सत्ता परिवर्तन तक सिमट गया। यह नया आंदोलन भ्रष्टाचार संघर्ष से शुरू होकर व्यवस्था परिवर्तन की दिशा मे बढना चाहिये। किन्तु सस्ती लोकप्रियता के चक्कर मे कहीं यह आंदोलन भी मंहगार्इ और डीजल-पेट्रोल जैसे अनावश्यक मुददो की भेंट न चढ जावे। यही सोचकर मैने एक सहायक के नाते सतर्क करना ठीक समझा । यदि कृत्रिम उर्जा या मंहगार्इ के विषय मे कोर्इ अपने वक्तब्य को ठीक मानता हो तो मै उन सबके बीच भी खुली चर्चा हेतु तैयार हूं। मै यह स्पष्ट कर दूं कि मै टीम अन्ना से ऐसी अपेक्षा नही करता कि वे अपना महत्वपूर्ण कार्य छोडकर इन कार्यो मे लगे किन्तु मै इतना अवश्य चाहता हू कि वे अपनी सोच को बिल्कुल साफ रखें कि कृत्रिम उर्जा का मंहगा होना भारत की सभी आर्थिक समस्याओं का एकमात्र समाधान है।

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