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मंथन क्रमाॅक-95 बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार–बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं। 1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है। 2. किसी भी संविधान के निर्माण में ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’–बजरंग मुनि
-------------------------------------------------------- कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। 1. कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है। 2. जब अल्पसंख्यक स...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार–
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थाप...
सामयिकी–बजरंग मुनि
उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उप राज्य पाल के विवाद का निपटारा कर दिया। निपटारा किसके पक्ष मे हुआ यह मेरा विषय नही है। मै तो यह समीक्षा करना चाहता हॅू कि गलत कौन था। दिल्ली...
सामयिकी–बजरंग मुनि
दिल्ली मे एक हिन्दू परिवार के सभी ग्यारह सदस्यो ने मोक्ष की कामना से आत्महत्या कर ली। यदि कभी शरीर मे कोई घाव होता है तो चारो तरफ से मक्खियां टूट पडती हैं। इस आत्महत्या की घटना से भी लाभ उठाने क...
सन 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा-बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है 1 शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। 2 लोकतंत्र दो तरह का होत...
स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1 प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1 व्यक्ति के रूप मे 2 समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2 जब तक व्यक्ति अकेला है तब तक ...
हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रति ...
कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष्ट...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है। 1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है। 2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरू...

श्री मणीन्द्र नाथ ठाकुर, जनसत्ता अठाइस मार्च बारह, श्री कुलदीप नैयर, पंजाब केशरी पचीस अप्रेल बारह ।

Posted By: admin on May 23, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

 

अमेरिका की एक पत्रिका के सर्वे ने यह पाया कि आज के लिए प्रासंगिक चिंतकों में मार्क्स का नाम सबसे उपर है। पिछले कुछ वर्षों में गांधी और आंबेडकर भी विश्व बौद्धिक समाज को बेहद आकर्षित कर रहे हैं। लेकिन इस आकर्षण में एक राज भी छिपा है। गांधी, मार्क्स और आंबेडकर का जिक्र अब जिस तरह से हो रहा है उसमें उनका क्रांतिकारी तेवर गायब होता जा रहा है। सोवियत क्रांति के बाद बहुत-से देशों ने केवल राज्यसत्ता को वैध बनाए रखने के लिए मार्क्स के नाम का उपयोग किया। ठीक उसी तरह जैसे गांधी के नाम का उपयोग भारतीय राज्य ने किया। गांधी को महज महापुरूष, महात्मा और राष्ट्रपिता के रूप में पूज कर उनके संघर्ष के तेवर को कुंद कर दिया गया। आंबेडकर का भी कुछ यही हाल होने जा रहा है। मार्क्स पर कई उतर आधुनिकता के प्रवर्तक कुछ इस प्रकार लिखने लगे हैं कि उनकी एक नई छवि बनती जा रही है। गांधी पर भी लिखने वाले उदारवादी चिंतकों ने उनकी शांतिप्रियता को ही मूल तथ्य बना डाला है। एक तरफ जहां इनके विचारों से प्रभावित आंदोलन आपस में संवाद नहीं कर पा रहे हैं या एक दूसरे का विरोध करते पाए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इनके विचारों की क्रातिकारिता पर परदा डालने में लगे हैं।

ऐसे में आनंद पटवर्धन की फिल्म ‘जय भीम कामरेड‘ इन तीनों चिंतकों के बीच एक संवाद की संभावना की खोज है। एक मार्क्सवादी कवि, गायक और चिंतक ने आत्महत्या करते समय घर की दीवार पर मोटे अक्षरों में लिख डाला कि ‘दलित अस्मिता की लड़ाई लड़ो।‘ यह आश्चर्यजनक घटना नहीं है, लेकिन इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है कि जीवन भर मार्क्स के विचारों पर चलने वाले एक कामरेड ने आत्महत्या क्यों की और उसे दलित अस्मिता इतनी महत्वपूर्ण क्यों लगी।

भारत में ऐसे विचारकों की कमी नहीं है जो दलित चेतना को मानव कल्याण की चेतना से जोड़ कर देखना चाहते हैं। उनके लिए गांधी एक महात्मा हैं जो आंबेडकर जैसे महात्मा के साथ सतत संवाद में लगे रहे। राजनीतिक विरोध परिस्थितिजन्य था, लेकिन वैचारिक साम्यता लक्ष्यजन्य थी। उनके लिए आंबेडकर का बुद्ध और मार्क्स के बीच तुलना करना एक को दूसरे के विरोध में खड़ा करना कतई नहीं था, बल्कि उनके बीच एक संवाद के सूत्र तलाशने का प्रयास था।

इस प्रयास की कुछ आवश्यक शर्ते हैं। पहली शर्त है कि हमारा लक्ष्य उनके बीच विवाद पैदा करने के बदले तत्कालीन संघर्ष के उनके अनुभवों को आधार बना कर नए संघर्ष की रूपरेखा खड़ी करना हो। वर्चस्व की संरचनाओं को समझने में उनकी मदद लें, विभिन्न मुद्दों पर उनके साथ संवाद कर देश, काल और परिस्थिति के संदर्भ में नई समझ बनाएं, ताकि संघर्ष को आगे बढ़ाया जा सके। संवाद की यह प्रक्रिया दुनिया भर के मुक्ति-संघर्षों के अलावा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फल-फूल रही दार्शनिक परंपराओं के साथ भी चलनी चाहिए। आने वाले समय में मुक्ति-संग्राम की दिशा इस बात से तय होगी कि अलग-अलग मुद्दों को लेकर संघर्षरत लोग इन चिंतकों से संवाद किस तरह स्थापित कर पाते हैं। ‘जय भीम कामरेड‘ फिल्म इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरूआत है।

श्री कुलदीप नैयर, पंजाब केशरी पचीस अप्रेल बारह। आस्ट्रेलिया के एक सम्पादक ने जब भारतीय प्रेस से सवाल किया कि पत्रकारिता के क्षेत्र में कोई दलित, अछूत शीर्ष स्थान पर क्यों नहीं है तो मैं परेशान हो गया। मैं इसे एक गलती मानता हूं जिसे बहुत पहले ठीक कर लिया जाना चाहिए था। मुझे लगा कि अब आगे कोई और देर किए बिना इसे ठीक कर लिया जाएगा।

लेकिन जब कुछ दिन पहले दलितों के गांधी डा. भीम राव अम्बेडकर की 121वीं जयंती पर जरा भी ध्यान नहीं दिया गया तो मुझे लगा कि दलितों के खिलाफ भेदभाव एक पूर्वाग्रह है जिसे समाप्त होने में दशकों लग जाएंगे। दलित हिंदू समाज के सबसे निचले पायदान पर हैं और उनके खिलाफ बहुत पहले से ही दुराग्रह बना हुआ है। इस दुराग्रह को बनाए रखने में कोई शर्मिंदगी नहीं महसूस की गई है। अनुसूचित जातियों यानी दलितों के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान में है। हालांकि यह प्रावधान उनके विरोध के बावजूद किया गया था। अम्बेडकर आरक्षण के खिलाफ थे। आरक्षण की तुलना उन्होंने बैसाखी से की थी लेकिन उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस के दूसरे नेता उन पर भारी पड़े और 10 सालों के लिए आरक्षण की व्यवस्था उन्हें स्वीकारनी पड़ी।

उस वक्त अम्बेडकर ने ऐसा नहीं सोचा था कि एक ओर राजनीतिक दल तो दूसरी ओर दलितों के बीच के निहित स्वार्थ वाले, खासकर क्रीमीलेयर वाले लोग आरक्षण की इस व्यवस्था को चुनावी लाभ के लिए लम्बे समय तक खींचते चले जाएंगे। चुनावी लाभ का लोभ इतना बड़ा है कि संसद में बिना किसी बहस के आरक्षण का यह प्रावधान दशक-दर-दशक बढ़ाया जाता रहा है।

हिन्दू समाज को डा. अम्बेडकर और उनके अनुयायियों का आभारी होना चाहिए कि इन लोगों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। भेदभाव से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने अपने अनुयायियों के साथ इस्लाम धर्म कबूल कर लेने की बात कही तो महात्मा गांधी ने उनसे ऐसा नहीं करने का आग्रह किया और यहां तक कि आमरण अनशन पर बैठ जाने की धमकी दी। डा. अम्बेडकर गांधी की इच्छा के आगे झुक गए लेकिन फिर से हिन्दू धर्म स्वीकारने से इन्कार कर दिया। लेकिन धर्मांतरण से भी दलितों को कोई लाभ नहीं हुआ। इस्लाम, ईसाई या सिख धर्म में भी उनके साथ कमोवेश हिन्दू समाज जैसा ही व्यवहार होता रहा है। हालांकि इस्लाम, ईसाई या सिख धर्म समानता की बात करते हैं लेकिन दलित जहां कहीं भी गए, उन्हें भेदभाव और असहायता    दंश झेलना पड़ा। इस तरह हिन्दुत्व के बाहर भी दलितों को जाति व्यवस्था की बुराइयों से मुक्ति नहीं मिली। सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इंगित किया है कि इस्लाम धर्म कबूल करने के बाद भी दलितों को अमानवीय व्यवहारों का सामना करना पड़ता है।

आज भी दलित सिर पर मैला ढोते हैं। सरकार इस पर रोक लगाने की बात करती है। यह बात 50 साल पहले ही शुरू की गई थी। उस वक्त भी गृह मंत्रालय ने निर्देश जारी किए थे, लेकिन उस वक्त से आज तक स्थिति में बहुत थोड़ा ही बदलाव आया है क्योंकि सरकार इस प्रचलन को सिर्फ कानून बनाकर रोकने का प्रयास करती रही है। मुझे तो लगता है कि अगर दलित खुद सिर पर मैला ढ़ोने से इन्कार कर दें तो उनकी स्थिति ज्यादा बेहतर हो सकती है लेकिन वे इतने गरीब हैं कि अपनी आजीविका पर लात मारने की हिम्मत नहीं कर सकते।

अब यह बात साफ हो जानी चाहिये कि किसी कानून या किसी सरकारी प्रयास से अस्पृश्यता समाप्त नहीं होने वाली। दरअसल मानसिकता बदले बगैर कामयाबी नहीं हासिल की जा सकती। बच्चे जिस परंपरा और धर्म के नाम पर बड़े हो रहे हैं, वह दुराग्रहपूर्ण है। जब तक समाज को पक्षपाती रवैया छोड़ने को मजबूर नहीं किया जाता तब तक यह स्थिति नहीं बदलने वाली। देष में सामाजिक क्रांति के लिए कोई आंदोलन हो रहा हो, यह मुझे दिख नहीं रहा। उदाहरण स्वरूप लड़कियों को बोझ मानने का प्रचलन है। कितनी बच्चियां गर्भ में या जन्म के बाद मार दी जाती है। यह कोई तसल्ली देने वाला बात नहीं है कि ऐसी वारदातें तो ज्यादातर सिर्फ उत्तर भारत और खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में ही होती हैं।

मानसिकता बदलने और दामन के धब्बे खत्म करने के लिए निरंतर प्रयास करने का असर बड़े पैमाने पर व्याप्त इन बुराइयों को समाप्त करने पर पड़ सकता है लेकिन ऐसा करने को कोई राजनीतिक दल तैयार नहीं है और न ही कोई एक्टीविस्ट इस दिशा में कुछ सोच रहा है।

उत्तर-  बजरंग़ मुनि- आप दोनों ही स्थापित विचारक हैं। आपने गांधी, मार्क्स और अम्बेडकर की तुलना की है। विषय अधिक गंभीर है। मेरी आप सबसे आंशिक सहमति तथा व्यापक असहमति है। अतः मैंने इसी अंक में इस संबंध में एक पूरा लेख लिखना ठीक समझकर मार्क्स गांधी और अम्बेडकर शीर्षक से लिखा है।

आपने दलित शब्द का बार बार उल्लेख किया है। कुछ वर्ष पूर्व दलित शब्द में वे सब लोग आते थे जो समाज में दबे कुचले हैं चाहे ये गरीब हों या हरिजन या आदिवासी। धीरे धीरे कुछ लोगों ने दलित शब्द हरिजन जाति के लिये रिजर्व कर लिया। पहले तो वैश्याएं भी दलित में ही मानी जाती थीं। आपने जिस वामपंथी नेता की आत्महत्या में दलित शब्द का उल्लेख किया है वह दलित शब्द जाति सूचक न होकर आर्थिक रूप से दबे हुए लोगों के लिये था। उनका आशय दबाये गये वर्ग से था न कि उनका आशय मायावती रामबिलास पासवान और मीरा कुमार से। आप अपनी भूल सुधार लें।

मानव स्वभाव है कि पूर्वाग्रह भुलाये तो जा सकते हैं किन्तु छुड़ाये नहीं जा सकते। दलित पूर्वाग्रह बढ़ने का कारण सिर्फ ये लोग हैं जो ऐसे पूर्वाग्रह को भूलने नहीं दे रहे। मौलिक अधिकारो की सुरक्षा आपका अधिकार है। संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा आपका अधिकार न होकर राज्य का कर्तव्य है। इसी तरह सामाजिक अधिकार आपका अधिकार न होकर सामने वाले का कर्तव्य है। आप उसके लिये दावा नहीं कर सकते। समानता किसी भी रूप में मौलिक अधिकार नहीं। स्वतंत्रता हमारा मौलिक अधिकार है। जानकारी के अभाव में हमारे संविधान में समानता को मौलिक अधिकार में डाल दिया गया। आप लोगों ने इस भूल को ठीक करने की अपेक्षा जोर से पकड़ लिया। आश्चर्य है कि कुलदीप नैयर जी सरीखे विद्वान भी मूल अधिकार की ठीक ठीक व्याख्या न करके गलत व्याख्या से चिपटे हुए हैं। समानता का व्यवहार किसी का अधिकार नहीं जो दावा करें।

आप दोनों दलितों के सम्बन्ध में समाज से निवेदन कर रहे हैं या शिकायत। दलित तो शिकायत कर ही नहीं सकते क्योंकि समानता को मूल अधिकार संविधान ने घोशित किया है, समाज ने नहीं। समाज ने स्वतंत्रता को मूल अधिकार माना है। मेरा आप सबसे निवेदन है कि किसी समाज शास्त्री के साथ बैठकर इन विषयों पर गंभीर चर्चा करिये और तब ऐसे शब्दों का प्रयोग करिये। सामाजिक भेदभाव कानून से मिटाना संभव नहीं। आप कानून से मूल अधिकारों की तो सुरक्षा कर नहीं पा रहे और सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा का दायित्व ले रहे हैं । मूल अधिकारों की सुरक्षा संविधान का दायित्व है। सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा संविधान का दायित्व न होकर कर्तव्य है जो स्वैच्छिक है। आप दायित्व पूरा करते हुए ही स्वैच्छिक कर्तव्य कर सकते हैं, दायित्व की अनदेखी करके नहीं। इन मुद्दों पर विचार करिये। दलित शोषित, पिछड़े आदि शब्दों का अनावश्यक उच्चारण आपको लाभ दे सकता है किन्तु समाधान नहीं दे सकता। समाधान तो सिर्फ एक ही है और वह है समान नागरिक संहिता।

 

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