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मंथन क्रमांक-45 शिक्षा व्यवस्था- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति की...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत-बजरंग मुनि
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशों की नकल करने लगा। पश्चिम के देशों ने तानाशाही के विकल्प ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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समान नागरिक संहिता।

Posted By: admin on June 13, 2012 in Uncategorized - Comments: 1 Comment »


नागरिक संहिता तथा आचार संहिता बिल्कुल अलग-अलग अर्थ और प्रभाव रखते हैं। नागरिक संहिता नागरिक की होती है, राजनैतिक व्यवस्था से जुड़ी होती है, सामूहिक होती है जबकि आचार संहिता व्यकित की होती है, व्यकितगत होती है, समाज या राज्य के दबाव से मुक्त होती है। नागरिक संहिता को हर हाल में समान होना ही चाहिये दूसरी ओर आचार संहिता को समान करने का प्रयत्न घातक होता है।
विवाह, खानपान, भाषा, पूजा-पद्धति, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि आचार संहिता से जुड़े विषय हैं। कोर्इ सरकार इस संबंध में कोर्इ कानून नहीं बना सकती। सुरक्षा, न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि में सरकारी सहायता व्यकितगत न होकर नागरिकता से जुड़े हैं। इस संबंध में सरकार कोर्इ कानून बना सकती है।
स्वतंत्रता के समय से ही आचार संहिता और नागरिक संहिता का अन्तर नहीं समझा गया और न आज तक समझा जा रहा है। आचार संहिता तथा नागरिक संहिता को एक करने के कारण समाज में अनेक समस्याएं बढ़ती गर्इं समाज टूटता गया तथा राजनेता मजबूत होते चले गये। राजनेता तो लगातार चाहता है कि समाज, धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, उम्र, लिंग, गरीब-अमीर, किसान, मजदूर के रूप में वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष की दिशा में बढ़ता रहे तथा राजनेता बिलिलयों के बीच बन्दर बनकर सुरक्षित रहें।
भारत की राजनैतिक व्यवस्था को व्यकित, परिवार, गांव, जिला, प्रदेश, देश और विश्व के क्रम में एक दूसरे के साथ जुड़ना चाहिये था, किन्तु उसे जोड़ा गया व्यकित, जाति, वर्ण, धर्म, समाज के क्रम में। स्वाभाविक था कि उपर वाला क्रम एक दूसरे का पूरक होता तथा नीचे वाला क्रम एक दूसरे के विरूद्ध। स्वतंत्रता के तत्काल बाद अम्बेडकर जी, नेहरू जी आदि ने तो सब समझ ते हुए भी यह राह पकड़ी जिससे समाज कभी एक जुट न हो जावे किन्तु अन्य अनेक लोग नासमझी में आचार संहिता और नागरिक संहिता को एक मानने लगे। आज भी संघ परिवार के लोग समान नागरिक संहिता के नाम पर आचार संहिता के प्रश्न उठाते रहते हैं। विवाह एक हो या चार यह नागरिक संहिता का विषय न होकर आचार संहिता से संबंधित है जिसे बहुत चालाकी से नागरिक संहिता में घुसाया गया है।
आज भारत में जो भी सामाजिक समस्याएं दिख रही हैं उनका सबसे अच्छा समाधान है समान नागरिक संहिता। भारत एक सौ इक्कीस करोड़ व्यकितयों का देश होगा, न कि धर्म, जाति, भाषाओं का संघ। भारत के प्रत्येक नागरिक को समान स्वतंत्रता होगी। संविधान के प्रीएम्बुल में समता शब्द को हटाकर स्वतंत्रता कर दिया जायेगा। प्रत्येक नागरिक के अधिकार समान होंगे। न्यायालय भी कर्इ बार समान नागरिक संहिता के पक्ष में आवाज उठा चुका है। अब समाज को मिलकर इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिये।

हमारी मूल समस्या शिक्षा का अभाव या गरीबी ?

Posted By: admin on May 6, 2010 in Recent Topics - Comments: No Comments »

डूब मरने की बात यह भी है कि ऐसे गरीबी रेखा के नीचे रहने वालो के उत्पादन और उपभोग की वस्तुओं पर भी हम भारी कर वसूलते है क्योकि हमे शिक्षा जैसी मूलभूत आवष्यकता पर खर्च करना पड़ता है ।.

आज के अखबारों में समाचार छपा है कि तेंतीस प्रतिशत प्राथमिक स्कूलो में षौचालय नही है, तो चालीस प्रतिशत स्कूलो में हैण्ड पम्पों का अभाव है या इतने प्रतिशत स्कूलो में भवन नही है तो इतने प्रतिशत में fशक्षकों का आभाव है। समाचार को इस तरह हाईलाईट किया गया है जैसे षिक्षा का विस्तार ही हमारी गरीबी बेरोजगारी आर्थिक विशमता का समाधान हो और यदि षिक्षा पर अधिक धन खर्च कर दिया जावें तो भूख मिट जायेगी । मैने भी सोचना षुरू किया तो पाया कि यह बिल्कुल विपरीत प्रचार है । षिक्षा से रोजगार नही बढ़ सकता क्योकि षिक्षा रोजगार का श्रृजन नही कर सकती । षिक्षा व्यक्तिगत रोजगार वृद्धि भी कर सकती है और व्यक्तिगत जीवन स्तर कुछ व्यक्तिओं का सुधार सकती है किन्तु सामूहिक रोजगार तो श्रम ही दे सकता है, षिक्षा नहीं ।
आकड़ो को टटोलिये तो पता चलेगा कि भारत में इक्कीस प्रतिषत लोग तेरह रूपये से भी कम पर जीवन जी रहे है और हम इन तेरह रूपये पर जीवन जीने को मजबूर लोगों के अपने स्वयं के उत्पादन और उपभोक्ता  वस्तुओं पर भारी कर वसूल करके षिक्षा पर खर्च बढ़ाने की योजनाएॅ बना रहे है। हमारे लिये षर्म का विशय यह नही कि हमारे कितने प्रतिषत स्कूलो में षौचालय या पानी की व्यवस्था नही है । षर्म का विशय तो यह है कि हमारे कितने प्रतिषत गरीब घरो में षौचालय नही हैं या कितने प्रतिषत मुहल्लो में पानी की सुविधा नही है ? साथ ही डूब मरने की बात यह भी है कि ऐसे गरीबी रेखा के निचे रहने वालो के उत्पादन और उपभोग की वस्तुओं पर भी हम भारी कर वसूलते है क्योकि हमे षिक्षा जैसी मूलभूत आवष्यकता पर खर्च करना पड़ता है । यदि गरीबी घटेगी, जीवन स्तर सुधरेगा, पेट भरने लग जायगा तो षिक्षा अपने आप बढ़ जायेगी और यदि गरीबी , भूख, जीवन स्तर को अनदेखी करके षिक्षा को अधिक महत्व दिया गया तो एक दो प्रतिषत व्यक्ति तो प्रगति कर लेगें किन्तु समूह के साथ अन्याय हो जायेगा । आवष्यकता इस बात की है कि हम अपनी प्राथमिकताएॅ तय करे और उन प्राथमिकताओं में गरीबी और षिक्षा का संतुलन बनावें । षिक्षको को सम्मान जनक वेतन मिले, स्कूलो की हालत सुधरे, स्कूलो बजट बढ़े चाहे इसके लिये गरीब ग्रामिण श्रमजीवी पर ही क्यो न टैक्स बढ़ाना पडे़ ऐसा सोचना अनैतिक है, अन्यायपूर्ण तथा गलत है। आप बुद्धिजीवी है इसका अर्थ यह कदापि नही है कि आप श्रम के षोशण को अनैतिक या अपराध न समझे । यदि प्राथमिकताओं को समझने में भूल हुई तो यह भूल बहुत हानिकर हो सकती है।

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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