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ज्ञानोत्सव 2019–बजरंग मुनि
दिनांक 09.09.2019 को प्रथम सत्र सुबह होने वाले विचार मंथन का विषय क्रमांक-19 "भारत विभाजन भूल या मजबूरी" ........................................................................ ये कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त व निष्कर्ष हैं जो हमें भारत विभाजन क...
ज्ञानोत्सव 2019, मंथन का विषय क्रमांक 1 – “ज्ञान-यज्ञ क्या क्यों कैसे?”–बजरंग मुनि
दिनाँक 31.08.2019 प्रथम सत्र प्रातः को होने वाले विचार ............................................................. 1. राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। जहॉ एक तरफ सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर ज...
मंथन क्रमांक-137 ’’राज्य के दायित्व या कर्तव्यों की समीक्षा’’–बजरंग मुनि
धर्म समाज और राज्य की भूमिका अलग-अलग होती है। समाज अन्तिम तथा सर्वोच्च इकाई होता है। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते हैं। कभी भी धर्म या राज्य समाज को कोई निर्देष नहीं दे सकते। धर्म व्यक्त...
मंथन क्रमांक-136″राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, इस्लाम और साम्यवाद”–बजरंग मुनि
दुनियां में अनेक प्रकार के संगठन बने हुये है। भारत में भी ऐसे संगठनों की बाढ़ आयी हुई है। ऐसे संगठनों में से हम सिर्फ तीन संगठनों की समीक्षा कर रहे हैं। ये हैं 1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2. इस्ल...
मंथन क्रमांक-135 अनुशासन महत्वपूर्ण है या सहजीवन–बजरंग मुनि
व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं जो एक दूसरे से जुडी होती हैं। व्यक्तियों को मिलाकर समाज बनता है और समाज के द्वारा ही किसी नये व्यक्ति की उत्पति होती है। परिवार, गांव से लेकर देश तक की इका...
मंथन क्रमांक-134 ’’मानवीय ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा’’–बजरंग मुनि
ऊर्जा के मुख्य रूप से दो स्रोत माने जाते हैं 1. जैविक 2. कृत्रिम। जैविक ऊर्जा में मनुष्य और पशु को सम्मिलित किया जाता है। कृत्रिम ऊर्जा में डीजल, पेट्रोल, बिजली, केरोसीन, गैस और कोयला को मानते है...
मंथन क्रमांक-133 ’’ भाषा आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित’’—बजरंग मुनि
किसी व्यक्ति के मनोभाव किसी दूसरे व्यक्ति तक ठीक-ठीक उसी प्रकार से पहुंच सकें जैसा कि वह चाहता है, और इसके लिये जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है, उसे भाषा कहते हैं। भाषा एक माध्यम है, उसकी स्व...
मंथन क्रमांक 132 ’’गांधी हत्या क्यो?’’–बजरंग मुनि
आज तक मेरे लिये यह प्रश्न एक पहेली बना हुआ है कि गांधी हत्या क्यों हुई? गांधी हिन्दू थे और किसी हिन्दू ने उनकी हत्या कर दी। यह कारण समझ में नहीं आया। जो भी कारण बताया जाता है वह पूरी तरह अपर्याप्...
मंथन क्रमांक 131 ’’क्षेत्रियता कितनी समाधान कितनी समस्या’’–बजरंग मुनि
आदर्श व्यवस्था के लिये नीचे वाली और उपर वाली इकाईयों के बीच तालमेल आवश्यक है, यदि यह तालमेल बिगड़ जाये तो अव्यवस्था होती है, जो आगे बढकर टकराव के रूप में सामने आती है। वर्तमान भारत की शासन व्यव...
मंथन क्रमांक 130 ’’संविधान और संविधान संशोधन’’–बजरंग मुनि
पूरे विश्व में मूल ईकाईयां दो होती है व्यक्ति और समाज। व्यक्ति सबसे नीचे की अंतिम इकाई होती है और समाज सबसे उपर की अंतिम। व्यक्ति के लिये स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन अनिवार्य आवश्यकता है...

भाजपा का सैद्धान्तिक समझौता

Posted By: admin on May 6, 2010 in Uncategorized - Comments: No Comments »

सर्व विदित है कि तानाशाही में आसानी से व्यवस्था स्थापित की जाती है साथ ही इसमें अनुशासन व चरित्र एक विशेष दिशा में बढ़ता जाता है। यदि तानाशाह की नीति व नीयत भलाई की हो तो वह बहुत आसानी से सही दिशा में व्यवस्था दे सकता है किन्तु यदि उसकी नीति या नीयत में कोई खोट हो तो उतनी ही तेजी से समाज को गुलाम भी बना सकता है।

संपूर्ण भारत में सिर्फ दो ही दल लोकतांत्रिक व्यवस्था से चल रहे है – 1) जे.डी.यू   2) भारतीय जनता पार्टी । शेष सभी दल तानाशाही के रूप में अपने दल का नेतृत्व कर रहे है। लोकतंत्र जहां जीवन पद्धति में न आकर शासन पद्धति में आता है वहां अव्यवस्था निश्चित है। भारतीय राजनीति तथा उसके सभी राजनैतिक दल शासन पद्धति वाले लोकतंत्र को आधार बनाकर चलते है। परिणाम होता है अव्यवस्था । यही हुआ दोनों पार्टियो के साथ। जे.डी.यू लोकतंत्र पर अडिग रहकर अव्यवस्थित है। स्वतंत्रता के बाद साठ वर्षो तक भाजपा भी लोकतंत्र के कारण अव्यवस्थित होकर टूटती जुटती रही क्योंकि कभी अटल जी लोकतंत्र को मजबूत करने लगते थे तो कभी संघ व्यवस्था को मजबूत करने लगता था । अब जबकि संघ का पूरा नियंत्रण भाजपा पर हो चुका है, अटल जी वृद्ध होकर अलग-थलग हो चुके है वैसी स्थिति में भाजपा पुनः अनुशासित होकर अपने लोकतंत्र से समझौता करके पुनः केन्द्रित व्यवस्था के आधार पर खड़ा होने की कोशिश करेगी । उम्मीद है कि इस दिशा में चल कर वह तेजी से एक तानाशाह अनुशासित व्यवस्थित व सक्रिय पार्टी बन जायेगी। यह परिवर्तन भाजपा को पुनर्जीवित कर सकता है किन्तु क्या यह समाज के लिये उचित होगा ? इस तानाशाही के प्रभाव से उसका मुख्य नियंत्रक संघ भी अछूता नही रह सकेगा। आज भी सर्वाधिक अच्छे व नैतिक व्यक्ति संघ से जुडे़ हुये है। क्या वे भाजपा के चरित्र पतन को रोक पायेंगे जो असंभव दिखता है । स्वाभाविक है कि संघ में आन्तरिक असंतोष और अव्यवस्था होगी। क्योकि भाजपा के परिणाम से संघ को प्रभावित होते देखकर संघ के प्रति समर्पित लोगों को उत्तर देना कठिन होगा ।

क्या हमें यह मान लेना चाहिये कि जनसंघ या भाजपा के जन्म से ही भाजपा ने लोकतंत्रीय व्यवस्था की जो मसाल जलाई थी वह लोकतंत्रीय दुष्परिणामों से डरकर थक कर हार गई है और आंतरिक व्यवस्था में तानाशाही के रूप में चलने को मजबूर हो गई है।

यदि ऐसा है तो भाजपा क्यो श्रेष्ठ है क्यो हम उससे जुड़ाव रखे। जब अन्य पार्टी जैसा उसे भी रहना है तो क्यो न हम उस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को देखकर उसके पक्ष चले जो राष्ट्र के लिये अच्छा कार्य करे, जो समाज के लिये अच्छा कार्य करे। जो समाज की शक्तियों का केन्द्रीयकरण न करके उन्हें विकेन्द्रीत करे एवं समाज के हर व्यक्ति को मजबूत करे । यदि अन्य कोई पार्टी ऐसा समाज सशक्तिकरण का कार्य करे तो व्यक्ति को उसी पार्टी के साथ जुड़ना चाहिये जो अधिकतम आजादी प्रदान करें । मेरा विचार है कि या तो हम तटस्थ होकर ऐसे दल की समीक्षा करे या कोई अन्य विकल्प खोजने का प्रयत्न करे ।

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