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सामयिकी
मै न्यायिक सक्रियता के विरूद्ध रहा हॅू। साथ साथ मै विधायिका की अति सक्रियता के भी विरूद्ध रहा हॅू। विधायिका की अति सक्रियता से परेशान न्यायपालिका ने संवैधानिक तरीके से जनहित याचिकाओ की अनु...
सामयिकी-बजरंग मुनि
निर्भया कांड के समय संभवतः मै भारत का अकेला व्यक्ति था जिसने बलात्कार के लिये कडे कानून को और कडा करने का खुला विरोध किया था। यहां तक कि मैने जस्टिस वर्मा आयोग...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?-बजरंग मुनि
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
सामयिकी- बजरंग मुनि
भारत मे स्वतंत्रता के पूर्व श्रम शोषण के उद्देश्य से सवर्ण आरक्षण था। भीम राव अम्बेडकर एक बडे बुद्धिजीवी थे जो जन्म से तो अवर्ण थे किन्तु श्रम शोषण के लिये अन्य सवर्णो की तुलना मे बहुत आगे थ...
मंथन क्रमांक 80- ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे? बजरंग मुनि
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा ...
जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा-बजरंग मुनि
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्ष...
क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है-बजरंग मुनि
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुंचा...
सामयिकी
उत्तर प्रदेश के उपचुनावो मे गोरखपुर और फुलपुर मे स पा की जीत अप्रत्याशित थी। उतनी ही अप्रत्याशित जितनी विधानसभा चुनावों मे सपा की करारी हार थी। उस समय उनकी हार का वैसा अनुमान नही था और इस समय ...
भय का व्यापार-बजरंग मुनि
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रेज...
मंथन क्रमांक-75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क-बजरंग मुनि
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्तिय...

कृत्रिम उर्जा…!

Posted By: admin on May 31, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

दुनिया मे दो प्रकार के देश होते हैं (1) श्रम अभाव देश (2) श्रम बहुल देश। श्रम अभाव देषों मे श्रम बुद्धि  और धन के बीच कम अंतर होता है। श्रम का मूल्य बहुत ज्यादा होने से वहां  के नागरिकों को श्रम के विकल्प के रूप मे सस्ती कृत्रिम उर्जा डीजल, पेट्रोल,  बिजली, गैस, किरासन, कोयला का विकल्प देना सरकार की मजबूरी होती है। श्रम बहुल देशों को इसके ठीक विपरीत कृत्रिम उर्जा को श्रम का प्रतिस्पर्धी  मानकर ऐसी मूल्य नीति रखनी चाहिये जिससे श्रम की मांग बढ़े और श्रम, बुद्धि  और धन के बीच की दूरी बढती न चली जावे। भारत एक श्रम बहुल देश है किन्तु स्वतंत्रता के तत्काल बाद भारत की अर्थनीति मे बुद्धिजीवी पूंजीपति गठजोड का एकाधिकार हो गया। इन्होने श्रम शोषण के उद्देश्य से भारत मे ऐसी अर्थनीति बनाई कि श्रम बुद्धि और धन के बीच दूरी लगातार बढती चली गई। श्रम बहुल देश मे कृत्रिम उर्जा श्रम शोषण का आधार बनती है। ये बुद्धिजीवी पूंजीपति अच्छी तरह जानते थे कि भारत श्रम बहुल देश है किन्तु इन्होने षणयंत्र पूर्वक श्रम मूल्य की तुलना मे कृत्रिम  उर्जा का मूल्य बहुत कम रखा क्योकि कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढने से श्रम की मांग बढती है परिणम स्वरूप श्रम कर मूल्य बढता है जिसका लाभ श्रम बेचने वालो को होता और हानि श्रम खरीदने वालो को। स्पष्ट है कि गरीब तथा श्रम जीवी आम तौर पर श्रम बेचने वालों मे शामिल होते है तथा बुद्धिजीवी पूंजीपति श्रम खरीदने वालों मे । इस श्रम शोषण के षणयंत्र का नेतृत्व किया वामपंथियो ने और लाभ उठाया पूंजीपतियो ने। वामपंथियों समाजवादियों ने लगातार कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि का विरोध किया क्योकि यदि कृत्रिम  उर्जा मूल्य बढने से श्रम का मूल्य बढ जाता तो भारत मे गरीब अमीर का टकराव नही होता जो वामपंथियो की सफलता के लिये आवश्यक मजबूरी है। वामपंथियो की खाडी देशों के साथ भी गुप्त सहानुभूति या समझौता रहा है । यह भी उनके विरोध की मजबूरी थी।

इन श्रम शोषण करने वालो ने इससे भी गन्दा काम यह किया कि इन्होने श्रम उत्पादन उपभोग की वस्तुओ पर भारी कर लगा दिये। साइकिल पर प्रति साइकिल चार सौ रूपया टैक्स लेना और रसोई गैस पर तीन सौ रूपया छूट, देने से इनकी नीयत साफ हो जाती है । सब प्रकार के कृषि उत्पादो पर भी भारी कर लगाकर सस्ती बिजली सस्ता आवागमन की प्रथा पूरे भारत मे आज तक प्रचलित है।

श्रम शोषण की अर्थनीति को पलटना होगा। कृत्रिम उर्जा की बहुत भारी मूल्य वृद्धि करके गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान के उत्पादन उपभोग की वस्तुएं कर मुक्त करनी होंगी। बुद्धिजीवी पूंजीपति गठजोड रूपी षणयंत्र को तोडना ही हमारी अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान हैं।

कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि हमारी सभी आर्थिक समस्याओं का भी एक मात्र समाधान है। इससे श्रम बुद्धि और धन के बीच का अंतर घटेगा , गरीब अमीर के बीच की दूरी घटेगी, शहरो की आबादी की गांवों की ओर वापसी होगी,  डीजल पेट्रोल गैस की खपत घटने से विदेशी मुद्रा बचेगी, पर्यावरण प्रदूषण घटेगा तथा ग्रामीण अर्थ व्यवस्था मजबूत होकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को कमजोर करेगी। एक बिन्दु कर होने से भ्रष्टाचार भी घटेगा।

इससे कुछ लोगों को परेशानी भी होगी । आवागमन महंगा होगा। खाडी देश नाराज होकर हमारे कुछ राजनेताओं की गुप्त सहायता रोक सकते है । आयात के साथ साथ निर्यात पर भी कुछ विपरीत प्रभाव पडेगा। किन्तु लाभ की तुलना मे हानि की मात्रा नगण्य ही है। एक आकलन के अनुसार यदि कृत्रिम उर्जा का बाजार मूल्य दो गुना कर दे तो प्रति व्यक्ति प्रतिमाह दो हजार रूपया कृत्रिम उर्जा सब्सीडी के रूप मे दिया जा सकता है। अन्य कई प्रकार के टैक्स हटाने के बाद भी।

हमारे भारत के राजनेता सरकारी खजाना भरने के लिये कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि करने का ढोंग  करते है। इस कारण जनता ऐसी मूल्य वृद्धि का विरोध करती है । साथ मे खाडी देशों के एजेन्ट राजनेता भी विरोध का वातावरण बनाते है। यदि एक बार एक पृथक कोष बनाकर टैक्स वृद्धि के साथ अन्य राहत को जोडकर एक साथ घोषणा कर दे तो ऐसी मूल्य वृद्धि का विरोध न होकर स्वागत होगा।

विस्तृत वार्ता ए टू जेड चैनल मे दिनांक 20 मई को सायं 7 से 8 प्रसारित की गईं।

 

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