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मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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कृत्रिम उर्जा…!

Posted By: admin on May 31, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

दुनिया मे दो प्रकार के देश होते हैं (1) श्रम अभाव देश (2) श्रम बहुल देश। श्रम अभाव देषों मे श्रम बुद्धि  और धन के बीच कम अंतर होता है। श्रम का मूल्य बहुत ज्यादा होने से वहां  के नागरिकों को श्रम के विकल्प के रूप मे सस्ती कृत्रिम उर्जा डीजल, पेट्रोल,  बिजली, गैस, किरासन, कोयला का विकल्प देना सरकार की मजबूरी होती है। श्रम बहुल देशों को इसके ठीक विपरीत कृत्रिम उर्जा को श्रम का प्रतिस्पर्धी  मानकर ऐसी मूल्य नीति रखनी चाहिये जिससे श्रम की मांग बढ़े और श्रम, बुद्धि  और धन के बीच की दूरी बढती न चली जावे। भारत एक श्रम बहुल देश है किन्तु स्वतंत्रता के तत्काल बाद भारत की अर्थनीति मे बुद्धिजीवी पूंजीपति गठजोड का एकाधिकार हो गया। इन्होने श्रम शोषण के उद्देश्य से भारत मे ऐसी अर्थनीति बनाई कि श्रम बुद्धि और धन के बीच दूरी लगातार बढती चली गई। श्रम बहुल देश मे कृत्रिम उर्जा श्रम शोषण का आधार बनती है। ये बुद्धिजीवी पूंजीपति अच्छी तरह जानते थे कि भारत श्रम बहुल देश है किन्तु इन्होने षणयंत्र पूर्वक श्रम मूल्य की तुलना मे कृत्रिम  उर्जा का मूल्य बहुत कम रखा क्योकि कृत्रिम उर्जा का मूल्य बढने से श्रम की मांग बढती है परिणम स्वरूप श्रम कर मूल्य बढता है जिसका लाभ श्रम बेचने वालो को होता और हानि श्रम खरीदने वालो को। स्पष्ट है कि गरीब तथा श्रम जीवी आम तौर पर श्रम बेचने वालों मे शामिल होते है तथा बुद्धिजीवी पूंजीपति श्रम खरीदने वालों मे । इस श्रम शोषण के षणयंत्र का नेतृत्व किया वामपंथियो ने और लाभ उठाया पूंजीपतियो ने। वामपंथियों समाजवादियों ने लगातार कृत्रिम उर्जा मूल्य वृद्धि का विरोध किया क्योकि यदि कृत्रिम  उर्जा मूल्य बढने से श्रम का मूल्य बढ जाता तो भारत मे गरीब अमीर का टकराव नही होता जो वामपंथियो की सफलता के लिये आवश्यक मजबूरी है। वामपंथियो की खाडी देशों के साथ भी गुप्त सहानुभूति या समझौता रहा है । यह भी उनके विरोध की मजबूरी थी।

इन श्रम शोषण करने वालो ने इससे भी गन्दा काम यह किया कि इन्होने श्रम उत्पादन उपभोग की वस्तुओ पर भारी कर लगा दिये। साइकिल पर प्रति साइकिल चार सौ रूपया टैक्स लेना और रसोई गैस पर तीन सौ रूपया छूट, देने से इनकी नीयत साफ हो जाती है । सब प्रकार के कृषि उत्पादो पर भी भारी कर लगाकर सस्ती बिजली सस्ता आवागमन की प्रथा पूरे भारत मे आज तक प्रचलित है।

श्रम शोषण की अर्थनीति को पलटना होगा। कृत्रिम उर्जा की बहुत भारी मूल्य वृद्धि करके गरीब ग्रामीण श्रमजीवी किसान के उत्पादन उपभोग की वस्तुएं कर मुक्त करनी होंगी। बुद्धिजीवी पूंजीपति गठजोड रूपी षणयंत्र को तोडना ही हमारी अनेक सामाजिक समस्याओं का समाधान हैं।

कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि हमारी सभी आर्थिक समस्याओं का भी एक मात्र समाधान है। इससे श्रम बुद्धि और धन के बीच का अंतर घटेगा , गरीब अमीर के बीच की दूरी घटेगी, शहरो की आबादी की गांवों की ओर वापसी होगी,  डीजल पेट्रोल गैस की खपत घटने से विदेशी मुद्रा बचेगी, पर्यावरण प्रदूषण घटेगा तथा ग्रामीण अर्थ व्यवस्था मजबूत होकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को कमजोर करेगी। एक बिन्दु कर होने से भ्रष्टाचार भी घटेगा।

इससे कुछ लोगों को परेशानी भी होगी । आवागमन महंगा होगा। खाडी देश नाराज होकर हमारे कुछ राजनेताओं की गुप्त सहायता रोक सकते है । आयात के साथ साथ निर्यात पर भी कुछ विपरीत प्रभाव पडेगा। किन्तु लाभ की तुलना मे हानि की मात्रा नगण्य ही है। एक आकलन के अनुसार यदि कृत्रिम उर्जा का बाजार मूल्य दो गुना कर दे तो प्रति व्यक्ति प्रतिमाह दो हजार रूपया कृत्रिम उर्जा सब्सीडी के रूप मे दिया जा सकता है। अन्य कई प्रकार के टैक्स हटाने के बाद भी।

हमारे भारत के राजनेता सरकारी खजाना भरने के लिये कृत्रिम उर्जा की मूल्य वृद्धि करने का ढोंग  करते है। इस कारण जनता ऐसी मूल्य वृद्धि का विरोध करती है । साथ मे खाडी देशों के एजेन्ट राजनेता भी विरोध का वातावरण बनाते है। यदि एक बार एक पृथक कोष बनाकर टैक्स वृद्धि के साथ अन्य राहत को जोडकर एक साथ घोषणा कर दे तो ऐसी मूल्य वृद्धि का विरोध न होकर स्वागत होगा।

विस्तृत वार्ता ए टू जेड चैनल मे दिनांक 20 मई को सायं 7 से 8 प्रसारित की गईं।

 

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