Lets change India
प्याज के आंसू
दुनिया भर में अनेक ऐसे अंध विश्वाश  फैले हुए हैं जिन्हें आम आदमी सत्य मानता है। भारत में ऐसे अंध विश्वाश बहुत ज्यादा फैलाये गये हैं। ऐसे अंध विष्वासों में सामाजिक, धार्मिक अंधविष्वास हैं तो अ...
मैने वोट क्यों नहीं दिया?
आम जनता ने बड़े उत्साह और हर्षोल्लास के साथ आम चुनाव में हिस्सा लेते हुए अपने लिए एक सरकार का रास्ता साफ कर दिया। करीब सवा महीने लंबी चली चुनावी प्रक्रिया के दौरान हर तरफ से लोकतंत्र के इस पाव...
वैकल्पिक राजनीति का प्रारम्भ- श्री बजरंग मुनि
लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हों चुके हैं। पिछले तीन माह से अनेक विषयों पर वर्तमान व्यवस्था से जुडे राजनीतिक दलों ने काफी लंबी बहस की। एक-दूसरे पर दोषारोपण भी किया। यहाँ तक कि दोषारोपण राजनीति या ...
लोक स्वराज हीं व्यवस्था परिवर्तन है !
आज भी हमारे देश के अधिकतर लोग यह मानते हैं कि वे शासित होने के लिए ही पैदा हुए हैं I भारत के लोगों के जेहन में यानि यूँ कहे की एक तरह से हिमोग्लोबिन में गुलामी में रहने की प्रवृति विकसित हो गई है I ...
नितीश कुमार द्वारा नरेंद्र मोदी के झूठ का पोस्टमार्टम i
नरेंद्र मोदी ने बिहार में जाकर भाषण दिया I ऐसा लगता था कि नरेंद्र मोदी कहीं न कहीं बोलने में फसेंगे ,किन्तु ऐसा नहीं लगता था कि वे जान बुझ कर झूठ बोलते हैं और वह भी ऐसा झूठ जो आसानी से पकड़ा जाय I अब ...
फिर पटना बम विस्फोट में सिर्फ मुसलमानों का हीं पकड़ा जाना !
पटना में नरेंद्र मोदी की रैली के समय बम विस्फोट हुआ I जो लोग पकड़े गए वे सबके सब मुसलमान हैं I इतिहास बताता है कि सांप्रदायिक आतंकवादी घटनाओं में अब तक पकड़े गए लगभग सभी लोग मुसलमान हैं I कुछ घटनाओं...
राहुल गाँधी या नरेन्द्र मोदी
यह वर्ष चुनाव निकट होने के कारण राजनैतिक बुखार से तप रहा है। स्पस्ट हो चला है कि मुख्य मुकाबला दल के रूप में भाजपा और कांग्रेंस के बीच तथा व्यक्ति के रूप में नरेंद्र मोदी तथा राहुल गाँधी के बीच ...
मुजफ्फर नगर के दंगे -कारण व समाधान ;-बजरंग मुनि
पिछले दिनो मुजफ्फर नगर मे साम्प्रदायिक दंगे हुए जिसमे कई बेगुनाह मारे गये। प्रशासनिक तौर पर मरने वालो की संख्या 47 के आस पास बताई जा रही है। संभव है कि इससे अधिक लोग भी मरे हों । दंगे हिन्दुओ और ...
आचार्य पंकज, राष्ट्रीय अध्यक्ष, व्यवस्था परिवर्तन मंच
प्रश्न -  8 अप्रेल 2013  को पतंजली योग पीठ हरिद्वार उत्तराखंड मे राष्ट्रीय सुधार शिखर सम्मेलन‘‘ मे आपके गंभीर विचार सुनने का अवसर मिला। आपने कहा कि सम्मेलन के समक्ष जो विजन प्रस्तुत किया गया है व...
गुडिया के गुनाहगार -संजय तिवारी विस्फोट डांट काम से
आग अभी धधक रही है और शायद इतनी जल्दी बुझेगी भी नही। ये तो पहले ही रेप के खिलाफ जीरो टालरेन्स मांगनेवाले लोग थे। अब तो अनघा छटक गया है। लेकिन दुख और यौन पीडा की इस घडी मे भी आंदोलनकारी ऐसे सदमे मे ...

श्री पुन्य प्रसून वाजपेयी, विस्फोट डांट कांम से

Posted By: Author on May 26, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

बस्तर के जंगल में माओवादियों की समानान्तर सरकार की यह पहली तस्वीर थी। संयोग से ठीक दो बरस पहले 6 अपै्ल 2010 को जिस चीतलनार कैंप के 76 सीआरपीएफ जवानों को सेंध लगाकर माओवादियों ने मार दिया था, उसी चीतलनार कैंप से महज 55 किलोमीटर की दूरी पर कलेक्टर एलेक्स मेनन जंगल में बीते 13 दिनों तक रहे। लेकिन सुरक्षा बल उन तक नहीं पहुंच सके। जबकि दो बरस पहले गृह मंत्री चिदंबरम ने देश से वादा किया था कि चार बरस में माओवाद को खत्म कर देंगे और नक्सल पर नकेल कसने के साथ साथ विकास का रास्ता भी साथ साथ चलेगा। लेकिन इस जमीन का सच है क्या?

तेइस बरस पहले पहली बार नक्सली बस्तर के इस जंगल में पहुंचे। दण्डकारण्य का एलान 1991 में पहली बार बस्तर में किया गया। पहली बार नक्सल पर नकेल कसने के लिये 1992 में बस्तर में तैनात सुरक्षाकर्मियों के लिये 600 करोड़ का बजट बना। लेकिन आजादी के 65 बरस बाद भी बस्तर के इन्हीं जंगलों में कोई शिक्षा संस्थान नहीं है। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र नहीं हैं। साफ पानी तो दूर, पीने के किसी भी तरह के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। रोजगार तो दूर की गोटी है। तेंदू पत्ता और बांस कटाई भी ठेकेदारों और जंगल अधिकारियो की मिलीभगत के बाद सौदेबाजी के जरिये होती है। जहां 250 तेंदू पत्ता की गड्डी की कीमत महज 55 पैसे है और जंगल की लकड़ी या बांस काटने पर सरकारी चालान 50 रूपये का होता है। यह सब 2012 का सच है। जहां सुकमा के कलेक्टर के घर से लेकर चीतलनार के कैंप तक के 100 किलोमीटर के घेरे में सरकार सुरक्षा बलों पर हर साल 250 करोड़ रूपये खर्च दिखा रही है।

1200 सीआरपीएफ जवान और 400 पुलिसकर्मियों के अलावा 350 एसपीओ की तैनाती के बीच यहां के छोटे छोटे 32 गांव में कुल 9000 आदिवासी परिवार रहते हैं। इन आदिवासी परिवारों की हर दिन की आय 3 से 8 रूपये है। समूचे क्षेत्र में हर रविवार और गुरूवार को लगने वाले हाट में अनाज और सब्जी से लेकर बांस की लकड़ी की टोकरी और कच्चे मसाले और महुआ का आदान प्रदान होता है। यानी बार्टर सिस्टम यहां चलता है। रूपया या पैसा नहीं चलता। जितना खर्चा रमन सिंह सरकार और केन्द्र सरकार हर महीने नक्सल पर नकेल कसने की योजनाओं के तहत इन इलाकों में कर रहे हैं, उसका 5 फीसदी भी साल भर में 9 हजार आदिवासी परिवारों पर खर्चा नहीं होता। इसीलिये दिल्ली में गृहमंत्री चिदंबरम की रिपोर्ट और सुकमा के कलेक्टर की रिपोर्ट की जमीन पर आसमान से बड़ा अंतर देखा जा सकता है।

एलेक्स मेनन की रिपोर्ट बताती है कि जीने की न्यूनतम जरूरतों की जिम्मेदारी भी अगर सरकार ले ले तो उन्हीं ग्रामीण आदिवासियों को लग सकता है कि उन्हें आजादी मिल गई जो आज भी सीआरपीएफ की भारी भरकम गाडि़यों को देखकर घरों में दुबक जाते हैं। सुकमा कलेक्टर के अपहरण से पहले उन्हीं की उस रिपोर्ट को रायपुर में नक्सल विरोधी कैंप में आई जी रैंक के अधिकारी के टेबल पर देखी जा सकती है, जहां एलेक्स ने लिखा है कि दक्षिणी बस्तर में ग्रामीण आदिवासियों के लिये हर गांव को ध्यान में रखकर 10-10 करोड़ की ऐसी योजना बनायी जाये, जिससे बच्चों और बड़े-बुजुर्गों की न्यूनतम जरूरत जो उनके मौलिक अधिकार में शामिल है, उसे मुहैया करा दें तभी मुख्यधारा से सभी को जोड़ने का प्रयास हो सकता है और मौलिक जरूरत की व्याख्या भी बच्चों को पढ़ाने के लिये जंगल स्कूल, भोजन की व्यवस्था, पीने के पानी का इन्फ्रास्ट्रक्चर और बुजुर्गो के इलाज के लिये प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र और जंगल में टूटी पेड़ों की टहनियों को जमा करने की इजाजत। साथ ही जगह जगह सामूहिक भोजन देने की व्यवस्था।

लेकिन रायपुर से दिल्ली तक इन जंगलों को लेकर तैयार रिपोर्ट बताती है कि जंगल गांव का जिक्र कहीं है ही नहीं। सिर्फ माओवादी धारा को रोकने के लिये रेड कारिडोर में सेंध लगाने की समूचे आपरेशन का जिक्र ही है और उस पर भी जंगल के भीतर आधुनिकतम हथियारों के आसरे कैसे पहुंचा जा सकता है और हथियार पहुंचाने के लिये जिन सड़को और जिस इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, उसके बजट का पूरा खाका हर रिपोर्ट में दर्ज है। इतना ही नहीं बजट किस तरह किस मद में कितना खर्च होगा अगर सारी रिपोर्ट को मिला दिया जाये तो केन्द्र और राज्य मिलकर माओवाद को खत्म करने के लिये हर बरस ढाई हजार करोड़ चाहते हैं। असल में जमीनी समझ का यही अंतर मध्यस्थों के मार्फत कलेक्टर की रिहाई तो करवाता है और रिहाई के लिये जो सवाल मध्यस्थ उठाते हैं, उस पर यह कहते हुये अपनी सहमति भी दे देता है कि माओवाद का इलाज तो उनके लिये बंदूक ही है। लेकिन जो मुद्दे उठे उसमें सरकार मानती है कि नक्सल कहकर किसी भी आदिवासी को पुलिस-प्रशासन जेल में ठूस सकती है और नक्सल विरोधी अभियान को सफल दिखाने के लिये इस सरल रास्ते का उपयोग बार बार सुरक्षाकर्मियों ने किया। जिस वजह से दो सौ से ज्यादा जेल में बंद आदिवासियों की रिहाई के लिये कानूनी पहल शुरू हो जायेगी। सुरक्षाबलों का जो भी आपरेशन दिल्ली और रायपुर के निर्देश पर जंगल में चल रहा है, उसे बंद इसलिये कर दें क्योंकि आंपरेशन की सफलता के नाम पर बीते तीन बरस में 90 से ज्यादा आदिवासियों को मारा गया है। सरकार ने मरनेवालो पर तो खामोशी बरती लेकिन यह आश्वासन जरूर दिया कि सुरक्षाबल बैरक में एक खास वक्त तक रहेंगे।

जो सरकारी योजनाये पैसे की षक्ल में जंगल गांव तक नहीं पहुंच पा रही है उसका पैसा बीते दस बरस से खर्च कहां हो जाता है यह सरकार को बताना चाहिये। क्योंकि अगवा कलेक्टर इसी विषय को बार बार उठाते रहे। सरकार के अधिकारियों ने इस पर भी खामोशी बरती लेकिन योजनाओं के तहत आने वाले पैसे के खर्च ना होने पर वापस लौटाने की ईमानदारी बरतने पर अपनी सहमति जरूर दे दी। यानी जो दूरबीन दिल्ली या रायपुर से लगाकर बस्तर के जंगलों को देखा जा सकता है, उसमें तीन सवाल सीधे सामने खड़े हैं। उड़ीसा में विधायक अपहरण से लौटने के बाद विधायकी छोड़ने पर राजी हो जाता है। कलेक्टर थके हारे मानता है कि 13 दिनों में उसने जंगल के बिगड़े हालात देखे वह बतौर कलेक्टर पद पर रहते हुये देख नहीं पा रहा था। माओवादियों के कंधे पर सवार होकर बंगाल में ममता सत्ता पाती है तो जवाब निकलता है कि सत्ता पाने के बाद ममता की तरह माओवादियो के निपटाने में लग जाया जाये या छूटने के बाद कलेक्टर की तरह सुधार का रास्ता पकड़ा जाये? या रिहाई के बाद विधायकी छोड़ कारपोरेट के खनन लूट से आदिवासी ग्रामीण के जीवन को बचाया जाये? असल में इन्हीं सवालों के जवाब में सत्ता की सच्चाई भी है और बस्तर सरीखे माओवाद प्रभावित जंगलों का सच भी।

समीक्षा-बजरंग़ मुनि- बाजपेयी जी ने नक्सलवाद पर एक विवेचना प्रस्तुत करके तीन मौलिक प्रश्न उठाये हैं (1) पिछड़े हुए गांवों में तेज विकास का मार्ग (2) भ्रष्टाचार नियंत्रण का मार्ग (3) माओवादियों को निपटाने का मार्ग। इस विषय पर सर्वसम्मति है कि तीनों ही दिशाओं में काम करना आवश्यक है किन्तु निर्णय यह होना है कि तीनों में सर्वोच्च प्राथमिकता किस लाइन को देना उचित है।

पिछले साठ वर्षों से देखा जा रहा है कि भारत में एक वर्ग ऐसा बना हुआ है जो किसी भी समस्या का कभी कोई समाधान शुरू होने ही नहीं देता। किसी भी समस्या के समाधान की शुरूआत करने के पूर्व सब प्रकार के मार्गों पर गंभीर विचार मंथन एक आवश्यकता होती है। इसका यह अर्थ नहीं कि विचार मंथन कभी खतम ही न हो। किसी भी समाधान के पक्ष विपक्ष में तर्क उठने स्वाभाविक हैं। तर्कों के बाद स्थापित व्यवस्था द्वारा जो मार्ग निकालकर कार्य प्रारंभ हो उस मार्ग की समीक्षा भी समय समय पर विचारकों को करनी चाहिये किन्तु स्थापित व्यवस्था को कभी किसी नतीजे तक पहुंचने ही न दिया जाये और यदि व्यवस्था फिर भी प्रयास करे तो उस निर्णय के विरूद्ध धरना प्रदर्शन विरोध और टकराव तक ले जाया जाये तो संदेह होता है कि विरोध कर्ता कहीं पेशेवर विचारक तो नहीं। यह भी संदेह होता है कि कहीं विरोध कर्ता किसी विदेशी, एन जी ओ स्वदेशी संगठन या सरकारी एजेन्ट तो नहीं। यह प्रश्न स्वाभाविक है किसी समस्या के समाधान के लिये अधिकृत व्यवस्था को किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से बार बार रोकने के पीछे उसका उद्देश्य क्या है?

बाजपेयी जी के लेख से यह स्पष्ट है कि लेख विलम्ब के उद्देश्य से न लिखकर मंथन के उद्देश्य तक सीमित है। यह सच है कि बस्तर के एक भाग से भारतीय संविधान की व्यवस्था समाप्त होकर नक्सलवादी व्यवस्था के अन्तर्गत पूरा शासन चल रहा है। यह भी सच है कि नक्सलवादी शासन के पूर्व भी उस क्षेत्र का विकास देश के अन्य क्षेत्रों से बहुत पीछे था। यह भी सच है कि नक्सलवादी शासन आने के बाद भी उस क्षेत्र में कोई सुधार आने की जगह ज्यादा ही हालत बिगड़ी है। नक्सलवादी क्षेत्र और नक्सलवाद मुक्त क्षेत्र के बीच जो क्षेत्र है और जो छत्तीसगढ़ तथा भारत सरकार की व्यवस्था के अन्तर्गत है वहां विकास तो संतोषजनक है किन्तु भ्रष्टाचार की मात्रा अन्य दोनों क्षेत्रों से कई गुना ज्यादा है। स्पष्ट है यदि भ्रष्टाचार नहीं होता तो विकास बहुत तेज होता और उसका दूसरे क्षेत्रों पर भी प्रभाव पड़ता।

पहला प्रश्न यह है कि उक्त क्षेत्र का विकास नक्सलवाद आने के पूर्व भी इतना पीछे रहने का कारण क्या है? क्या हमारे व्यवस्थापक जानबूझकर उसे पिछड़ा रखना चाहते थे अथवा क्या भ्रष्टाचार के कारण वह क्षेत्र पिछड़ा या कहीं नीतिगत भूल हुई? मैं इस बात से आश्वस्त हॅूं कि जानबूझकर उस क्षेत्र से कोई अलग व्यवहार नहीं हुआ। भ्रष्टाचार भी वहां उसी तरह हुआ जैसा सब जगह हुआ। यदि हमारे क्षेत्र में एक करोड़ रूपया आया और तीस लाख का भ्रष्टाचार हुआ तो उस क्षेत्र में पांच करोड़ आया और ढाई करोड़ भ्रष्टाचार में गया। आपका मानना है कि हमारे क्षेत्र में भ्रष्टाचार तीस प्रतिशत हुआ तो उस क्षेत्र में पचास प्रतिशत हुआ। मेरा मानना है कि भ्रष्टाचार ज्यादा होने के बाद भी वहां खर्च हुई वास्तविक राशि हमारे क्षेत्र से बहुत अधिक थी। मेरे विचार से उस क्षेत्र के पिछड़ने का कारण नीतिगत था। वहां एक इमानदार, आदिवासी शुभ चिन्तक, जिलाधीश ब्रम्हदेव शर्मा की नीतिगत भूल ने उस क्षेत्र का विकास रोक दिया। कलेक्टर बी डी शर्मा ने एक कानून बनवाकर उस पूरे क्षेत्र में बाहर के लोगों का प्रवेश रोक दिया। शर्मा जी की सोच थी कि बाहर के लोग आदिवासियों का शोषण करेंगे। शर्मा जी ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध भी कठोर रुख अपनाया। वह क्षेत्र शोषण और भ्रष्टाचार से तो कुछ बचा किन्तु विकास की कीमत पर। वह क्षेत्र लगातार पिछड़ता चला गया क्योंकि वह क्षेत्र एक अजायब घर सरीखे बाहरी दुनिया से अलग थलग पड़ गया। मेरे विचार में शर्मा जी की इमानदारी और भलमनसाहत भरी गलत नीति बस्तर का विकास रोकने का आधार बनी। आज भी बी डी शर्मा उस क्षेत्र में औद्योगिक विकास में भरसक बाधा पहुंचाते ही हैं। इस स्थिति का लाभ उठाकर उस क्षेत्र में ‘नक्सलवाद आया।‘

शर्मा जी के विषय में यह कहावत प्रचलित है कि जिस क्षेत्र में शर्मा जी चले जायें वहां पीछे पीछे नक्सलवाद पहुंच ही जाता है जबकि शर्मा जी  की ऐसी कोई योजना नहीं होती। बस्तर के बाद सन् तिरान्नबे चैरान्नबे में शर्मा जी ने हमारे रामानुजगंज क्षेत्र में जड़ें जमानी शुरू कीं। वहां बंग जी के मार्गदर्शन में हम लोग ग्राम सभा सशक्तिकरण का प्रचार करते थे। हमारा नारा था कि हमें सुराज्य नहीं स्वराज्य चाहिये। शर्मा जी को लगा कि इस लोक स्वराज्य अभियान का पूरा संचालन गैर आदिवासी कर रहे हैं तथा इस आंदोलन में आदिवासी विकास की कोई योजना नहीं है। शर्मा जी को यह भी डर लगा कि इन प्रयत्नो से आदिवासियो का तीव्र विकाश होकर आदिवासी गैर आदिवासी का भेद ही  मिट जायगा।  उनकी सलाह पर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी ने मुझे और हमारी पूरी टीम को नक्सलवादी घोषित कर दिया। बंग जी अमरनाथ भाई आदि गांधीवादियों ने बहुत समझाया पर ये नहीं माने। उस समय तक सरगुजा में नक्सलवाद नहीं आया था। मैं पहला नक्सलवादी घोषित हुआ। अमानवीय अत्याचार हुए। सर्वोदय की ही एक टीम मुख्यमंत्री के साथ जा मिली जिसका नेतृत्व रामचन्द्र जी राही के पास था। हम न्यायालय से जीत गये। ब्रम्हदेव जी शर्मा इस बीच मजबूत हुए और कहावत के अनुसार दो हजार दो में हमारा पूरा क्षेत्र नक्सलवादी हो गया। बस्तर क्षेत्र के समान ही इस क्षेत्र में भी नक्सलवादियों की सरकार बन गई। स्वतंत्रता दिवस को सरकारी स्कूलों में नक्सलवादी झंडे फहरने लगे। जन अदालतों में हजारों आदमी जुटने लगे जहां पूरी भीड़ के सामने पीट पीट कर हत्याएं होने लगी। ब्रम्हदेव शर्मा का सारा अहिंसक ताना बाना नक्सलवाद में बदल गया। हमें भी पहली बार आभास हुआ कि नक्सलवाद कहीं भी व्यवस्था परिवर्तन नहीं है। यह तो शुद्ध अराजकता वाद जिसके गर्भ में सत्ता संघर्ष है। मैंने नक्सलवादी नेताओं को सलाह दी कि आप अपनी सरकार अहिंसक जनमत खड़ा करके चलाइये। यदि पुलिस या सरकार का अत्याचार होगा तो हम आपका साथ देंगे। किन्तु ये नहीं माने। नतीजा हुआ कि हम लोगों ने नक्सलवादियों की हिंसक गतिविधियों का विरोध किया और पुलिस ने चुन चुन कर उनके सभी प्रमुख नेताओं की हत्या कर दी।

प्रश्न उठता है कि नक्सलवाद नियंत्रित या नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में पहले तेज विकास हो या पहले नक्सल मुक्ति हो। भ्रष्टाचार राष्ट्रव्यापी समस्या है। सबसे पहले एक छोटे से क्षेत्र का भ्रष्टाचार रूके यह संभव नहीं क्योंकि पूरी की पूरी राजनैतिक प्रशासनिक व्यवस्था भ्रष्ट है तो रोकेगा कौन? क्या भ्रष्टाचार के बहाने अराजकता को छूट देना उचित है? मेरे विचार में नहीं। अब तो या तो ममता दीदी के मार्ग पर पहले नक्सलवाद से निपट लें तब विकास की बात करें या कलेक्टर एलेक्स पाल की योजना अनुसार पहले विकास हो तब नक्सल मुक्ति। मुझे लगता है कि पहले विकास की बात अर्थहीन है क्योंकि नक्सल नियंत्रित क्षेत्र में विकास कौन करेगा तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी विकास का श्रेय सरकार को जायेगा या नक्सलवादियों को। सरकारी धन में भ्रष्टाचार होगा ही और भ्रष्टाचार का भारी धन नक्सलवादियों के पास जायेगा ही। क्या नक्सल प्रभावित क्षेत्र में नक्सल मुक्ति से पूर्व विकास की गंगा बहाने की सलाह का कोई औचित्य है? बेसिर पैर की सलाह देने वाले की क्षमता या नीयत पर शक पैदा होता है। कलेक्टर मेनन ने जमीनी हकीकत को समझे बिना विकास का जो मार्ग पकडा उसने बहुत नुकसान किया है। सरकार को भी एक हीं मार्ग पकडना होगा कि नक्सल मुक्त क्षेत्र का तीव्र विकास होगा और नकसल प्रभावित क्षेत्रों का द्वितीय प्राथमिकता पर। नक्सल नियंत्रित क्षेत्र में तो किसी विकाश की तब तक बात नहीं हो सकती जब तक पहले वह क्षेत्र सरकारी नियंत्रण में न आ जावे। यदि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के ठीक सटे नक्सल मुक्त क्षेत्र का बहुत तेज विकास होगा तो स्वभाविक है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्र भी इस दिषा में सोचना शुरू कर दे।

भारत सरकार ने बहुत विचार करने के बाद एक लाईन पकडी है। छत्तीसगढ़ सरकार से भी तालमेल है। छत्तीसगढ़ का मीडिया जमीनी हकीकत समझ रहा है। बंबई और दिल्ली में बैठकर सलाह देना ठीक नहीं। यदि आप नक्सल समस्या का अध्ययन करना चाहते हैं तो आइये रामानुजगंज। वहां आपको नक्सलवाद पूर्व का भी अनुभव मिलेगा, ब्रम्हदेव शर्मा जी के संगठन का उतार-चढाव भी देखने को मिल जायेगा, नक्सलवादी शासन का भी और नक्सलवाद मुक्त शासन का भी। नक्सलवाद मुक्ति के बाद यहां जितना तेज विकास दिख रहा है वह अभूतपूर्व है। भ्रष्टाचार भी बडी मात्रा में है जिसे राष्ट्रीय समस्या मानकर समाधान के मार्ग तलाशे जा रहे हैं लेकिन जो लोग भ्रष्टाचार का हव्वा खडा करके विकास को ही अवरूद्ध करना चाहते हैं उनकी यहाँ कोई पूछ परख नहीं। यदि वास्तव में कोई नक्सलवाद पर अध्ययन और शोध करना चाहे तो रामानुजगंज क्षेत्र उसके लिये सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है। मेरे विचार में भारत में एक भी ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान कठिन हो। वास्तविक समस्या तो वे लोग हैं जो किसी समाधान पर सिर्फ प्रश्न  उठाने तक हीं सीमित हैं। उनके पास सुझाव तो होता नहीं। ऐसी बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। नक्सलवाद भी कोई गंभीर समस्या नहीं। पहले ऐसे तत्वों से मुक्ति मिल जाये। सारे देश में नक्सलवाद बढ रहा है सिर्फ रामानुजगंज क्षेत्र में हीं घट रहा हैं। उसका कारण न दैवी चमत्कार है न हीं कोई विशेष सरकारी प्रयत्न। हमने एक साफ लाईन पकडी है। पहले हमने लोकस्वराज्य की स्पष्ट लाईन ली। जिससे अहिंसक व्यवस्था परिवर्तन संभव हो। हमारा सरकार से टकराव हुआ। नक्सलवाद आया। जब नक्सलवाद की पोल खुली तो नक्सलवाद के विरूद्ध भी अभियान चला। खास राज की बात यह थी कि पूरी जनता एकजुट थी। जाति धर्म का भेद नहीं था। दिग्विजय सिंह, अग्निवेश सरीखे लोग अवांछनीय घोषित थे। ब्रम्हदेव शर्मा का पूरा सम्मान था किंतु उनकी सलाह बिना सुने हीं कूडेदान में डाल दी जाती थी। पुलिस विभाग को समाज का इतना विश्वास प्राप्त था कि वे यदि किसी नक्सलवादी को फर्जी मुठभेड में भी मार दे तो पूरी जनता उनका हीं साथ देगी। पेशेवर मानवाधिकारियों का इस क्षेत्र में प्रवेश हीं नहीं था। यह क्षेत्र भारत में अकेला वह स्थान है जहाँ ग्राम सभा सशक्तिकरण के अहिंसक गाँधीवादी तरीके से नक्सलवाद लगातार पीछे हटने को मजबूर हुआ। आज प्रसिद्ध गांधीवादी ठाकुरदास बंग स्वास्थ्य की कमजोरी और उम्र के कारण प्रत्यक्ष रूप से यहाँ नहीं आ पाते हैं किन्तु अविनाश भाई उनकी जगह कार्य को आगे बढा रहे हैं। मुझे विश्वास है कि पूरे भारत से नक्सलवाद मुक्ति का यही प्रयोग सफल हो सकता है।

कायरता की पटकथा पर माओवाद का मातम –संजय द्विवेदी

Posted By: Author on June 14, 2011 in Recent Topics - Comments: No Comments »

भारतीय राज्य की निर्ममता और बहादुरी के किस्से हमे दिल्ली के रामलीला मैदान मे देखने को मिले। यहां भारतीय राज्य अपने समूचे विद्रूप के साथ अहिंसक लोगो के दमन पर उतारू था । लेकिन देश का एक इलाका ऐसा भी है जहां इस बहादुर राज्य की कायरता की कथा लिखी जा रही है। यहां हमारे जवान रोज मारे जा रहे है और राज्य के हाथ बंधे हुए लगते हैं।

बात बस्तर की हो रही है, जहां गुरूवार की रात 9 जून 2011 को नक्सलियों ने 10 पुलिस वालो को मौत के घाट उतार दिया । ठीक कुछ दिन पहले 23 मई 2011 को वे एक एडीशनल एसपी समेत 11 पुलिसकर्मियो को छत्तीसगढ के गरियाबंद मे मौत के घाट उतार देते है। गोली मारने के बाद शवो को क्षत  विक्षत कर देते है। बहुत वीभत्स नजारा है। माओवाद की ऐसी सौगातें छत्तीसगढ मे आम हो गई है। बाबा रामदेव के पीछे पडे हमारे गृहमंत्री पी0 चिदंबरम और केंद्रीय सरकार के बहादुर मंत्री क्या नक्सलवादियों की तरफ भी रूख करेंगें१

भारतीय राज्य के द्वारा पैदा किए गए भ्रम का सबसे ज्यादा फायदा नक्सली उठा रहे है। उनका खूनी खेल नित नये क्षेत्रो मे विस्तार कर रहा है। निरंतर अपना क्षेत्र विस्तार कर रहे नक्सल संगठन हमारे राज्य को निरंतर चुनौती देते हुए आगे बढ़ रहे है। उनका निशाना दिल्ली है। 2050 मे भारतीय राज्य सत्ता पर कब्जे का उनका दुस्वप्न बहुत प्रकट है किन्तु जाने क्यो हमारी सरकारें इस अधोशित युद्ध के समक्ष अत्यंत विनीत नजर आती है। एक बडी सोची समक्षी साजिश के तहत नक्सलवाद को एक विचार के साथ जोड कर विचारधारा बताया जा रहा है। क्या आतंक का भी कोई वाद हो सकता है क्या रक्त बहाने की भी कोई विचारधारा हो सकती है राक्षसी आतंक का दमन और उसका समूल नाश ही इसका उत्तर है । किन्तु हमारी सरकारो मे बैठे कुछ राजनेता, नौकरशाह, मीडिया कर्मी, बुद्धिजीवी और जनसंगठनो के लोग नक्सलवाद को लेकर समाज को भ्रमित करने मे सफल हो रहे है। गोली का जबाब, गोली से देना गलत है- ऐसा कहना सरल है किन्तु ऐसी स्थितियों मे रहते हुए सहज जीवन जीना भी कठिन है। एक विचार ने जब आपके गणतंत्र के खिलाफ युद्ध छेड रखा है तो क्या आप उसे शान्ति प्रवचन ही देते रहेंगे । आप उनसे संवाद की अपीलें करते रहेंगें और बातचीत के लिये तैयार हो जायेगे। जबकि सामने वाला पक्ष इस भ्रम का फायदा उठाकर निरंतर नई शक्ति अर्जित कर रहा है।

देश को तोडने और आम आदमी की लडाई लडने के नाम पर हमारे जनतंत्र को बदनाम करने मे लगी ये ताकतें व्यवस्था से आम आदमी का भरोसा उठाना चाहती है। अफसोस, व्यवस्था के नियम इस सत्य को नही समझ रहे है। वे तो बस शान्ति प्रवचन करते हुए लोकतंत्र की कायरता के प्रतीक बन गये है। अपने भूगोल और अपने नागरिको की रक्षा का धर्म हमे लोकतंत्र ही सिखाता है। निरंतर मारे जा रहे आदिवासी समाज के लोग और हमारे पुलिस और सुरक्षा बलों के जवान आखिर हमारी पीडा का कारण क्यो नही है१ जब भारतीय राज्य को अपनी कायरता की ही पटकथा लिखनी है तो क्या कारण है कि अपने जवानो के जंगलो मे ढकेल रखा है१ इन इलाको से सुरक्षा बलो को वापस बुलाइये क्योकि वे ही नक्सलियो के सबसे बडे शत्रु है। नक्सलियो के निशाने पर आम आदमी, पुलिस व सुरक्षाबलो के जवान है। शेष सरकारी अमले से उनका कोई संघर्ष नही दिखता । वे सबसे लेवी वसूलते हुए जंगल मे मंगल कर रहे है और एक न पूरा होने वाला स्वपन देख रहे है । किन्तु जिस राज्य पर उनके स्वप्न भंग की जिम्मेदारी है१ वह क्या कर रहा है।

विचारधारा के आधार पर बटे देश मे यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे सवालो पर भी हम एक आम सहमति नही बना पा रहे है। प्लीज, अब इसे लोकतंत्र का सौदर्य या विशेषता न कहिये। क्योकि जहां  हमारे लोग मारे जा रहे हो वहां भी हम असहमति के सौदर्य पर मुग्ध है तो यह चिंतन बेहद अमानवीय है। हिंसा का कोई भी रूप, वह वैचारिक रूप से कही से भी प्रेरणा पाता हो, आदर योग्य नही हो सकता। यह हिंसा के खिलाफ हमारी सामूहिक सोच बनाने का समय है। आतंकवाद के विविध रूपो से जूझता भारत और अपने अपने आतंक को सैद्धान्तिक जामा व वैचारिक कवच पहनाने मे लगे बुद्धिजीवी इस देश के लिये सबसे बडा खतरा है।

आदिवासी समाज को निकट से जानने वाले जानते है कि  यह  दुनिया का सबसे निर्दोष समाज है। ऐसे समाज की पीडा को देखकर भी न जाने कैसे हम चुप रह जाते है। पर यह तय मानिये कि इस बेहद अहिंसक, प्राकृति पूजक समाज के खिलाफ चल रहा नक्सलवाद अभियान एक मानवताविरोधी अभियान भी है। हमे किसी भी रूप मे इस सवाल पर किन्तु परन्तु जैसे शव्दों के माध्यम से बाजीगरी दिखाने का प्रयास नही करना चाहिये। भारत की भूमि के वास्तविक पुत्र आदिवासी ही है, कोई विदेशी विचार उन्हे मिटाने  मे सफल नही हो सकता। उनके शान्त जीवन मे बंदूको का खलल, बारूदो की गंध हटाने का यही सही समय है । केन्द्र और राज्य सरकारो मे समन्वय और स्पष्ट नीति के अभाव ने इस संकट को और गहरा किया है। राजनीति की अपनी चाल और प्रकृति होती है। किन्तु बस्तर से आ रहे संदेश यह कह रहे है कि भारतीय लोकतंत्र यहां एक कठिन लडाई लड रहा है उसका सबसे बडा सवाल यह है कि क्या हमारी सरकारो और राजनीति की प्राथमिकता मे आदिवासी कहीं आते है। क्योकि आदिवासियों की अस्मिता के इस ज्वलंत प्रश्न पर आदिवासियों को छोडकर सब लोग बात कर रहे है, इस कोलाहल मे आदिवासियों के मौन को पढने का साहस क्या हमारे पास है१

समीक्षा- बजरंग मुनि द्वारा

मैं आपके लेख की मूल भावना से पूरी तरह सहमत हूं । किन्तु बाबा रामदेव का चार जून का रामलीला मैदान का अनशन और बस्तर के आतंकवाद की तुलना नही हो सकती। यह अनशन एक अस्पष्ट मुद्दे  पर किया गया आंदोलन था जबकि नक्सलवाद एक सुनियोजित हिंसक सत्ता संघर्ष। मै सहमत हूं कि रामलीला मैदान के अनशन की अपेक्षा बस्तर की समस्या कई गुना अधिक चिन्ताजनक है किन्तु यदि किसी कारण वश बस्तर मे कायरता दिखानी पड रही है तो दिल्ली को भी अव्यवस्था मे झोंक दिया जाय यह ठीक नहीं।बाबा रामदेव  जिस काले धन के लिये निर्णायक संघर्ष पर उतारू थे  उन्ही  बाबा रामदेव ने बस्तर मुक्ति को मुद्दा बनाकर अनशन क्यों नहीं किया। क्या बस्तर भारत का  अंग नहीं१ क्या बस्तर की समस्या काले धन की अपेक्षा कई गुना ज्यादा गंभीर नहीं१

बस्तर के आतंक की पटकथा मे अब तक दो पात्रो के बीच के सत्ता संघर्ष की गंध आ रही है जिसमें एक ओर है मनमोहन सिंह सरकार और दूसरी तरफ है मनमोहन सिंह को येन केन प्रकारेण असफल अयोग्य  सिद्ध करके राहुल गांधी को बिठाने की जल्दबाजी। मनमोहन सिंह का हर कदम सुनियोजित तथा लोक तांत्रिक है तो राहुल की टीम का बचकाना तथा घातक । मेरे पास कोई स्पष्ट जानकारी तो है ही नही किन्तु जिस तरह राष्ट्रीय सलाहकार परिशद को प्रोत्साहित किया जा रहा है अथवा दिग्विजय सिंह को छुट्टा सांड़ के समान कहीं भी मुंह मारने की छूट दी गई है वह संदेह तो पैदा करती ही है कि मनमोहन सिंह  जी को बदनाम करने की सुनियोजित चालें चली जा रही है । इन चालों मे सोनिया जी शामिल हो भी सकती है और शायद न भी हों। राहुल गांधी तो अभी नौसिखिया हैं । हो सकता है कि वह सत्ता के लोभ मे न पडकर वास्तव मे मनमोहन सिंह को गलत मानने लगा हो। बात चाहे जो हो किन्तु खतरनाक है। अभी तेा बस्तर क मामला कठिन होते हुए भी  हाथ से बाहर नही गया है किन्तु उस दिशा मे जा जरूर रहा है । भारतीय जनता पांर्टी तो अब केन्द्र मे अस्तित्व  ही खो रही है। इसलिये अब तो आप जैसे जागरूक लोगों को ही आगे आना चाहिये। साथ देने मे तो हम सब है ही।

यह मामला किसी भी रूप मे आदिवासी गैर आदिवासी का नही है। फिर भी यदि मामले को अधिक हाईलाइट करने के लिये आदिवासी शव्द शामिल  किया गया है तो कोई गलत नहीं । यह सच है कि बस्तर के युद्ध क्षेत्र बनने से वहां जिन लोगो को सबसे ज्यादा परेशानी होगी वे गरीब भी है ग्रामीण भी और सम्वैधानिक भाषा मे आदिवासी भी।अतः इस मामले को हर तरह से सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिये। मेरा तो मत है  कि भविश्य मे नक्सलवादियो के द्वारा की गई हत्याओ के शिकार मृतको के शव राहुल गांधी की टीम अथवा विशेषकर  दिग्विजय सिंह के पास भेज दिये जाने चाहिये। शायद इनकी आत्मा जगे और ये राजनीति से उपर उठकर राष्ट्र और समाज के विषय मे भी सोचना शुरू करें।

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