Lets change India
जालसाजी धोखाधडी–बजरंग मुनि
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
सामयिकी–बजरंग मुनि
जो काम जान बूझकर बुरी नीयत से किये जाये वही अपराध होते है, अन्य नही । यदि पूरे भारत की कुल आबादी का आकलन करे तो अपराधियो की संख्या एक प्रतिशत से भी कम हो सकती है। इसमे भी हिंसा और मिलावट या जालसा...
सामयिकी– कसडोल छत्तीसगढ की एक घटना के अनुसार–बजरंग मुनि
पति की प्रताडना से परेशान होकर शादीशुदा बेटी घर बैठी है। उसे ससुराल मे जलाने की कोशिश हुई तो मामला पुलिस तक और फिर कोर्ट कचहरी तक जा पहॅुचा । इसी से नाराज होकर समाज ने विवाहिता के पूरे परिवार ...
सामयिकी–बजरंग मुनि
मै एक आस्थावान हिन्दू हॅू और गांधी को स्वामी दयानंद के बाद का सर्वश्रेष्ठ महापुरूष मानता हॅू। मेरा सर्वोदय और संघ परिवार से निकट का संबंध है यद्यपि दोनो एक दूसरे के शत्रुवत है। कुछ मुददो पर ...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट–बजरंग मुनि
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
सामयिकी-बजरंग मुनि
जब कोई भौतिक पहचान ही किसी की योग्यता और श्रद्धा का मापदंड बन जाती है तब धूर्त और अपराधी उस भौतिक पहचान का सहारा लेकर अपने को आगे बढाते है। यही स्थिति राजनीति मे खादी की हुई तो धर्म मे सन्यासी ...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
सामयिकी
मै न्यायिक सक्रियता के विरूद्ध रहा हॅू। साथ साथ मै विधायिका की अति सक्रियता के भी विरूद्ध रहा हॅू। विधायिका की अति सक्रियता से परेशान न्यायपालिका ने संवैधानिक तरीके से जनहित याचिकाओ की अनु...
सामयिकी-बजरंग मुनि
निर्भया कांड के समय संभवतः मै भारत का अकेला व्यक्ति था जिसने बलात्कार के लिये कडे कानून को और कडा करने का खुला विरोध किया था। यहां तक कि मैने जस्टिस वर्मा आयोग...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?-बजरंग मुनि
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...

नक्सलवाद और उसकी पहचान

Posted By: admin on May 6, 2010 in Uncategorized - Comments: No Comments »

मैने पाया है कि नक्सलवाद किसी भी रूप में व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं है। सच बात यह है कि नक्सलवाद पूरी तरह सत्ता संघर्ष है। समीक्षक बजरंग मुनि

आज पूरा देष नक्सलवाद से चिंतित है। मैं विकसित भारत के जिन क्षेत्रों में जाता हू वहाँ के श्रोता बड़ी उत्सुकता से मुझसे पूछते हैं कि नक्सलवाद क्या है ? ये लोग कैसे दिखाई देते हैं? आप उस क्षेत्र में किस तरह रहते हैं? आदि- आदि।  पूरी भारत सरकार भी नक्सलवाद को भारत की पहली समस्या घोशित करके समाधान की लम्बी चैड़ी तैयारी कर रही है। बैठकें पर बैठकें और रोज नई-नई घोशणाऐं हो रही हैं। आज ही केन्द्रीय गृहमंत्री चिन्दम्बरम जी नें कहा है कि फरवरी से नक्सलवाद नियन्त्रण अभियान प्रारम्भ हो सकता है। इसकी षुरूआत छत्तीसगढ़ के सरगुजा और बस्तर क्षेत्र से होगी। विदित हो कि सरगुजा जिले का जो भाग नक्सलवाद प्रभावित है वह रामानुजगंज क्षेत्र है और सौभाग्य से मैं वहीं का निवासी होने से इस संपूर्ण महासंग्राम का प्रत्यक्षदर्षी भी हूॅ। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमणसिंह जी ने भी  कहा है कि नक्सलियों को खदेडने के बाद इस मुक्त क्षेत्र का तीव्र विकास भी किया जायगा। दूसरी ओर नक्सलवादियों ने भी चुनौती स्वीकार करने का मन बना लिया हैै। उनकी भी योजना है कि वे अभियान षुरू होते ही इस क्षेत्र को छोड़ कर चले जायेगें । उनके समर्थक यहाॅ समाज में असंतोश बढ़ाने का काम भिन्न नामों और रूपो में करते रहेगे। एक वर्श के पूर्व ही केन्द्र का भारी भरकम अभियान दम तोड़ देगा और नक्सलवाद और अधिक सक्रियता और षक्ति से स्थापित हो जायेगा । क्या होगा यह पता नही किन्तु इतना अवष्य होगा कि मेरा गृह क्षेत्र रामानुजगंज इस राश्ट्रीय युद्ध का रणक्षेत्र बनेगा जिसके अच्छे और बुरे परिणाम यहा के लोगों को स्वीकार करने ही होगें ।
मै स्वयं भी दोनों के संघर्श की पृश्ठ भूमि को नजदीक से देखता रहता हूँ। यहाॅ तक कि मैने सत्ता के उच्च पदो पर रहकर भी अपने इस क्षेत्र की व्यवस्था को देखा है और नक्सलवादियों के निकट संपर्क से भी । एक ओर तो नक्सलवादी हिंसा का मुखर विरोधी होने के कारण नक्सलवादियों ने मुझे अपना प्रमुख विरोधी मान रखा था तो दूसरी ओर सरकार ने मुझे नक्सलवादी घोशित करके मुझपर सन् छियान्नवें में न्यायालय में आरोप भी लगाया था जो मैने उच्च न्यायालय तक लड़कर मुक्ति पायी । मैने दोनो ओर के आक्रमण झेलकर नक्सलवाद को समझा है। मैने पाया है कि नक्सलवाद किसी भी रूप में व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं है। सच बात यह है कि नक्सलवाद पूरी तरह सत्ता संघर्श मात्र है। स्वतंत्रता के समय भारत के राजनेताओं के एक गुट ने गांधी की और दूसरे गुट ने गांधी के ग्राम स्वराज्य की नीतियों की हत्या करके समाज को गुलाम बना लिया था । इन लोगों ने मिलजुल कर समाज पर एक ऐसा संविधान थोप दिया जिसमें लोकतंत्र के नाम पर अनन्त काल तक समाज को गुलाम बनाकर रखने के सभी उपकरण मौजूद है। वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था येन केन प्रकारेण इस लोक तंत्र को सुरक्षित रखना चाहती है और नक्सलवादी इस लोक तंत्र को उखाड़ फेककर अपनी नई व्यवस्था स्थापित करना चाहते है। दोनो के बीच में संघर्श का प्रतीक बना है भारतीय संविधान । वही संविधान जिसके नाम पर पिछले साठ वर्शो से भारतीय समाज व्यवस्था को गुलाम बनाकर रखा जा रहा है। तथा कोई भी लोकतंत्र वादी यह बताने के लिये तैयार नही कि समाज को राजनैतिक गुलामी से कब और कैसे मुक्ति मिलेगी । वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के दलाल इस व्यवस्था से लाभ उठा उठा कर बदले में इसका गुणगान करते हुये इस अतिवादी प्रषंसा तक चले जाते है कि भारत का वर्तमान संविधान दुनिया का सबसे अच्छा संविधान है या भारत दुनियाॅ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। अनेक साहित्यकार या समाज सेवी तो षतप्रतिषत मतदान या मतदाताजागरण अभियान आदि के नाटको द्वारा वर्तमान व्यवस्था कि दलाली करते मिल जाया करते है और अब तो कुछ धर्मगुरू तक इस चापलूसी में षामिल हो गये है जो स्वभाविक भी है क्योकि वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था ने ही तो उन्हें इस तरह बिना मेहनत के ही उच्च सुविधाएॅ संग्रह करने की छूट दी है।
सम्पन्नता सुविधा और अधिकारों की इस संवैधानिक लूट का स्वामित्व अपने हाथ में लेने का हिसंक प्रयास ही नक्सलवाद है। विभिन्न राजनैतिक दल तोकतंत्र की दुहाई देकर संवैधानिक तरीके से इस लूट के स्वामित्व पर कब्जा बनाये रखना चाहते है, तो दूसरी ओर अनेक दुसाहसी इस प्रयास में स्वयं को असमर्थ पाकर लोक तंत्र संविधान आदि का विरोध करके इस स्वामित्व को प्राप्त करना चाहते है और इस सफलता के लिये हिंसा ही सबसे अच्छा समाधान दिखता है।

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