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भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
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मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
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मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान-बजरंग मुनि
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं- (1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...

भारत की समस्याएँ और संघ

Posted By: admin on May 6, 2010 in Recent Topics - Comments: No Comments »

भारत मंे भौतिक उन्नति सामान्य रूप से हो भी रही है और दिख भी रही है किन्तु समाज व्यवस्था लगातार कमजोर हो रही है। ग्यारह समस्याएँ ‘‘(1) चोरी डकैती, (2) बलात्कार, (3) मिलावट, (4) जालसाजी, (5) हिंसा आतंकवाद, (6) भ्रष्टाचार, (7) चरित्र पतन, (8) साम्प्रदायिकता, (9) जातीय कटुता (10) आर्थिक असमानता (11) श्रम शोषण‘‘ लगातार बढ़ती ही जा रही हैं और भविष्य मंे भी इनका कोई समाधान नहीं दिख रहा। इसके विस्तार के कारणांे पर गंभीर विचार मंथन हमारे चिन्तन का मुख्य विषय है।

भारत मंे अनेक संगठन धार्मिक हैं और अनेक राजनैतिक। सामाजिक संगठन भी बहुत अधिक हैं जो चरित्र निर्माण के असामयिक प्रयत्नांे मंे लगे हुए हैं। एकमात्र संघ ही ऐसा संगठन है जिसमंे समाज की चिन्ता करने वाले लोगांे का भारी मात्रा मंे समावेश हुआ। संघ के प्रति आम भारतीयांे की आशाएँ भी जगीं ओर विश्वास भी। स्वतंत्रता के पूर्व संघ ने इस्लाम को समाज का सबसे बड़ा खतरा मानकर स्वयं को इस्लाम के विरूद्ध केन्द्रित किया। संघ ने राजनीति से दूर रहकर राजनीति पर नियंत्रण का भरपूर प्रयास किया।

स्वतंत्रता के बाद संघ ने अपनी राणनीति बदली। उसने अपनी राजनीति से दूर रहने की नीति को छोड़कर राजनीति मंे सक्रिय होने की नीति प्रारंभ करी दी और इस कार्य के लिये भी इस्लाम विरोध को मुख्य आधारी घोषित कर दिया। इसके पूर्व इस्लाम पर अंकुश लगाना संघ का लक्ष्य था किन्तु इसके बाद संघ सत्ता संघर्ष के लिये इस्लाम विरोध को मार्ग के रूप मंे उपयोग करने लगा। सत्ता के स्वाद की कल्पना करते रहने से संघ  मंे    नये तरह की सक्रियता आई जिसमंे समाज चिन्तक गौण और सत्ता के खिलाड़ी मुख्या होने लगे। इस्लाम मंे तो धर्म के सांगठनिक स्वरूप का हस्तक्षेप राजनीति मंे सदा ही होता रहा है किन्तु भारतीय संस्कृति मंे धर्म के गुणात्मक स्वरूप का ही राजनीति मंे समावेश हुआ है, सांगठनिक स्वरूप का नहीं। कभी ऐसा नहीं हुआ जब किसी शंकराचार्य या किसी अन्य धर्म प्रमुख ने राजकाज मंे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया हो। स्वतंत्रता के बाद आर्य समाज ने स्वयं को पूरी तरह दूर कर लिया। किन्तु संघ अपना राजनीति का लोभ संवरण नहीं कर सका। संघ के सम्पूर्ण सामाजिक जीवन की यह सबसे अधिक गंभीर भूल थी कि उसने राजनीति मंे अप्रत्यक्ष रूप से कूदने का निर्णय लिया।

परिणाम जो होना था वही हुआ। कंाग्रेस पार्टी से उसकी प्रतिद्वंद्विता हुई। कांग्रेस को सत्ता के लिये किसी विशेष चरित्र की आवश्यकता नहीं थी क्यांेकि स्वंतत्रता संघष और गांधी जी का नाम ही उसके लिये पर्याप्त था  किन्तु संघ को तो इस्लाम विरोध के नाम पर नया ध्रुवीकरण करना था इसलिये उसकी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को न चाहते हुए भी इस्लाम के समर्थन मंे आना पड़ा। ज्यों ज्यांे संघ की ताकत बढ़ी त्यांे त्यांे अन्य दलांे का भी कांग्रेस और इस्लाम से गठजोड़ होता गया और राजनीति मंे सत्तावन वर्ष बीतते संघ के विरूद्ध सब लोग एकजुट हो गये। संघ राजनीति मंे इस्लाम विरोध के साथ साथ और दलों की अपेक्षा चरित्र का अधिक पक्षकार रहा जिसके परिणाम स्वरूप  चरित्र विरोधियांे का भी जमावाड़ा संघ विरोधियांे के पास इकट्ठा होने लगा। सत्ता संघर्ष मंे सफलता की जल्दी मंे संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा ने चरित्र से कुछ कुछ समझौता किया और यहीं से चरित्र पतन का मार्ग और स्पष्ट हो गया। अब राजनीति मंे चरित्र की बात करने वाला कोई भी दल नहीं था। जो ऐसे व्यक्ति थे वे भी धीरे धीरे कमजोर होने लगे।

भारतीय राजनीति मंे स्पष्ट ध्रुवीकरण हुआ जिसमंे एक ओंर इस्लाम विरोधी तथा चरित्र की चिन्ता करने वाले इकट्ठे हुए और दूसरी ओर इस्लाम समर्थक तथा चरित्र की चिन्ता न करने वाले लोग रहे। इस्लाम का समर्थन कांग्रेस की इच्छा न होकर राजनैतिक मजबूरी थी और चिरत्र पतन मंे समझौता संघ की इच्छा न होकर राजनैतिक मजबूरी रही। दोनांे ने सत्ता के लोभ मंे नीतियांे को छोड़ना स्वीकार कर लिया।

संघ ने सत्ता की हड़बड़ी मंे चिन्तन को भी पूरी तरह छोड़ दिया। इनमंे शिविरांे मंे तथा सर्वोच्च कोर ग्रुप की बैठकांे मंे भी नीतियांे की समीक्षा न करके कार्यक्रमांे की समीक्षा होने लगी। आर्थिक नीति कभी बनी ही नहीं। समाज मंे हिंसा को प्रोत्साहन देने की स्वतंत्रता की बाद भारत मंे लोकतंत्र है और लोकतंत्र मंे हिंसा का कोई स्थान नहीं होता है। यदि कोई दल हिंसा का प्रत्यक्ष या परोक्ष भी समर्थन करता है तो यह पूरा पूरा संदेह होता है कि वह तानाशाही की दिशा मंे सोच रहा है। इसी तरह संघ अंध इस्लाम विरोध से इतना अधिक चपेट गया कि उसे समाज समाज की अन्य दस समस्याआंे की चिन्ता ही नहीं रही। परिणाम हुआ कि नमाज तो छूटी नहीं रोजा और गले पड़ गया। अर्थात् इस्लाम पर अंकुश मंे तो सफलता मिली नहीं, उल्टा चरित्र पतन आतंकवाद भ्रष्टाचार अपराधीकरण आदि समस्याआंे का और अधिक विस्तार हो गया। आज भारत  मंे सामाजिक हिंसा का स्तर जितना बढ़ा हुआ है उसमंे संघ की भूमिका किसी भी रूप से अन्य दलांे से अलग नहीं है। अन्य दलांे की इससे कोई बदनामी नहीं होती क्यांेकि अन्य दलांे ने अपनी पहचान के साथ चरित्र को कहीं जोड़ा ही नहीं है किन्तु यदि चरित्र पतन और इस्लाम का विस्तार होता है तो संघ को उसमंे अपनी असफलता स्वीकार करनी चाहिये।

वर्तमान मंे भारत मंे कांग्रेस और भाजपा ही ऐसे दल हैं जिनमंे चरित्र की आंशिक चर्चा होती है। अन्य सभी दल तो पूरी तरह चरित्र प्रुफ हैं। कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी है। परिणाम स्वरूप चरित्र प्रुफ दलांे से समझौते करने और यहाॅ तक कि खुशामद करने तक को मजबूर हैं। संघ प्रमुख जैसी हस्ती कुछ वर्ष पूर्व के घोषित मियाॅ मुलायम के घर जाकर उनसे राजनैतिक चर्चा करे यह घटना मजबूरी को बिल्कुल स्पष्ट करती है। समाज के सामने तो कोई और विकल्प नहीं है। वह तो संघ का समर्थन करने को मजबूर है और संघ का हाल यह है कि सत्ता के मोह मंे उसने अपनी सारी लाज शर्म छोड़कर भाजपा को अपना लिया है। सत्ता लोलुपता के समक्ष संघ न समाज की चिन्ता कर रहा है न नीतियांे की।

पिछले दिनांे वाराणसी मंे नीतियांे पर गंभीर विचार मंथन हुआ। उम्मीद थी कि संघ स्वयं दलगत राजनीति से पृथक हो कर राजनीति और समाज के बीच मध्यस्थ के रूप मंे सामने आयेगा किन्तु समाज को उनके निर्णय से घोर निराशा हुई जब संघ ने भाजपा को परोक्ष समर्थन के स्थान पर प्रत्यक्ष नियंत्रण का नीतिगत निर्णय लिया। भाजपा मंे गुटबन्दी दूर होने का उसे लाभ मिलेगा। अब भाजपा कांग्रेस को कमजोर करके स्वयं को मजबूत कर सकेगी। सत्ता से संघ की और निकटता बढ़ेगी। भाजपा मंे धीरे-धीरे चरित्र की मात्रा सुधरेगी और संघ मंे धीरे – धीरे चरित्र की मात्रा घटेगी। अन्य दलांे को अब और अधिक सुविधा हो जायेगी। अब कांग्रेस और भाजपा ऐसे दलों के सिद्धान्त , व्यवहार और आचरण की और अधिक अनदेखी करके उनसे समझौते करेंगे, उनकी चापलूसी करेंगे। समाज की रही सही आशा भी टूट जायगी।

इतने वर्षो बाद होनी वाली संघ की नीतिगत चर्चा मंे भी समाज चिन्तकांे पर सत्ता चिन्तक भारी पड़ेे। वहाँ तो विचार का मुददा यह बन गया कि संघ भाजपा से दूर हटकर किसी नये दल की रचना करे या भाजपा को ही पुनर्जीवित करे। दोनो ही विचार सत्ता से ही जुड़े हुए थे। प्रश्न उठता है कि समाज की चिन्ता कौन करेगा ? क्या भारत के नागरिकांे को भविष्य मंे भी इसी तरह चरित्र पतन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और अपराधीकरण की वृद्धि को बरदाश्त करना होगा? क्या ऐसा संभव नहीं है कि संघ अल्पकाल के लिये स्वयं को सत्ता संघर्ष से दूर रहकर राजनीति पर अंकुश की दिशा मंे सक्रिय कर ले। क्या यह नहीं हो सकता कि कांग्रेस और भाजपा को गुण दोष के आधार पर एक दूसरे का समर्थन या विरोध की नीति पर चलने को मजबूर कर दिया जावे? मुझे तो यह कार्य असंभव नहीं दिखता। अपराधीकरण और चरित्र पतन की तेज रफ्तार गाड़ी पर नियंत्रण संभव है और यह नियंत्रण तभी लग सकता है जब संघ के भीतर सत्ता लोलुप जमात पर समाज प्रधान जमात भारी पड़े। दो टूक और कठोर फैसले लेने होंगे। सत्ता मंे सुविधा भी है और आकर्षण भी किन्तु सुविधा और आकर्षण पर समाज की बली नहीं चढ़ाई जा सकती। अन्तिम रूप से सिद्ध हो चुका है कि सत्ता एक ऐसा खेल है जो कभी बन्द नहीं हो सकता। और इसका खामियाजा लगातार समाज को भोगना पड़ता है। बहुत हो चुका सत्ता की लुका छिपी का खेल। संघ के राजनीति निरपेक्ष लोगांे को पूरी बेशर्मी से खड़े होकर सत्ता लोलुपांें पर नियंत्रण करना होगा। संघ को इस्लाम विरोध तक सीमित न रहकर वर्तमान राजनैतिक पतन के विरूद्ध मोर्चा खोलना होगा। यदि संघ इस बात को नहीं समझा और भारत चरित्र पतन, भ्रष्टाचार, आंतकवाद और इस्लामिक कट्टरता का विस्तार हुआ तो इसका सारा दोष संघ की सत्ता लिप्सा अर्थात् एकमात्र संघ पर जायेगा। यदि संघ इस कलंक से बचना चाहता है तो उसके पास दो ही मार्ग हैं (1) संघ सत्ता संघर्ष से किनारे होकर राजनीति पर नियंत्रण का प्रयास करे, (2) संघ चरित्र की चर्चा का ढोंग बन्द करके स्वयं को धर्म और शुचिता के अग्रणी संरक्षक का दावा करना बन्द कर दे। यदि संघ की अन्य दलांे की तरह ही सुचिता से दूर हो जायगा तो उस पर कोई आरोप नहीं लगेगा। समाज कोई न कोई नया मार्ग खोज लेगा। अब भी समय है कि संघ भविष्य के संबंध मंे फिर से सोचकर कोई निर्णय करे।

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