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मंथन क्रमांक-122 ’’गांधी, मार्क्स ओर अम्बेडकर’’–बजरंग मुनि
गांधी, मार्क्स और अम्बेडकर की तुलना कठिन होते हुये भी बहुत प्रासंगिक है क्योंकि तीनों के लक्ष्य और कार्यप्रणाली अलग-अलग होते हुये भी वर्तमान भारत की राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था पर तीनों महाप...
मंथन क्रमांक-121 ’’राइट टू कंस्टीटयूशन’’–बजरंग मुनि
दुनियां की समाज व्यवस्था में व्यक्ति एक प्राकृतिक और प्राथमिक इकाई होता है तो समाज अमूर्त और अन्तिम। दुनियां के सभी व्यक्तियों के संयुक्त स्वरूप को समाज कहते हैं। समाज की एक व्यवस्था होती ...
मंथन क्रमांक-120 ’’संगठन कितनी आवश्यकता कितनी मजबूरी’’–बजरंग मुनि,
सामान्यतया संगठन और संस्था को एक सरीखा ही मान लिया जाता है किन्तु दोनो बिल्कुल अलग-अलग होते हैं। संगठन को अंग्रजी में आर्गेनाईजेशन कहते है और संस्था को इंस्टीटयूशन, यद्यपि दोनो के अर्थ कभी-क...
मंथन क्रमांक 119 ’’व्यक्ति, परिवार और समाज’’–बजरंग मुनि,
पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में व्यक्ति और सरकार को मिलाकर व्यवस्था बनती है। सरकार को ही समाज मान लिया जाता है। इस्लामिक व्यवस्था में परिवार और धर्म को मिलाकर व्यवस्था बनती है। साम्यवाद रा...
मंथन क्रमांक-118 ’’समान नागरिक संहिता’’–बजरंग मुनि
व्यक्ति और नागरिक एक ही होते हुये भी अलग-अलग भूमिकाओं में होते है। व्यक्ति सामाजिक भूमिका में होता है तो नागरिक संवैधानिक भूमिका में। व्यक्ति जब तक अकेला होता है तब तक वह व्यक्ति के रूप में हो...
मंथन क्रमाँक-117 ’’भारतीय राजनीति मे अच्छे लोग’’–बजरंग मुनि
समाज मे अच्छे शब्द की जो परिभाषा प्रचलित है उस परिभाषा मे भी राजनीति को कोई अच्छा स्थान प्राप्त नही हैं। राजनीति कभी भी न समाज सेवा का सर्वश्रेष्ठ आधार बनी न ही व्यवस्था परिर्वतन का। इसलिये ...
मंथन क्रमांकः116 “#मानवाधिकार”–बजरंग मुनि
1. व्यक्ति के अधिकार तीन प्रकार के होते है 1. प्राकृतिक अथवा मौलिक 2. संवैधानिक 3. सामाजिक। मौलिक अधिकारो को ही प्राकृतिक अथवा मानवाधिकार भी कहा जा सकता है; 2. मानवाधिकार सृष्टि के प्रारम्भ से लेक...
मंथन क्रमाँक-115 ’’ज्ञान, बुद्धि, श्रम और शिक्षा’’–बजरंग मुनि
1. ज्ञान और शिक्षा अलग-अलग होते है। ज्ञान स्वयं का अनुभवजन्य निष्कर्ष होता है तो शिक्षा किसी अन्य द्वारा प्राप्त होती है; 2. ज्ञान निरंतर घट रहा है और शिक्षा लगातार बढ रही है। स्वतंत्रता के बाद भ...
मंथन क्रमांक-114 ’’ईश्वर का अस्तित्व’’–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है- 1. ईश्वर है, किन्तु यदि नहीं भी हो तो एक ईश्वर मान लेना चाहिए; 2. ईश्वर और भगवान अलग-अलग होते है। धर्म दोनों को अलग-अलग मानता है और सम्प्रदाय एक कर देता है; 3. ईश्वर एक अदृश्य शक्ति के...
मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है; 2. दुनियां का प्रत्येक ...

राज ठाकरे और इतिहास के सबक

Posted By: admin on May 6, 2010 in Uncategorized - Comments: No Comments »

जब भी किसी तात्कालिक उद्देश्य के लिये आवंछित लोगों को आगे बढाया जाता है तब उसके घातक परिणाम स्वयं को ही भुगतने पडते है। स्वतन्त्रन्ता के पूर्व संघ परिवार मे गाधीं जी के विरूद्ध जो वातावरण बना था वह संघ परिवार के नियन्त्रण से बाहर हो गया । परिणाम स्वरूप संघ परिवार की कोई  योजना न होते हुए भी गांधी जी की हत्या हो गई।

अमेरिका ने रूस को अफगानिस्तान से बाहर करने के उद्देश्य से लादेन को सशक्त किया था। लादेन अमेरिका के नियन्त्रण से बाहर हुआ और परिणाम आप सबके सामने है। इंदिरा जी ने सिख राजनीति से परेशान होकर सन्त भिण्डरा वाले को खडा किया। परिणाम सबके सामने है। आपरेशन ब्लूस्टार भी करना पड़ा और इन्दिरा जी की जान भी चली गई। इसी तरह राजीव गांधी ने श्रीलंका को अस्थिर करने हेतु प्रभाकरण को पाल पोसकर बड़ा किया था । प्रभाकरण भी राजीव गांधी का काल बन गया । इतिहास ऐसी अनेक घटनाओ से भरा पड़ा है । भले ही हम इतिहास से कोई अनुभव न प्राप्त करें।

वर्तमान कांग्रेस पार्टी शिवसेना को किसी तरह कमजोर करना चाहती थी उसने फिर से उसी भूल का सहारा लिया । राज ठाकरे को काग्रेस ने जिन्दा किया । जब राज ठाकरे बाल ठाकरे को कमजोर कर रहे थे और शिव सेना का मुद्दा छीन रहे थे तब कांग्रेस पार्टी की प्रसन्नता देखते ही बनती थी। हर कांग्रेसी इसी कार्य को अपनी बहुत बड़ी कामयाबी समझ रहा था । अब राज ठाकरे कांग्रेस से हटकर अलगाव की भाषा बोलने लगे है। बाल ठाकरे और राज ठाकरे के बीच मराठी जन भावना को उभारने की प्रतिस्पर्धा इस सीमा तक चली जायेगी कि महाराष्ट्र को भारत से अलग होने तक की आवाज उठने लगे तब कांग्रेस पार्टी की चिन्ता बढ़ी है। बाल ठाकरे शरीर से भी बुढ़े हो गये है और प्रतिष्ठा से भी । संघ परिवार को भी कुछ अकल आ गई है किन्तु राज ठाकरे जवान भी है और उभरती हुई ताकत भी । कांग्रेस के समक्ष कुऑ और खाई की स्थिति बनती जा रही है। यदि राज ठाकरे थोड़ा भी और अधिक शक्तिशाली हुआ तो वह किसी भी सीमा तक जा सकता है। न कांग्रेस उसे रोक सकेगी न ही देश की और ताकत। ऐसी स्थिति भयावह होगी और उसका क्या परिणाम होगा यह अभी बताना सम्भव नही । किन्तु इतना अवश्य बताया जा सकता है  कि परिणाम न देश के हित मे होगा न ही कांग्रेस पार्टी के हित में।

महापुरूषो की इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिये कि तात्कालिक उद्देश्यों के लिये अवांछित तत्वों को प्रोत्साहन हमेशा कष्टकारक ही होते है।

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