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भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है 1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है। 2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं। 2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है ब...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान-बजरंग मुनि
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं- (1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...

लोक संसद का प्रारुप

Posted By: admin on November 11, 2012 in Recent Topics - Comments: No Comments »

प्रस्ताव

 

1. वर्तमान लोकसभा के समकक्ष एक लोकसंसद हो। लोकसंसद की सदस्य संख्या‚ चुनाव प्रणाली तथा समय सीमा वर्तमान लोक सभा के समान हो। चुनाव भी लोकसभा के साथ हो किन्तु चुनाव दलीय आधार पर न होकर निर्दलीय आधार पर हो।

 

2. लोक संसद के निम्न कार्य होगें,

 

क) लोकपाल समिति का चुनाव|

ख) संसद द्वारा प्रस्तावित संविधान संशोधन पर निर्णय|

ग) सांसद‚ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश़‚ मंत्री या राष्ट्रपति के वेतन भत्ते संबंधी प्रस्ताव पर विचार और निर्णय|

घ) किसी सांसद के विरुद्ध उसके निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत सरपंचो के बहुमत से प्रस्तावित अविश्वास प्रस्ताव पर विचार और निर्णय|

च) लोकपाल समिति के भ्रष्टाचार के विरुद्ध शिकायत का निर्णय|

छ) व्यक्ति‚ परिवार ग्राम सभा‚ जिला सभा‚ प्रदेश‚ सरकार तथा केन्द्र सरकार के आपसी संबंधो पर विचार और निर्णय|

ज) अन्य संवैधानिक इकाइयों के बीच किसी प्रकार के आपसी टकराव के न निपटने की स्थिति में विचार और निर्णय|

 

3. लोक सांसद को कोई वेतन भत्ता नहीं होगा। बैठक के समय भत्ता प्राप्त होगा।

 

4. लोक संसद का कोई कार्यालय या स्टाफ नहीं होगा। लोकपाल समिति का कार्यालय तथा स्टाफ ही पर्याप्त रहेगा।

 

5. यदि किसी प्रस्ताव पर लोकसंसद तथा लोक सभा के बीच अंतिम रुप से टकराव होता है तो उसका निर्णय जनमत संग्रह से होगा।

1. संविधान के मूल तत्व समाजशास्त्र का विषय है और समाजिक विचारकों को निष्कर्ष निकालना चाहिये। संविधान की भाषा राजनीतिशास्त्र का विषय है और राजनीतिज्ञ उसे भाषा दे सकता हैं।

 

2. भारतीय संविधान के मूल तत्व भी राजनेताओं ने ही तय किए और भाषा भी उन्होंने ही दी। संविधान के मूल तत्व तय करने में समाजशास्त्रियों की कोई भूमिका नहीं रही। या तो अधिवक्ता थे या आंदोलन से निकले राजनीतिज्ञ। संविधान निर्माण में गांधी तक को किनारे रखा गया जो राजनीति और समाजशास्त्र के समन्वय रुप थे। यही कारण था कि राजनेताओं ने संसद को प्रबंधन के स्थान पर अभिरक्षक‚ कस्टोडियन का स्वरुप दिया। यही नहीं‚ उन्होनें तो संसद के अभिरक्षक स्वरुप की कोई समय अवधि तय न करके देश के साथ भारी षड़यंत्र किया जिसका परिणाम हम आज भुगत रहें हैं।

 

3. देश के समाज शास्त्रियों को मिल-जुलकर संविधान के मूल तत्वों पर विचार मंथन करके कुछ निष्कर्ष निकालने चाहिये।

 

4. हमारे संविधान निर्माताओं ने पक्षपातपूर्वक राज्य को एकपक्षीय शक्तिशाली बना दिया। अब देश के समाजशास्त्रियों को मिलकर राज्य और समाज के अधिकारों की सीमाओं की पुनः व्याख्या का आंदोलन शुरू करना चाहिये।

 

5. भारतीय संविधान दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश के संविधान की अपेक्षा बहुत खराब है क्योकि‚

  •  (क) जब संसद संविधान के अनुसार ही कार्य करने को बाध्य है तो वही संसद संविधान संशोधन कैसे कर सकती है ।
  •  (ख) संविधान की उद्देशिका मे हम भारत के लोग ‘शब्द’ है। संविधान संशोधन में भारत के लोगो की प्रत्यक्ष स्वीकृति आवश्यक है। हम चुनावो मे जो संसद बनाते है वह संविधान के अंतर्गत व्यवस्था के लिये होती है न कि संविधान संशोधन की स्वीकृति। संविधान निर्माताओं ने घपला करके संसद को यह अधिकार लिख दिया।
  •  (ग) जिस संसद के अंतर्गत कार्यपालिका का नियंत्रण भी हो और विधायिका के संपूर्ण अधिकार भी उसी संसद के पास संविधान संशोधन का अधिकार प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
  •  (घ) भारतीय संविधान मे सांसद जन प्रतिनिधि होता है। उसे जनता की ओर से संसद मे अपनी बात रखने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। राजनैतिक दलो की मान्यता कानूनी है संवैधानिक नही। ऐसे संवैधानिक अधिकारो को किसी राजनैतिक दल द्वारा व्हिप जारी करके रोकना असंवैधानिक संविधान संशोधन है।
  •  (च) राजीव गांधी ने भारत की जनता को एक खतरनाक तोहफा दिया जो दल बदल कानून के रुप मे है। यह कलंक है।

 

लोक संसद बनाकर आंशिक रुप से संविधान संशोधन व्यवस्था को ठीक कर सकते है।

 

6. भारत में संविधान का शासन है। संविधान हमारी संसद के दाये हाथ मे ढाल है और बायी मुठी मे कैद है। हमारा पहला कार्य होना चाहिये कि संविधान रुपी संरक्षक को कैद से मुक्त कराया जाय। हमारी संसद एक ऐसा मंदिर है जिसमे हमारा भगवान कैद है। मंदिर का पुजारी भगवान को कैद मे रखकर उसका दुरुपयोग कर रहा है।

मार्कस, गांधी और अम्बेडकर- बजरंग मुनि

Posted By: admin on May 22, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

गांधी माकर्स और अम्बेडकर के बीच तुलनात्मक विवेचना कठिन कार्य है क्योकि गांधी की तुलना मे मार्कस और अम्बेडकर  कहीं नही ठहरते। तुलना के लिये आवश्यक है कि तीनो के लक्ष्य मे कुछ समानता हो भले ही मार्ग  भिन्न ही क्यो न हो। यहां  तो तीनो के लक्ष्य भी अलग अलग हैं और मार्ग भी । गांधी सामाजिक स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाकर चल रहे थे । गांधी के लक्ष्य मे कही भी सत्ता संघर्ष  नहीं था।  वे तो सत्ता मुक्ति के प्रयत्नों तक सीमित थे। मार्कस का लक्ष्य सत्ता परिवर्तन था । गांधी का  लक्ष्य अकेन्द्रीयकरण था तो मार्कस का केन्द्रीयकरण। अम्बेडकर का लक्ष्य तो और भी सीमित था। मार्कस सत्ता को समस्याओं का समाधान बताते थे किन्तु स्वयं  सत्ता संघर्ष  मे नहीं थे किन्तु अम्बेडकर स्वयं प्रारंभ से ही सत्ता की तिकडम करते रहे। मार्कस पूंजीवाद  को हटाकर धनहीनों की सत्ता चाहते थे तो अम्बेडकर समाज व्यवस्था का लाभ उठा रहे सवर्णो के लाभ मे अवर्ण बुद्धिजीवियों का हिस्सा मात्र चाहते थे। गांधी किसी भी प्रकार के वर्ग संघर्ष  के विरूद्ध थे तो मार्कस गरीब अमीर के बीच तथा अम्बेडकर सवर्ण अवर्ण के बीच संघर्ष के पक्षधर थे। गांधी वर्ग संघर्ष के परिणाम मे समाज टूटन विषरूपी परिणाम देखकर चिन्तित थे तो मार्कस  और अम्बेडकर  वर्ग संघर्ष  के परिणाम स्वरूप  समाज टूटन को सत्ता रूपी मक्खन समझकर प्रसन्न होते थे। गांधी अधिकतम अहिंसा के पक्षधर थे तो मार्कस अधिकतम हिंसा के और अम्बेडकर को हिंसा अहिंसा से कोई परहेज नही रहा। इतनी सारी विसंगतियों के बाद तीनो के बीच कैसे तुलना संभव है।

कुछ लोग कहते हैं कि मार्कस का अन्तिम लक्ष्य शासन मुक्त व्यवस्था थी । यह एक ऐसा झुठ प्रचार था जिसका उसी तरह कोई सिर पैर नही था जिस तरह निर्मल बाबा के समोसे मे। अम्बेडकर जी का कथन बिल्कुल स्पष्ट था। उसमे मार्कस के समान असत्य कल्पना नही थी। परिणाम स्पष्ट था कि मार्कस के कथनानुसार चलने वालो को पूरा पूरा सत्ता सुख मिला जिसमे कहीं भी समाज के लिये गुलामी के अतिरिक्त कुछ और नही था तो अम्बेडकर जी के मार्ग पर सत्ता की दिशा चलने वालों को लूट के माल मे हिस्सा मिलना शुरू हो गया। समाज को न मार्कस की दिशा मे गुलामी से राहत मिली न अम्बेडकर के मार्ग से। गांधी की चर्चा इसलिये संभव नहीं क्योकि गांधी तो स्वतंत्रता के पहले पडाव पर ही मार दिये गये। सत्ता के दो दावेदार गुटो मे से एक ने गांधी के विरूद्ध ऐसा वातावरण बनाया कि गांधी की शारीरिक हत्या हो गई तो दूसरे ने गांधी के वारिस बनकर ऐसा वातावरण बनाया कि गांधी विचारों की हत्या हो गई।

यदि हम भारत का आकलन करें तो यहां आपको मार्कस की लाइन पर चलने वाले भी बडी संख्या मे मिल जायगें क्योकि इस लाइन पर चलने मे कहीं न कहीं सत्ता की उम्मीद है। अम्बेडकर की लाइन पर चलने मे भी लाभ ही लाभ है क्योकि वहां भी सत्ता मे हिस्सेदारी की पूरी व्यवस्था अम्बेडकर जी सदा सदा के लिये कर गये है। बेचारे गांधी के मार्ग पर क्या मिलने वाला है? क्यो    कोई गांधी मार्ग पर चले । आज भारत मे बेचारे गांधी का हाल यह है कि यदि किसी से कहा जाय कि तुम्हारे बेटे के रूप मे गांधी का जन्म होने वाला है तो वह चाहेगा कि गांधी के रूप वाला बेटा पडोसी के घर चला जाय। उसे तो नेहरू    बिडला या अम्बेडकर सरीखे बेटे से ही काम चल जायगा। गांधी की लाइन पर चलने वाले को न तो कोई व्यक्तिगत लाभ है न ही पारिवारिक। इस लाइन पर चलकर सिर्फ सामाजिक लाभ ही संभव है जिसमे चलने वालो का भाग नगण्य है। दूसरी ओर मार्कस या अम्बेडकर की लाइन पर चलने वाले को व्यक्तिगत और पारिवारिक लाभ भरपूर है। इतना ज्यादा कि वह पूरे समाज के लाभ को भी अपने घर मे डाल रखने की शक्ति पा जाता है। बताइये कि आज के भौतिक युग मे कोई गांधी मार्ग पर क्यो चले?

यदि अम्बेडकर या मार्कस मे आंशिक रूप से भी सामाजिक भाव होता तो वे श्रम, बुद्धि और धन के बीच श्रम की मांग और मूल्य बढने की बात करते जिससे आर्थिक सामाजिक विषमता कम होती । गांधी ने लगातार श्रम और बुद्धि के बीच दूरी घटाने की कोशिश की । अम्बेडकर को तो श्रम से कोई मतलब नहीं था। न अच्छा न बुरा। अम्बेडकर तो सिर्फ सामाजिक असमानता का लाभ उठानें तक ही पर्याप्त  थे। किन्तु मार्कस को आधार बनाकर बढने वालों ने श्रम को धोखा देने के लिये मानसिक श्रम नामक एक नया शब्द  बना लिया जो पूरे पूरे  शारीरिक श्रम का हिस्सा निगल गया। बुद्धि जीवियों ने शारीरिक श्रम शोषण के ऐसे ऐसे तरीके खोज लिये कि श्रम और बुद्धि के बीच दूरी लगातार बढती चली गई । यदि गांधी के अनुसार मशीन और शारीरिक श्रम के बीच कोई मानवीय संतुलन रखा गया होता तो आज जैसी अराजकता नहीं होती। किन्तु मार्कस वादियों की निगाहें श्रम पर थी और निशाना बुद्धि को लाभ पहुंचाने का। मार्कस को मानने वाले चीन मे श्रमजीवियो की अमानवीय दषा का वर्णन भी रोगटे खडे करने वाला है। भारत जहां समाजवादी लोकतंत्र नामक आंशिक साम्यवाद ही आ पाया किन्तु यहां भी श्रम और बुद्धि के बीच लगातार बढता फर्क स्पष्ट है। यदि श्रम की मांग और महत्व बढ जाता तो जातीय आरक्षण की जरूरत  ही नही पडती। किन्तु भारत मे सत्ता लोलुप त्रिगुट श्रम  मूल्य वृद्धि के प्रयास से ही आतंकित थे। नेहरू के नेतृत्व का कांग्रेसी गुट बुद्धिजीवी पूंजीपतियों को अधिकाधिक सुविधा देकर उनके वोट लेने का प्रयास करता रहा तो साम्यवादी श्रम प्रधान लोगों को बहकाकर उन्हे पूंजीवाद के विरूद्ध नारा लगवाने का औजार मानते रहे और अम्बेडकर वादियों की खास समस्या रही कि यदि श्रम और बुद्धि के बीच की दूरी घट गई तो जातीय आरक्षण महत्वहीन हो जायगा। तीनो के अलग अलग स्वार्थ थे और इस स्वार्थ का उजागर करने वाला कोई था नहीं।

गांधी कट्टर हिन्दू थे। वे मानते थे कि हिन्दू धर्म की वाह्य मान्यताएं अन्य सभी धर्मो की अपेक्षा अधिक मानवीय है। मार्कस अपना स्वयं का धर्म चलाना चाहते थे। उनके अनुसार धर्म समाज मे होता है। यदि राज्य ही समाज बनकर समाज के सभी काम करने लगे तो किसी धर्म की जरूरत ही क्या है। अम्बेडकर को हिन्दू धर्म से विशेष द्वेष था। वे बचपन से ही हिन्दू धर्म छोडकर उससे प्रत्यक्ष टकराव चाहते थे। किन्तु गांधी जी ने कडाई से उन्हे रोक दिया। अम्बेडकर बहुत चालाक थे। उन्होने समझा कि कुछ वर्ष हिन्दू ही रहकर उसकी जडो मे मट्ठा डालने का काम क्यो न करें? जहां लोहिया, जयप्रकाश, नेहरू, पटेल आर्थिक विषमता को दूर करना अपनी प्राथमिकता घोशित कर रहे थे वहीं अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल के पीछे अपनी सारी शक्ति लगा दी। वे मुसलमान होना चाहते थे किन्तु मुस्लिम महिलाओं को उन्होंने अपने कोड बिल के सुधारवादी कदम से बाहर रखा। रोकने वाला कोई था नही। गांधी थे ही नही, नेहरू जी अंबेडकर से डरते थे। गांधी हत्या के बाद संघ अविश्वसनीय हो चुका था। अम्बेडकर के इस प्रयत्न को कौन रोकता? हिन्दू धर्म के तथाकथित अगुवा सवर्ण स्वयं अवर्ण  शोषण के कलंक से मुंह छिपा रहे थे। अम्बेडकर जी हिन्दू कोड बिल बनवाने मे सफल रहे। मुझे आश्चर्य होता है कि गांधी के कट्टर हिन्दू होते हुए भी किसी धूर्त हिन्दुत्व के स्वार्थ पूर्ण प्रचार से प्रभावित होकर किसी हिन्दू ने ही गांधी की हत्या कर दी। मै समझ नही पाता कि हिन्दुत्व का शत्रु कौन? अम्बेडकर, मार्कस अथवा वह स्वार्थ पूर्ण प्रचार जिसने सत्ता के फेर मे पडकर गांधी को उसमे बाधक मान लिया। कुछ ही वर्ष बाद बात उजागर हो गई जब ऐसे तत्वो ने हिन्दू संगठन के नाम पर अपना अलग राजनैतिक दल बना लिया। मै अब भी मानता हॅू कि हिन्दू धर्म मे आंतरिक बुराइयां थी और अब भी है किन्तु अन्य धर्मो के साथ संबंध मे हिन्दू धर्म के मुकाबले कोई नही। गांधी हिन्दू धर्म की आंतरिक बुराइयों को दूर करना चाहते थे और अम्बेडकर उसका लाभ उठाना चाहते थे यही तो है इनका तुलनात्मक विश्लेषण।

गांधी के बाद गांधी को ठीक से समझने वालो मे दो नाम ही प्रमुख है। (1) राम मनोहर लोहिया (2) जय प्रकाश नारायण। लोहिया जी ने गांधी विचार और मार्कस  के बीच समाजवाद का मार्ग चुना और जे पी मार्कसवाद से अलग होकर गांधी विचार की लाइन पर आये। दोनो के साथ क्या हुआ यह इतिहास के पन्नो मे अंकित हैं। और कोई गांधीवादी था नही। संघ परिवार गांधी विरोध का प्रत्यक्ष झंडा उठाये घूम रहा था तो साम्यवादी परिवार सर्वोदय मे चुपचाप घुसकर उसका वे्न-वाश कर रहा था। ज्योही कोई संघ परिवार से निराश होकर गांधी को समझना चाहता था त्योही ये साम्यवादी उसके खिलाफ दुश्प्रचार शुरू कर देते थे। वेचारे नाना जी देशमुख का उदाहरण आपके सामने है। मेरे साथ भी यही कोशिश हुई किन्तु बंग साहब सिद्धराज जी को मेरे विरूद्ध समझाने मे यह गुट सफल नही सहो सका । अब  भी इस गुट ने हार नही मानी है। मैने तो सुना है कि वह गुट कुछ हद तक रामदेव जी के साथ भी तालमेल बिठाने मे सफल हो गया है जो इस लेख का विषय नहीं।

वर्तमान समय मे गांधी विचार को सबसे अधिक साफ साफ समझने वाला एक ही व्यक्ति दिखता है अन्ना हजारे । वैसे तो आर्य भूषण भारद्वाज कृष्ण कुमार खन्ना अविनाश भाई आदि भी हैं जो विचारो के साथ साथ प्रत्यक्ष जीवन मे भी पूर्ण गांधीवादी है किन्तु ऐसे लोग कम ही है। अन्य अनेक गांधीवादियों की तो जीवन स्तर तक ही गांधी की सीमा है। विचारो से कुछ लेना देना नही । एक अन्ना हजारे ऐसे व्यक्तित्व के रूप मे आये जिन्हे गांधी की समझ है। अनेक अम्बेडकर वादी तो बेचारे अन्ना के पीछे पिल पडे है। मार्कस  को मानने वाले अभी  अध्ययन  कर रहे है। संघ परिवार अन्ततः अन्ना का विरोध ही करेंगा   । क्योकि संघ परिवार का उद्देश्य सत्ता है जो अन्ना का नही फिर भी इतिहास साक्षी है कि सत्ता लोलुप कांग्रेसी साम्यवादी संध परिवार अंबेडकर वादियो के लाख दुश्प्रचार के बाद भी सामान्य भारतीय के मन मे आज भी गांधी के प्रति अगाध श्र्रद्धा है। अन्ना जी के लिये भी यह सामान्य जन मानस की श्रद्धा ही आधार बन सकती है। गांधी मार्कस और अम्बेडकर तो जा चुके है। अब तो आशा की किरण अन्ना हजारे पर ही टिकी है।

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संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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