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मंथन क्रमांक-45 शिक्षा व्यवस्था- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति की...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत-बजरंग मुनि
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशों की नकल करने लगा। पश्चिम के देशों ने तानाशाही के विकल्प ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। उच्श...
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परिवार में शामिल प्रत्येक व्यक्ति के परिवार में रहते तक सामाजिक संवैधानिक तथा प्राकृतिक अधिकार शून्यवत् हो जाते हैं ।क्या आप इससे सहमत हैं?
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आंदोलन अन्ना-रामदेव, एक समीक्षा…!

Posted By: admin on June 9, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »


यह स्पष्ट है कि भारत की वर्त्तमान राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह असफल है| व्यवस्थापक राजनेताओं की नीतियाँ तो गलत है ही, नियत भी गलत है| भ्रष्टाचार हमारे राजनेताओं की बुरी नियत का परिणाम है, कारण नहीं| “Power Corrupts a Man and Absolute Power Corrupts Absolutely” एक सर्वमान्य सिद्धांत है| हमारे राजनेता लगातार समाज के स्वाभाविक कार्यों में भी हस्तक्षेप बढाकर Absolute Power की दिशा लगातार बढ़ते हैं जिसका परिणाम होता है निरंतर भ्रष्टाचार वृद्धि|

वर्त्तमान समय में जो भी राजनैतिक संघर्ष में सक्रिय संगठन भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे हैं उनके आंदोलन अन्ततोगत्व सत्ता संघर्ष तक सीमित है| भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर जनमत जागरण करके स्वयं सत्ता में आना उनका लक्ष्य है| बाबा रामदेव जी के पुरे आंदोलन में तो दिशा पूरी तरह स्पष्ट ही है की वह सत्ता संघर्ष है| टीम अन्ना का अभी स्पष्ट होना बाकी है| टीम अन्ना कभी तो संसदीय प्रणाली पर प्रश्न खड़े करती है तो कभी भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर लोकपाल पर आ जाती है| जब तक संसद और समाज के अधिकारों का पुनः विभाजन नहीं होता तब तक यह साफ़ नहीं कि टीम अन्ना सत्ता संघर्ष कि दिशा में है या व्यवस्था परिवर्तन कि दिशा में| लोकपाल का आंदोलन सांसदों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकता है किन्तु संसद के अधिकारों पर अंकुश नहीं लगता| संसद को संविधान कि सीमाओं के अंतर्गत ही कार्य करने कि बाध्यता है| फिर वही संसद संविधान में संशोधन कैसे कर सकती है? यह साधारण सा प्रश्न टीम अन्ना समझना नहीं चाहती या समझने कि हिम्मत नहीं कर रही| बाबा रामदेव से तो व्यवस्था परिवर्तन कि उम्मीद ही व्यर्थ है किन्तु टीम अन्ना से अब भी बहुत उम्मीद है की वह जुलाई कि २५ तारीख से अपने आंदोलन कि लाइन भ्रष्टाचार से हटा कर लोक्स्वराज्य कि दिशा में मोडेंगे| भारत को संसदीय लोकतंत्र नहीं, सहभागी लोकतंत्र चाहिए यह स्पष्ट आवाज़ उठाने का समय आ गया है|

मेरे विचार में अन्नाजी सहभागी लोकतंत्र कि दिशा में बढ़ना चाहते हैं किन्तु उनकी टीम अभी दुविधा में है| यदि दुविधा छोड़ कर स्पष्ट मार्ग लेलें तो समाज अवश्य साथ देगा| लोकपाल राजनैतिक भ्रष्टाचार का हो सकता है किन्तु भ्रष्टाचार मुक्ति व्यवस्था परिवर्तन नहीं है और व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवश्यक है सहभागी लोकतंत्र|

मैं आंदोलन अन्ना का सहयोगी हूं, सहभागी नहीं। क्यों? – बजरंग़ मुनि

Posted By: admin on May 30, 2012 in Recent Topics - Comments: 1 Comment »

पिछले दिनों मैंने कुछ लेख लिखे जो विरोधाभासी दिखते हैं। मैंने लिखा

1. वर्तमान समय में राजनीति में लगभग सारे लोग भ्रष्ट हैं। मनमोहन सिंह सहित

2. स्वतंत्रता के बाद पहली बार भारत में मनमोहन सिंह के रूप में एक अच्छा प्रधानमंत्री आया है।

हम नासमझी में या स्वार्थ वश उसे अस्थिर कर रहे हैं।

3 हम रामदेव जी के आंदोलन का समर्थन करते हैं, सहयोग नहीं।

4 हम अन्ना जी की टीम का सहयोग करते हैं, सहभागिता नहीं।

5 हमारे विचार में भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन समस्या का समाधान नहीं।

 इन सब लेखों ने पाठकों को असमंजस में डाल दिया है कि हम कहना क्या चाहते हैं ?

 

सन् सैंतालीस से ही भारत संसदीय लोकतंत्र की लाइन पर चला जिसका अर्थ है संसद सर्वोच्च। इस संसदीय लोकतंत्र में राजनैतिक व्यवस्था के पास अधिकतम अधिकार अधिकतम दायित्व होते हैं। इसके पास संविधान संशोधन तक के अधिकार होते हैं। यह व्यवस्था समाज से भी उपर हो जाती है तथा समाज से लेकर व्यक्ति तक के हित के सारे अधिकार अपने पास समेट लेती है चाहे व्यक्ति चाहे या न चाहे। चाहे समाज की सहमति हो या न हो।

संसदीय लोकतंत्र तानाशाही से बचाता है किन्तु अव्यवस्था की दिशा में ले जाता है। संसदीय लोकतंत्र में अव्यवस्था, भ्रष्टाचार निश्चित है। मैं अक्षरश सहमत हॅूं कि Power Corrupts a man and absolute  power corrupts absolutely जिस बात को मेरे जैसा साधारण व्यक्ति भी समझता है वह बात टीम अन्ना के पढ़े लिखे लोग नहीं समझते। ये पावर घटाने की अपेक्षा भ्रष्टाचार दूर करने पर ज्यादा जोर देते हैं जो असंभव कार्य है। यदि आप अव्यवस्था भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहते हैं तो संसदीय लोकतंत्र को बदलना ही होगा। इस बदलाव के दो ही मार्ग हैं (1. तानाशाही (2. सहभागी लोकतंत्र या लोकस्वराज्य। तीसरा कोई मार्ग नहीं। तानाशाही के मार्ग से अव्यवस्था भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, तीव्र विकास होगा किन्तु गुलामी आयेगी। तथा लोक स्वराज्य प्रणाली आने ही नहीं दी जायेगी क्योंकि सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था ने उसकी चर्चा तक को रोक रखा है। ऐसी स्थिति में मैंने विश्लेषण किया है कि समस्याओं का समाधान तो सिर्फ व्यवस्था परिवर्तन अर्थात् लोक स्वराज्य प्रणाली की दिशा मात्र ही है। बाकी सारी चर्चाएं या आंदोलन तो वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में सुधार तक सीमित है, समाधान नहीं। भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन भी ऐसे ही सुधार का एक भाग है।

मैं रामदेव जी का समर्थक हॅूं। ये वर्तमान स्वार्थ पूर्ण राजनेताओं को हटाकर अच्छे लोगों को सत्ता में लाना चाहते हैं। रामदेव जी अच्छा काम कर रहे हैं किन्तु रामदेव जी को लोक स्वराज्य प्रणाली का न ज्ञान है न विश्वास। सत्ता में अच्छे लोगों का जाना कोई समाधान नहीं है क्योंकि पचास वर्ष पूर्व सत्ता में बहुत अच्छे लोग थे तब भी सत्ता बिगड़ती गई क्योंकि वह संसदीय लोकतंत्र प्रणाली का दोष था जो अच्छे लोगों को कमजोर करके बुरे लोगों को आकर्षित करने में सफल रही। दूसरा आंदोलन अन्ना जी तथा उनकी टीम का है। अन्ना जी लोक स्वराज्य को समझते भी हैं और उस दिशा में साफ साफ बढ़ना चाहते हैं। अन्ना जी की टीम के प्रमुख लोग अरविन्द केजरीवाल, प्रशान्तभूषण आदि लोक स्वराज्य को समझते हैं और उसे समाधान भी मानते हैं किन्तु उन्हें जनता पर इतना विश्वास नहीं कि जनता इसे हाथो हाथ उठा लेगी। यही कारण है कि वे घूम फिर कर भ्रष्टाचार विरोध पर आ जाते हैं। भ्रष्टाचार विरोध एक लोक प्रिय मुद्दा है, सत्ता परिवर्तन का आधार हो सकता है किन्तु व्यवस्था परिवर्तन का आधार नहीं। मेरा मत है कि व्यवस्था परिवर्तन का आधार तो लोक संसद का आंदोलन ही है। जिससे टीम अन्ना को विष्वास होते हुए भी डर लगता है।

वर्तमान राजनैतिक वातावरण की समीक्षा करें तो मेरे विचार में बड़ी कुशलता से मनमोहन सिंह अघोशित रूप से ठीक दिशा में जा रहे हैं। सन् सैंतालीस से अब तक देश केन्द्रीयकरण की लाइन पर था। मजबूत प्रधानमंत्री थे जो हर छोटी से छोटी बात के लिये जिम्मेदार थे। किसी रेल दुर्घटना के लिये अपनी गलती न होते हुए भी रेलमंत्री का त्यागपत्र सिद्ध करता है कि सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था केन्द्रित थी। यह शास्त्री जी के त्याग का उदाहरण तो बना किन्तु व्यवस्था नहीं बनी। मनमोहन सिंह ने विकेन्द्रित शासन प्रणाली की शुरूआत की है। मनमोहन सिंह चाहते हैं कि व्यवस्था शक्तिशाली हो व्यक्ति या पद नहीं। यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय होता है और आप इतने सक्षम हैं कि उसका अन्याय दूर कर सकते हैं। जनता आपसे चाहती है कि आप उसका अन्याय दूर करें। मेरे विचार में यह लोक लुभावन मार्ग है। अच्छा तो यही है कि आप उस अन्याय को दूर करने योग्य व्यवस्था तैयार करें न कि स्वयं उसे ठीक करने में लग जायें। आज भारत में हर व्यक्ति स्वयं न्याय देना चाहता है। मनमोहन सिंह चाहते हैं कि स्वयं समस्याओं का समाधान करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र तो किसी व्यवस्था के अन्तर्गत समाधान होना है। ये पूरी तरह निजीकरण के पक्षधर हैं। मनमोहन सिंह जी ने न किसी व्यक्ति को भ्रष्टाचार करने से रोका न ही किसी को भ्रष्टाचार पकड़ने से। आज तक जितने भी प्रधानमंत्री हुए उन्होंने स्वयं को शासक समझा। उन्होंने जहां चाहा वहां भ्रष्टाचार करने वालों को रोका और जहां चाहा वहां भ्रष्टाचार रोकने वालों को भी रोककर भ्रष्टाचार पर पर्दा डाला क्योंकि ये व्यवस्था को स्वयं से उपर नहीं मानते थे। मनमोहन सिंह व्यवस्था को स्वयं से उपर मानते हैं।

मनमोहन सिंह जी दुहरी समस्या से जूझ रहे हैं। गुलाम मानसिकता के लोग इन्हें मजबूत प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं तथा सत्ता लोलुप लोग इन्हें कमजोर या भ्रष्ट कहकर स्वयं इनकी जगह आना चाहते हैं। सोनिया जी इन्हें असफल सिद्ध करके राहुल की ताजपोशी चाहती हैं किन्तु उन्हें डर है कि कहीं इनकी बिदाई कांर्गेस पार्टी की ही बिदाई न बन जाये। भारत की जनता के समक्ष दो मार्ग हैं (1, नरेन्द्रमोदी सरीखे कार्यकुशल तानाशाह प्रशासक के माध्यम से भ्रष्टाचार मुक्ति और विकास का मार्ग पकड़े अथवा (2, नीतिश कुमार मनमोहन सिंह सरीखे लोकतांत्रिक मार्ग को आगे बढ़ायें। भारत की जनता अव्यवस्था से उब चुकी है। वह नरेन्द्र मोदी के मार्ग पर जाना चाहती है जो उसकी मजबूरी है किन्तु मार्ग खतरनाक है। कांर्गेस पार्टी के नाम पर सोनिया राहुल सशक्तिकरण तो और भी खतरनाक है। ऐसी स्थिति में नीतिश या मनमोहन सिंह ही विकल्प दिखते हैं।

रामदेव जी को भारत की जनता पर पूर्ण विष्वास है कि वह भावनाप्रधान होने से आसानी से ठगी जा सकती है। टीम अन्ना को भारत की जनता पर विश्वास ही नहीं है कि वह सहभागी लोकतंत्र या लोक स्वराज्य की अवधारणा को समझ पायेगी। इसलिये ये भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाना चाहते हैं। भारत की जनता को विश्वास नहीं है कि भ्रष्टाचार के नाम पर सत्ता में आने वाले सहभागी लोकतंत्र की लाइन पर जायेंगे। चाहे और किसी को भले ही हो किन्तु मुझे तो नहीं है क्योंकि दो माह पूर्ण जिस तरह टीम अन्ना ने ललकारा था कि संसद अपराधियों का चारागाह होने से वह स्वयं में एक समस्या है, अब लाइन बदलकर प्रधानमंत्री सहित पंद्रह मंत्रियों की जांच के मुद्दे को टकराव का मुद्दा बनाने की घोषणा कर रही है। जब टीम अन्ना भी जानती है और पूरा देश भी जानता है कि संसद में इमान की कसौटी पर शायद ही कोई खरा उतर पाये तो ऐसा मुद्दा उठाना कितना उपयोगी है। भ्रष्टाचार करना और भ्रष्टाचार होते हुए देखने मे बहुत फर्क है। मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार किया नहीं। मनमोहन सिंह ने सक्षम होते हुए भी भ्रष्टाचार रोका नहीं यह उन पर आरोप है। मनमोहन सिंह ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध लोकतांत्रिक सक्रियता को पनपने की पूरी छूट दी यह उनकी विशेषता है। आरोप और विशेषता के बीच इस आधार पर तुलना होगी कि उनके मुकाबले में कौन है और उसकी विचार धारा क्या है  ? टीम अन्ना ने जिस तरह प्रधानमंत्री का भ्रष्टाचार प्रमाणित करने की पहल की वह मेरे विचार में यदि सच भी हो तब भी अनावश्यक थी, औचित्य हीन थी, टीम पर संदेह पैदा करने वाली थी कि टीम व्यवस्था परिवर्तन की लाइन से हटकर सत्ता संघर्ष की लाइन पर बढ़ रही है। वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था के जारी रहते यदि मनमोहन सिंह जी की जगह अरविन्द केजरीवाल भी प्रधानमंत्री बन जाये तो कोई सुधार संभव नहीं जब तक पावर का विकेन्द्रीयकरण न हो।

मैं अब तक नहीं समझ पा रहा कि टीम अन्ना भ्रष्टाचार नियंत्रण की जगह पर संसद के अधिकारों के विभाजन को मुद्दा बनाने से क्यों कतरा रही है। यदि लोक संसद बनाकर वर्तमान संसद के तानाशाही अधिकारों में विभाजन का आंदोलन हो तो सबसे ज्यादा सुरक्षित और लोकप्रिय मुद्दा हो सकता है। यह मुद्दा न उठाने के पीछे यह संदेह है कि इससे तो भविष्य में बनने वाली संसद के अधिकार ही घट जायेंगे। अर्थात् यदि रामदेव जी या टीम अन्ना भ्रष्टाचार या मंहगाई आदि के आधार पर चुनाव जीत लेते हैं तो लोक संसद तो इनके लिये भी घातक हो सकती है। ऐसा संदेह स्वाभाविक है। यही संदेह मुझे टीम अन्ना के साथ सहभागिता से रोक रहा है। टीम अन्ना न कहीं संविधान संशोधन का मुद्दा उठा रही है न सहभागी लोकतंत्र का। संसदीय ढांचे पर भी प्रश्न उठाने के बाद उनकी लाइन अब फिर से बदलकर भ्रष्टाचार की तरफ मुड़ गई है। यदि ऐसा ही हुआ तो मेरे विचार में नीतिश कुमार या मनमोहन सिंह की लाइन ज्यादा विश्वास योग्य है क्योंकि दोनों में कहीं तानाशाही की गंध नहीं है।

यह सही है कि अन्ना हजारे स्वयं पूरी तरह सहभागी लोकतंत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता समझते हैं। टीम के सदस्य अरविन्द केजरीवाल, प्रशान्तभूषण, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय आदि भी इस लाइन का महत्व समझते हैं भले ही वे किसी राजनीति के अन्तर्गत स्पष्ट बोलने में हिचक रहे हों। मेरी तो उन्हें सलाह है कि वे खुलकर अपनी लाइन बदलें और संविधान संशोधन, लोक स्वराज्य, सहभागी लोकतंत्र, लोक संसद जैसे शब्दों को आधार बनाये तो जनता आसानी से समझ सकेगी। 

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