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मंथन क्रमांक-112 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है; 2. दुनियां का प्रत्येक ...
मंथन क्रमांक- ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः 1. दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ; 2. धर्म शब्द के अनेक अ...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय”–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। 1. समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया; 2. आदर्श वर्ण व्यवस्था म...
मंथन क्रमॉक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष है। 1. मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते है। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता है; 2. किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता है, किये जाने वाले कार्य न करना अनै...
मंथन क्रमांक- 109 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’—बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है; 2. भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लग...
मंथन क्रमांक 108- आरक्षण–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कम...
मंथन क्रमाँक107- भारत की राजनीति और राहुल गांधी–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1. धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में। धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है और राजनीति व्यवहार प्र...
मंथन क्रमांक- 106 “समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान”–बजरंग मुनि
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’– बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रका...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’–बजरंग मुनि
------------------------------------------------------------------- कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः- 1. पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी...

धर्म :- मैं किधर जाऊं

Posted By: admin on May 6, 2010 in Uncategorized - Comments: No Comments »

धर्म की परिभाशा है “ व्यक्ति के किसी अन्य के हित में किया गया जाने वाला नि:स्वार्थ कार्य । धर्म हमेशा ही व्यक्तिगत रहा है। धर्म हमेशा कर्तव्य तक सीमित रहा है। धर्म न कभी संगठन के रूप में रहा है न ही उसकी कोई अधिकार के रूप में उपयोगिता रही है। बुद्ध के समय पहली बार धर्म ने संगठन बनाना शुरू किया अन्यथा बुद्ध के पहले तो संगठन सम्प्रदाय ही होती था । उसके पूर्व धर्म के साथ न कोई पूजा पद्धति जुडी होती न ही ईश्वर आराधाना । नास्तिक भी धर्म मान्य हुआ करता था ।
इशुमसीह तथा इस्लाम ने धर्म को विशेश रूप से पूजा पद्धति से जोड़ा और बुद्ध के संगठन की नीति को विस्तार दिया । परिणाम हुआ कि धर्म कर्तव्य से हटकर अधिकारों के साथ जुडा । अब तो स्थिति यहॉ तक आ गई है कि धर्म के आधार पर बने संगठन सिर्फ अपने संख्या विस्तार को ही धर्म मानने लग गये है। भारत में धर्म प्रचार का सर्वश्रेश्ठ आधार तर्क या विचार मन्थन तक सीमित था। पिश्चम ने उसके स्थान पर धन सेवा प्रेम और सदभाव को महत्व दिया और इस्लाम ने संगठन व्यक्ति और तरवार को । भारतीय तर्क व्यवस्था पर या तलवार की ताकत भारी पड़ी।  आचरण, चरित्र, धर्म की नई प्रस्तुति की सफलता  को देख देख कर हिन्दू धर्मावलिम्बयों के कुछ समूह भी संगठन, ईश्वर पूजा पद्धति को आधार बनाकर अन्य धर्म कहे जाने वाले साम्प्रदायों से प्रतिस्पर्धा करने लगें है। ये भी धर्म प्रचार के लिये तर्क और विचार मन्थन की जगह संगठन व्यक्ति या बल प्रयोग का सहारा लेने लगें है। जिस तरह पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर अमानवीय अत्याचार और हत्याएं हुई है, उसी दिशा में भारत भी लगतार बढ़ता जा रहा है जो धर्म का एक निकृश्टम स्वरूप है।

आवश्यकता यह है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप भी समाज के समक्ष आवे और वह सिर्फ आदशZ मात्र न होकर इतना व्यावहारिक हो कि उसके समक्ष साम्प्रदायिक ‘ाक्तियॉ कमजोर हो जावें । इसलिये आज धर्म के मामले में भी समाज को एक नई दिशा की आवश्यकता है ।

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