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मंथन क्रमांक 130 ’’संविधान और संविधान संशोधन’’–बजरंग मुनि
पूरे विश्व में मूल ईकाईयां दो होती है व्यक्ति और समाज। व्यक्ति सबसे नीचे की अंतिम इकाई होती है और समाज सबसे उपर की अंतिम। व्यक्ति के लिये स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन अनिवार्य आवश्यकता है...
मंथन क्रमांक 129 ’’विचार और चिंतन” का फर्क–बजरंग मुनि
विचार और चिंतन एक दूसरे के पूरक हैं। विचार निष्कर्ष है और चिंतन निष्कर्ष तक पहुॅचने का मार्ग। प्रत्येक व्यक्ति के मन में निरंतर नये नये विचार तथा समस्याएं आती रहती हैं। व्यक्ति चिंतन मनन क...
मंथन क्रमांक 128 ’’कट्टरवाद, उग्रवाद और आतंकवाद–बजरंग मुनि
स्वतंत्रता और सहजीवन का संतुलन प्रत्येक व्यक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है। आमतौर पर ऐसा संतुलन बन नहीं पाता है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी संगठन से जुड जाता है और उसकी प्राथमिकताएं ...
मंथन क्रमांक 127 ’’सर्वोत्तम संभव का सिद्धान्त’’–बजरंग मुनि
आदर्शवाद और व्यावहारिकता बिल्कुल भिन्न-भिन्न होते है। आदर्श का अर्थ होता है क्या करना उचित है और व्यावहारिकता का अर्थ होता है कि क्या होना आसान है। उच्च आदर्श अव्यावहारिक हो सकता है और किसी ...
मंथन क्रमांक 126 ’’ सहजीवन और सतर्कता’’–बजरंग मुनि
स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति का प्राकृतिक अधिकार होता है और सहजीवन उसकी सामाजिक मजबूरी। स्वतंत्रता सबकी समान होती है। स्वतंत्रता की सीमा प्राकृतिक रूप से बनी हुयी है। कोई भी अन्य व्यक्ति ...
मंथन क्रमाॅक 125 ’’न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सीमाएं’’–बजरंग मुनि
दुनियां की वर्तमान सामाजिक व्यवस्था आदर्श सामाजिक व्यवस्था से बहुत अलग है। आदर्श व्यवस्था में समाज सबसे उपर होता है और राष्ट्र या धर्म सहायक। वर्तमान में समाज से भी उपर राष्ट्र और धर्म बन ग...
मंथन क्रमांक-124 ’’मनरेगा कितना समाधान कितना धोखा’’–बजरंग मुनि
कुछ हजार वर्षों का विश्व इतिहास बताता है कि दुनियां में बुद्धिजीवियों ने श्रम शोषण के लिए नये-नये तरीकों का उपयोग किया। श्रम शोषण के लिए ही पश्चिम के देशों ने पूंजीवाद को महत्त्व दिया तो भार...
मंथन क्रमांक-123 ’’धर्म परिवर्तन कितनी स्वतंत्रता कितना अपराध’’–बजरंग मुनि
धर्म शब्द प्राचीन समय में गुण प्रधान रहा है। धर्म स्वयं एकवचन है बहुवचन नहीं। जब भारत गुलाम हुआ तब भारत में पहचान प्रधान शब्द धर्म के साथ जुड गया। धर्म शब्द द्विअर्थी हो गया। यही कारण है कि भा...
मंथन क्रमांक-122 ’’गांधी, मार्क्स ओर अम्बेडकर’’–बजरंग मुनि
गांधी, मार्क्स और अम्बेडकर की तुलना कठिन होते हुये भी बहुत प्रासंगिक है क्योंकि तीनों के लक्ष्य और कार्यप्रणाली अलग-अलग होते हुये भी वर्तमान भारत की राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था पर तीनों महाप...
मंथन क्रमांक-121 ’’राइट टू कंस्टीटयूशन’’–बजरंग मुनि
दुनियां की समाज व्यवस्था में व्यक्ति एक प्राकृतिक और प्राथमिक इकाई होता है तो समाज अमूर्त और अन्तिम। दुनियां के सभी व्यक्तियों के संयुक्त स्वरूप को समाज कहते हैं। समाज की एक व्यवस्था होती ...

महिला आरक्षण : समस्या या समाधान

Posted By: admin on May 6, 2010 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी भी समस्या के समाधान के पूर्व समस्या की पहचान, कारण, समाधान के लाभ और हानि की समीक्षा स्वाभाविक है। महिला आरक्षण के विषय पर भी देश भर में समीक्षा हो रही है।

सिद्धान्त रूप में आरक्षण घातक होता है। हजारों वर्ष पूर्व परिवार में पुरूष प्रधानता आरक्षण के रूप में स्थापित हुई तथा उस प्रधानता ने समाज में भी पुरूष प्रधान व्यवस्था का स्वरूप ग्रहण कर लिया । महिला और पुरूष दो वर्ग के रूप में स्थापित होने लगे । महिलाओं की क्षमता और योग्यता की सीमाएँ निर्धारित हुई जो पुरूषों द्वारा अपने पक्ष में बनाई गई । दुष्ट प्रवृत्ति पुरूषों द्वारा ऐसी पुरूष प्रधानता का दुरूपयोग स्वाभाविक था । दुष्ट प्रवृत्ति पुरूषों ने इसका लाभ भी खूब उठाया । इस्लाम में तो ऐसे एकपक्षीय नियम ही बना दिये गये कि परिवार में मालिक पति होगा किन्तु हिन्दुत्व में भी पुरूष मुखिया की व्यवस्था मालिक से कोई बहुत कम नहीं रही ।

इस समाज व्यवस्था को तोड़ने के नाम से महिला उत्पीड़न रोकने के अनेक कानून बने । महिला आरक्षण प्रयास उसी की एक कड़ी है। निसंदेह ऐसे प्रयत्नों से पुरूष प्रधान व्यवस्था टूटेगी और महिलाओं को आगे आने का अवसर मिलेगा । किन्तु विचारणीय प्रश्न यह भी है कि इन प्रयत्नों का संपूर्ण समाज व्यवस्था पर क्या और कितना प्रभाव पडेगा । एक सर्वेक्षण के अनुसार ऐसे कानूनों का सर्वाधिक लाभ धूर्त महिलाओं ने उठाया है। यहाँ तक कि धूर्त पुरूषों ने भी शरीफ पुरूषों के उत्पीड़न के उद्देश्य से महिला उत्पीड़न प्रावधानों का भरपूर दूरूपयोग किया । कुल मिलाकर वर्ग विद्वेष व वर्ग संघर्ष मजबूत हुआ और वर्ग समन्वय टूटा । परिवार व्यवस्था में भी टूटन बढ़ने लगी । वर्तमान महिला आरक्षण विधेयक इस टूटन को और अधिक बढ़ाएगा ।

वर्तमान आरक्षण विधेयक का एक और दुष्प्रभाव होगा । कानूनी अधिकार सक्षम परिवारों की ओर केन्द्रित हो जायेंगे। पहले संसद में यदि चार सौ परिवारों का प्रतिनिधित्व था तो वह अब घटकर तीन सौ परिवारों तक सिमट जायेगा । यदि युवको को भी आरक्षण दे दिया जाय तो फिर तो और भी सुविधा हो जायेगी, सौ परिवारों की ही ठेकेदारी में संसद सिमट जायेगी । सरकारी नौकरियों का भी यही हाल होगा कि नौकरियाँ कुछ परिवारों तक सिमटने लगेंगी । यह केन्द्रीयकरण तो और भी अधिक घातक होगा।

महिला और पुरूष के बीच की दूरी क्या हो यह भी एक विषय है। यह दूरी यदि सीमा से अधिक बढ़ी तो नई पीढ़ी का सृजन रूकेगा और सीमा से अधिक घटी तो विध्वंस होगा। स्त्री और पुरूष की तुलना आग और बारूद से की जाती है। आग और बारूद की सीमा क्या हो यह तय करना आसान नहीं । इसलिये समाज ने सहमत स्त्री पुरूष के बीच की दूरी को न्यूनतम कर दिया और उसे पति पत्नी के रूप में भी मान्यता दे दी और वैश्यालय के रूप में भी। दूसरी ओर असहमत स्त्री पुरूष के बीच इस दूरी को अधिकतम कर दिया यहाँ तक कि परिवार में भी। वर्तमान व्यवस्था इस दूरी की सीमाओं के निर्धारण में खिलवाड़ कर रही है। सहमत स्त्री पुरूषों के बीच दूरी बढ़ाई जा रही है वैश्यालय या बार बालाओं पर रोक लगाकर तो असहमतों के बीच दूरी घटाई जा रही है सहशिक्षा प्रोत्साहन या सरकारी नौकरी संसद आदि में आरक्षण देकर । यह दूरी घटेगी तो उससे होने वाली असुरक्षा भी सिर दर्द बनेगी ही। एक ओर आग और बारूद की दूरी घटाने का आनन्द और दूसरी ओर रूचिका राठौर या नारायण दत्त तिवारी विध्वंस पर हाय तोबा एक साथ कैसे संभव है।

महिला आरक्षण विधेयक की समीक्षा में हमें प्राथमिकताएँ तय करनी होंगी कि हम भारत में चरित्र पतन भ्रष्टाचार आदि को पहली प्राथमिकता मानते हैं या महिला पुरूष असमानता को ।  यह असमानता जन जागृति से कम होने में लम्बा समय लगेगा किन्तु दुष्प्रभाव नहीं होगा। यदि यह काम कानून से होगा तो जल्दी होगा और अनेक समस्याएँ पैदा करेगा। मैं तो इस मत का हॅू कि यदि महिला पुरूष असमानता जल्दी दूर हो और वर्ग विद्वेष को बढ़ावे, अधिकार सक्षम परिवारों तक केन्द्रित करे तथा धूर्तता को मजबूत करे तो यह प्रयास लाभ कम और हानि अधिक करेगा। ऐसी जल्दबाजी से बचना चाहिये । पुरूष प्रधानता धीरे धीरे कम हो और परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर न हो यह अधिक सुरक्षित मार्ग होगा ।

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