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महिला आरक्षण : समस्या या समाधान

Posted By: admin on May 6, 2010 in Recent Topics - Comments: No Comments »

किसी भी समस्या के समाधान के पूर्व समस्या की पहचान, कारण, समाधान के लाभ और हानि की समीक्षा स्वाभाविक है। महिला आरक्षण के विषय पर भी देश भर में समीक्षा हो रही है।

सिद्धान्त रूप में आरक्षण घातक होता है। हजारों वर्ष पूर्व परिवार में पुरूष प्रधानता आरक्षण के रूप में स्थापित हुई तथा उस प्रधानता ने समाज में भी पुरूष प्रधान व्यवस्था का स्वरूप ग्रहण कर लिया । महिला और पुरूष दो वर्ग के रूप में स्थापित होने लगे । महिलाओं की क्षमता और योग्यता की सीमाएँ निर्धारित हुई जो पुरूषों द्वारा अपने पक्ष में बनाई गई । दुष्ट प्रवृत्ति पुरूषों द्वारा ऐसी पुरूष प्रधानता का दुरूपयोग स्वाभाविक था । दुष्ट प्रवृत्ति पुरूषों ने इसका लाभ भी खूब उठाया । इस्लाम में तो ऐसे एकपक्षीय नियम ही बना दिये गये कि परिवार में मालिक पति होगा किन्तु हिन्दुत्व में भी पुरूष मुखिया की व्यवस्था मालिक से कोई बहुत कम नहीं रही ।

इस समाज व्यवस्था को तोड़ने के नाम से महिला उत्पीड़न रोकने के अनेक कानून बने । महिला आरक्षण प्रयास उसी की एक कड़ी है। निसंदेह ऐसे प्रयत्नों से पुरूष प्रधान व्यवस्था टूटेगी और महिलाओं को आगे आने का अवसर मिलेगा । किन्तु विचारणीय प्रश्न यह भी है कि इन प्रयत्नों का संपूर्ण समाज व्यवस्था पर क्या और कितना प्रभाव पडेगा । एक सर्वेक्षण के अनुसार ऐसे कानूनों का सर्वाधिक लाभ धूर्त महिलाओं ने उठाया है। यहाँ तक कि धूर्त पुरूषों ने भी शरीफ पुरूषों के उत्पीड़न के उद्देश्य से महिला उत्पीड़न प्रावधानों का भरपूर दूरूपयोग किया । कुल मिलाकर वर्ग विद्वेष व वर्ग संघर्ष मजबूत हुआ और वर्ग समन्वय टूटा । परिवार व्यवस्था में भी टूटन बढ़ने लगी । वर्तमान महिला आरक्षण विधेयक इस टूटन को और अधिक बढ़ाएगा ।

वर्तमान आरक्षण विधेयक का एक और दुष्प्रभाव होगा । कानूनी अधिकार सक्षम परिवारों की ओर केन्द्रित हो जायेंगे। पहले संसद में यदि चार सौ परिवारों का प्रतिनिधित्व था तो वह अब घटकर तीन सौ परिवारों तक सिमट जायेगा । यदि युवको को भी आरक्षण दे दिया जाय तो फिर तो और भी सुविधा हो जायेगी, सौ परिवारों की ही ठेकेदारी में संसद सिमट जायेगी । सरकारी नौकरियों का भी यही हाल होगा कि नौकरियाँ कुछ परिवारों तक सिमटने लगेंगी । यह केन्द्रीयकरण तो और भी अधिक घातक होगा।

महिला और पुरूष के बीच की दूरी क्या हो यह भी एक विषय है। यह दूरी यदि सीमा से अधिक बढ़ी तो नई पीढ़ी का सृजन रूकेगा और सीमा से अधिक घटी तो विध्वंस होगा। स्त्री और पुरूष की तुलना आग और बारूद से की जाती है। आग और बारूद की सीमा क्या हो यह तय करना आसान नहीं । इसलिये समाज ने सहमत स्त्री पुरूष के बीच की दूरी को न्यूनतम कर दिया और उसे पति पत्नी के रूप में भी मान्यता दे दी और वैश्यालय के रूप में भी। दूसरी ओर असहमत स्त्री पुरूष के बीच इस दूरी को अधिकतम कर दिया यहाँ तक कि परिवार में भी। वर्तमान व्यवस्था इस दूरी की सीमाओं के निर्धारण में खिलवाड़ कर रही है। सहमत स्त्री पुरूषों के बीच दूरी बढ़ाई जा रही है वैश्यालय या बार बालाओं पर रोक लगाकर तो असहमतों के बीच दूरी घटाई जा रही है सहशिक्षा प्रोत्साहन या सरकारी नौकरी संसद आदि में आरक्षण देकर । यह दूरी घटेगी तो उससे होने वाली असुरक्षा भी सिर दर्द बनेगी ही। एक ओर आग और बारूद की दूरी घटाने का आनन्द और दूसरी ओर रूचिका राठौर या नारायण दत्त तिवारी विध्वंस पर हाय तोबा एक साथ कैसे संभव है।

महिला आरक्षण विधेयक की समीक्षा में हमें प्राथमिकताएँ तय करनी होंगी कि हम भारत में चरित्र पतन भ्रष्टाचार आदि को पहली प्राथमिकता मानते हैं या महिला पुरूष असमानता को ।  यह असमानता जन जागृति से कम होने में लम्बा समय लगेगा किन्तु दुष्प्रभाव नहीं होगा। यदि यह काम कानून से होगा तो जल्दी होगा और अनेक समस्याएँ पैदा करेगा। मैं तो इस मत का हॅू कि यदि महिला पुरूष असमानता जल्दी दूर हो और वर्ग विद्वेष को बढ़ावे, अधिकार सक्षम परिवारों तक केन्द्रित करे तथा धूर्तता को मजबूत करे तो यह प्रयास लाभ कम और हानि अधिक करेगा। ऐसी जल्दबाजी से बचना चाहिये । पुरूष प्रधानता धीरे धीरे कम हो और परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर न हो यह अधिक सुरक्षित मार्ग होगा ।

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