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मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

भाजपा का सैद्धान्तिक समझौता

Posted By: kaashindia on May 6, 2010 in Uncategorized - Comments: No Comments »

सर्व विदित है कि तानाशाही में आसानी से व्यवस्था स्थापित की जाती है साथ ही इसमें अनुशासन व चरित्र एक विशेष दिशा में बढ़ता जाता है। यदि तानाशाह की नीति व नीयत भलाई की हो तो वह बहुत आसानी से सही दिशा में व्यवस्था दे सकता है किन्तु यदि उसकी नीति या नीयत में कोई खोट हो तो उतनी ही तेजी से समाज को गुलाम भी बना सकता है।

संपूर्ण भारत में सिर्फ दो ही दल लोकतांत्रिक व्यवस्था से चल रहे है – 1) जे.डी.यू   2) भारतीय जनता पार्टी । शेष सभी दल तानाशाही के रूप में अपने दल का नेतृत्व कर रहे है। लोकतंत्र जहां जीवन पद्धति में न आकर शासन पद्धति में आता है वहां अव्यवस्था निश्चित है। भारतीय राजनीति तथा उसके सभी राजनैतिक दल शासन पद्धति वाले लोकतंत्र को आधार बनाकर चलते है। परिणाम होता है अव्यवस्था । यही हुआ दोनों पार्टियो के साथ। जे.डी.यू लोकतंत्र पर अडिग रहकर अव्यवस्थित है। स्वतंत्रता के बाद साठ वर्षो तक भाजपा भी लोकतंत्र के कारण अव्यवस्थित होकर टूटती जुटती रही क्योंकि कभी अटल जी लोकतंत्र को मजबूत करने लगते थे तो कभी संघ व्यवस्था को मजबूत करने लगता था । अब जबकि संघ का पूरा नियंत्रण भाजपा पर हो चुका है, अटल जी वृद्ध होकर अलग-थलग हो चुके है वैसी स्थिति में भाजपा पुनः अनुशासित होकर अपने लोकतंत्र से समझौता करके पुनः केन्द्रित व्यवस्था के आधार पर खड़ा होने की कोशिश करेगी । उम्मीद है कि इस दिशा में चल कर वह तेजी से एक तानाशाह अनुशासित व्यवस्थित व सक्रिय पार्टी बन जायेगी। यह परिवर्तन भाजपा को पुनर्जीवित कर सकता है किन्तु क्या यह समाज के लिये उचित होगा ? इस तानाशाही के प्रभाव से उसका मुख्य नियंत्रक संघ भी अछूता नही रह सकेगा। आज भी सर्वाधिक अच्छे व नैतिक व्यक्ति संघ से जुडे़ हुये है। क्या वे भाजपा के चरित्र पतन को रोक पायेंगे जो असंभव दिखता है । स्वाभाविक है कि संघ में आन्तरिक असंतोष और अव्यवस्था होगी। क्योकि भाजपा के परिणाम से संघ को प्रभावित होते देखकर संघ के प्रति समर्पित लोगों को उत्तर देना कठिन होगा ।

क्या हमें यह मान लेना चाहिये कि जनसंघ या भाजपा के जन्म से ही भाजपा ने लोकतंत्रीय व्यवस्था की जो मसाल जलाई थी वह लोकतंत्रीय दुष्परिणामों से डरकर थक कर हार गई है और आंतरिक व्यवस्था में तानाशाही के रूप में चलने को मजबूर हो गई है।

यदि ऐसा है तो भाजपा क्यो श्रेष्ठ है क्यो हम उससे जुड़ाव रखे। जब अन्य पार्टी जैसा उसे भी रहना है तो क्यो न हम उस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को देखकर उसके पक्ष चले जो राष्ट्र के लिये अच्छा कार्य करे, जो समाज के लिये अच्छा कार्य करे। जो समाज की शक्तियों का केन्द्रीयकरण न करके उन्हें विकेन्द्रीत करे एवं समाज के हर व्यक्ति को मजबूत करे । यदि अन्य कोई पार्टी ऐसा समाज सशक्तिकरण का कार्य करे तो व्यक्ति को उसी पार्टी के साथ जुड़ना चाहिये जो अधिकतम आजादी प्रदान करें । मेरा विचार है कि या तो हम तटस्थ होकर ऐसे दल की समीक्षा करे या कोई अन्य विकल्प खोजने का प्रयत्न करे ।

महिला आरक्षण का विरोध क्यों ?

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मैंने अपने पिछले लेख में महिला आरक्षण का इसलिए विरोध किया था क्योंकि ऐसा आरक्षण स्त्री और पुरुष के बीच पूरक के भावना को कमजूर करके प्रतिस्पर्धा की भावना को बढ़ाएगा पर ऐसी प्रतिस्पर्धा की भावना पारिवारिक एकता के लिए घातक होगी | किन्तु में महिला आरक्षण के वर्तमान विरोध के तो और भी अधिक विरुद्ध हूँ क्योंकि यह विरोध पारिवारिक भावना से भी बहुत अधिक नीचे जाकर व्यक्तिगत स्वार्थ भाव को मजबूत करता है | महिला आरक्षण विरोधियों के तर्क भी गलत हैं और नीयत भी | उनके तर्क इसलिए गलत है क्योंकि वे आरक्षण में भी और आरक्षण की मांग करके आरक्षण भावना विस्तार के पक्षधर बन रहे हैं | दूसरी और उनके विरोध के पीछे उनका यह स्वार्थ भी छीपा है कि वे कहीं व्यक्तिगत रूप से बेदखल न होजाएं | वे कभी नही चाहेंगे कि उन्हें बेदखल करके उनकी पत्नी भी वह स्थान पा ले | आरक्षण के कारण कहीं वे स्वयं भी बहार हो जावें और पत्नी भी न आवे तब तो उनके लिए जीवन मरण का प्रश्न हो गया  | ऐसे लोगों कि सोच इतनी पतित है कि वे पति पत्नी को एक दुसरे का पूरक न मानकर पत्नी को अपना पूरक तथा समाज को अपने परिवार का पूरक बनाना चाहते हैं |
महिला आरक्षण योजना कुल मिलाकर समाज व्यवस्था को छति पहुचाकर सक्षम परिवारों को सशक्त करने का षड़यंत्र है | इसका विरोध इस उद्देश्य से होना चाहिय | साथ ही महिला आरक्षण का वर्तमान विरोध व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किया जाने वाला व्यक्तिगत षड़यंत्र है इसलिए ऐसे विरोध को किसी भी स्थिति में सफल नही होने देना चाहिए | मेरा कहने का आशय यह हे कि महिला आरक्षण विरोधियों का पूरी तरह विरोध करना चाहिये यदि उनका विरोध सैद्धांतिक न होकर स्वार्थ पूर्ण दिशा में दिखता हो | इसीलिए महिला आरक्षण सम्बन्धि पिछले लेख में मैंने यहाँ तक लिख दीया था कि महिला आरक्षण का सैद्धांतिक विरोध करना चाहिए और यदि देना  आवश्यक ही दीखे तो कुछ वर्षों के लिए सो प्रतिशत आरक्षण भले ही दे दे किन्तु वर्तमान आरक्षण का समर्थन न करे|

महिला आरक्षण : समस्या या समाधान

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किसी भी समस्या के समाधान के पूर्व समस्या की पहचान, कारण, समाधान के लाभ और हानि की समीक्षा स्वाभाविक है। महिला आरक्षण के विषय पर भी देश भर में समीक्षा हो रही है।

सिद्धान्त रूप में आरक्षण घातक होता है। हजारों वर्ष पूर्व परिवार में पुरूष प्रधानता आरक्षण के रूप में स्थापित हुई तथा उस प्रधानता ने समाज में भी पुरूष प्रधान व्यवस्था का स्वरूप ग्रहण कर लिया । महिला और पुरूष दो वर्ग के रूप में स्थापित होने लगे । महिलाओं की क्षमता और योग्यता की सीमाएँ निर्धारित हुई जो पुरूषों द्वारा अपने पक्ष में बनाई गई । दुष्ट प्रवृत्ति पुरूषों द्वारा ऐसी पुरूष प्रधानता का दुरूपयोग स्वाभाविक था । दुष्ट प्रवृत्ति पुरूषों ने इसका लाभ भी खूब उठाया । इस्लाम में तो ऐसे एकपक्षीय नियम ही बना दिये गये कि परिवार में मालिक पति होगा किन्तु हिन्दुत्व में भी पुरूष मुखिया की व्यवस्था मालिक से कोई बहुत कम नहीं रही ।

इस समाज व्यवस्था को तोड़ने के नाम से महिला उत्पीड़न रोकने के अनेक कानून बने । महिला आरक्षण प्रयास उसी की एक कड़ी है। निसंदेह ऐसे प्रयत्नों से पुरूष प्रधान व्यवस्था टूटेगी और महिलाओं को आगे आने का अवसर मिलेगा । किन्तु विचारणीय प्रश्न यह भी है कि इन प्रयत्नों का संपूर्ण समाज व्यवस्था पर क्या और कितना प्रभाव पडेगा । एक सर्वेक्षण के अनुसार ऐसे कानूनों का सर्वाधिक लाभ धूर्त महिलाओं ने उठाया है। यहाँ तक कि धूर्त पुरूषों ने भी शरीफ पुरूषों के उत्पीड़न के उद्देश्य से महिला उत्पीड़न प्रावधानों का भरपूर दूरूपयोग किया । कुल मिलाकर वर्ग विद्वेष व वर्ग संघर्ष मजबूत हुआ और वर्ग समन्वय टूटा । परिवार व्यवस्था में भी टूटन बढ़ने लगी । वर्तमान महिला आरक्षण विधेयक इस टूटन को और अधिक बढ़ाएगा ।

वर्तमान आरक्षण विधेयक का एक और दुष्प्रभाव होगा । कानूनी अधिकार सक्षम परिवारों की ओर केन्द्रित हो जायेंगे। पहले संसद में यदि चार सौ परिवारों का प्रतिनिधित्व था तो वह अब घटकर तीन सौ परिवारों तक सिमट जायेगा । यदि युवको को भी आरक्षण दे दिया जाय तो फिर तो और भी सुविधा हो जायेगी, सौ परिवारों की ही ठेकेदारी में संसद सिमट जायेगी । सरकारी नौकरियों का भी यही हाल होगा कि नौकरियाँ कुछ परिवारों तक सिमटने लगेंगी । यह केन्द्रीयकरण तो और भी अधिक घातक होगा।

महिला और पुरूष के बीच की दूरी क्या हो यह भी एक विषय है। यह दूरी यदि सीमा से अधिक बढ़ी तो नई पीढ़ी का सृजन रूकेगा और सीमा से अधिक घटी तो विध्वंस होगा। स्त्री और पुरूष की तुलना आग और बारूद से की जाती है। आग और बारूद की सीमा क्या हो यह तय करना आसान नहीं । इसलिये समाज ने सहमत स्त्री पुरूष के बीच की दूरी को न्यूनतम कर दिया और उसे पति पत्नी के रूप में भी मान्यता दे दी और वैश्यालय के रूप में भी। दूसरी ओर असहमत स्त्री पुरूष के बीच इस दूरी को अधिकतम कर दिया यहाँ तक कि परिवार में भी। वर्तमान व्यवस्था इस दूरी की सीमाओं के निर्धारण में खिलवाड़ कर रही है। सहमत स्त्री पुरूषों के बीच दूरी बढ़ाई जा रही है वैश्यालय या बार बालाओं पर रोक लगाकर तो असहमतों के बीच दूरी घटाई जा रही है सहशिक्षा प्रोत्साहन या सरकारी नौकरी संसद आदि में आरक्षण देकर । यह दूरी घटेगी तो उससे होने वाली असुरक्षा भी सिर दर्द बनेगी ही। एक ओर आग और बारूद की दूरी घटाने का आनन्द और दूसरी ओर रूचिका राठौर या नारायण दत्त तिवारी विध्वंस पर हाय तोबा एक साथ कैसे संभव है।

महिला आरक्षण विधेयक की समीक्षा में हमें प्राथमिकताएँ तय करनी होंगी कि हम भारत में चरित्र पतन भ्रष्टाचार आदि को पहली प्राथमिकता मानते हैं या महिला पुरूष असमानता को ।  यह असमानता जन जागृति से कम होने में लम्बा समय लगेगा किन्तु दुष्प्रभाव नहीं होगा। यदि यह काम कानून से होगा तो जल्दी होगा और अनेक समस्याएँ पैदा करेगा। मैं तो इस मत का हॅू कि यदि महिला पुरूष असमानता जल्दी दूर हो और वर्ग विद्वेष को बढ़ावे, अधिकार सक्षम परिवारों तक केन्द्रित करे तथा धूर्तता को मजबूत करे तो यह प्रयास लाभ कम और हानि अधिक करेगा। ऐसी जल्दबाजी से बचना चाहिये । पुरूष प्रधानता धीरे धीरे कम हो और परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था कमजोर न हो यह अधिक सुरक्षित मार्ग होगा ।

बजट का रोना

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बजट म जबूरी का रोना नही, सिद्धान्तों का आइना होना चाहिये। महिनों से प्रतीक्षित प्रणव मुखर्जी का केन्द्रीय बजट प्रस्तुत हुआ । बजट में हिम्मत तो दिखाई गई है किन्तु यथार्थ को छिपाया गया है। भारत का यथार्थ यही है कि उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्य उस सीमा तक बढ़ने चाहिये जहाँ तक कृषि और श्रमिक उत्पादन प्रभावित न हो।

भारत का यथार्थ यह भी है कि कृत्रिम उर्जा को उस सीमा तक मंहगा किया जाय कि श्रम की मांग बढ़ने लगे। दोनो ही मामलो में कांग्रेस सरकार यथार्थवादी मार्ग की ओर चलने का प्रयास तो कर रही है किन्तु यथार्थ को स्वीकार नही कर रही है। सरकार उत्पादन बढ़ाने के लिये मंहगाई बढ़ा रही है किन्तु यथार्थ को स्वीकार न करके मजबूरी में । सरकार डीजल पेट्रोल का मूल्य भी बढ़ा रही है किन्तु यथार्थ को स्वीकार न करके किसी तरह मजबूरी दिखाकर, रोते धोते ।

प्रस्तुत बजट में बड़ी मश्किल से दो तीन रूपया प्रति लीटर डीजल पेट्रोल का मूल्य बढ़ा, और उसे भी मजबूरी बताया जा रहा है। हमारे देश के अर्थशास्त्रियों ने सिर्फ पश्चिम के किताबों को पढ़ पढ़ कर अर्थशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की । भारत का श्रम शास्त्र कहता है कि कृत्रिम उर्जा श्रम की प्रतिस्पर्धी होती है और बुद्धिजीवियों की सहायक । हमारे अर्थशास्त्री श्रम और बुद्धि की तुलना में बुद्धि की ओर एकपक्षीय झुक जाते हैं। यह प्रवृति श्रम के साथ छल है। हमारी संपूर्ण अर्थनीति गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, किसान, के नाम पर पर इन चारो के छदम शोषण के मार्ग पर चल रही है। प्रणव मुखर्जी  के बजट ने इसके विरूद्ध हिम्मत तो दिखाई है किन्तु समझदारी नहीं दिखाई। समझदारी तो यह होती कि वे संसद के  बहाने समाज के समक्ष प्रस्ताव रखते कि कृत्रिम उर्जा पर बीस प्रतिशत मूल्य वृद्धि करके संपूर्ण प्राप्त राशि गरीबी रेखा के नीचे के पचीस करोड़ व्यक्तियों में बराबर बराबर बांट दी जायगी यह राशि करीब पांच सौ रूपया प्रति व्यक्ति प्रतिमाह होगी अर्थात वर्ष में एक परिवार के पांच आदमी को 72000 रू.। प्रणव दादा कल्पना तो करे कि जनता क्या चाहेगी। जनता पर आप बोझ बढ़ावे, और गुलछर्रे उढ़ावें, भ्रष्टाचार बढ़ावें शिक्षा पर बजट बढ़ावें, दिल्ली में खेल आयोजित  करावें । इसलिये टैक्स स्वीकार नहीं । टैक्स बढ़ाइये और ग्रामीण गरीब श्रमजीवी को दीजिये तो जनता आपका स्वागत करेगी ।
विपक्ष को न डीजल पेट्रोल की मूल्य वृद्धि की चिन्ता है न गरीब ग्रामीण श्रम जीवी की । वामपंथी दलों को खाड़ी देशो से मिलने वाली सहायता के कारण उनकी वकालत करनी ही पड़ती है। यदि डीजल पेट्रोल का मूल्य बढ़ने से खपत घटी तो खाड़ी देशो पर दुष्प्रभाव होगा । भाजपा को अर्थनीति का ज्ञान कभी हुआ ही नहीं । लालू मुलायम मयावती आदि मनमोहन सोनिया की बढ़ती प्रतिशत से चिन्तित है। सबकी अपनी अपनी मजबूरी है, कांग्रेस के विरूद्ध विपक्षी एक जुटता उनकी मजबूरी है। दूसरी ओर जीवन भर मंहगाई और डीजल पेट्रोल की मूल्य वृद्धि  के विरूद्ध  बोलने वाली कांग्रेस को भी यथार्थ स्वीकारने में कठिनाई है। यथार्थ यह है कि-
कृत्रिम उर्जा सस्ती हो यह बहुत बड़ा षड्यंत्र है,
श्रम का शोषण करने का यह पूंजीवादी मंत्र है।
फिर भी प्रणव मुखर्जी ने हिम्मत का काम तो किया ही है। इसके लिये उन्हें बधाई ही देनी चाहिये ।

राज ठाकरे और इतिहास के सबक

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जब भी किसी तात्कालिक उद्देश्य के लिये आवंछित लोगों को आगे बढाया जाता है तब उसके घातक परिणाम स्वयं को ही भुगतने पडते है। स्वतन्त्रन्ता के पूर्व संघ परिवार मे गाधीं जी के विरूद्ध जो वातावरण बना था वह संघ परिवार के नियन्त्रण से बाहर हो गया । परिणाम स्वरूप संघ परिवार की कोई  योजना न होते हुए भी गांधी जी की हत्या हो गई।

अमेरिका ने रूस को अफगानिस्तान से बाहर करने के उद्देश्य से लादेन को सशक्त किया था। लादेन अमेरिका के नियन्त्रण से बाहर हुआ और परिणाम आप सबके सामने है। इंदिरा जी ने सिख राजनीति से परेशान होकर सन्त भिण्डरा वाले को खडा किया। परिणाम सबके सामने है। आपरेशन ब्लूस्टार भी करना पड़ा और इन्दिरा जी की जान भी चली गई। इसी तरह राजीव गांधी ने श्रीलंका को अस्थिर करने हेतु प्रभाकरण को पाल पोसकर बड़ा किया था । प्रभाकरण भी राजीव गांधी का काल बन गया । इतिहास ऐसी अनेक घटनाओ से भरा पड़ा है । भले ही हम इतिहास से कोई अनुभव न प्राप्त करें।

वर्तमान कांग्रेस पार्टी शिवसेना को किसी तरह कमजोर करना चाहती थी उसने फिर से उसी भूल का सहारा लिया । राज ठाकरे को काग्रेस ने जिन्दा किया । जब राज ठाकरे बाल ठाकरे को कमजोर कर रहे थे और शिव सेना का मुद्दा छीन रहे थे तब कांग्रेस पार्टी की प्रसन्नता देखते ही बनती थी। हर कांग्रेसी इसी कार्य को अपनी बहुत बड़ी कामयाबी समझ रहा था । अब राज ठाकरे कांग्रेस से हटकर अलगाव की भाषा बोलने लगे है। बाल ठाकरे और राज ठाकरे के बीच मराठी जन भावना को उभारने की प्रतिस्पर्धा इस सीमा तक चली जायेगी कि महाराष्ट्र को भारत से अलग होने तक की आवाज उठने लगे तब कांग्रेस पार्टी की चिन्ता बढ़ी है। बाल ठाकरे शरीर से भी बुढ़े हो गये है और प्रतिष्ठा से भी । संघ परिवार को भी कुछ अकल आ गई है किन्तु राज ठाकरे जवान भी है और उभरती हुई ताकत भी । कांग्रेस के समक्ष कुऑ और खाई की स्थिति बनती जा रही है। यदि राज ठाकरे थोड़ा भी और अधिक शक्तिशाली हुआ तो वह किसी भी सीमा तक जा सकता है। न कांग्रेस उसे रोक सकेगी न ही देश की और ताकत। ऐसी स्थिति भयावह होगी और उसका क्या परिणाम होगा यह अभी बताना सम्भव नही । किन्तु इतना अवश्य बताया जा सकता है  कि परिणाम न देश के हित मे होगा न ही कांग्रेस पार्टी के हित में।

महापुरूषो की इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिये कि तात्कालिक उद्देश्यों के लिये अवांछित तत्वों को प्रोत्साहन हमेशा कष्टकारक ही होते है।

धर्म

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धर्म की परिभाशा है “ व्यक्ति के किसी अन्य के हित में किया गया जाने वाला नि:स्वार्थ कार्य । धर्म हमेशा ही व्यक्तिगत रहा है। धर्म हमेशा कर्तव्य तक सीमित रहा है। धर्म न कभी संगठन के रूप में रहा है न ही उसकी कोई अधिकार के रूप में उपयोगिता रही है। बुद्ध के समय पहली बार धर्म ने संगठन बनाना ‘ाुरू किया अन्यथा बुद्ध के पहले तो संगठन सम्प्रदाय ही होती था । उसके पूर्व धर्म के साथ न कोई पूजा पद्धति जुडी होती न ही ईश्वर आराधाना । नास्तिक भी धर्म मान्य हुआ करता था ।
इशुमसीह तथा इस्लाम ने धर्म को विशेश रूप से पूजा पद्धति से जोड़ा और बुद्ध के संगठन की नीति को विस्तार दिया । परिणाम हुआ कि धर्म कर्तव्य से हटकर अधिकारों के साथ जुडा । अब तो स्थिति यहॉ तक आ गई है कि धर्म के आधार पर बने संगठन सिर्फ अपने संख्या विस्तार को ही धर्म मानने लग गये है। भारत में धर्म प्रचार का सर्वश्रेश्ठ आधार तर्क या विचार मन्थन तक सीमित था। पिश्चम ने उसके स्थान पर धन सेवा प्रेम और सदभाव को महत्व दिया और इस्लाम ने संगठन ‘ाक्ति और तरवार को । भारतीय तर्क व्यवस्था पर या तलवार की ताकत भारी पड़ी।  आचरण, चरित्र, धर्म की नई प्रस्तुति की सफलता  को देख देख कर हिन्दू धर्मावलिम्बयों के कुछ समूह भी संगठन, ईश्वर पूजा पद्धति को आधार बनाकर अन्य धर्म कहे जाने वाले साम्प्रदायों से प्रतिस्पर्धा करने लगें है। ये भी धर्म प्रचार के लिये तर्क और विचार मन्थन की जगह संगठन ‘ाक्ति या बल प्रयोग का सहारा लेने लगें है। जिस तरह पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर अमानवीय अत्याचार और हत्याएं हुई है, उसी दिशा में भारत भी लगतार बढ़ता जा रहा है जो धर्म का एक निकृश्टम स्वरूप है।
आवश्यकता यह है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप भी समाज के समक्ष आवे और वह सिर्फ आदशZ मात्र न होकर इतना व्यावहारिक हो कि उसके समक्ष साम्प्रदायिक ‘ाक्तियॉ कमजोर हो जावें । इसलिये आज धर्म के मामले में भी समाज को एक नई दिशा की आवश्यकता है ।

राजनीति

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भारत सहित दुनिया के अनेक विद्वानों ने एक ओर राजनीति को धूर्तता का खेल बताया है तो कुछ दूसरो ने व्यवस्था का अनिवार्य अंग । मेरे विचार में राजनीति को यदि अनियन्त्रित रूप में स्वतन्त्र छोड़ दिया जावें तो वह सत्ता संधशZ का माध्यम बन जाती है और यह संधशZ ही धूर्तता के खेल मे बदल जाता है। यदि राजनीति पर समाज का अंकुश हो तो राजनीति समाज विरोधी तत्वो पर नियन्त्रण का आधार बन जाया करती है।
भारतीय राजनीति ने जन्म काल से ही समाज को आठ आधारों पर विभाजित करके स्वयं को इतना स्वतन्त्र बनाने की कोशिश की और जिसमें वे सफल भी रहे कि समाज व्यवस्था ही छिन्न भिन्न होने लगी । परिणाम यह हुआ कि राजनीति पर समाज का कोई नियन्त्रण नहीं रहा और वह “धूर्तता का खेल“ में बदल गई है। राजनीति, भ्रश्टाचार और अपराध एक दूसरे के पूरक बन चुके है। अच्छे लोग राजनीति से असफल बाहर निकल रहे है अथवा अपमानित होकर निकाले जा रहे है। सत्ता के केन्द्रीयकरण भ्रश्टाचार का एक सबसे बडा आधार है। आज की राजनीति सत्ता को तो अधिक से अधिक केन्द्रीत करती रहती है और भ्रश्टाचार रोकने का नाटक करती रहती है जो सम्भव ही नहीं है।
वर्तमान राजनीति में किसी प्रकार का कोई सुधार तब तक सम्भव नहीं जब तक उसकी संग्रह की भूख न मिटा दी जाय और यह भूख तब तक नहीं मिट सकती जब तक उस पर समाज का अंकुश न हों । इस अंकुश के प्रयास का नाम ही है लोक स्वराज्य ।

आतंकवाद और हमारे राष्ट्र भक्त

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आज दिल्ली बम ब्लास्ट काण्ड का एक आरोपी आजमगढ़ से ही पकड़ा गया । उसी आजमगढ़ से जिसकी चर्चा पिछले वर्ष बाटला हाउस मुठभेड़ काण्ड में मारे गये मुस्लिम युवक के साथ साथ सम्पूर्ण भारत में इस तरह हुई थी कि आजमगढ़ जिले का संजरपुर गांव और निकटवर्ती कुछ गांव पूरे भारत में मुस्लिम आतंकवाद के केन्द्र बने हुये है। उस समय कुछ देश भक्त मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह, जामिया मिलिया के कुलपति मुनिरूल हसन, सबाना आजमी तथा बड़ी मात्रा  में मानवाधिकार कार्यकर्त्ताओं ने उक्त प्रचार को असत्य कहकर आजमगढ़ जिले को बदनाम करने की साजिश बताया था । हद तो तब हुई जब इन लोगो ने ‘शहीद पुलिस इंस्पेक्टर की ‘शहादत पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया था । एक केन्द्रीय मन्त्री ए. आर. अन्तुले तक ने उनका साथ दिया था । घटनाएं स्पष्ट है कि उक्त संजर पुर गांव के कुछ मुस्लिम युवकों की पोल खुलते ही सम्पूर्ण भारत में हो रहे सिलसिलेवार बम धमाके बन्द हो गये । सिद्ध हो गया कि बम धमाकों के तार आजमगढ़ जिले के मुस्लिम युवकों के साथ जुड़े थे और युवकों के तार मुलायम अमर सहित पेशेवर मानवाधिकारवादियों के साथ ।

आतंकवाद की दूसरी घटना की चर्चा तीन दिन पूर्व ही समाचारों में आई कि दो तीन वर्ष पूर्व हिन्दू आतंकवाद के लिये गिरफ्तार प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पूरोहित ने अपनी आतंकवादी घटनाओं के लिये पाकिस्तान के मुस्लिम आतंकवादियों तक की सहायता ली थी । उस समय जब प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित प्रकाश में आये तब संध शिव सेना तथा भाजपा के लोग इन आतंकवादियों के समर्थन में उठ खडे हुये थे  । इन लोगो ने भी उस बेचारे हेमन्त करकरे को गद्दार कह दिया था जिसने इस काण्ड का पर्दाफाश किया था और जो कुछ माह बाद ही बम्बई आतंकवादी हमले मे मारा गया । इन दोनों आतंकवादी हिन्दुओं की करतूतो से पहली बार हिन्दू समाज का सर झुका था किन्तु बेशर्म गिरोह बाज फिर भी सर उठाकर चलते रहे । यहॉ तक पोल खुली थी कि प्रज्ञा और पुरोहित ने इन्द्रेश जी सहित संघ के दो उच्च पदाधिकारियों की हत्या की योजना इसलिये बनाई थी कि ये दोनो संघ पदाधिकारी हिन्दू मुस्लिम मेल मिलाप की बात करते है। दुख होता है जब संघ शिव सेना ऐसे आतंकवादियों के समर्थन में खड़ी होती है। कर्नल पुरोहित की संलिप्तता की जानकारी  पाकिस्तान के एक मन्त्री ने भारत सरकार को दी । इस संबंघ में हमारे कर्नल पुरोहित समर्थकों को स्थिति स्पष्ट करानी चाहिये ।

विचार करिये कि बाटला हाउस घटना में मारे गये मोहन लाल ‘शर्मा और प्रज्ञा पुरोहित की पोल खोलने वाले हेमन्त करकरे जैसे ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ अफसरों की प्रशंसा पूजा सम्मान की जगह मुलायम अमर सिंह सुदर्शन बाल ठाकरे इसलिये बदनाम करे क्योकि इन लोगों ने साम्प्रदायिकता की दो दुकाने खोल रखी है और दोनो पक्षो के इनके ग्राहकों की पोल खुल रही है। तो दो ‘शहीद अफसरों के परिवार क्या सोचते होगें । इन दोनो गुटो में ‘शामिल हिन्दू और मुसलमान कितने चरित्रवान है ? कितने देश भक्त है ? आज यह विचार करने का समय है कि समाज इन पेशेवर दुकानदारों की खुली दुकानों से कैसे मुक्त हो ? दोनों घटनाओं का संक्षिप्त विवरण कई वर्ष पूर्व प्रकाशित ज्ञानतत्व 165 तथा 169 के शीर्ष लेखों में भी पढ़े ।

संविधान – गोरों की गुलामी से अपनों की गुलामी तक

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संविधान:-</strong> राज्य के अधिकार, हस्तक्षेप तथा दायित्व की अधिकतम सीमाएं निश्चित करने वाले दास्तावेज को संविधान कहते है।

संविधान और कानून अलग अलग होते है । संविधान में राज्य के अधिकतम और समाज के न्यूनतम अधिकारों की सीमाएं निश्चित होती है जबकि कानून मे राज्य के न्यूनतम और समाज क अधिकतम अधिकारों की सीमाएं निश्चित होती है।

<strong>वर्तमान संविधान निम्न कारण से असफल हुआ -</strong>

1.     अपराध नियन्त्रण की अपेक्षा जनकल्याण को प्राथमिकता ।

2.    अस्पष्ट भाषा, द्विअर्थी भाषा, अधिकाधिक Interpretations

3.    अस्पष्ट उद्देश्य, धाराओं के बीच contradiction

4.    वर्ग मान्यता ।

5.    उच्च आदर्श वादी स्वरूप ।

6.    व्यवस्था की इकाईयों में परिवार का अभाव ।

7.    राज्य की भूमिका मैनेजर की न होकर कस्टोडियन की होना ।

दोष किसका:-संविधान की अपेक्षा लागू करने वालों को दोश देने का कार्य हास्यप्रद और वैसा ही बेतुका है जैसे पागल खाने के डाक्टर का यह तर्क कि रोगी उसके समझता हीं नहीं । संविधान की आवश्यकता ही ऐसे गलत चरित्र वालों पर नियन्त्रण हेतु हैं। यदि सब लोग स्वयं ही ठीक हो जावें तो संविधान की आवश्यकता ही क्या है?

समाधान

समाज सम्पूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व करता है और सरकार समाज का । अत: सम्पूर्ण विश्व का एक ही संविधान होना चाहिये और एक ही सरकार । समाज का कोई स्थिर स्वरूप न होने से राष्ट ने स्वयं को समाज घोषित कर दिया जो अस्थायी स्वरूप है।

किसी भी संविधान की सफलता की एक मात्र कसौटी है ‘शासन द्वारा व्यक्ति के मूल अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी । यदि चरित्र पतन होता है तो वह संविधान की विफलता मानी जायेगी ।

संविधान संशोधन :- देश के समाज ‘शास्त्रियों को मिल जुलकर संविधान के मूल तत्वों पर विचार मन्थन करके कुछ निष्कर्ष  निकालने चाहिये ।

समाज : – मैं टूट रहा हूँ

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भारत दुनिया में एक मात्र ऐसा देश है जहॉ समाज सर्वोच्च होता है अन्यथा पिश्चम के देशों में व्यक्ति, इस्लाम में धर्म तथा साम्यवाद में राज्य ही सर्वोच्च मना जाता हैं ।
भारत कई सौ सालों तक गुलाम रहने के बाद भी अपने समाज व्यवस्था को बचाने मे सफल रहा । इस्लाम या अंग्रेज हमारी परिवार व्यवस्था ग्राम व्यवस्था को तोड़ नही पाये । किन्तु स्वतन्त्रता के बाद भारत की समाज व्यवस्था को लगातार तोडा जा रहा है या कमजोर किया जा रहा है। धर्म, जाति, भाशा, क्षेत्रवाद, उम्र, लिंगभेद, गरीब-अमीर, उत्पादक-उपभोक्ता के आधारों पर समाज व्यवस्था, परिवार व्यवस्था को लगातार तोड़ा जा रहा है और इनके टूटने का सारा दोश समाज पर डाला जा रहा है।
जबकि सच्चाई यह है कि समाज टूट नही रहा बल्कि इसलिये तोडा जा रहा है कि  समाज को गुलाम बनाकर रखने वालों को समाजिक एकता से भय है। अब तो स्थिति यहॉ तक आ गई है कि एक ओर तो राज्य ने स्वयं को समाज का वैद्य प्रतिनिधि घोषित कर दिया है तो दूसरी ओर धर्म, जाति आदि समाज तोडक संगठन भी स्वयं को समाज कहने में पीछे नही रहते । समाज व्यवस्था संकट में है। धर्म, धन, राज्य और अपराध पूरी समाज व्यवस्था को नियन्त्रण में करने की प्रतिस्पर्धा में लगे है।
यदि समाज व्यवस्था नही बची तो न धर्म बचेगा न धन । चारो ओर या तो तानाशाही का खतरा है या अराजकता का । आवश्यकता यह है कि समाज को एक ऐसी दिशा मिले जो कि वर्ग विद्वेश, हिंसा तथा राज्य की गुलामी की मानसिकता को छोड़कर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व खड़ा हो सके । ऐसी नई दिशा के लिये ही……………………..

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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