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मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;दुनियां का प्रत्येक व्य...
मंथन क्रमांक-112 ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;धर्म शब्द के अनेक अर्...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय– बजरं मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;आदर्श वर्ण व्यवस्था में ...
मंथन क्रमाॅक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते हैं। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता हैं;किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता हैं, किये जाने वाले कार्य न करना अन...
मंथन क्रमांक 109- आरक्षण- बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमज...
मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगा...
मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

राजनीति का सच

Posted By: kaashindia on May 6, 2010 in Uncategorized - Comments: No Comments »

भारत सहित दुनिया के अनेक विद्वानों ने एक ओर राजनीति को धूर्तता का खेल बताया है तो कुछ दूसरो ने व्यवस्था का अनिवार्य अंग । मेरे विचार में राजनीति को यदि अनियन्त्रित रूप में स्वतन्त्र छोड़ दिया जावें तो वह सत्ता संघर्ष  का माध्यम बन जाती है और यह संघर्ष ही धूर्तता के खेल मे बदल जाता है। यदि राजनीति पर समाज का अंकुश हो तो राजनीति समाज विरोधी तत्वो पर नियन्त्रण का आधार बन जाया करती है।
<strong>भारतीय राजनीति ने जन्म काल से ही समाज को आठ आधारों पर विभाजित करके स्वयं को इतना स्वतन्त्र बनाने की कोशिश की और जिसमें वे सफल भी रहे कि समाज व्यवस्था ही छिन्न भिन्न होने लगी । परिणाम यह हुआ कि राजनीति पर समाज का कोई नियन्त्रण नहीं रहा और वह “धूर्तता का खेल“ में बदल गई है। राजनीति, भ्रश्टाचार और अपराध एक दूसरे के पूरक बन चुके है। अच्छे लोग राजनीति से असफल बाहर निकल रहे है अथवा अपमानित होकर निकाले जा रहे है।</strong> सत्ता के केन्द्रीयकरण भ्रश्टाचार का एक सबसे बडा आधार है। आज की राजनीति सत्ता को तो अधिक से अधिक केन्द्रीत करती रहती है और भ्रश्टाचार रोकने का नाटक करती रहती है जो सम्भव ही नहीं है।
वर्तमान राजनीति में किसी प्रकार का कोई सुधार तब तक सम्भव नहीं जब तक उसकी संग्रह की भूख न मिटा दी जाय और यह भूख तब तक नहीं मिट सकती जब तक उस पर समाज का अंकुश न हों । इस अंकुश के प्रयास का नाम ही है लोक स्वराज्य ।

धर्म :- मैं किधर जाऊं

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धर्म की परिभाशा है “ व्यक्ति के किसी अन्य के हित में किया गया जाने वाला नि:स्वार्थ कार्य । धर्म हमेशा ही व्यक्तिगत रहा है। धर्म हमेशा कर्तव्य तक सीमित रहा है। धर्म न कभी संगठन के रूप में रहा है न ही उसकी कोई अधिकार के रूप में उपयोगिता रही है। बुद्ध के समय पहली बार धर्म ने संगठन बनाना शुरू किया अन्यथा बुद्ध के पहले तो संगठन सम्प्रदाय ही होती था । उसके पूर्व धर्म के साथ न कोई पूजा पद्धति जुडी होती न ही ईश्वर आराधाना । नास्तिक भी धर्म मान्य हुआ करता था ।
इशुमसीह तथा इस्लाम ने धर्म को विशेश रूप से पूजा पद्धति से जोड़ा और बुद्ध के संगठन की नीति को विस्तार दिया । परिणाम हुआ कि धर्म कर्तव्य से हटकर अधिकारों के साथ जुडा । अब तो स्थिति यहॉ तक आ गई है कि धर्म के आधार पर बने संगठन सिर्फ अपने संख्या विस्तार को ही धर्म मानने लग गये है। भारत में धर्म प्रचार का सर्वश्रेश्ठ आधार तर्क या विचार मन्थन तक सीमित था। पिश्चम ने उसके स्थान पर धन सेवा प्रेम और सदभाव को महत्व दिया और इस्लाम ने संगठन व्यक्ति और तरवार को । भारतीय तर्क व्यवस्था पर या तलवार की ताकत भारी पड़ी।  आचरण, चरित्र, धर्म की नई प्रस्तुति की सफलता  को देख देख कर हिन्दू धर्मावलिम्बयों के कुछ समूह भी संगठन, ईश्वर पूजा पद्धति को आधार बनाकर अन्य धर्म कहे जाने वाले साम्प्रदायों से प्रतिस्पर्धा करने लगें है। ये भी धर्म प्रचार के लिये तर्क और विचार मन्थन की जगह संगठन व्यक्ति या बल प्रयोग का सहारा लेने लगें है। जिस तरह पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर अमानवीय अत्याचार और हत्याएं हुई है, उसी दिशा में भारत भी लगतार बढ़ता जा रहा है जो धर्म का एक निकृश्टम स्वरूप है।

आवश्यकता यह है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप भी समाज के समक्ष आवे और वह सिर्फ आदशZ मात्र न होकर इतना व्यावहारिक हो कि उसके समक्ष साम्प्रदायिक ‘ाक्तियॉ कमजोर हो जावें । इसलिये आज धर्म के मामले में भी समाज को एक नई दिशा की आवश्यकता है ।

गणतंत्र दिवस , विकाश की ख़ुशी या गुलामी का गम

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आज का दिन वह काला दिन है जब कुछ राजनेताओं ने मिलकर एक मनमानी किताब लिख ली और उसे संविधान कहकर भारत के नागरिकों पर इस तरह थोप दिया कि वे न चाहते हुये भी सदा सदा के लिये इनके गुलाम बने रहे ।

आज छब्बीस जनवरी है, गणतंत्र दिवस । ऐसा शुभ दिन जब अंग्रेजी गुलामी के अंतिम अवषेष भी भारत से विदा हो गये थे। भारत का अपना संविधान सत्तारूढ़ हो चुका था । हम स्वयं भारत के भाग्यविधाता थे। हम अपना निर्णय स्वयं कर सकते थे । आज ऐसे शुभ दिन की इकसठवीं वर्षगांठ है। खुषियों का अवसर है कि भारत तेजी से विकास कर रहा है। आम नागरिकोें का जीवन स्तर उॅंचा हुआ है। अमेरिका जैसे सम्पन्न देष भी भारत से मित्रवत् व्यवहार बनाकर रखना चाहते है। चीन भी भारत को उस तरह गीदड़ नही मानता जैसा पच्चास वर्ष पूर्व मानता था । भारत परमाणु सम्पन्न दुर्लभ देषो की श्रेणी में शामिल है। भारतीय वैज्ञानिकों ने चन्द्रमा पर पानी की खोज का सफल करिष्मा भी कर दिखाया । भारत की विकास दर दुनियाॅ के तीन चार देषों की विकास दरों से प्रतिस्पर्धा कर रही है । आज पूरे भारत का आम आदमी प्रसन्न चित्त है । केन्द्रित स्थलों पर झंडारोहण से लेकर मिष्ठान्न वितरण तक के कार्यक्रम आयोजित हो रहे है। अखबार बडे़ बड़े विज्ञापनों से भरे पडे़ है। हर सम्पन्न व्यक्ति अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने की दौड़ में शामिल है। कहीं कहीं दीप भी जलाये जा रहे है। कवि सम्मेलन और झांकियों की तो कोई गिनती ही नही है। पूरा वातावरण प्रसन्नता से सराबोर है।
दूसरी ओर आज का दिन वह काला दिन है जब कुछ राजनेताओं ने मिलकर एक मनमानी किताब लिख ली और उसे संविधान कहकर भारत के नागरिकों पर इस तरह थोप दिया कि वे न चाहते हुये भी सदा सदा के लिये इनके गुलाम बने रहे । राजनेताओं ने स्वयं को प्रबंधक की जगह शासक घोषित कर दिया और वोट देने के अतिरिक्त सारे अधिकार अपने पास समेट लिये । उन्होंने समाज को बांट कर रखने के सभी आठ आधारों पर पूरी सक्रियता से काम किया। परिणाम स्वरूप समाज धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रीयता, उम्र, लिंग, गरीब-अमीर, उत्पादक-उपभोक्ता के वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष में फंसता चला गया । भ्रष्टाचार दिन दूना रात चैगुना बढ़ता गया और ऐसे भ्रष्टाचार से पल्लवित पोषित लोग उछल उछल कर ज्यादा से ज्यादा गणराज्य दिवस मनाने में आगे रहने लगे । आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है। बुद्धिजीवी पूॅजीपति, शारीरिक, श्रम का शोषण करने की नई नई योजनाएॅ बनाते रहते है। बुद्धि का मूल्य बढ़ा बढ़ा कर गरीब ग्रामीण श्रमजीवी पर टैक्स पर टैक्स लगाये जा रहे है। तंत्र से जुड़ा हर व्यक्ति अपना वेतन भत्ता स्वयं बढ़वा लेता है और उसकी कोई सीमा भी नही है। दूसरी ओर वह सारा खर्च हम गुलामों से वसूल लिया जाता है। सैद्धान्तिक रूप से संविधान राज्य और समाज के बीच का द्विपक्षीय समझौता हैं किन्तु हमारे नेताओं ने उस किताब में लिख दिया कि वे लोग बिना हमसे पूछे इसमें कभी भी और कुछ भी संषोधन कर सकते है।
मैने भारत के विकास और समाज की दुर्दषा की समीक्षा की तो पाया कि दोनों ही बातो में सच्चाई है। देष लगातार प्रगति कर रहा है और समाज कमजोर हो रहा है। आज छब्बीस जनवरी को मैं क्या मानूॅ ? तब मुझे एक महापुरूष की एक लाइन याद आई कि ‘‘किसी दूसरे की अच्छी से अच्छी व्यवस्था से भी अपनी व्यवस्था अच्छी होती है। और यदि व्यवस्था करने वालों की नीयत भी खराब हो जावे तो ऐसी व्यवस्था को एक मिनट भी चलने देना हमारी कायरता का प्रतीक है। छब्बीस जनवरी को जो अपनी व्यवस्था मानते हैं वे प्रसन्न है भी और होना भी चाहियें किन्तु जो व्यवस्था करने वालों की नीतियों के साथ साथ नीयत भी खराब मानते है उनके लिये तो यह सामाजिक गुलामी के अतिरिक्त और कुछ नहीं । मै तो स्वयं को दूसरी लाइन में मानता हॅू। आप क्या मानते है यह उत्तर देने की कृपा करें

न्याय पालिका और लोकतंत्र

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न्यायपालिका, विधायिका तथा कार्यपालिका का समन्वित स्वरूप ही लोकतंत्र होता है। लोकतंत्र में न्यायपालिका विधायिका तथा कार्यपालिका एक दूसरे के पूरक भी होते है तथा नियंत्रक भी । इसका अर्थ यह हुआ कि इन तीनो में से कोई अंग कमजोर पड़ रहा हो तो शेष दो उसे शक्ति दें और यदि कोई अंग अधिक मजबूत हो रहा हो तो उसके पंख कतर दें । लोकतंत्र की सबसे घातक स्थिति वह होती है जब तीनो अंग एक दूसरे को कमजोर करके स्वयं शक्तिशाली होने की प्रतिस्पर्धा में जुट जावें । लगता है कि वर्तमान भारत में न्यायपालिका और विधायिका के बीच ऐसी प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। इस टकराव की पहल तो विधायिका ने ही की है और न्यायपालिका ने लम्बे समय तक इसे सहन भी किया लेकिन जबसे न्यायपालिका इस टकराव में कूदी है तबसे उसने भी मुड़ कर समीक्षा नहीं की । परिणाम टकराव के रूप में दिख ही रहे है।

                                इसी माह न्यायपालिका ने दो महत्वपूर्ण विचार दिये पहला सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसी भी मामले में सीबीआई जांच के आदेश देने के अधिकार संबंधी और दूसरा नक्सलवाद का मुख्य कारण राजनैतिक न होकर आर्थिक होने की सलाह संबंधी । इन दोनों की विस्तृत विवेचना आवश्यक है । पहला मामला यह है कि बंगाल सरकार हाई कोर्ट के आदेश के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट गई थी कि न्यायालय किसी भी राज्य सरकार की सहमति के बिना किसी मामले में सीबीआई जांच का आदेश नहीं दे सकती । बंगाल सरकार के अनुसार कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है और सीबीआई केन्द्र सरकार की जांच एजेन्सी है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने विचार किया और कई वर्श तक विचार करने के बाद निर्णय दिया कि न्यायालय को ऐसा अधिकार है।

                                न्यायपालिका के कई कार्य है। सामान्यतया न्यायपालिका कानून के अनुसार न्याय करती है। यदि न्याय और कानून आपस में विरूद्ध हो जावें तो न्यायपालिका संविधान के अनुसार उक्त कानून की समीक्षा करती है। किन्तु यदि कभी संविधान और न्याय भी आपस में टकरा जावें तब न्यायपालिक प्राकृतिक न्याय के पक्ष में संविधान की भी समीक्षा कर सकती है। जब इन्दिरा गांधी ने तानाशाही अधिकारों से लैस होकर कहा था कि संसद सर्वोच्च होने से उसे संविधान संशोधन के असीम अधिकार प्राप्त है तब न्यायपालिका ने निर्णय दिया था कि संसद ऐसा कोई संविधान संशोधन नहीं कर सकती जिससे संविधान का मौलिक स्वरूप ही बदल जावें । यह मौलिक स्वरूप क्या है इसकी आज तक व्याख्या नहीं हुई किन्तु संविधान का मौलिक स्वरूप है तो अवश्य । मेरे विचार में संविधान का मौलिक स्वरूप यही है कि संविधान स्वयं भी किसी व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार अकारण नहीं छीन सकता । इसका सीधा सीधा अर्थ हुआ कि मनुष्य एक स्वतंत्र इकाई है जिसे प्राकृतिक रूप से जीने का मौलिक अधिकार स्वतः प्राप्त है। यह अधिकार कोई भी संविधान छीन नहीं सकता । भारत में भी यही व्यवस्था है। मनुष्य को मौलिक अधिकार संविधान प्रदत्त भी नहीं है और संविधान उसकी व्याख्या नही कर सकता । वे तो मनुष्य को प्राकृतिक रूप से प्राप्त है जिनकी सुरक्षा की गांरटी मात्र संविधान देता है।

                                जब संविधान प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा की गारंटी देता है और न्यायपालिका उस संविधान की पहरेदार तीन इकाईयों में से एक है तो न्यायपालिका का यह दायित्व है कि किसी भी मामले में संविधान की रक्षा करें और यदि कोई समस्या खड़ी हो तो संविधान से उपर भी व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों की सुरक्षा करें । राज्य और केन्द्र ने आपस में अधिकारों का जो विभाजन किया है वह सरकारों का आपसी विभाजन है। वह विभाजन वही तक न्याय संगत है जहाँ तक वह व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा में सक्रिय और सहायक है। यदि वह विभाजन ऐसी सुरक्षा के विरूद्ध है तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना ही चाहिये क्योकि न्याय विहीन व्यवस्था घातक होती है और व्यवस्था विहीन न्याय असफल । बंगाल सरकार का तर्क न्याय विहीन व्यवस्था के पक्ष में होने से प्रथम दृष्टि में अमान्य था । पता नही सुप्रीम कोर्ट ने इतने वर्ष इस मामूली बात में क्यों लगाये ।

                                ठीक इसी समय छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा का एक मामला सुप्रीम कोर्ट मे रहा । सच्चाई यह है कि सम्पूर्ण भारत में छत्तीसगढ़ अकेला ऐसा प्रदेश है जिसकी सरकार पूरी ईमानदारी से नक्सलवाद का मुकाबला कर रही है अन्यथा अन्य सरकारें तो मुकाबले का नाटक मात्र कर रहीं है। छत्तीसगढ़ सरकार ने देश भर के मानवाधिकार वादियों को यहाँ आइना दिखा दिया । मेघा पाटकर संदीप पांडे सहित कई मानवाधिकारी सांढ़ पूरे भारत में छुट्टा घूमते रहे किन्तु छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके में उनका नकाब उतर गया । उस सरकार के दंतेवाडा गोलीकांड मामले में समीक्षा अवसर पर न्यायालय ने टिप्पणी  कर दी कि नक्सलवाद राजनैतिक संघर्ष न होकर आर्थिक संघर्ष है जिसके लिये आर्थिक विकास का मार्ग भी पकड़ने की जरूरत है। पहली बात तो यह है कि न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका की सलाहकार इकाई न होकर समीक्षक इकाई है। न्यायपालिका को यह अधिकार नहीं कि वह लोकतंत्र की अन्य दो इकाईयों को सलाह दे कि वे नक्सलवाद से कैसे निपटें । नक्सलवाद की पहचान कारण और समाधान की नीति बनाना विधायिका का काम है, नीति का कार्यान्वयन कार्यपालिका का और उस नीति से संविधान का उल्लंघन न हो यह समीक्षा करना न्यायपालिका का । जब न्यायपालिका को ही यह अधिकार प्राप्त नही तब न्यायालय के न्यायाधीशों की ऐसी टिप्पणी तो भ्रम भी पैदा करती है और हानिकर भी है। किसी न्यायाधीश की व्यक्तिगत धारणा भी भिन्न हो सकती है और सोच भी किन्तु न्यायाधीश को ऐसी धारणाएँ कुर्सी पर बैठ कर व्यक्त करने का अधिकार नहीं । वहाँ बहस इस बात पर नही हो रही थी कि नक्सलवाद क्या है और उसका समाधान क्या है ? चर्चा का मुद्दा मात्र यह था कि क्या छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मारे गये लोग सामान्य नागरिक थे या नक्सलवादी । पता नहीं क्या सोचकर न्यायाधीशों ने ऐसी अनावश्यक और गलत टिप्पणी कर दी ।

                                सच बात यह है कि नक्सलवाद के फैलाव का कारण कही भी विकास का अभाव नहीं है । नक्सलवाद की लड़ाई अपढ़ और गरीब लोग नहीं लड़ रहे । इस लड़ाई को लड़ने वाले प्रमुख लोग  पढे लिखे विद्वान लोग है जो यह मानते है कि सत्ता परिवर्तन का यही एक उपयुक्त मार्ग है। अविकसित क्षेत्रों से तो संघर्ष का प्रारंभ मात्र है जिसे बढ़ते बढ़ते विकसित क्षेत्रों तक जाना है। वे तो चाहते है कि इस बहाने इस पिछड़े क्षेत्र में बड़ी मात्रा में सरकारी धन आवे जिसका बड़ा हिस्सा उनके आन्दोलन के काम आवे । न्यायाधीष महोदय नक्सलवाद आने के बाद जो बात कह रहे है वह बात या तो पहले कहनी चाहिये थी या बाद में किन्तु ठीक युद्ध के मैदान में इस तरह की  अनावश्यक सलाह घातक हो सकती है।

                                मेरी अब भी मान्यता है कि नक्सलवाद का समाधान न ही बन्दूक है न ही विकास। नक्सलवाद का समाधान है स्थानीय स्वायत्तता । सरकार गांवो को अधिकतम स्वायत्तता दे दें और इसके बाद भी जो न माने उसे चाहे कानून से मारे या बिना कानून के यह सोचना हमारा विषय नहीं । हमारा विषय तो सिर्फ इतना ही है कि सरकार ग्राम सभाओं को मजबूत करें। मुझे खुशी है कि  छत्तीसगढ़ सरकार ने ग्राम सभा सषक्तिकरण पर गंभीरता से विचार करना शुरू किया है। मुझे दुख है कि माननीय न्यायपालिका का ध्यान इस तीसरे समाधान की ओर नहीं गया ।

                                अंत में मै कहना चाहता हॅू कि न्यायपालिका लोकतंत्र की रक्षा में तैंतीस प्रतिशत की हिस्सेदार है। वह अपनी गंभीरता को समझे तो लोकतंत्र में सहायक होगा ।

अपनों से अपनी बात

                                तीस सितम्बर दो हजार नौ को दिल्ली में ज्ञान यज्ञ परिवार नाम से संगठन बनाने की योजना बनी थी । योजना अनुसार कार्य शुरू हुआ । ज्ञान यज्ञ परिवार का ध्वज पूर्व में ही निश्चित था । ज्ञान यज्ञ परिवार के अंतर्गत पांच स्वतंत्र संगठन काम शुरू किये ।

(1) ग्राम सभा सशक्तिकरण अभियान ।

(2) लोक स्वराज्य अभियान ।

(3) ज्ञान मंदिर योजना ।

(4) मानसिक व्यायाम

(5) ट्रस्ट एवं संरक्षण सभा ।

(1) ग्राम सभा सशक्तिकरण अभियान की सक्रियता रामचन्द्रपुर विकास खण्ड के एक सौ तेरह गांव, हरियाणा का एक गांव तथा अम्बिकापुर के एक गांव तक सीमित है। इन गांवों में पचीस दिसम्बर नौ से पांच कार्य प्रारंभ किये गये है।

(क) लोक और तंत्र के बीच दूरी कम होना ।

(ख) वर्ग विद्वेष को वर्ग समन्वय में बदलना ।

(ग) अहिसंक समाज रचना ।

(घ) भ्रष्टाचार मुक्त पंचायत व्यवस्था ।

(च) ग्रामीण उत्पादन तथा उपभोग की सभी वस्तुओं को कर मुक्त नियंत्रण मुक्त करने हेतु शासन से निवेदन ।

                                नगर सभा सशक्तिकरण की रामानुजगंज शहर में तैयारी चल रही है। ग्राम सभा नगर सभा सशक्तिकरण अभियान का संचालन श्री केशव चैबे जी उर्फ स्वराज बाबा कर रहे है।

(2) लोक स्वराज्य अभियान- इसका केन्द्रीय कार्यालय सेवाग्राम वर्धा महाराष्ट्र तथा सह कार्यालय 20/306 कल्याणपुरी दिल्ली में है। इस अभियान का प्रमुख कार्य समाज में लोक स्वराज्य की भूख पैदा करना है। इसके लिये राजनेताओ से मांग करनी है कि वे संविधान में परिवार गांव, जिले के अधिकारों की सूची शामिल करें । इस मांग के साथ साथ राइट टू रिकाल या अन्य मांगें भी जोड़ी जा सकती है। इस पूरे कार्य का औपचारिक नेतृत्व तो ठाकुर दास जी बंग के पास है किन्तु स्वास्थ्य कारणों से दुर्गा प्रसाद जी आर्य सम्हाल रहे है। दिल्ली कार्यालय ओमप्रकाश जी दुबे के संचालन में है।

(3) ज्ञान मंदिर योजना । इसके अन्तर्गत एक स्कूल शुरू किया गया है जो रामानुजगंज शहर में स्थित है। अभी स्कूल आठवीं कक्षा तक संचालित है। इसका कार्यालय रामानुजगंज धर्मशाला में है। इस योजना के अंतर्गत बच्चों में सामाजिक विचार भरने की योजना है। कुछ शिक्षा विद मिलकर इसकी रूपरेखा बना रहे हैं । दो अन्य स्कूल गांवों मे प्रारंभ करने की तैयारी है।

(4) मानसिक व्यायाम योजना । इस योजना का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति की स्वयं की चिन्तन शक्ति का इस तरह विकास करना है कि वह न तो किसी से जल्दी ठगा जाय न ही जीवन में कभी निराश हो  । मानसिक व्यायामक करने वाला व्यक्ति अपने जीवन के हर काम में अधिकाधिक सफल हो ऐसी शक्ति विकसित होना ही इस योजना की सफलता है।

                                इस कार्य का केन्द्रीय कार्यालय बनारस चैक अम्बिकापुर है। रामकृष्ण जी पौराणिक उज्जैन इसके प्रमुख है । आर्चाय पंकज, ईश्वर दयाल जी राजगीर आदि सहायक है। इस कार्य में निम्न कार्य प्रमुख है-

क. ज्ञान तत्व विस्तार । इसमें ज्ञान तत्व की पाठक संख्या बढ़ रही है।

ख. ज्ञान कथा । अभी सात दिन की कथा तीन मार्च से नौ मार्च तक रामानुजगंज में हो रही है। इसकी विषय सूची यह हैं:-

(1) ज्ञान कथा क्यों ?

(2) धर्म संप्रदाय और समाज।

(3) अपराध और अपराध नियंत्रण।

(4) आर्थिक समस्याएँ और समाधान।

(5) समाज मे महिलाओं की स्थिति।

(6) नयी समाज रचना।

(7) लोक तंत्र या लोकस्वराज्य ।

   अप्रील माह में तीन दिनों की ज्ञान कथा बिजनौर में हो रही है जिसके आयोजक डा. प्रकाश है। अप्रील माह में तीन दिनों की कथा कुरूक्षेत्र में हो रही है जिसका आयोजन श्री रणवीर शर्मा आई. जी. पुलिस कर रहे हैं । मई में तीन दिनों की कथा राजस्थान में होगी जिसके आयोजक श्री अषोक गदिया जी होंगे । इन चार आयोजनों के बाद समीक्षा होगी और तब आगे योजना बनेगी ।

ग. व्यायाम केन्द्र- पूरे भारत में सौ ऐसे केन्द्र बन रहे है जिनको ज्ञान तत्व विचार मंथन तथा सीडी भेजकर विचार मंथन बढ़ाने की योजना है। यह कार्य भी धीरे धीरे बढ़ रहा है। यद्यपि अभी व्यवस्थित नहीं हो पाया है।

घ. वेबसाइट-www.kaashindia.com नाम से वेवसाइट शुरू की गई है। इस साइट में पूरा साहित्य डाला जा रहा हैं। इसका संचालन रायपुर कार्यालय से हो रहा है। रवि अग्रवाल वेवसाइट की व्यवस्था देख रहे है।

च. मासिक विचार मंथन । यह मंथन कार्य प्रत्येक माह में एक बार रामानुजगंज में होता है। अब अम्बिकापुर में भी प्रारंभ करने की योजना हैं। अम्बिकापुर शहर की पूरी योजना का कार्य नन्दराम जी अग्रवाल तथा लेखराम जी देखते है।

5. ट्रस्ट एवं संरक्षण सभा । ज्ञान यज्ञ परिवार के सम्पूर्ण व्यय की सहायतार्थ दस हजार रूपया वार्षिक दान दाता ज्ञान यज्ञ परिवार ट्रस्ट के दाता सदस्य होंगे । यह ट्रस्ट पूरी तरह स्वतंत्र अधिकार प्राप्त होगा । यह ट्रस्ट पूरे कार्य को सहायता करेगा।

एक हजार रूपया वार्षिक देने वाले संरक्षक सभा के सदस्य होंगे । यह सभा स्थानीय स्तर पर होगी । इससे प्राप्त धन का स्वामित्व स्थानीय संरक्षक सभा का होगा । वे इस धन को आपसी विचार विमर्ष से खर्च करेगें । ट्रस्ट या संरक्षण सभा के धन पर ट्रस्ट या संरक्षण  सभा का  ही पूर्ण स्वामित्व तथा अधिकार होगा ।

                                इस सम्पूर्ण योजना का समन्वय अम्बिकापुर कार्यालय कर रहा है जिसका संचालन पंकज अग्रवाल के पास है। अम्बिकापुर कार्यालय बनारस चैक पर है।

                                मैनें पहले सोचा था कि सर्वोदय में भी बहुत बड़ी संख्या चरित्रवान लोगों की है और संघ में भी । यदि संघ, सर्वोदय, गायत्री परिवार और आर्य समाज एक साथ जुड़कर एक मंच बना ले तो व्यवस्था परिवर्तन कठिन नही होगा । मैने संघ और सर्वोदय के बीच की कटुता को कम करने की कोशिश की । मैने जितना ही संघ और सर्वोदय को समझाने की कोशिश की उतना ही उनका एक गुट विरोधी होने लगा। मेरी व्यक्तिगत राय है कि

                (1) परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था मजबूत हो।

                (2) धर्म परिवर्तन कराने के प्रयत्नों पर कानून से प्रतिबंध लगे।

                (3) अल्प संख्यक बहु संख्यक का विचार समाप्त हो ।

                (4) सम्पूर्ण भारत में समान नागरिक संहिता लागू हो।

                (5) धार्मिक आधार पर तुष्टिकरण समाप्त हो ।

                                मेरा स्पष्ट मत रहा है कि हिन्दुत्व की विचार धारा और इस्लामिक विचार धारा में बहुत अंतर है। हिन्दुत्व की विचारधारा पूरी तरह विज्ञान सम्मत है जबकि इस्लामिक रूढ़िवादी कट्टरवादी। इसके बाद भी संघ परिवार को मेरी यह सलाह बुरी लगती है कि हिन्दूराष्ट्र की मांग को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाय, गांधी को और ठीक से समझा जाय, मुसलमानों का विरोध न करके आतंकवाद तथा इस्लामिक कट्टरवाद का विरोध किया जाय । मेरा मानना है कि संघ परिवार को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिये ।

                                मैने सदा ही निश्कर्श निकाला कि गांधी की नीतियों ही समाज को गुलामी से बचा सकती है। अन्यथा राजनेता तो लगातार गुलाम बनाने की तिकड़म करते रहते है। गांधी के बाद भारत में कोई ऐसा व्यक्तित्व उभर ही नहीं पाया जो लोक स्वराज्य की दिशा में या तो समझ पाता या समझा पाता । यदि हुआ भी तो राजनेताओं की ताकत के समक्ष कमजोर पड़ा।

                                मैं समझ रहा था कि गायत्री परिवार और आर्य समाज को जुड़ने में दिक्कत नहीं होगी यदि सर्वोदय और संघ किसी न्यूनतम मुद्दे पर अल्पकाल के लिये एक साथ हो जावें । अन्य मुद्दों पर तो सहमति बनती भी थी किन्तु सर्वोदय के कुछ लोग गांधी हत्या का मुद्दा भुलाते नही थे और संघ परिवार गांधी हत्या के संबंध में चर्चा हेतु तैयार नहीं था । दोनो ही पक्षों के अधिकांश सामान्य कार्यकर्त्ता एकजुट होने को सहमत दिखे किन्तु दोनों ही पक्षों के झंडा पकडे़ लोग जरा भी झुकने को तैयार नही हुए । स्थिति यहाँ तक आई कि दोनों पक्षों के कुछ झंडा धारियों को मुझसे भी विरोध होने लगा। उन्हें मेरी सलाह भी कांटे के समान चुभने लगी। सर्वोदय के एक दो लोगों ने सेवाग्राम में जैसा फतवा जारी किया वह सब जानते ही है। किन्तु रामानुजगंज की घटना ने मुझे बहुत सतर्क किया । रामानुजगंज संघ में नरम पंथी कार्यकर्त्ता अधिक है और कट्टरवादी कम। चार माह पूर्व एक घटना में कट्टरपंथी गुट साम्प्रदायिक टकराव को हवा देना चाहता था और नरमपंथी गुट टकराव को अनावश्यक मानता था । टकराव टल गया। नगरपालिका चुनावों में भाजपा ने नरमपंथी गुट के कार्यकत्र्ता को उम्मीदवार बना दिया । मुझे आष्चर्य हुआ जब कट्टरवादी गुट के लोगों ने उस संघ कार्यकर्त्ता के विरूद्ध सिर्फ इसलिये गुप्त रूप से कांग्रेस पार्टी की मदद की कि संघ कार्यकर्त्ता होते हुये उसने हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नही होने दिया । चिन्ता होती है यह देखकर कि हिन्दू कट्टरवादियों ने भी उस उम्मीदवार का साथ दिया जिसका मुस्लिम कट्टरवादियों ने दिया। आज भी आप देख सकते है कि बम्बई आई पी एल मैच के विरूद्ध मुस्लिम आतंकवादी भी धमकी दे रहे है और शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे भी । सभी कट्टरवादी तत्व  दो विपरीत गुटों में बंटकर एक ही भाषा बोलते है यह मेरी पुरानी धारणा प्रमाणित हो गई ।

                                मै इस क्षेत्र में चोरी, डकैती के विरूद्ध लगातार सक्रिय रहता हॅू । नक्सलवादी  आतंकवाद के विरूद्ध भी मेरी पूरी सक्रियता है। भ्रष्टाचार और गुण्डागर्दी के विरूद्ध मै रहता ही हॅू। इस्लामिक साम्प्रदायिकता को मैने कभी सहन नही किया । मै इन सबके विरूद्ध सक्रिय रहता हॅू  तो मेरे ही कुछ कट्टरवादी साथी मेरे ही विरूद्ध रहते है। समझ मे नही आता कि वे क्या चाहते है? रामानुजगंज नक्सलवादी आतंक से जूझ रहा है। चोरी डकैती का खतरा बढ रहा है। छोटी छोटी बातों पर अन्य टकराव टालकर बड़ी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिये किन्तु कुछ लोग तो बस एक ही रट मुसलमान- मुसलमान लगाये रहते है और किसी तरह समझते ही नहीं ।

                                इस तरह दोनो ही गुटो के कुछ प्रमुख ने अपनी मुर्गी की तीन टांग की रट से जरा भी कम पर चर्चा करना स्वीकार न करके उल्टा मुझे ही शत्रु मानना शुरू कर दिया तब हार थक कर मैने दोनों गुटो के मतभेद कम करने का अभियान छोड़ दिया और व्यक्तियों से अलग अलग चर्चा शुरू किया । जो कार्यकर्त्ता दोनों गुटों के मतभेद भूलकर एक साथ बैठ सकते है वे बैठे। जो लोग न बैठना चाहें वे अपनी अपनी दुकान अलग अलग चलाते रहे । पिछले तीस सितम्बर के बाद छः माह में ही ठीक प्रगति दिख रही है। आगे और भी प्रगति संभव है क्योंकि अब न तो उनको समझाने में शक्ति लगानी है न ही उनकी नाराजगी की परवाह करनी है। सबसे अच्छा तो यही होगा कि दोनों गुटों की अनावश्यक चर्चा ही बन्द कर दी जाये क्योकि उन दोनों गुटों के कुछ प्रमुख क्षत्रपों ने न समझने की कसम खा ली है तो हम क्या कर सकते है।

                                मैं नही समझ सका कि ये लोग कट्टरपन के कारण ऐसी जिद पर अडे़ है या जानबूझकर किसी स्वार्थ के कारण । किन्तु यह बात सच है कि दोनो ही गुटों के कुछ लोगों ने अपनी जिद के कारण समाज का बहुत नुकसान किया है । कार्यकत्र्ताओं का कर्त्तव्य है कि वे मेरी मजबूरी को समझेंगे ।

                                मेरी इच्छा है कि अब संगठन को समझाने की चिन्ता छोड़कर व्यक्तियों को समझाया जाय। जब से इस नीति पर काम शुरू हुआ है तबसे कुछ काम बढ़ना शुरू हुआ है। हो सकता है कि यह मार्ग कुछ बढ़ने में सफल हो ।

प्रश्नोत्तर

(1) श्री सुरेन्द्र विष्ट बम्बई

प्रश्नः- श्री गोविंदाचार्य जी ने केन्द्र सरकार से मांग की है कि संपूर्ण राष्ट्रीय बजट का सात प्रतिशत गांवों पर खर्च होना चाहिये जो वर्तमान में नहीं हो रहा है। यह सात प्रतिशत राशि पंचायतों को सीधे देनी चाहिये जिससे बीच में गड़बड़ न हो सके। गोविंदाचार्य जी ने आठ फरवरी को देश भर से आये करीब पांच सौ लोगों के साथ जन्तर मन्तर पर इस मांग के लिये धरना भी दिया तथा वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी से मिलने की भी योजना है। इस संबंध में आपका क्या विचार है ?  व्यवस्था परिवर्तन अभियान गोविंद जी शुरू कर रहे है। आपकी सहभागिता आवश्यक है।

उत्तरः- गोविंदाचार्य जी व्यवस्था परिवर्तन अभियान की दिशा में बढ़ रहे है यह अच्छी बात है । इस विषय पर गंभीर चर्चा होनी चाहिये ।

                                व्यवस्था कई तरह की होती है जैसे सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक आदि। गोविंद जी का व्यवस्था परिवर्तन से आशय राजनैतिक व्यवस्था परिवर्तन से है। व्यवस्था परिवर्तन और व्यवस्था सुधार बिल्कुल अलग अलग होता है। लोक तंत्र को लोक स्वराज्य में बदलना ही व्यवस्था परिवर्तन है जिसे दूसरे शब्दों में संसदीय लोकतंत्र को सहभागी लोकतंत्र में बदलना कह सकते है। अन्य सारे प्रयत्न व्यवस्था में सुधार कहे जाने चाहिये ।

                                वर्तमान संसदीय लोकतंत्र की अर्थ व्यवस्था में मौलिक सुधार करने के लिये तो स्वतंत्र अर्थपालिका ही एक मात्र मार्ग है। अन्य सारे सुधार मौलिक न होकर आंशिक ही होंगे । क्योंकि यदि हमने विधायिका के आर्थिक मामलों में निर्णय के अधिकारों पर अंकुश नहीं लगाया तो वे सात प्रतिशत बजट गांवों को देकर कई प्रकार के नये नये टैक्स थोप देंगे जिन्हें रोकना हमारे अधिकार में नहीं होगा । स्वतंत्र अर्थपालिका का अर्थ हुआ कि राज्य की टैक्स लगाने की स्वतंत्रता सीमित हो जायगी ।

                                किन्तु यह कार्य भी कठिन दिखता है। इसलिये सात प्रतिशत बजट राशि ग्राम सभाओं को सीधे देने की मांग भी वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में आंशिक सुधार तो करेगी ही। यदि सरकार इतना भी करने को तैयार हो जाती है तो राजनेताओं की स्थानीय दादागिरी कम हो सकती है। सात प्रतिशत बजट गांवों को देना लाभदायक की होगा । मैं इस मांग के पूरा होने को कोई क्रान्तिकारी परिणाम तो नहीं समझता किन्तु इस मांग का पूरा होना उस दिशा  में एक कदम अवश्व है।

                                इस संबंध में एक घटना बताना उचित होगा । हम लोक स्वराज्य अभियान में एक सूत्रीय मांग ‘‘संविधान में परिवार गांव जिले की सूचियों का समावेश‘‘ को लेकर सफलता पूर्वक आगे बढ़ रहे थे । कुछ दिनों बाद उसमें राइट टू रिकाल की मांग जुड़ गई । बीच में कुछ और मांगे जुडी जिन्हें हटाया गया । पिछले वर्ष सेवाग्राम में राष्ट्रपति के वेतन भत्ते की मांग को आधार बना दिया गया । राष्ट्रपति से मिलने गये। राष्ट्रपति जी ने अपना बढ़ा वेतन भत्ता घटाना स्वीकार कर लिया । हमारा सारा आन्दोलन तहस नहस हो गया क्योकि तीस जनवरी दो हजार आठ को राष्ट्रपति से मिलने के पूर्व जो उत्साह और योजना थी वह तितर बितर हो गई । राष्ट्रपति के वेतन मांग सिर्फ सहायक मांग तक सीमित होनी चाहिये थी किन्तु वह मुख्य मांग के रूप सामने आ गई जो भूल हुई। सात प्रतिशत बजट गांवों की ग्राम सभाओं की सीधा मिले ऐसी मांग में हम आपके आंदोलन में साथ है। हम आपका समर्थन भी करेंगे और सहयोग भी किन्तु अब हम ऐसी तात्कालिक मांगों को अपने आंदोलन का भाग नहीं बनाना चाहते क्योकि ऐसी मांगे व्यवस्था में सुधार तक ही सीमित है।

                                फिर भी गोविंद जी की यह आवाज ग्राम सभाओं को मजबूत करने में सहायक होगी और हम आपका पूरा पूरा सहयोग करेंगे । आप आवश्यकतानुसार आदेश दीजियेगा ।

(2) श्री राधा कृष्ण गेरा, अशोक विहार, दिल्ली ।

प्रश्नः- पचीस दिसम्बर दो हजार नौ को आपके जन्म दिवस पर रामानुजगंज आने का अवसर मिला । वहाँ की शांति ने मन मोह लिया । आपकी योजना ने भी अनेक आशाओं को जन्म दिया है। वहाँ गरीबी भी देखी । ऐसा लगा जैसे हम किसी दूसरे भारत में आ गये है।

                                मेरे मन में गरीबी के प्रति सहायता का भाव जगा। अभी हम जैसे अनेक घरों में बड़ी मात्रा में अच्छी हालत के पुराने कपडे़ मिल सकते है जिन्हें एकत्रित करके इन गरीबों की कुछ सहायता की जा सकती है। आप योजना बनाइये तो हम कुछ प्रयत्न करें । क्या उधर के लोग पुराने कपडे़ लेना पंसद करेंगे ?

उत्तरः- आपने रामानुजगंज क्षेत्र को तीन दिनों तक देखा समझा इससे हमें खुशी हुई है। यहाँ पिछड़ापन है, गरीबी है, अशिक्षा है, शराब है। यहाँ के लोगों में ईमानदारी है, सच्चाई है, शराफत है, संतोष है। मैने अपने जीवन का लम्बा समय यहा बिताया और दो हजार पांच से आठ तक के चार वर्ष दिल्ली जैसे महानगर में भी बिताये । मैं अब भी निश्चित रूप से कहने की स्थिति में नहीं कि पिछड़ापन यहाँ मानू या दिल्ली में ।

                                यह पूरी तरह नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र है । नक्सलवादी जो कुछ समझा देते है उसे ही ये सच मान लेते है । यदि सरकार समझा दे तब भी ये सच मान लेते है । इन्हे ऐसा लगता ही नही कि कोई इन्हें धोखा भी दे सकता है। सरकार लगातार इन पर जुल्म कर रही है। गैर आदिवासी की जमीन और इनकी अपनी जमीन के मूल्य में सौ गुने का फर्क है क्योकि ये अपनी जमीन गैर आदिवासी को बेच नहीं सकते । इस पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र विकास पर पूरी तरह रोक लगी हुई है । कोई भी व्यक्ति कृषि योग्य भूमि पर न घर बना सकता है न ही कृषि के अतिरिक्त कोई अन्य कार्य कर सकता है। अपनी जमीन पर खडे़ पेड़ काटने पर भी रोक हैं अपने खेत  के गन्ने का गुड़ नहीं बना सकते । अपने खेत की पैदा कृषि उपज वन उपज स्वतंत्रता पूर्वक बेच नहीं सकते क्योकि कई प्रकार के सरकारी कर लगे हुये है । ऐसे ऐसे अत्याचार होते हुए भी राज्य भक्त समाज सेवी एजेन्ट घूम घूमकर इन्हें समझा देते है कि ये सभी कानून तो तुम्हारें हित में ही बने है। इस क्षेत्र के लोग भी मान जाते है कि ये कानून उनके हित में ही तो है।

                                अनेक समाज सुधारक आते है तो समझाते है कि शराब ही तुम्हारी सारी समस्याओं की जड़ है। ये बेचारे समझ जाते है। नक्सलवादी भी इनकी शराब छुड़ाने में दिन रात लगे है और सरकारी एजेन्ट भी । धर्म गुरू तो दिन रात यही कहते रहते है । ये बेचारे भी मान लेते है कि उनके पिछड़ेपन का एक मात्र कारण शराब ही है। वे अपनी ही गलती मान लेते है क्योकि इतने बड़े बड़े धर्म गुरू, अफसर, नेता, विद्वान झूठ तो बोलेंगे नहीं ।       

                                अभी एक माह पूर्व ही मैने गांव गांव में घूमकर कहा था कि ग्राम सभा में आदिवासी गैर आदिवासी का भेद नहीं है। जाति धर्म, गरीब अमीर सब बराबर है। सबको समान अधिकार है। अभी परसों पंद्रह फरवरी को प्रसिद्ध गांधीवादी पंचायती राज्य विशेषज्ञ ब्रम्हदेव जी शर्मा आई.ए.एस. ने यहाँ एक बड़ी सभा रखी  जिसमें कई हजार ग्रामीण इकट्टे हुए । मैं भी मंच पर वक्ता के रूप में था। शर्मा जी ने नारा दिया  ‘‘न लोक सभा न राज्य सभा, सबसे उपर ग्राम सभा‘‘ । उन्होंने ग्राम सभा का महत्व तथा संवैधानिक अधिकार की विस्तृत व्याख्या की । साथ ही उन्होंनें यह भी कहा कि यह आदिवासियों की भूमि है। यहाँ आदिवासियों का विशेष अधिकार है। मैं सोचने लगा कि शर्मा जी की पहली बात सच है या दूसरी । यदि यहाँ आदिवासी को विशेष अधिकार है और होना भी चाहिये तो ग्राम सभा का पूरा अर्थ ही बदल जायेगा । ग्राम सभा में जाति भेद है ही नहीं । आदिवासी यहाँ के मूल निवासी है और अन्य बाहरी । यह बात यदि सच भी हो तो अब इसको ग्राम सभा के  साथ जोड़ने से क्या लाभ है ? लेकिन शर्मा जी जीवन भर दोनों बाते एक साथ बोलते है।

                                अभी कुछ दिन पूर्व ही कलेक्टर सरगुजा ने कोयला खदान तथा कुछ अन्य उद्योगों के लिये भूमि अधिग्रहण के प्रस्ताव ग्राम सभाओं में पास करवाये । लोगों ने पास कर दिये । यहाँ तो गांव के गांव आदिवासी है। उनकी जमीन तो मिट्टी के मोल है क्योकि कोई गैर आदिवासी तो खरीद नहीं सकता है। सरकार ने जो भी मुआवजा कहा वह बाजार मूल्य से बहुत कम और आदिवासी भूमि मालिकों की अपेक्षा से बहुत अधिक था । शर्मा जी ने कारखाने या कोयला खदान का विरोध किया और आन्दोलन की रूपरेखा बताई । प्रष्न उठता है कि कौन सही है ? शर्मा जी या सरकार । शर्मा जी एक ओर तो आदिवासियों की जमीन बिक्री पर सरकारी रोक के पक्षधर है तो दूसरी ओर आदिवासियों को प्राप्त मुआवजा भी अन्याय पूर्ण बता रहे है । मै नहीं समझ सका कि इतनी छोटी सी बात पर भी इतना बड़ा विद्वान स्पष्ट क्यों नही। गांव के लोग जमीन किसे बेचे यह निर्णय का अधिकार ग्राम सभा को होना चाहिये । यदि ग्राम सभा संसद से भी उपर है तो संसद जमीन खरीद बिक्री पर प्रतिबंध कैसे लगा सकती है और ग्राम सभा तथा सर्वोदय के पक्षधर शर्मा जी ऐसे कानून का समर्थन कैसे कर सकते है । मैं स्वयं नहीं समझ पा रहा कि इस पिछड़े क्षेत्र के औद्योगिकरण का समर्थन करूँ या विरोध ? मैने सभा में चुप रहना ही बेहतर समझा । यदि कोई साधारण आदमी होता तो कुछ चर्चा भी करता किन्तु कोई बड़ा विद्वान हो और गांधीवादी हो या आर.एस.एस. वाला हो तो चुप रहना ही अधिक अच्छा होता है। एक तरफ संघ वालों की सरकार है जो उद्योग पक्षधर है तो दूसरी ओर सर्वोदय जो उद्योग विरोधी है। बीच में पिस न जाउॅ इसलिये मुँह बंद रखा ।

             इस क्षेत्र के लोग राजनैतिक गुलामी में भी संतुष्ट है। आपस में भाईचारा है। आदिवासी गैर आदिवासी के दिन रात बीज बोये जा रहे है किन्तु उन बीजो का कुछ षिक्षितों को छोड़कर कहीं प्रभाव नहीं है। मै स्वयं उलझन में हॅू कि मैं आप सबके समक्ष इनकी उजली तस्वीर प्रस्तुत करूँ या गन्दी ।

                                आपने पुराने वस्त्र बांटने की योजना पूछी । मैं इस कार्य में पहल नहीं कर सकता क्योकि मेरे विचार में क्रांति की पहल का यह सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र है। इसलिये पूरी षक्ति लोक स्वराज्य पर लगाना चाहता हॅू । फिर भी यदि आप इस सेवा कार्य में मेरी सहायता चाहेंगे तो मैं बांटने में सहायता कर सकता हॅू । योजना आप बनाइये । अभाव ग्रस्त लोग है। कुछ स्वाभिमानी नही भी ले सकते है और कुछ ले भी सकते है । यदि उन्हें बता दिया जाय कि लेना पाप है तो फेक देंगे और पुण्य है तो ले भी लेंगे ।

कार्यालयीन प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न – पिछले दिनों जयपुर में दलित साहित्य सम्मेलन सम्पन्न हुआ । सम्मेलन में मंच से गांधी को दलित विरोधी करार दिया गया । साहित्यकार कांचाइलैया जी ने इस संबंध में विस्तृत भाषण दिया। रमेश निर्मल जी ने भी उसका समर्थन किया । ओम थानवी जी ने कुछ सफाई देनी चाही तो उनका विरोध हुआ । गांधी बेचारे के साथ ऐसा क्यो होता है ?

उत्तरः- जब पेशेवर लोगों के पेषे में किसी महापुरूष के विचार बाधक होते है तब उक्त महापुरूष का ऐसा विरोध स्वाभाविक प्रक्रिया होती रही है। आप साठ वर्ष पूर्व की घटनाओं को याद करिये । सभी संघ वाले भी गांधी जी के विरूद्ध थे और कट्टरपंथी मुसलमान भी । दोनो आपस में एक दूसरे के कट्टर विरोधी होते हुए भी गांधी जी के विरोध में एक समान सक्रिय थे। अम्बेडकर जैसे दलित भी गांधी विरोधी थे और अम्बेडकर विरोधी सवर्ण भी । यहाँ तक कि साम्यवादी भी गांधी जी को भरपेट गाली देते थे और नेहरू पटेल भी अन्दर अन्दर कुढ़ते रहते थे । चारो ओर से सक्रिय भिन्न भिन्न पेशेवर लोग गांधी जी को बोझ समझते थे । फिर भी देश की पंचानवें प्रतिशत जनता गांधी को मानती थी और सम्मान देती थी ।

                                आज भी सभी पेशेवर लोग गांधी विरोधी ही है । इसके बाद भी गांधी अकेले भारत के जन जन में स्थापित हैं । न दलितों का विरोध काम आ रहा है न संघियों का डंडा ।

                                आपने दलित साहित्य सम्मेलन नाम देकर साहित्य का अपमान किया है । साहित्य यदि दलित है तो वह साहित्य न होकर साहित्य के नाम पर खुली कोई दुकान है। ऐसी दुकान पर यदि गांधी को गालियाँ न मिले तो और क्या मिले ?

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नक्सलवाद और उसकी पहचान

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मैने पाया है कि नक्सलवाद किसी भी रूप में व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं है। सच बात यह है कि नक्सलवाद पूरी तरह सत्ता संघर्ष है। समीक्षक बजरंग मुनि

आज पूरा देष नक्सलवाद से चिंतित है। मैं विकसित भारत के जिन क्षेत्रों में जाता हू वहाँ के श्रोता बड़ी उत्सुकता से मुझसे पूछते हैं कि नक्सलवाद क्या है ? ये लोग कैसे दिखाई देते हैं? आप उस क्षेत्र में किस तरह रहते हैं? आदि- आदि।  पूरी भारत सरकार भी नक्सलवाद को भारत की पहली समस्या घोशित करके समाधान की लम्बी चैड़ी तैयारी कर रही है। बैठकें पर बैठकें और रोज नई-नई घोशणाऐं हो रही हैं। आज ही केन्द्रीय गृहमंत्री चिन्दम्बरम जी नें कहा है कि फरवरी से नक्सलवाद नियन्त्रण अभियान प्रारम्भ हो सकता है। इसकी षुरूआत छत्तीसगढ़ के सरगुजा और बस्तर क्षेत्र से होगी। विदित हो कि सरगुजा जिले का जो भाग नक्सलवाद प्रभावित है वह रामानुजगंज क्षेत्र है और सौभाग्य से मैं वहीं का निवासी होने से इस संपूर्ण महासंग्राम का प्रत्यक्षदर्षी भी हूॅ। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमणसिंह जी ने भी  कहा है कि नक्सलियों को खदेडने के बाद इस मुक्त क्षेत्र का तीव्र विकास भी किया जायगा। दूसरी ओर नक्सलवादियों ने भी चुनौती स्वीकार करने का मन बना लिया हैै। उनकी भी योजना है कि वे अभियान षुरू होते ही इस क्षेत्र को छोड़ कर चले जायेगें । उनके समर्थक यहाॅ समाज में असंतोश बढ़ाने का काम भिन्न नामों और रूपो में करते रहेगे। एक वर्श के पूर्व ही केन्द्र का भारी भरकम अभियान दम तोड़ देगा और नक्सलवाद और अधिक सक्रियता और षक्ति से स्थापित हो जायेगा । क्या होगा यह पता नही किन्तु इतना अवष्य होगा कि मेरा गृह क्षेत्र रामानुजगंज इस राश्ट्रीय युद्ध का रणक्षेत्र बनेगा जिसके अच्छे और बुरे परिणाम यहा के लोगों को स्वीकार करने ही होगें ।
मै स्वयं भी दोनों के संघर्श की पृश्ठ भूमि को नजदीक से देखता रहता हूँ। यहाॅ तक कि मैने सत्ता के उच्च पदो पर रहकर भी अपने इस क्षेत्र की व्यवस्था को देखा है और नक्सलवादियों के निकट संपर्क से भी । एक ओर तो नक्सलवादी हिंसा का मुखर विरोधी होने के कारण नक्सलवादियों ने मुझे अपना प्रमुख विरोधी मान रखा था तो दूसरी ओर सरकार ने मुझे नक्सलवादी घोशित करके मुझपर सन् छियान्नवें में न्यायालय में आरोप भी लगाया था जो मैने उच्च न्यायालय तक लड़कर मुक्ति पायी । मैने दोनो ओर के आक्रमण झेलकर नक्सलवाद को समझा है। मैने पाया है कि नक्सलवाद किसी भी रूप में व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं है। सच बात यह है कि नक्सलवाद पूरी तरह सत्ता संघर्श मात्र है। स्वतंत्रता के समय भारत के राजनेताओं के एक गुट ने गांधी की और दूसरे गुट ने गांधी के ग्राम स्वराज्य की नीतियों की हत्या करके समाज को गुलाम बना लिया था । इन लोगों ने मिलजुल कर समाज पर एक ऐसा संविधान थोप दिया जिसमें लोकतंत्र के नाम पर अनन्त काल तक समाज को गुलाम बनाकर रखने के सभी उपकरण मौजूद है। वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था येन केन प्रकारेण इस लोक तंत्र को सुरक्षित रखना चाहती है और नक्सलवादी इस लोक तंत्र को उखाड़ फेककर अपनी नई व्यवस्था स्थापित करना चाहते है। दोनो के बीच में संघर्श का प्रतीक बना है भारतीय संविधान । वही संविधान जिसके नाम पर पिछले साठ वर्शो से भारतीय समाज व्यवस्था को गुलाम बनाकर रखा जा रहा है। तथा कोई भी लोकतंत्र वादी यह बताने के लिये तैयार नही कि समाज को राजनैतिक गुलामी से कब और कैसे मुक्ति मिलेगी । वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था के दलाल इस व्यवस्था से लाभ उठा उठा कर बदले में इसका गुणगान करते हुये इस अतिवादी प्रषंसा तक चले जाते है कि भारत का वर्तमान संविधान दुनिया का सबसे अच्छा संविधान है या भारत दुनियाॅ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। अनेक साहित्यकार या समाज सेवी तो षतप्रतिषत मतदान या मतदाताजागरण अभियान आदि के नाटको द्वारा वर्तमान व्यवस्था कि दलाली करते मिल जाया करते है और अब तो कुछ धर्मगुरू तक इस चापलूसी में षामिल हो गये है जो स्वभाविक भी है क्योकि वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था ने ही तो उन्हें इस तरह बिना मेहनत के ही उच्च सुविधाएॅ संग्रह करने की छूट दी है।
सम्पन्नता सुविधा और अधिकारों की इस संवैधानिक लूट का स्वामित्व अपने हाथ में लेने का हिसंक प्रयास ही नक्सलवाद है। विभिन्न राजनैतिक दल तोकतंत्र की दुहाई देकर संवैधानिक तरीके से इस लूट के स्वामित्व पर कब्जा बनाये रखना चाहते है, तो दूसरी ओर अनेक दुसाहसी इस प्रयास में स्वयं को असमर्थ पाकर लोक तंत्र संविधान आदि का विरोध करके इस स्वामित्व को प्राप्त करना चाहते है और इस सफलता के लिये हिंसा ही सबसे अच्छा समाधान दिखता है।

मंहगाई का दोशी कौन ?

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मंहगाई बढा़ने का सारा दोश उन बुद्धिजीवियों उपभोक्ताओं का है जो नकली मंहगाई का हल्ला उठा उठा कर उत्पादकों के जले पर नमक छिड़कने का काम करते रहे  है और आज वास्तविक मूल्य वृद्धि के लिये दोशी कौन ? की बलि का बकरा खोजने की  कोशिश कर रहे है।

आज के समाचारो मे सबसे महत्वपूर्ण खोज खबर रही कि मंहगाई के लिये दोषी  कौन ? अधिकांष समीक्षकों ने कृशि मंत्री सरद पवार को दोशी माना तो सरद पवार ने भी हथियार डालते हुए प्रधान मंत्री को दोषी कहना षुरू कर दिया । मैने भी अपनी बुद्धि की पुरानी यादो को टटोलना षुरू किया तो पाया कि मंहगाई के लिये सर्वाधिक दोषी रही है भाजपा सरकारे जिन्होने बिना सोचे समझे अपने कार्यकाल मे वस्तुओं के मूल्यो को इतना सस्ता कर दिया कि उत्पादक परेषान हो गये। मेरे पिता स्वयं एक किसान रहे और हार थक कर खेती बन्द कर दी । आज भी मै महसूस करता हॅू कि  उनका निर्णय सही था । मेरा खेती करना मेरी मूर्खता थी क्योकि मेरे ईमानदार प्रयत्नों का लाभ उठा कर निकम्मे लोग गुलछर्रे उडाना षुरू कर दे तो ऐसे ईमानदार प्रयत्न मूर्खता ही कहे जाने चाहिये । सन् सतहत्तर की जनता सरकार ने जिस तरह षक्कर दो रू किलो तथा सरसों तेल ढ़ाई रूपये लीटर बिकवा कर उपभोक्ताओं की वाहवाही लूटी थी वही आज मंहगाई का रोना क्यो रो रहे है। उपभोक्ता यदि उत्पादको की सह्नदयता का लाभ उठाने के अभ्यस्त हो जावे तो दोशी कौन ? वस्तुओं को सस्ता करके उत्पादकों को सबसीडी देना एक गलत पंरपरा रही है, जिसका उपयोग सभी सरकारों ने समय समय पर किया है और भाजपा सरकारे उसमे अन्यों से आगे ही रही है । यदि सूझ बूझ की नीति बनती और मूल्य वृद्धि को रोकने की अपेक्षा उपभोक्ताओं को सबसीडी देने की योजन बनती तब न तो उत्पाद घटता न मूल्य अनिंयत्रित होते । आज बेचारा टमाटर सड़क पर मारा मारा फिर रहा है। यदि किसान टमाटर उत्पादन बन्द न करे तो क्या करें। उपभोक्ताओं के मंहगाई के एक पक्षीय प्रचार की आंधी उत्पादकों की कमर तो तोड़ सकती है, उन्हें आत्म हत्या के लिये मजबूर कर सकती है, किसानों की आत्म हत्या पर आंसू बहाने का नाटक कर सकती है, किन्तु उत्पादन नहीं बढ़ा सकती क्योकि षारीरिक श्रम करना उनका न स्वभाव है न मजबूरी। बौद्धिक श्रम द्वारा आकड़ो की खेती करके सस्ते से सस्ता खाना उनका स्वभाव है। जिसका परिणाम यदि उत्पादन की कमी के रूप में दिखे तो दोश किसका ? जो लोग मंहगाई के लिये कृशि मंत्री को दोश दे रहे है वे पूरी तरह गलत है। मंहगाई बढा़ने का सारा दोश उन बुद्धिजीवियों उपभोक्ताओं का है जो नकली मंहगाई का हल्ला उठा उठा कर उत्पादकों के जले पर नमक छिड़कने का काम करते रहे  है और आज वास्तविक मूल्य वृद्धि के लिये दोशी कौन ? की बलि का बकरा खोजने की कोषिष कर रहे है।

हमारी मूल समस्या शिक्षा का अभाव या गरीबी ?

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डूब मरने की बात यह भी है कि ऐसे गरीबी रेखा के नीचे रहने वालो के उत्पादन और उपभोग की वस्तुओं पर भी हम भारी कर वसूलते है क्योकि हमे शिक्षा जैसी मूलभूत आवष्यकता पर खर्च करना पड़ता है ।.

आज के अखबारों में समाचार छपा है कि तेंतीस प्रतिशत प्राथमिक स्कूलो में षौचालय नही है, तो चालीस प्रतिशत स्कूलो में हैण्ड पम्पों का अभाव है या इतने प्रतिशत स्कूलो में भवन नही है तो इतने प्रतिशत में fशक्षकों का आभाव है। समाचार को इस तरह हाईलाईट किया गया है जैसे षिक्षा का विस्तार ही हमारी गरीबी बेरोजगारी आर्थिक विशमता का समाधान हो और यदि षिक्षा पर अधिक धन खर्च कर दिया जावें तो भूख मिट जायेगी । मैने भी सोचना षुरू किया तो पाया कि यह बिल्कुल विपरीत प्रचार है । षिक्षा से रोजगार नही बढ़ सकता क्योकि षिक्षा रोजगार का श्रृजन नही कर सकती । षिक्षा व्यक्तिगत रोजगार वृद्धि भी कर सकती है और व्यक्तिगत जीवन स्तर कुछ व्यक्तिओं का सुधार सकती है किन्तु सामूहिक रोजगार तो श्रम ही दे सकता है, षिक्षा नहीं ।
आकड़ो को टटोलिये तो पता चलेगा कि भारत में इक्कीस प्रतिषत लोग तेरह रूपये से भी कम पर जीवन जी रहे है और हम इन तेरह रूपये पर जीवन जीने को मजबूर लोगों के अपने स्वयं के उत्पादन और उपभोक्ता  वस्तुओं पर भारी कर वसूल करके षिक्षा पर खर्च बढ़ाने की योजनाएॅ बना रहे है। हमारे लिये षर्म का विशय यह नही कि हमारे कितने प्रतिषत स्कूलो में षौचालय या पानी की व्यवस्था नही है । षर्म का विशय तो यह है कि हमारे कितने प्रतिषत गरीब घरो में षौचालय नही हैं या कितने प्रतिषत मुहल्लो में पानी की सुविधा नही है ? साथ ही डूब मरने की बात यह भी है कि ऐसे गरीबी रेखा के निचे रहने वालो के उत्पादन और उपभोग की वस्तुओं पर भी हम भारी कर वसूलते है क्योकि हमे षिक्षा जैसी मूलभूत आवष्यकता पर खर्च करना पड़ता है । यदि गरीबी घटेगी, जीवन स्तर सुधरेगा, पेट भरने लग जायगा तो षिक्षा अपने आप बढ़ जायेगी और यदि गरीबी , भूख, जीवन स्तर को अनदेखी करके षिक्षा को अधिक महत्व दिया गया तो एक दो प्रतिषत व्यक्ति तो प्रगति कर लेगें किन्तु समूह के साथ अन्याय हो जायेगा । आवष्यकता इस बात की है कि हम अपनी प्राथमिकताएॅ तय करे और उन प्राथमिकताओं में गरीबी और षिक्षा का संतुलन बनावें । षिक्षको को सम्मान जनक वेतन मिले, स्कूलो की हालत सुधरे, स्कूलो बजट बढ़े चाहे इसके लिये गरीब ग्रामिण श्रमजीवी पर ही क्यो न टैक्स बढ़ाना पडे़ ऐसा सोचना अनैतिक है, अन्यायपूर्ण तथा गलत है। आप बुद्धिजीवी है इसका अर्थ यह कदापि नही है कि आप श्रम के षोशण को अनैतिक या अपराध न समझे । यदि प्राथमिकताओं को समझने में भूल हुई तो यह भूल बहुत हानिकर हो सकती है।

भारत की समस्याएँ और संघ

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भारत मंे भौतिक उन्नति सामान्य रूप से हो भी रही है और दिख भी रही है किन्तु समाज व्यवस्था लगातार कमजोर हो रही है। ग्यारह समस्याएँ ‘‘(1) चोरी डकैती, (2) बलात्कार, (3) मिलावट, (4) जालसाजी, (5) हिंसा आतंकवाद, (6) भ्रष्टाचार, (7) चरित्र पतन, (8) साम्प्रदायिकता, (9) जातीय कटुता (10) आर्थिक असमानता (11) श्रम शोषण‘‘ लगातार बढ़ती ही जा रही हैं और भविष्य मंे भी इनका कोई समाधान नहीं दिख रहा। इसके विस्तार के कारणांे पर गंभीर विचार मंथन हमारे चिन्तन का मुख्य विषय है।

भारत मंे अनेक संगठन धार्मिक हैं और अनेक राजनैतिक। सामाजिक संगठन भी बहुत अधिक हैं जो चरित्र निर्माण के असामयिक प्रयत्नांे मंे लगे हुए हैं। एकमात्र संघ ही ऐसा संगठन है जिसमंे समाज की चिन्ता करने वाले लोगांे का भारी मात्रा मंे समावेश हुआ। संघ के प्रति आम भारतीयांे की आशाएँ भी जगीं ओर विश्वास भी। स्वतंत्रता के पूर्व संघ ने इस्लाम को समाज का सबसे बड़ा खतरा मानकर स्वयं को इस्लाम के विरूद्ध केन्द्रित किया। संघ ने राजनीति से दूर रहकर राजनीति पर नियंत्रण का भरपूर प्रयास किया।

स्वतंत्रता के बाद संघ ने अपनी राणनीति बदली। उसने अपनी राजनीति से दूर रहने की नीति को छोड़कर राजनीति मंे सक्रिय होने की नीति प्रारंभ करी दी और इस कार्य के लिये भी इस्लाम विरोध को मुख्य आधारी घोषित कर दिया। इसके पूर्व इस्लाम पर अंकुश लगाना संघ का लक्ष्य था किन्तु इसके बाद संघ सत्ता संघर्ष के लिये इस्लाम विरोध को मार्ग के रूप मंे उपयोग करने लगा। सत्ता के स्वाद की कल्पना करते रहने से संघ  मंे    नये तरह की सक्रियता आई जिसमंे समाज चिन्तक गौण और सत्ता के खिलाड़ी मुख्या होने लगे। इस्लाम मंे तो धर्म के सांगठनिक स्वरूप का हस्तक्षेप राजनीति मंे सदा ही होता रहा है किन्तु भारतीय संस्कृति मंे धर्म के गुणात्मक स्वरूप का ही राजनीति मंे समावेश हुआ है, सांगठनिक स्वरूप का नहीं। कभी ऐसा नहीं हुआ जब किसी शंकराचार्य या किसी अन्य धर्म प्रमुख ने राजकाज मंे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया हो। स्वतंत्रता के बाद आर्य समाज ने स्वयं को पूरी तरह दूर कर लिया। किन्तु संघ अपना राजनीति का लोभ संवरण नहीं कर सका। संघ के सम्पूर्ण सामाजिक जीवन की यह सबसे अधिक गंभीर भूल थी कि उसने राजनीति मंे अप्रत्यक्ष रूप से कूदने का निर्णय लिया।

परिणाम जो होना था वही हुआ। कंाग्रेस पार्टी से उसकी प्रतिद्वंद्विता हुई। कांग्रेस को सत्ता के लिये किसी विशेष चरित्र की आवश्यकता नहीं थी क्यांेकि स्वंतत्रता संघष और गांधी जी का नाम ही उसके लिये पर्याप्त था  किन्तु संघ को तो इस्लाम विरोध के नाम पर नया ध्रुवीकरण करना था इसलिये उसकी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को न चाहते हुए भी इस्लाम के समर्थन मंे आना पड़ा। ज्यों ज्यांे संघ की ताकत बढ़ी त्यांे त्यांे अन्य दलांे का भी कांग्रेस और इस्लाम से गठजोड़ होता गया और राजनीति मंे सत्तावन वर्ष बीतते संघ के विरूद्ध सब लोग एकजुट हो गये। संघ राजनीति मंे इस्लाम विरोध के साथ साथ और दलों की अपेक्षा चरित्र का अधिक पक्षकार रहा जिसके परिणाम स्वरूप  चरित्र विरोधियांे का भी जमावाड़ा संघ विरोधियांे के पास इकट्ठा होने लगा। सत्ता संघर्ष मंे सफलता की जल्दी मंे संघ की राजनैतिक शाखा भाजपा ने चरित्र से कुछ कुछ समझौता किया और यहीं से चरित्र पतन का मार्ग और स्पष्ट हो गया। अब राजनीति मंे चरित्र की बात करने वाला कोई भी दल नहीं था। जो ऐसे व्यक्ति थे वे भी धीरे धीरे कमजोर होने लगे।

भारतीय राजनीति मंे स्पष्ट ध्रुवीकरण हुआ जिसमंे एक ओंर इस्लाम विरोधी तथा चरित्र की चिन्ता करने वाले इकट्ठे हुए और दूसरी ओर इस्लाम समर्थक तथा चरित्र की चिन्ता न करने वाले लोग रहे। इस्लाम का समर्थन कांग्रेस की इच्छा न होकर राजनैतिक मजबूरी थी और चिरत्र पतन मंे समझौता संघ की इच्छा न होकर राजनैतिक मजबूरी रही। दोनांे ने सत्ता के लोभ मंे नीतियांे को छोड़ना स्वीकार कर लिया।

संघ ने सत्ता की हड़बड़ी मंे चिन्तन को भी पूरी तरह छोड़ दिया। इनमंे शिविरांे मंे तथा सर्वोच्च कोर ग्रुप की बैठकांे मंे भी नीतियांे की समीक्षा न करके कार्यक्रमांे की समीक्षा होने लगी। आर्थिक नीति कभी बनी ही नहीं। समाज मंे हिंसा को प्रोत्साहन देने की स्वतंत्रता की बाद भारत मंे लोकतंत्र है और लोकतंत्र मंे हिंसा का कोई स्थान नहीं होता है। यदि कोई दल हिंसा का प्रत्यक्ष या परोक्ष भी समर्थन करता है तो यह पूरा पूरा संदेह होता है कि वह तानाशाही की दिशा मंे सोच रहा है। इसी तरह संघ अंध इस्लाम विरोध से इतना अधिक चपेट गया कि उसे समाज समाज की अन्य दस समस्याआंे की चिन्ता ही नहीं रही। परिणाम हुआ कि नमाज तो छूटी नहीं रोजा और गले पड़ गया। अर्थात् इस्लाम पर अंकुश मंे तो सफलता मिली नहीं, उल्टा चरित्र पतन आतंकवाद भ्रष्टाचार अपराधीकरण आदि समस्याआंे का और अधिक विस्तार हो गया। आज भारत  मंे सामाजिक हिंसा का स्तर जितना बढ़ा हुआ है उसमंे संघ की भूमिका किसी भी रूप से अन्य दलांे से अलग नहीं है। अन्य दलांे की इससे कोई बदनामी नहीं होती क्यांेकि अन्य दलांे ने अपनी पहचान के साथ चरित्र को कहीं जोड़ा ही नहीं है किन्तु यदि चरित्र पतन और इस्लाम का विस्तार होता है तो संघ को उसमंे अपनी असफलता स्वीकार करनी चाहिये।

वर्तमान मंे भारत मंे कांग्रेस और भाजपा ही ऐसे दल हैं जिनमंे चरित्र की आंशिक चर्चा होती है। अन्य सभी दल तो पूरी तरह चरित्र प्रुफ हैं। कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी है। परिणाम स्वरूप चरित्र प्रुफ दलांे से समझौते करने और यहाॅ तक कि खुशामद करने तक को मजबूर हैं। संघ प्रमुख जैसी हस्ती कुछ वर्ष पूर्व के घोषित मियाॅ मुलायम के घर जाकर उनसे राजनैतिक चर्चा करे यह घटना मजबूरी को बिल्कुल स्पष्ट करती है। समाज के सामने तो कोई और विकल्प नहीं है। वह तो संघ का समर्थन करने को मजबूर है और संघ का हाल यह है कि सत्ता के मोह मंे उसने अपनी सारी लाज शर्म छोड़कर भाजपा को अपना लिया है। सत्ता लोलुपता के समक्ष संघ न समाज की चिन्ता कर रहा है न नीतियांे की।

पिछले दिनांे वाराणसी मंे नीतियांे पर गंभीर विचार मंथन हुआ। उम्मीद थी कि संघ स्वयं दलगत राजनीति से पृथक हो कर राजनीति और समाज के बीच मध्यस्थ के रूप मंे सामने आयेगा किन्तु समाज को उनके निर्णय से घोर निराशा हुई जब संघ ने भाजपा को परोक्ष समर्थन के स्थान पर प्रत्यक्ष नियंत्रण का नीतिगत निर्णय लिया। भाजपा मंे गुटबन्दी दूर होने का उसे लाभ मिलेगा। अब भाजपा कांग्रेस को कमजोर करके स्वयं को मजबूत कर सकेगी। सत्ता से संघ की और निकटता बढ़ेगी। भाजपा मंे धीरे-धीरे चरित्र की मात्रा सुधरेगी और संघ मंे धीरे – धीरे चरित्र की मात्रा घटेगी। अन्य दलांे को अब और अधिक सुविधा हो जायेगी। अब कांग्रेस और भाजपा ऐसे दलों के सिद्धान्त , व्यवहार और आचरण की और अधिक अनदेखी करके उनसे समझौते करेंगे, उनकी चापलूसी करेंगे। समाज की रही सही आशा भी टूट जायगी।

इतने वर्षो बाद होनी वाली संघ की नीतिगत चर्चा मंे भी समाज चिन्तकांे पर सत्ता चिन्तक भारी पड़ेे। वहाँ तो विचार का मुददा यह बन गया कि संघ भाजपा से दूर हटकर किसी नये दल की रचना करे या भाजपा को ही पुनर्जीवित करे। दोनो ही विचार सत्ता से ही जुड़े हुए थे। प्रश्न उठता है कि समाज की चिन्ता कौन करेगा ? क्या भारत के नागरिकांे को भविष्य मंे भी इसी तरह चरित्र पतन, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और अपराधीकरण की वृद्धि को बरदाश्त करना होगा? क्या ऐसा संभव नहीं है कि संघ अल्पकाल के लिये स्वयं को सत्ता संघर्ष से दूर रहकर राजनीति पर अंकुश की दिशा मंे सक्रिय कर ले। क्या यह नहीं हो सकता कि कांग्रेस और भाजपा को गुण दोष के आधार पर एक दूसरे का समर्थन या विरोध की नीति पर चलने को मजबूर कर दिया जावे? मुझे तो यह कार्य असंभव नहीं दिखता। अपराधीकरण और चरित्र पतन की तेज रफ्तार गाड़ी पर नियंत्रण संभव है और यह नियंत्रण तभी लग सकता है जब संघ के भीतर सत्ता लोलुप जमात पर समाज प्रधान जमात भारी पड़े। दो टूक और कठोर फैसले लेने होंगे। सत्ता मंे सुविधा भी है और आकर्षण भी किन्तु सुविधा और आकर्षण पर समाज की बली नहीं चढ़ाई जा सकती। अन्तिम रूप से सिद्ध हो चुका है कि सत्ता एक ऐसा खेल है जो कभी बन्द नहीं हो सकता। और इसका खामियाजा लगातार समाज को भोगना पड़ता है। बहुत हो चुका सत्ता की लुका छिपी का खेल। संघ के राजनीति निरपेक्ष लोगांे को पूरी बेशर्मी से खड़े होकर सत्ता लोलुपांें पर नियंत्रण करना होगा। संघ को इस्लाम विरोध तक सीमित न रहकर वर्तमान राजनैतिक पतन के विरूद्ध मोर्चा खोलना होगा। यदि संघ इस बात को नहीं समझा और भारत चरित्र पतन, भ्रष्टाचार, आंतकवाद और इस्लामिक कट्टरता का विस्तार हुआ तो इसका सारा दोष संघ की सत्ता लिप्सा अर्थात् एकमात्र संघ पर जायेगा। यदि संघ इस कलंक से बचना चाहता है तो उसके पास दो ही मार्ग हैं (1) संघ सत्ता संघर्ष से किनारे होकर राजनीति पर नियंत्रण का प्रयास करे, (2) संघ चरित्र की चर्चा का ढोंग बन्द करके स्वयं को धर्म और शुचिता के अग्रणी संरक्षक का दावा करना बन्द कर दे। यदि संघ की अन्य दलांे की तरह ही सुचिता से दूर हो जायगा तो उस पर कोई आरोप नहीं लगेगा। समाज कोई न कोई नया मार्ग खोज लेगा। अब भी समय है कि संघ भविष्य के संबंध मंे फिर से सोचकर कोई निर्णय करे।

Hello world!

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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