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मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा
स्वतंत्रता पूर्व स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, श्री हेडगेवार, तथा महात्मा गॉधी लगातार भारत की आतंरिक ,राजनैतिक, सामाजिक व्यवस्था के सुधार में सक्रिय रहे। तीनों ही संगठनों में एक स...
महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान– बजरंग मुनि
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेश , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 वर...
संघ परिवार की हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नीति सफलता की ओर- बजरंग मुनि
लम्बे समय से संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत काम करता रहा है कि भारत का मतदाता बहुसंख्यक अल्प संख्यक के नाम पर ध्रुवीकृत हो जाये। स्पष्ट है कि भारत मे हिन्दूओ का प्रतिशत अस्सी से भी ...
मंथन कैसे ?- बजरंग मुनि
मैंने लम्बे समय तक बौद्धिक व्यायाम किया है किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि यदि लम्बे समय तक व्यायाम करने के बाद व्यायाम बंद कर दिया जाये तो गठिया समेत अनेक बीमारियों की संभावना बन जाती है। ऐसा ह...
मंथन क्यों? बजरंग मुनि
भावना और बुद्धि का संतुलन आदर्श स्थिति मानी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिये भी यह संतुलन आवश्यक है तथा समाज के लिये भी। भावना त्याग प्रधान होती है तो बुद्धि ज्ञान प्रधान। भावना की अधिकता ...
मंथन क्रमांक- 4 की समीक्षा
आचार्य पंकज,वाराणसी,उ0प्र0 प्रश्न -मंथन क्रमांक 4 में विश्व की प्रमुख समस्याओं की विस्तृत चर्चा करते समय आपने आतंकवाद को शामिल नहीं किया,जबकि आतंकवाद भी एक बहुत बडी समस्या हंै। आप इस संबंध में ...
मंथन क्रमांक- 4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बीच ...
मंथन क्रमांक-3 की समीक्षा
ओम प्रकाश दुबे, नोएडा 1 प्रश्न- गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व मे क्या फर्क है? उत्तर-गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व का आशय एक ही है किन्तु गुणात्मक हिन्दुत्व और संगठनात्मक हि...
मंथन क्रमांक -2 बेरोजगारी
व्यक्ति को रोजगार प्राप्त कराना राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य होता है, दायित्व नहीं। क्योंकि रोजगार व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं होता,बल्कि संवैधानिक अधिकार मात्र होता है। रोजगार की स्वतंत्...
दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा
दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा में एक लेख लिखा है। उस लेख की समीक्षा में मैने एक उत्तर लिखा है जो इस प्रकार है- उत्तरः- आप सब जानते है कि मैं प्रतिद...

लोक संसद का प्रारुप

Posted By: kaashindia on November 11, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

प्रस्ताव

 

1. वर्तमान लोकसभा के समकक्ष एक लोकसंसद हो। लोकसंसद की सदस्य संख्या‚ चुनाव प्रणाली तथा समय सीमा वर्तमान लोक सभा के समान हो। चुनाव भी लोकसभा के साथ हो किन्तु चुनाव दलीय आधार पर न होकर निर्दलीय आधार पर हो।

 

2. लोक संसद के निम्न कार्य होगें,

 

क) लोकपाल समिति का चुनाव|

ख) संसद द्वारा प्रस्तावित संविधान संशोधन पर निर्णय|

ग) सांसद‚ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश़‚ मंत्री या राष्ट्रपति के वेतन भत्ते संबंधी प्रस्ताव पर विचार और निर्णय|

घ) किसी सांसद के विरुद्ध उसके निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत सरपंचो के बहुमत से प्रस्तावित अविश्वास प्रस्ताव पर विचार और निर्णय|

च) लोकपाल समिति के भ्रष्टाचार के विरुद्ध शिकायत का निर्णय|

छ) व्यक्ति‚ परिवार ग्राम सभा‚ जिला सभा‚ प्रदेश‚ सरकार तथा केन्द्र सरकार के आपसी संबंधो पर विचार और निर्णय|

ज) अन्य संवैधानिक इकाइयों के बीच किसी प्रकार के आपसी टकराव के न निपटने की स्थिति में विचार और निर्णय|

 

3. लोक सांसद को कोई वेतन भत्ता नहीं होगा। बैठक के समय भत्ता प्राप्त होगा।

 

4. लोक संसद का कोई कार्यालय या स्टाफ नहीं होगा। लोकपाल समिति का कार्यालय तथा स्टाफ ही पर्याप्त रहेगा।

 

5. यदि किसी प्रस्ताव पर लोकसंसद तथा लोक सभा के बीच अंतिम रुप से टकराव होता है तो उसका निर्णय जनमत संग्रह से होगा।

1. संविधान के मूल तत्व समाजशास्त्र का विषय है और समाजिक विचारकों को निष्कर्ष निकालना चाहिये। संविधान की भाषा राजनीतिशास्त्र का विषय है और राजनीतिज्ञ उसे भाषा दे सकता हैं।

 

2. भारतीय संविधान के मूल तत्व भी राजनेताओं ने ही तय किए और भाषा भी उन्होंने ही दी। संविधान के मूल तत्व तय करने में समाजशास्त्रियों की कोई भूमिका नहीं रही। या तो अधिवक्ता थे या आंदोलन से निकले राजनीतिज्ञ। संविधान निर्माण में गांधी तक को किनारे रखा गया जो राजनीति और समाजशास्त्र के समन्वय रुप थे। यही कारण था कि राजनेताओं ने संसद को प्रबंधन के स्थान पर अभिरक्षक‚ कस्टोडियन का स्वरुप दिया। यही नहीं‚ उन्होनें तो संसद के अभिरक्षक स्वरुप की कोई समय अवधि तय न करके देश के साथ भारी षड़यंत्र किया जिसका परिणाम हम आज भुगत रहें हैं।

 

3. देश के समाज शास्त्रियों को मिल-जुलकर संविधान के मूल तत्वों पर विचार मंथन करके कुछ निष्कर्ष निकालने चाहिये।

 

4. हमारे संविधान निर्माताओं ने पक्षपातपूर्वक राज्य को एकपक्षीय शक्तिशाली बना दिया। अब देश के समाजशास्त्रियों को मिलकर राज्य और समाज के अधिकारों की सीमाओं की पुनः व्याख्या का आंदोलन शुरू करना चाहिये।

 

5. भारतीय संविधान दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश के संविधान की अपेक्षा बहुत खराब है क्योकि‚

  •  (क) जब संसद संविधान के अनुसार ही कार्य करने को बाध्य है तो वही संसद संविधान संशोधन कैसे कर सकती है ।
  •  (ख) संविधान की उद्देशिका मे हम भारत के लोग ‘शब्द’ है। संविधान संशोधन में भारत के लोगो की प्रत्यक्ष स्वीकृति आवश्यक है। हम चुनावो मे जो संसद बनाते है वह संविधान के अंतर्गत व्यवस्था के लिये होती है न कि संविधान संशोधन की स्वीकृति। संविधान निर्माताओं ने घपला करके संसद को यह अधिकार लिख दिया।
  •  (ग) जिस संसद के अंतर्गत कार्यपालिका का नियंत्रण भी हो और विधायिका के संपूर्ण अधिकार भी उसी संसद के पास संविधान संशोधन का अधिकार प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
  •  (घ) भारतीय संविधान मे सांसद जन प्रतिनिधि होता है। उसे जनता की ओर से संसद मे अपनी बात रखने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। राजनैतिक दलो की मान्यता कानूनी है संवैधानिक नही। ऐसे संवैधानिक अधिकारो को किसी राजनैतिक दल द्वारा व्हिप जारी करके रोकना असंवैधानिक संविधान संशोधन है।
  •  (च) राजीव गांधी ने भारत की जनता को एक खतरनाक तोहफा दिया जो दल बदल कानून के रुप मे है। यह कलंक है।

 

लोक संसद बनाकर आंशिक रुप से संविधान संशोधन व्यवस्था को ठीक कर सकते है।

 

6. भारत में संविधान का शासन है। संविधान हमारी संसद के दाये हाथ मे ढाल है और बायी मुठी मे कैद है। हमारा पहला कार्य होना चाहिये कि संविधान रुपी संरक्षक को कैद से मुक्त कराया जाय। हमारी संसद एक ऐसा मंदिर है जिसमे हमारा भगवान कैद है। मंदिर का पुजारी भगवान को कैद मे रखकर उसका दुरुपयोग कर रहा है।

“लोक स्वराज मंच” तथा “ज्ञान क्रांति अभियान” के तत्वावधान में संपर्क यात्रा…!

Posted By: kaashindia on November 5, 2012 in Uncategorized - Comments: No Comments »

पिछले कुछ महिनों की परिस्थितियों से स्पष्ट है कि वर्तमान भारत में “लोक” “तंत्र” पर संप्रभुता स्थापित करने हेतु कटिबद्ध है । राजनीति पर समाज के अंकुश की इच्छा अब उत्तरोत्तर बलवती हो रही है । इस जनजागरण का श्रेय भारतीय समाज को तो जाता ही है‚ साथ-साथ समूची राजनैतिक व्यवस्था की बंदरबांट वृत्ति के खुलासों ने भी इस जन-जागरण को पुष्ट ही किया है ।

अब भारत की जनता “सत्ता परिवर्तन” एवं “व्यवस्था परिवर्तन” का भेद जानने लगी है तथा व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में कार्यरत समूहों को शक्ति प्रदान करने लगी है‚ चाहे वह “लोक स्वराज मंच” हो‚ अन्ना हजारे हों‚ अरविन्द केजरीवाल हो‚ या अनेकानेक स्थानीय आन्दोलन।

परिवर्तन की चाह तथा कार्यान्वयन में अंतर होता है‚ क्योंकि चाह नीयत-प्रधान होती है एवं कार्यान्वयन नीति-प्रधान । जयप्रकाश आन्दोलन में भी नीयत ठीक रहीं‚ नीतियाँ गड़बड़ाईं । आज 35 साल बाद फिर ऐसा ही सुनहरा मौक़ा भारत के सामने है‚ बशर्ते उस समय की नीतिगत त्रुटियों की पुनरावृत्ति से बचा जाय तो सम्पूर्ण क्रान्ति निश्चित तौर पर संभव है ।

“लोक स्वराज मंच” 1999 से ही व्यवस्था परिवर्तन कार्यान्वयन के नीतिगत मसलों में स्पष्ट रहा है । “भावी भारत का संविधान” एवं “लोक संसद” के विचार इसके प्रमाण हैं । बदलते भारत को इन विचारों से प्रत्यक्ष परिचय करवाने हेतु “लोक स्वराज मंच” ने व्यापक जन-चेतना यात्रा २२ नवम्बर २०१२ से प्रारंभ की है‚ जो विभिन्न चरणों में देश भर के १०० केन्द्रों में ३१ मार्च २०१२ तक पूर्ण की जायेगी ।

 

इस यात्रा के अंतर्गत “ज्ञान क्रांति अभियान” विचार मंथन को भी प्रोत्साहित करने का प्रयास करेगा । पूरी यात्रा का संचालन‚  राजीव माहेश्वरी – 0 91790 45559‚ रमेश चौबे – 0 84350 23029 तथा नरेन्द्र सिंह – 0 73898 90738 मिलकर करेंगे ।

आप भी “लोक स्वराज मंच” के माध्यम से बदलते भारत के नवनिर्माण में सहयोगी बनें तथा आपसे निवेदन है कि आप भी इस यात्रा में अपनी क्षमता अनुसार सहयोग करने की कृपा करें ।                                                                                                                                                                                                                         

अध्यक्ष:- सिद्धार्थ शर्मा   “लोक स्वराज मंच

संरक्षक:-  श्री बजरंग मुनि – 0 96170 79344   

 

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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