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मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;दुनियां का प्रत्येक व्य...
मंथन क्रमांक-112 ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;धर्म शब्द के अनेक अर्...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय– बजरं मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;आदर्श वर्ण व्यवस्था में ...
मंथन क्रमाॅक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते हैं। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता हैं;किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता हैं, किये जाने वाले कार्य न करना अन...
मंथन क्रमांक 109- आरक्षण- बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमज...
मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगा...
मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर किस वर्ग के नायक और किसके खलनायक

Posted By: kaashindia on April 19, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

Dr-Bhim-Rao-Ambedkarडाॅ0 भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिन पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जा रहा है। लगभग सर्वसम्मति बनी हुई है और कहीं कोई समीक्षा या आलोचना के स्वर नहीं सुनाई दे रहे।प्रश्न उठता है कि अम्बेडकर जी किस वर्ग के नायक के रुप में माने जा सकते है, और किस वर्ग के खलनायक के रुप में?
भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न वर्ग होते हैं। प्रवृत्ति के आधार पर दो वर्ग होते है-1. दैवीय प्रवृत्ति वाले 2. आसुरी प्रवृत्ति वाले। धर्म के आधार पर भी दो वर्ग होते है – 1. गुण प्रधान 2. पहचान प्रधान। सामाजिक कार्यो में संलग्न लोगों में भी दो वर्ग होते है- 1. संस्थागत कार्य करने वाले 2. संगठनात्मक स्वरुप वाले। आर्थिक आधार पर भी दो वर्ग होते है- 1. बुद्धिप्रधान 2. श्रम प्रधान। राजनैतिक आधार पर भी दो वर्ग होते है- 1. संचालक या शासक 2. शासित या संचालित। चूॅकि अम्बेडकर जी जीवन भर राजनीतिज्ञ के रुप में कार्य करते रहे इसलिए हम अन्य वर्गो के आधार पर उनकी समीक्षा न करके राजनैतिक वर्ग विश्लेषण तक सीमित रहेंगे।
राजनीति में दो वर्ग होते है-1 शासक और 2 शासित। तानाशाही में शासक व्यक्ति होता है और मालिक के रुप में होता है। जबकि लोकस्वराज्य में शासक प्रतिनिधि होता है और प्रबंधक होता है, मैंनेजर होता है। जहाॅ लोकतंत्र होता है वहाॅ और विशेष कर भारतीय लोकतंत्र में शासक शासितों द्वारा चुने हुए व्यक्तियो का गुट होता है। यह गुट संरक्षक की भूमिका में होता है जबकि समाज इस गुट के अन्तर्गत संरक्षित होता है। शासक समाज को अयोग्य,नाबालिग मानकर अप्रत्यक्ष रुप से अपनी मालिक की भूमिका बनाता है। स्वतंत्रता के पूर्व भीमराव अम्बेडकर शासन की राजनीति करने वालों में सबसे प्रमुख व्यक्ति थे। भीमराव अम्बेडकर मे शासक के सारे गुण मौजूद थे। विलक्षण प्रतिभा थी,धूर्तता के चरण तक की कूटनीति थी तथा परिश्रम के मामले में भी अन्य सबसे आगे थे। स्वतंत्रता के पूर्व शीर्ष पर जो दो विचारधाराएॅ थी, उनमें एक का नेतृत्व गाॅधी के हाथ में था तो दूसरी का भीमराव अम्बेडकर के हाथ में। अन्य सब लोग तो बीच में इधर उधर होते रहते थे।
सफल राजनेता के आवश्यक गुणों में यह माना जाता है कि वह समाज को हमेशा विभिन्न वर्गो में बांटकर रखे,तथा उन्हें कभी एकजुट न होने दें। यहाॅ तक कि सफलता के चर्मोत्कर्ष के लिए परिवार तक को बांटकर रखना आवश्यक माना जाता है। साथ ही लोकतंत्र में शासितों को धोखा देने के लिए अनेक प्रकार के नाटक भी करने पडते है। अम्बेडकर जी धोखा देने और नाटक करने में सिद्धहस्थ रहे। भीमराव अम्बेडकर जी ने प्रांरभ से ही अपने वर्ग की प्रसन्नता और सुविधा के लिए वह सब कुछ किया जो समाज को लम्बे समय तक गुलाम बनाकर रखने के लिए किसी नेता को करना चाहिए। यहाॅ तक कि उन्होने अपने वर्ग की सुविधा के लिए गाॅधी तक का विरोध किया। राजनैतिक वर्ग के मार्ग में गाॅधी सबसे बडी बाधा थे। स्वतंत्रता मिलते ही राजनेताओं के लिए गाॅधी एक बोझ बन गये थे। वह बोझ हटते ही राजनेताओं के वर्ग को पूरी छूट मिल गई और उस छूट का लाभ उठाकर भीमराव अम्बेडकर जी ने अपने वर्ग के लिए स्वतंत्रता पूर्वक सब कुछ करते हुए ऐसा मार्ग बना दिया कि वह वर्ग कई पीढि़यों तक उसका लाभ उठा सकता है।
माना जाता है कि वर्तमान संविधान भीमराव अम्बेडकर जी के द्वारा ही बनाया हुआ है। इस संविधान में वह सब कुछ है तो राजनेताओं द्वारा समाज को अनंत काल तक गुलाम बनाकर रखने के लिए होना चाहिए।समाज को समझाया जाता है कि संविधान तो भगवान का स्वरुप है। साथ ही संविधान में किसी भी प्रकार के फेरबदल का अंतिम अधिकार भी राजनेताओं ने अपने पास ही सुरक्षित रखा है। जो संविधान आज भारत में है, या धीरे धीरे उसको राजनेताओं ने फेरबदल करके जैसा बना दिया है, उसके अनुसार तो तंत्र पूरी तरह मालिक और लोक गुलाम से अधिक कोई हैसियत नहीं रखता। वोट देने के अतिरिक्त लोक के पास ऐसा कौन सा अधिकार है जिसमें तंत्र हस्तक्षेप न कर सके। हमारे अधिकार क्या हो यह तंत्र तय करेगा किन्तु उनके अपने अधिकार क्या हो यह वे स्वयं तय करेंगे। हमारा वेतन क्या हो यह वे तय करेंगे किन्तु उनका वेतन क्या हो यह भी वे ही तय कर लेंगे। वे हमसे कितना टैक्स वसूल सकते है इसकी कोई सीमा नहीं है दूसरी ओर वे अपनी सुविधाएॅ कितनी बढा सकते है इसकी भी कोई सीमा नहीं है। स्पष्ट है कि वे संवैधानिक रुप से हमारे भाग्य विधाता है और हम उनके गुलाम प्रजा। संविधान ने परिवार व्यवस्था, गाॅव व्यवस्था, को तो अपने मे से बाहर कर दिया। दूसरी ओर समाज तोडक जाति,धर्म,भाषा आदि को अपने अंदर समेट लिया। यह सारी योजना भीमराव अम्बेडकर जैसे चालाक मस्तिष्क की ही उपज थी, अन्यथा अन्य किसी के बस की बात नहीं थी। भीमराव अम्बेडकर जी प्रारंभ से ही महिला और पुरुष को दो वर्गो में विभाजित देखना चाहते थे और जीवन भर तथा मृत्यु तक उन्होने इस दिशा में सक्रियता दिखाई। हिन्दू कोड बिल भीमराव अम्बेडकर की एक ऐसी पहचान बन चुका है जो भारत के हिन्दुओं की छाती में तीर के समान लगातार घाव कर रहा है। भीमराव अम्बेडकर जी बुद्धिजीवियों का प्रतिनिधित्व करते थे और इसलिए उन्होने जीवन भर श्रम के साथ भी धोखा किया। श्रम और बुद्धि के बीच इतना बडा फर्क अम्बेडकर जी की ही देन है। भाषा के मामले में भी भीमराव अम्बेडकर जी अंग्रेजी प्रिय थे। यहाॅ तक कि जब हिन्दी पर ज्यादा जोर दिया गया तो भीमराव अम्बेडकर जी ने संस्कृत की आवाज उठा कर हिन्दी भाषियों में फूट डालने का काम किया। इतनी चालाकी तो कोई शातिर दिमाग व्यक्ति ही कर सकता है।
कहाॅ जाता है कि भीमराव अम्बेडकर जी और नेहरु में नहीं पटती थी। मैं स्पष्ट कर दॅू कि भीमराव अम्बेडकर जी प्रधानमंत्री बनने की प्रतिद्वंदिता में नेहरु और जिन्ना के खिलाफ थे। किन्तु समाज को गुलाम बनाकर और समाज को आपस में तोडफोड कर रखने में तीनों एक साथ रहे । मैंने तो यहाॅ तक सुना है कि प्रारंभ में भीमराव अम्बेडकर जी राजनैतिक नेतृत्व के लिए मुसलमान भी बनना चाहते थे। किन्तु जब वे नहीं बन सके और मुस्लिम नेतृत्व जिन्ना ने ले लिया तब भीमराव अम्बेडकर जी ने पिछडों का नेतृत्व करना शुरु किया। यहाॅ तक कि पहला चुनाव भीमराव अम्बेडकर जी ने मुस्लिम लीग की सहायता से ही लडा था। बाद में वे कांग्रेस से चुनाव लडे और बाद में कांग्रेस के विरुद्ध भी चुनाव लडे और अंत में फिर बौद्ध भी बने। उन्होने सारे नाटक किये किन्तु प्रधानमंत्री बनने की उनकी इच्छा अंत तक अधूरी ही रह गई। वे महिलाओं के प्रमुख पक्ष धर माने जाते है किन्तु उनका अपनी पत्नि के साथ व्यवहार शोध का विषय है।
यह सही है कि भीमराव अम्बेडकर जी में विलक्षण प्रतिभा थी। परिस्थितियों को अपने पक्ष में करना वे अच्छी तरह जानते थे। उनके पिता राज कार्य में किसी पद पर थे। भीमराव अम्बेडकर जी में प्रारंभ से ही प्रतिभा थी। अब यह प्रतिभा उनके जन्म पूर्व के संस्कारों से आयी या पूर्व जन्म की संचित प्रतिभा थी या राज परिवार के संस्कारों से प्राप्त वातावरण की थी यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं। किन्तु उनमें प्रतिभा थी और उस प्रतिभा को तत्कालीन राज परिवार का अंध समर्थन मिला। यह बात सच है कि उन्होने इन सब परिस्थितियो का पूरा पूरा लाभ उठाया। सवर्ण ब्राहमण ने उन्हे पढाया, सवर्ण राजा ने उनकी सब प्रकार से सहायता की सवर्ण पत्नि ने जीवन भर उनका साथ दिया और भीमराव अम्बेडकर जी ने भी सवर्णो के हित में वह सब किया जो उन्हे नहीं करना चाहिए था। स्पष्ट दिख रहा था कि स्वतंत्रता के बाद सवर्ण और अवर्ण के बीच वह भेदभाव पूर्ण स्थिति नहीं रह सकती जो स्वतंत्रता के पूर्व थी। भीमराव अम्बेडकर जी ने बहुत चतुराई से मुट्ठी भर अवर्ण बुद्धिजीवियों को बहुसंख्यक सवर्ण बुद्धिजीवियों से समझौता करा दिया और उसका परिणाम हुआ कि 67 वर्षो बाद भी सवर्ण बहुमत सब प्रकार के लाभ उठा रहे है और अवर्ण बहुमत आज भी मट्टी खोदने से आगे बढने की स्थिति में नही है।
हम देख रहे है कि आज पूरे हिन्दुस्तान के सभी राजनेता, सभी धर्मगुरु चाहे सवर्ण हो या अवर्ण तथा सभी बुद्धिजीवी चाहे छोटे पद पर हो या बडे पद पर, एक स्वर से भीमराव अम्बेडकर जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे है कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए सभी राजनेताओं तथा बुद्धिजीवियों में एक होड सी मची है कि कौन इस मामले में आगे निकल पाता है। चाहे मोदी हो या सोनिया राहुल, चाहे कम्युनिष्ट हो या नीतिश अरविंद , चाहे संघ प्रमुख हों या आजम खान हो, सभी एक स्वर से प्रशंसा में लगे है। मेरे विचार से उन्हे लगना भी चाहिए। क्योकि समाज को गुलाम बनाकर पीढियों तक रखने का जो मार्ग भीमराव अम्बेडकर जी ने दिया और जिस पर चलकर आज भी ये लोग अपने को स्थापित किये है उस मार्ग दृष्टा को सम्मानित न करना तो कृतघ्नता ही मानी जाएगी। सभी संविधान की दुहाई दे रहे है क्योकि संविधान ही तो वह दस्तावेज है जो समाज को गुलाम बनाकर रखने में तंत्र की ढाल बना हुआ है।
विचारणीय है कि आज समाज का प्रतिनिधत्व करने वाला कोई गाॅधी दिख नहीं रहा और ऐसे प्रतिनिधित्व के अभाव में राजनेता मैदान में एक तरफा गोल मारे जा रहे है। यह अलग बात है कि इस एक तरफा गोल करने में उनके आपसी हित भी टकराते हो किन्तु कोई और गाॅधी पैदा न हो जाये जो समाज को सशक्त करने का मार्ग प्रस्तुत कर दे , इस मामले में तंत्र से जुडे सब लोग एकजुट है। भीमराव अम्बेडकर जयन्ती के बहाने ये सब लोग मिलकर अम्बेडकर जी को अपना नायक सिद्ध करने का पूरा प्रयास कर रहे है। मुझे विश्वाश है कि भविष्य में परिस्थितियाॅ बदलेंगी और जब दूसरा पक्ष मालिक की भूमिका में आयेगा तब शायद भीमराव अम्बेडकर जी एक खलनायक के रुप में स्थापित हो सकेंगे।

केरल मंदिर दुर्घटना और राजनेताओं का नाटक

Posted By: kaashindia on April 13, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

108922-kerala-ttraedyएक सर्वमान्य सिद्धांत के अनुसार सुरक्षा और न्याय राज्य का दायित्व होता है तथा अन्य जनकल्याण के कार्य उसका कर्तव्य। सुरक्षा और न्याय तंत्र के लिए बाध्यकारी होता है जबकि जनकल्याणकारी कार्य उसके स्वैच्छिक कर्तव्य। पश्चिम के देशो में सुरक्षा और न्याय की आवश्यकता सीमा के अंदर थी इसलिए उन देशो ने जनकल्याणकारी कार्यो को आंशिक रुप से अपने दायित्वों के साथ जोड़ लिया। किन्तु इसके ठीक विपरीत दक्षिण एशिया के देशो में, जिनमें भारत भी शामिल है, सुरक्षा और न्याय खतरनाक स्थिति तक संकट में पडा हुआ है। ऐसी स्थिति में सुरक्षा और न्याय राज्य का एकमात्र या पहला दायित्व होना चाहिए था। किन्तु भारत सरकार ने पता नही क्यों पश्चिम की नकल करते हुए सुरक्षा और न्याय की अपेक्षा जनकल्याणकारी कार्यों को अपने दायित्वों में शामिल कर लिया। मैं नहीं कह सकता कि यह कार्य जानबूझकर किया गया या भूलवष,किन्तु किया गया अवश्य ।
केरल के एक शहर के मंदिर में किसी धार्मिक कार्यक्रम के अंतर्गत हो रही आतिशबाजी से आग लग गई। भयंकर दुर्घटना के अतर्गत 110 के करीब लोग झुलसकर मर गये, तथा 3-4 सौ घायल स्थिति में कराह रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी मनुष्य का दिल पसीजना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और यदि ऐसा न हो तो उसे पत्थर दिल या निर्दयी व्यक्ति ही माना जायेगा। यहाॅ तक कि दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों ने भी इस भयानक दुर्घटना के प्रति अपना शोक व्यक्त किया है। मैं भी ऐसी दुर्घटना से द्रवित हुए बिना नहीं रह सका। जिनके परिवारों के लोग मरे है या घायल हैं, उनकी करुण स्थिति की कल्पना ही की जा सकती है।
इन सब के बाद भी राज्य रुपी संवैधानिक इकाई इतनी स्वतंत्र नहीं है जो अपनी प्राथमिकताएॅ व्यक्तिगत भावनाओं के आधार पर बदल सके। भारत में राज्य एक व्यवस्था है न कि व्यक्ति समूह का शासन। हत्या और मृत्यु में आसमान जमीन का फर्क होता है। हत्या एक अपराध है। इसका अर्थ हुआ कि हत्याओं को रोकना राज्य का दायित्व है किन्तु मृत्यु चाहे किसी भी कारण से हो, कितनी भी वीभत्स हो, वह दुर्घटना हो सकती है किन्तु अपराध नहीं। इसका अर्थ हुआ कि इसमें सहायता करना राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य मात्र हो सकता है, दायित्व नहीं। यदि राज्य हत्या और दुर्घटनामृत्यु के बीच दुर्घटना को ज्यादा महत्व देता है तो कहीं न कहीं राज्य अपने दायित्व से पीछे हट रहा है अर्थात् राज्य गलत कर रहा है।
मैंने पिछले 2-3 दिनों में देखा कि केरल मंदिर की दुर्घटना में राजनेताओं के बीच नाटक करने की होड़ मची हुई है। ऐसी प्रतिस्पर्धा जैसी किसी हत्या के मामले में कभी नहीं दिखती। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, राहुल गाॅधी, ए के एन्टनी आदि नेता तत्काल घटना स्थल पर पहॅुच गये। घटना स्थल पर पहुचने में घायलों की सहायता का उद्देश्य न के बराबर था और सहानुभूति या सहायता करने का नाटक करना मुख्य। ऐसा लगा कि जैसे हत्या से प्रभावित व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति होता है तथा दुर्घटना से प्रभावित व्यक्ति मतदाता होता है। इसका अर्थ हुआ कि मतदाताओं की संख्या जहाॅ अधिक होगी तथा उस घटना के समय किये गये नाटक का प्रभाव अन्य मतदाताओं पर जितना अधिक होगा नेता उसी को अधिक महत्व देगा, उसी को अधिक सहायता भी देगा जबकि हत्या या अपराध के मामले में सहायता या सहानुभूति सिर्फ औपचारिक या मामूली होगी। हमारे छ0ग0 में राज्य संरक्षित हाथियों या बाघों ने कई लोगों की हत्या कर दी। यदि दस लोग ऐसी हत्या के शिकार हुये तो उन्हें आर्थिक सहायता में कुल मिलाकर 20-25 लाख रुपये प्राप्त हुये। मैं देखता हॅू कि यदि डकैत या अपराधी दस निर्दोष लोगो की आपराधिक हत्या कर दे तो उन्हें बडी मुश्किल से 20-25 लाख रुपया मुवाजा मिलेगा। ऐसे लोगों के आंसू पोंछने कोई विधायक या पटवारी भी नहीं जायेगा क्योकि यह तो केवल पुलिस का रुटिन वर्क है। किन्तु यदि दस लोग किसी दुर्घटना में या गाडी एक्सीडेंट में सामूहिक रुप से मर जायें तो प्रशासन के मुख्यमंत्री तक उसके परिवार में आंसू पोंछने अवश्य आयेंगे और उन्हें दस लोगों की आर्थिक सहायता के रुप में एक करोड़ रुपया भी दे सकते है। स्पष्ट है कि हत्या और मृत्यु में बहुत अंतर है। किन्तु हमारे देश के नेता इस अंतर को जब चाहे तब विपरीत रुप से परिभाषित कर सकते है। मुख्य रुप से ऐसा तब होता है जब मीडिया ऐसी दुर्घटना को बढा चढाकर हाथ में ले ले।
मैंने 2-3 दिनों में हर चैनल के मीडिया कर्मी को अनेक प्रकार के प्रश्न पूछते देखा। अनेक ने तो इस घटना को हत्या तक प्रचारित करने का प्रयास किया। हो सकता है यही चैनल इसे नरसंहार भी कहना शुरु कर दे। चैनल वाले प्रश्न बहुत कर रहे है किन्तु इस बात का उत्तर नहीं दे रहे कि घटना के ठीक पूर्व उनके प्रतिनिधि इस विषय में क्या कर रहे थे। ऐसी घटनाएॅ पहले भी घट चुकी है और राज्य शासन ने इससे कोई सबक नहीं लिया। यह सच है किन्तु यह भी सच है कि उस मंदिर में इस दुर्घटना के पहले भी प्रतिवर्ष इसी तरह का खतरनाक आयोजन होता रहा है, जिसको रोकने में मीडिया ने कभी कोई पहल नहीं की। मैं मानता हॅू कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी मामले में दया करने का व्यक्तिगत रुप से पूरा अधिकार है किन्तु किसी भी व्यक्ति को किसी संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से किसी भी रुप में किसी के साथ विशेष दया करने का अधिकार नहीं है। मैंने देखा कि मोदी जी अथवा राहुल गाॅधी इस प्रकार का चेहरा बनाये हुए थे जैसे कि वे बस रोने ही वाले है। किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि हमारे देश के ये नेता रोज ही किसी न किसी मामले में ऐसा चेहरा बनाये रहते है।
राजनैतिक व्यवस्था से जुडी हर इकाई अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए ऐसी दुर्घटना के मामलों में तत्काल कठोर कार्यवाही करना शुरु कर देती है। मीडिया भी तत्काल प्रश्नों की झडी लगा देता है। प्रशासनिक अफसर भी तुरंत ही अनेक तरह के नोटिस मंदिर प्रशासन को थमा चुके है। तुरन्त ही सरकार ने भी अनेक तरह की जाॅचों का आदेश दे दिया है। ऐसा लगा जैसे इस दुर्घटना के बाद ऐसी दुर्घटनाओं का द्वार बंद ही हो जायेगा। किन्तु मैं आश्वस्त हॅू कि भविष्य में भी ऐसी कार्यवाही से दुघटनाओं की बाढ़ रुकेगी नहीं। क्योंकि ऐसी दुर्घटनाएॅ रोकने का यह कोई उचित मार्ग नहीं है। इसका उचित मार्ग तो यह होता कि वहाॅ इक्ट्ठे होने वाले नागरिक स्वयं ऐसे खतरों के प्रति सतर्क रहते और इसके बाद भी कोई वहाॅ जाता है तो वहाॅ जाने वाले की भी उतनी ही बडी गलती है जितनी आयोजक की और सरकार की। जाने वाले को परिवार ने नहीं रोका, स्थानीय समाज ने नहीं रोका, क्योंकि सरकार ने ऐसी घटनाओं को रोकने का सारा दायित्व अपने उपर ले लिया है और लोग निश्चित है कि सरकार की चुस्त दुरुस्त व्यवस्था के अंतर्गत दुर्घटना होना संभंव ही नही है। अर्थात् जब कलेक्टर की अनुमति के बिना वहाॅ बारुद इक्ट्ठा ही नहीं होगा तो दुर्घटना होगी कैसे। सरकार की कार्यवाही कितनी लुंजपुंज है यह सरकार भी जानती है फिर भी ऐसे मामलों का दायित्व अपने उपर ले लेती है और इसके बाद भी दुर्घटना होने पर अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने की अपेक्षा आयोजकों को दण्डित करके अपने को निर्दोष सिद्ध करने का प्रयास करती हैं।
मैं स्पष्ट कर दॅू कि यदि 10 लोगों की हत्याएॅ होती है और 100 लोगों की मृत्यु होती है तो समाज के लिए 100 लोगों की मृत्यु अधिक महत्वपूर्ण है किन्तु प्रशासन के लिए 10 लोगों की हत्या। 100 लोगों की मृत्यु की अपेक्षा 10 लोगो की हत्या अधिक महत्वपूर्ण है। क्योकि हत्याएॅ रोकना राज्य का दायित्व है तथा मृत्यु रोकना स्वैच्छिक कर्तव्य। राज्य सत्ता से जुडे लोग इस प्रकार का नाटक करके खजाना लुटाकर या नोटिस थमा कर यदि अपने दायित्व से भागने का प्रयास करते है तो यह अच्छी बात नहीं है। मैं चाहता हॅू कि इस विषय पर समाज में एक सार्थक विचार मंथन होना चाहिए।

Posted By: kaashindia on April 8, 2016 in Uncategorized - Comments: Comments Off on

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Posted By: kaashindia on in Uncategorized - Comments: Comments Off on

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Posted By: kaashindia on April 7, 2016 in Uncategorized - Comments: Comments Off on

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एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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