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मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा
स्वतंत्रता पूर्व स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, श्री हेडगेवार, तथा महात्मा गॉधी लगातार भारत की आतंरिक ,राजनैतिक, सामाजिक व्यवस्था के सुधार में सक्रिय रहे। तीनों ही संगठनों में एक स...
महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान– बजरंग मुनि
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेश , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 वर...
संघ परिवार की हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नीति सफलता की ओर- बजरंग मुनि
लम्बे समय से संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत काम करता रहा है कि भारत का मतदाता बहुसंख्यक अल्प संख्यक के नाम पर ध्रुवीकृत हो जाये। स्पष्ट है कि भारत मे हिन्दूओ का प्रतिशत अस्सी से भी ...
मंथन कैसे ?- बजरंग मुनि
मैंने लम्बे समय तक बौद्धिक व्यायाम किया है किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि यदि लम्बे समय तक व्यायाम करने के बाद व्यायाम बंद कर दिया जाये तो गठिया समेत अनेक बीमारियों की संभावना बन जाती है। ऐसा ह...
मंथन क्यों? बजरंग मुनि
भावना और बुद्धि का संतुलन आदर्श स्थिति मानी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिये भी यह संतुलन आवश्यक है तथा समाज के लिये भी। भावना त्याग प्रधान होती है तो बुद्धि ज्ञान प्रधान। भावना की अधिकता ...
मंथन क्रमांक- 4 की समीक्षा
आचार्य पंकज,वाराणसी,उ0प्र0 प्रश्न -मंथन क्रमांक 4 में विश्व की प्रमुख समस्याओं की विस्तृत चर्चा करते समय आपने आतंकवाद को शामिल नहीं किया,जबकि आतंकवाद भी एक बहुत बडी समस्या हंै। आप इस संबंध में ...
मंथन क्रमांक- 4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बीच ...
मंथन क्रमांक-3 की समीक्षा
ओम प्रकाश दुबे, नोएडा 1 प्रश्न- गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व मे क्या फर्क है? उत्तर-गुणात्मक हिन्दुत्व और सनातन हिन्दुत्व का आशय एक ही है किन्तु गुणात्मक हिन्दुत्व और संगठनात्मक हि...
मंथन क्रमांक -2 बेरोजगारी
व्यक्ति को रोजगार प्राप्त कराना राज्य का स्वैच्छिक कर्तव्य होता है, दायित्व नहीं। क्योंकि रोजगार व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं होता,बल्कि संवैधानिक अधिकार मात्र होता है। रोजगार की स्वतंत्...
दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा
दैनिक भास्कर के संम्पादक कल्पेश याग्निक जी ने सर्जिकल स्ट्राइक की समीक्षा में एक लेख लिखा है। उस लेख की समीक्षा में मैने एक उत्तर लिखा है जो इस प्रकार है- उत्तरः- आप सब जानते है कि मैं प्रतिद...

मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा

Posted By: kaashindia on November 19, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

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स्वतंत्रता पूर्व स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, श्री हेडगेवार, तथा महात्मा गॉधी लगातार भारत की आतंरिक ,राजनैतिक, सामाजिक व्यवस्था के सुधार में सक्रिय रहे। तीनों ही संगठनों में एक से बढकर एक त्यागी ,तपस्वी लोग शामिल रहे, किन्तु तीनों संगठनों का कुछ मामलों में तालमेल नहीं हो सका। आर्य समाज मुख्य रुप से सामाजिक समस्याओं पर अधिक केन्द्रित रहा। आर्य समाज भावनाओं की अपेक्षा विचारों पर अधिक बल देता था। आर्यसमाज परिस्थिति अनुसार अपनी कार्यप्रणाली में संशोधन भी करता था। यही कारण था कि आर्य समाज ने स्वतंत्रता संघर्ष में सामाजिक कार्यो की अपेक्षा गुलामी से मुक्ति आन्दोलन में अधिक बढ़ चढकर हिस्सा लिया। आर्य समाज के बहुत से लोग गॉधी के मार्ग से भी जुडे रहे, तो दूसरी ओर बहुत से लोग गॉधी मार्ग से ठीक विपरीत क्रांतिकारियों के साथ भी जुडे रहे। मार्ग भले ही भिन्न भिन्न हो किन्तु लक्ष्य दोनों का स्वतंत्रता में सहयोग था। हेडगेवार जी तथा उनके द्वारा स्थापित संघ हिन्दू सुरक्षा तक सीमित था। संघ के लोग इस्लाम को हिन्दू धर्म के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक मानते थे और यह भी सच था कि मुसलमान राजाओं का इतिहास ऐसा ही कलंकित रहा है। मुसलमानों की अपेक्षा संघ परिवार अंग्रेजी शासन को कम खराब मानता था और इसलिए संघ परिवार की एकमात्र सम्पूर्ण शक्ति इस्लाम के विरुद्ध हिन्दू संगठन तक केन्द्रित रही। महात्मा गॉधी राष्ट्रीय गुलामी को सर्वाधिक खतरनाक मानते थे। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता संघर्ष में महात्मा गॉधी अहिंसक मार्ग पर चलने के लिए दृढ थे, तो क्रांतिकारी अहिंसक मार्ग को असफल मानते थे। लेकिन लक्ष्य के प्रति दोनों के बीच कोई विरोधाभास नहीं था। महात्मा गॉधी तथा क्रातिकारी इस्लाम की अपेक्षा गुलामी को पहला शत्रु मानते थे , तो संघ परिवार इस्लाम को पहला शत्रु मानता था। आर्य समाज भी इस्लाम को पहला शत्रु मानना बंद करके गुलामी को पहला शत्रु मानने लगा था। यही कारण है कि आर्य समाज प्रारंभ में इस्लाम के पूरी तरह विरुद्ध होते हुए भी स्वतंत्रता संघर्ष के समय उस विरोध को प्राथमिकता नहीं दे रहा था। यही कारण था कि गॉधी पूरी तरह हिन्दू धर्म के पक्षधर होते हुए भी स्वतंत्रता संघर्ष में इस्लाम को साथ लेकर चलना चाहते थे और संघ परिवार स्वतंत्रता भले ही देर से मिले या न भी मिले किन्तु वह इस्लाम से किसी भी प्रकार के समझौते के विरुद्ध था। यही कारण है कि संघ के इक्कादुक्का लोगों को छोडकर अन्य किसी कार्यकर्ता की स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही। बल्कि कहीं कहीं इस संघर्ष को विवादास्पद बनाने में भी सक्रियता देखी जा सकती है।
स्वतंत्रता के बाद आर्य समाज ने यह मान लिया कि उसका काम पूरा हो गया और उसे अब पुनः अपने समाज सुधार के कार्य में लग जाना चाहिए और उसने पूरी तरह राजनीति से किनारा कर लिया। इसके ठीक विपरीत स्वतंत्रता के पूर्व संघ एक सांस्कृतिक संगठन तक सीमित था, किन्तु स्वतंत्रता मिलते ही वह पूरी तरह राजनीति में सक्रिय हो गया। स्वाभाविक था कि अधिकांश मुसलमान भारत के हिन्दुओं में अपना विश्वास खो चुके थे तथा संघ के लिए यह अच्छा अवसर था। यह अलग बात है कि संघ विचारों से प्रभावित कुछ अतिवादी हिन्दुओं ने गॉधी हत्या जैसा भावनात्मक और मूखर्तापूर्ण कृत्य करके उसका खेल बिगाड दिया। गॉधी हत्या के बाद सर्वोदय दो भागों में विभाजित हो गया। गॉधी को मानने वालो का एक भाग राजनीति के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन में लग गया जो बाद में अपनी अवस्था परिवर्तन में बदल गया, तो दूसरा सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन तक सीमित हो गया।
दुनिया में साम्यवादी सबसे अधिक चालाक और बुद्धिवादी माने जाते है, तो दूसरी ओर संघ परिवार सबसे अधिक शरीफ नासमझ और भावना प्रधान। सर्वोदय भी लगभग शरीफ नासमझ और भावनाप्रधान ही माना जाता है। किन्तु गॉधी हत्या ने सर्वोदय के मन में इतनी कटुता भर दी कि साम्यवादी और मुस्लिम संगठनों को सर्वोदय का साथ लेने में सुविधा हो गई। यदि हम सर्वोदय परिवार और संघ परिवार की तुलना करें तो दोनों में अनेक समानताओं के बाद भी दोनों में काफी असमानताएँ हैं। संघ एक संगठन का स्वरूप है जिसके नेता निर्णय करते हैं और कार्यकर्ता तदनुसार आचरण करते हैं। जबकि सर्वोदय का प्रत्येक कार्यकर्ता ही स्वयं में एक नेता है इसमें न तो एक नेतृत्व है, न ही प्रतिबद्ध अनुकरण कर्ता। संघ में पूरी तरह अनुशासन है तो संर्वोदय में पूरी तरह स्वशासन। संघ का एक स्पष्ट लक्ष्य है हिन्दू तुष्टीकरण के माध्यम से भारतीय राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा करना। सर्वोदय दिशाहीन है। उसका कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं। कभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तो कभी स्वदेशी का नारा। कभी ग्राम स्वराज्य तो कभी साम्प्रदायिकता उन्मूलन। एक वर्ष के लिये भी इनके लक्ष्य टिकाऊ या स्पष्ट नहीं होते। संघ मुस्लिम संगठनों की क्रिया के विरूद्ध तीव्र योजनाबद्ध तथा परिणाम मूलक प्रतिक्रिया करता है। सर्वोदय संघ की प्रतिक्रिया के विरूद्ध लचर अविचारित तथा शक्ति प्रदर्शन के लिये प्रतिक्रिया करता हैं। संघ अन्य संगठनों का उपयोग करना जानता है जबकि सर्वोदय किसी संगठन का उपयोग नहीं कर सकता भले ही उसी का कोई उपयोग कर ले। संघ नेतृत्व पूरी तरह सतर्क सक्रिय और चालाक है। सर्वोदय नेतृत्व सक्रिय तो है किन्तु ढीला ढाला तथा शरीफ प्रवृति का है। संघ का उद्देश्य सत्ता प्रधान है, और परिणाम सफलता है जबकि सर्वोदय का उद्देश्य जनहित का है किन्तु परिणाम शून्य है।
मैंने दोनों संगठनों को निकट से देखा है। सर्वोदय की प्रत्येक चर्चा में गांधी हत्या की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सर्वोदय गांधी हत्या के लिए तो संघ को अक्षम्य दोषी मानता है किन्तु भारत विभाजन में मुसलमानों की भूमिका अथवा सम्पूर्ण विश्व में अन्य धर्मावलम्बियों से निरंतर टकराव में मुसलमानों की भूमिका को भूल जाने योग्य दोष से अधिक नहीं मानता। संघ प्रत्यक्ष रुप से बलप्रयोग का समर्थक है। उसकी कथनी करनी में फर्क नहीं। सर्वोदय प्रत्यक्ष रुप से अहिंसा की बात करता है किन्तु परोक्ष रुप से नक्सलवाद मुस्लिम आतंकवाद तक का समर्थन करता है। कथनी और करनी में आसमान जमीन का फर्क है।
मेरे विचार में सर्वोदय भटक रहा है। सन पचहत्तर में सर्वोदय ने इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरूद्ध एक निर्णायक पहल की। किन्तु सर्वोदय से भूल हुई कि उसने उक्त पहल करने में संघ तथा साम्यवादियों को मिलाकर एक मंच बना दिया। संघ और साम्यवादी उतने ही कटृर होते है जितने कि मुसलमान। ये व्यक्ति के रूप में तो कहीं भी रह सकते हैं किन्तु दल के रूप में ये पूरी तरह सतर्क और सक्रिय रहते हैं। सर्वोदय ने तानाशाही के विरूद्ध ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया किन्तु देश में कोई निर्णायक परिर्वतन नहीं आ सका। अब तो सर्वोदय लगभग चर्चा से भी बाहर हो रहा है। इस समापन काल मंे स्थिति यहॉ तक आ गई है कि सर्वोदय में ही सम्पत्ति और सत्ता की छीनाझपटी शुरु हो गई है। साम्यवाद के लगभग पतन और कांग्रेस के कमजोर होने के बाद सर्वोदय के सामने कोई अन्य मार्ग नहीं दिख रहा है जबकि संघ परिवार लगातार सशक्त हो रहा है तथा मुसलमानों की बढती अविश्वसनीयता संघ परिवार को और शक्ति प्रदान कर रही है। आर्य समाज की एक स्पष्ट दिषा रही है किन्तु अग्निवेश द्वारा साम्यवाद के समर्थन से आर्य समाज को भी कमजोर करने में बहुत सफलता मिली। यहॉ तक कि साम्यवाद कांग्रेस तथा कुछ विश्व स्तरीय संगठनों के समर्थन से अग्निवेश जैसे चालाक व्यक्ति आर्य संस्कारों के विरुद्ध होते हुए भी आर्य समाज के प्रधान बन बैठे थे।
पिछले दो वर्षो से स्थितियॉ बदली है वर्तमान समय में अधिकांश भावना प्रधान लोगो से भारतीय राजनीति का पिण्ड छूट गया है। तीनों संगठन अर्थात् सर्वोदय, आर्य समाज और संघ, मोदी के सामने समझदारी में बौने सिद्ध हो रहे है। साम्यवाद तो स्वयं ही समाप्त हो रहा था । आर्य समाज का आंशिक स्वरुप परिवर्तन होकर कुछ गायत्री परिवार, कुछ बाबा रामदेव के रुप में बिखर गया। संघ परिवार लगातार शक्तिशाली हो रहा है। स्पष्ट दिखता है कि परिवारवाद मुस्लिम साम्प्रदायिकता तथा आर्थिक कमजोरी से निपटते ही नरेन्द्र मोदी साम्प्रदायिकता से निपटने की पहल करेंगे। हो सकता है कि इस पहल की शुरुवात 2019 के आम चुनाव के बाद ही हो। किन्तु मुझे साफ दिखता है कि यह कार्य होगा अवश्य और ऐसी पहल का मुख्य निशाना संघ परिवार के वे बडबोले लोग और वह ना समझ विचार होगा जिन्हें न हिन्दुत्व का ज्ञान है, न समाज की चिंता है, न विश्वसनीयता की चिंता है बल्कि उन्हें तो अपने मुर्खतापूर्ण विचारों को टी बी और अखबारों में प्रसारित होने देने की तक चिंता है। मैं भारत में संगठनात्मक हिन्दुत्व की तुलना में गुणात्मक हिन्दुत्व के होने का पक्षधर रहा हॅू। मैं उम्मीद करता हॅू कि आर्य समाज तथा सर्वोदय भी वैचारिक तथा गुणात्मक हिन्दुत्व के समर्थन में अपनी पुरानी गलतियों की समीक्षा करेंगे।

महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान– बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 6, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं –
1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेश , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है।
2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है।
3 वर्ग निर्माण सिर्फ प्रवृत्ति के आधार पर ही उपयोगी होता है। अन्य किसी आधार पर होने वाला वर्ग निर्माण धुर्तता का सहायक होता है तथा शराफत को कमजोर करता है।
4 महिला सशक्तिकरण के प्रयत्नों का उद्देश्य वर्ग निर्माण मात्र होता है। लिग भेद के आधार पर महिला या पुरुष का संगठन बनना हमेशा घातक होता है। संस्था बनाई जा सकती है।
इस तरह हम कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण एक समस्या है जिसे समाज में समाधान के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महिला और पुरुष अलग अलग व्यक्ति तक ही सीमित होते है। यदि हम पूरे भारत का सर्वे करें तो भारत में कुल मिलाकर एक दो लाख ही महिलाये होगी क्योंकि अन्य महिलाये तो परिवार की सदस्य होती है। वे माॅ बहन बेटी पत्नी तो हो सकती हैं किन्तु महिला के रुप में उनका तब तक कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता जब तक वे अकेली न हो । यदि किसी महिला या पुरुष द्वारा तीन पैर की दौड अनिवार्य है और उसमें भी एक महिला और एक पुरुष का जुडना आवश्यक है तो ऐसी दौड में किसी एक इकाई को पृथक महत्व देना नुकसानदायक होता है। किसे मजबूत होना चाहिए यह तय करना उन दोनों का स्वतंत्र क्षेत्र है। इसमें कोई बाहर का व्यक्ति कोई नियम कानून नहीं बना सकता। क्योंकि बाहर का व्यक्ति तो स्वयं प्रतिस्पर्धी है तथा वह चाहेगा कि दोनों कभी एक होकर तीन पैर की दौड न जीत सकें। जब महिला का अपवाद स्वरुप ही पृथक अस्तित्व है तो महिला सशक्तिकरण शब्द या तो महत्वहीन है या घातक।
जो धुर्त लोग महिला और पुरुष के रुप में समाज को बांटकर अपना हित साधना चाहते हैं वे दहेज, सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहु विवाह, देव दासी आदि अनेक पुरानी परम्पराओं का उदाहरण देकर महिला अत्याचार प्रमाणित करते है मेरे विचार में समय समय पर देशकाल परिस्थिति के अनुसार सामाजिक मान्यताए बदलती रहती हैं। किसी समय में यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते को ध्येय वाक्य माना गया था तो किसी समय में ढोल गवार शूद्र पशु नारी को। ये वाक्य समय समय पर परिस्थिति अनुसार बदलते रहते है । वर्तमान में विकृति मानी जाने वाली दहेज ,सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहुविवाह, देव दासी आदि की परम्पराए पुराने समय में महिला शोषण के निमित्त नहीं बनी थी बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए इन्हें परम्पराओं के रुप में विकसित किया गया था। ये परम्पराएं बाद में परिस्थितियों के बदलाव होने से टूट गई। एक समय था जब बहुविवाह का अर्थ एक पुरुष की कई पत्नियों के साथ माना जाता था। तो अब भविष्य में ऐसा भी समय आने वाला है जब बहु विवाह का अर्थ एक महिला के साथ कई पुरुषों के विवाह से माना जाने लगेगा। न पहले वाली व्यवस्था विकृति थी और न ही भविष्य की व्यवस्था विकृति मानी जायेगी। विवाह,तलाक आदि व्यवस्थाएं आपसी सहमति से तथा सामाजिक मान्यताओं से चलती है,कानून से नहीं। नासमझ लोगों ने अनावश्यक इन परम्पराओं में कानून को घुसा दिया।
आमतौर पर यह प्रचारित किया जाता है कि महिलाये पुरुषांे की काम वासना पूर्ति की साधन मात्र होती हैं। यह प्रचार पूरी तरह गलत है। सच्चाई यह है कि काम इच्छा पुरुषों की अपक्षा महिलाओं में अधिक मानी जाती है। यह अलग बात है कि प्राकृतिक कारणों से पति पत्नि के बीच पति को हमेशा आक्रामक स्वरुप में होना चाहिए और पत्नि को आकर्षक स्वरुप में। यह प्राकृतिक स्वरुप यदि दोनों में यथावत है तो इसे किसी का किसी पर अत्याचार नहीं कह सकते। यदि काम इच्छा महिलाओं में बहुत कम होती तो महिलाए एक उम्र के बाद पुरुष के अभाव में परेशान नहीं होतीं। महिलाओं पर समाज में भेदभाव का आरोप भी पूरी तरह गलत है। कानून में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त है। समाज में महिलाओं को पुरुषो की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त है। परिवार व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पुरुष से कमजोर मानी जाती है लेकिन यह कमजोर भूमिका भी अत्याचार के रुप में नहीं कही जा सकती। एक कलेक्टर की पत्नी अपने दस पुरुष नौकरों पर अपना आदेश चलाती है। अनेक घरों में पुरुष महिलाओं को पीटते भी है तो अनेक घरों के पुरुष महिलाओं से मार भी खाते हैं। महिला और पुरुष का परिवार में कार्य विभाजन है और यह विभाजन सबकी सहमति से होता है। यदि परिवार में भोजन खराब बनेगा तो महिला डांट खाती है,और भोजन का अभाव है तो महिला पति को डाटती भी है। भारत में पिछले वर्षो में होने वाली लाखों किसान आत्महत्याओं में शायद ही एक दो महिलाओं ने आत्महत्या की होगी। क्योंकि यह पुरुष का दायित्व माना जाता है। समाज में एक मान्यता है कि यदि अत्याचारी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो अत्याचार पीडित प्रसन्न होता है। पति के मरने के बाद पत्नी जितना दुख व्यक्त करती है वह दुख उसका वास्तविक होता है, नाटक नहीं। मतलब साफ है कि यदि भले ही पति पत्नि के बीच पति अत्याचार करता हो किन्तु दोनों के बीच कोई ऐसी बात अवश्य है जो दोनों को जोडकर रखती है और इस जोड को कमजोर नहीं होने देना चाहती। यदि महिलाये यह जानती है कि पुरुष अत्याचारी होता है तो महिलाए सब कुछ समझते बूझते भी पति घर में स्वेच्छा से क्यों जाती है। यहाॅ तक कि यदि कभी कभी उनके जाने में विलम्ब हो जाये तो वे सारी मर्यादाये छोडकर भी जाती है। इसका अर्थ है कि महिला अत्याचार का प्रचार पूरी तरह सोचा समझा षडयंत्र है।
प्राचीन समय में महिलाओ और पुरुषों को कुल मिलाकर समान अधिकार प्राप्त थे। किन्तु वे अधिकार योग प्रधान थे अर्थात कुछ मामलों में महिलाओं को विशेष अधिकार थे तो कुछ मामलो में कम। किन्तु कुल मिलाकर समान थे। ये अधिकारों का विभाजन भी या तो परिवार स्वयं करता था या सामाजिक व्यवस्था। स्वतंत्रता के बाद कानूनी व्यवस्था ने सबको समान अधिकार घोषित कर दिया किन्तु सामाजिक व्यवस्था में पुरानी योग समान प्रणाली जीवित रही।
समाज में दो प्रकार के परिवार है 1 पारम्परिक परिवार 2 आधुनिक परिवार। पारम्परिक परिवार की महिलाओं की संख्या 98 प्रतिषत है और आधुनिक परिवारो की करीब दो प्रतिषत । ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये पूरे समाज का शोषण करना चाहती है। इन्हे सामाजिक व्यवस्था में तो विशेष अधिकार भी चाहिए और कानूनी व्यवस्था में समान अधिकार भी चाहिए। किसी आधुनिक महिला ने आज तक यह नहीं कहा कि उसे समान अधिकार चाहिए या विशेष अधिकार यदि पूरे भारत का सर्वे किया जाये तो ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये अपने को 98 प्रतिषत पारम्परिक महिलाओं का प्रतिनिधि घोषित करती है। किन्तु यदि इनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डाले तो 98 प्रतिषत की तुलना में इन दो प्रतिषत का चारित्रिक मापदण्ड भी कमजोर होता है तथा पारिवारिक जीवन भी अधिक असंतोषप्रद होता है। यहाॅ तक कि तलाक के मामले का भी प्रतिषत इन दो प्रतिषत आधुनिक महिलाओं में अधिक होता है। ये दो प्र्रतिषत आधुनिक महिलाएं सहजीवन के स्थान पर उच्श्रृंखलता को अधिक महत्व देती है और उसे ही स्वतंत्रता कहती है। यहाॅ तक कि ये महिलाये सारी सुविधाये भी अपने परिवार तक समेट लेना चाहती है। पति को सामान्य नौकरी तो पत्नी को आरक्षित नौकरी। पति सामान्यतया लोकसभा में तो पत्नी आरक्षित सीट पर । यदि यह नियम बन जाये कि एक परिवार का एक ही सदस्य राजनीतिक पद या सरकारी नौकरी पा सकता है तो ये आधुनिक महिलाये आसमान सर पर उठा लेगी किन्तु न ये ऐसा होने देंगी न इनके पति।
कुछ दशक पूर्व पुरुष सशक्तिकरण के नाम से समाज में विकृति आई थी और उसके भी दुष्परिणाम हमें दिखे। अब महिला सशक्तिकरण का एक घातक नारा समाज में प्रचारित किया जा रहा है और वह नारा समस्या का समाधान न होकर नई समस्या पैदा कर रहा है। मैंने दिल्ली के राजघाट पर सरकार की तरफ से एक बडा बोर्ड देखा जिसमें लिखा है ‘‘महिलाओं पर अत्याचार कानूनन अपराध है’’। मैं आज तक नहीं समझा कि क्या समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति पर अत्याचार करने की छूट प्राप्त है? ये महिलाओं शब्द लिखना वास्तव में बहुत घातक है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रसिद्ध संत बाबा रामदेव सरीखे लोग कन्या भ्रुण हत्या को रोकने का अभियान चला रहे है। मेरे विचार में बालक की भ्रूण हत्या तो नगण्य होती है फिर पूरी भ्रूण हत्या को ही यदि रोक दिया जाये तो कैसे गलत होगा ? इतना अवश्य है कि यदि पूरी भ्रूण हत्या को रोका गया तो महिला और पुरुष के बीच वर्ग विद्वेश वर्ग संघर्ष खडा करके अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का काम नहीं हो पायेगा।
यदि इसी तरह महिला सशक्तिकरण का नारा विकसित होता रहा तो एक नई विकृति जन्म ले सकती है। कहा जाता है कि घरों में महिलाओं को दासी समझा जाता है। यदि भविष्य में यह प्रथा उलट जाये और घोषित रुप से दासी कहा जाने लगे तो क्या अन्तर होगा। यदि ऐसी विकृत प्रथा प्रचलित हो जाये कि पुरुष विज्ञापन देने लगे कि उन्हे एक ऐसी दासी चाहिए जो दिन में नौकरी का काम करे और रात में उसके साथ सोये भी। इस विज्ञापन के आधार पर वेतन भत्ते तय करने की प्रथा हो जाये तो आप सोचिये कि यह प्रथा कानून कैसे रोक पायेगा जबकि यह प्रथा वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था से अधिक बुरी होगी।
परिवार में पति पत्नि के बीच अविश्वास की दीवार खडी की जा रही है। यह दीवार कितनी लाभदायक होगी यह तो भविष्य बतायेगा किन्तु यह दीवार परिवार व्यवस्था को तोडेगी अवश्य । छोटे बच्चों के संस्कार खराब होगे। लाभ होना तो संदेहास्पद है किन्तु नुकसान होना निश्चित है । अब पुरानी परिवार और समाज व्यवस्था की ओर लौटना न तो संभव है न उचित किन्तु महिला सशक्तिकरण के नाम पर परिवार तोडक समाज तोडक अभियान भी बंद होने चाहिए। परिवार में कौन सषक्त हो,कार्य विभाजन कैसा हो यह परिवार का आंतरिक मामला है उन्हें मिल बैठकर तय करने दीजिए। कोई कानून बनाना उचित नहीं। यदि उनमें आपसी सहमति नहीं है तो उन्हे अलग अलग मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता दीजिए। अलग होने में भी कोई कानूनी बंधन उचित नहीं। मेरे विचार में एक ही समाधान है कि भारत में व्यक्ति को एक इकाई माना जाये। सबको समान अधिकार माने जाये। कानून किसी को विशेष अधिकार न दे तथा देश सवा सौ करोड व्यक्तियों और परिवारों गांवो का संघ हो। धर्म, जाति, लिंग के आधार पर होने वाले सब प्रकार के भेद भाव मूलक कानून समाप्त कर दिये जाये।
नोटः- मंथन क्रमांक 7 का अगला विषय न्यायिक सक्रियता कितनी उचित कितनी घातक होगा।

संघ परिवार की हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नीति सफलता की ओर- बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 4, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

लम्बे समय से संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत काम करता रहा है कि भारत का मतदाता बहुसंख्यक अल्प संख्यक के नाम पर ध्रुवीकृत हो जाये। स्पष्ट है कि भारत मे हिन्दूओ का प्रतिशत अस्सी से भी ज्यादा है। पिछले कुछ दिनो से विपक्ष की गलत नीतियां संघ परिवार के इस उद्देश्य को पूरा करती दिखाई दे रही हैं।
अभी अभी मायावती जी ने यह कहा है कि उत्तर प्रदेश का मुसलमान एक जुट रहेगा । वह किसी भी अन्य दल के पास नही जायेगा । ऐसी ही कुछ सोच अन्य विपक्षी दलो की भी रही है। सबका यह मानना है कि हिन्दू तो आपस मे बंटेगा ही यदि मुसलमान का एक जुट वोट उसे मिल जाये तो वह हिन्दूओ के जाति के आधार पर किसी वर्ग को तोडकर शासन मे आ सकता है। नरेन्द्र मोदी के आने के बाद धीरे धीरे हिन्दुओ का ध्रुवीकरण भी बढ रहा है तथा विपक्षी दलो की मुस्लिम एकत्रीकरण की नीति हिन्दुओ को और अधिक इकठठा होने मे सहायता कर रही है। मुस्लिम एकत्रीकरण उस समय तक तो लाभदायक रहता है, जब तक हिन्दू एक जुट न हो । किन्तु इसका यह अर्थ नही कि आप पूरी वेशर्मी के साथ मुसलमानो को एक जुट करने की आवाज लगाये और यह मान ले कि हिन्दुओ पर कभी भी किसी भी परिस्थिति मे इसकी प्रतिक्रिया होगी ही नही । मेरे विचार मे विपक्षी दलो का ऐसा मानना गलत है।
अभी अभी भोपाल मे सिमी के आठ आतंकवादी जेल से फरार होने के बाद मुठभेड मे मारे गये। दिग्विजय सिंह जी ने यह प्रश्न उठाया कि आखिर क्या कारण है कि सिर्फ मुसलमान ही जेलो से भागते हैं। इसके पूर्व भी दिग्विजय सिंह सहित अनेक नेता यह प्रश्न उठा चुके है कि आवादी के अनुपात मे मुसलमान ही जेलो मे अधिक बंद क्यो है? मै नही समझता कि मै इस मूर्खता या धूर्तता पूर्ण प्रश्न का क्या उत्तर दॅू। स्पष्ट है कि यह प्रष्न भी हिन्दुओ के ध्रुवीकरण मे सहायक होता है।
मै देख रहा हॅू कि आतंकवादियो के मारे जाने पर जो बहस छिडी है उसमे अधिंकांश विपक्षी नेता या मुसलमान प्रवक्ता एक स्वर से इस प्रश्न को अधिक महत्व दे रहे है कि मुठभेड फर्जी थी और बिना न्यायिक प्रक्रिया के उन्हे मार दिया गया, जो गलत था । मै भी ऐसा सोचता हॅू कि इन आठ लोगो को मार देना फर्जी हो सकता है और बिना न्यायिक प्रकृया के पूरी हुए किसी को पुलिस द्वारा मार देना गैर कानुनी है। फिर भी मै ऐसा सोचता हॅू कि जिन लोगो की हत्या हुई वे भले ही कानून के द्वारा अपराध सिद्ध न हो किन्तु मेरे विश्वास के अनुसार वे अपराधी थे और यदि न्यायालय अनंत काल तक ऐसे अपराधियो को अपराधी घोषित करके दंडित न कर सके तो क्या ऐसे लेागो से समाज को मुक्ति दिलाने मे अन्य इकाइयों को पहल नही करनी चाहिये? यदि वे अपराधी थे, जैसा कि मुझे भी विश्वास है, और न्यायालय उन्हे दंडित नही कर पा रहा है तो पुलिस ने ऐसे लोगो को मारकर अपनी नौकरी जोखिम मे डाली है। इसके लिये भले ही वे कानून से दंडित हो जाये किन्तु सामाजिक दृष्टि से ऐसे पुलिसकर्मी बधाई के पात्र हैं। न्यायपालिका प्रतिदिन जजो की कमी का रोना रोती है, किन्तु यह कभी नही सोचती कि उसकी प्राथमिकताए क्या है? न्यायालय को सेशन कोर्ट के योग्य गंभीर आपराधिक मामलो को प्राथमिकता के आधार पर निपटाना चाहिये था। किन्तु न्यायपालिका अन्य कम महत्वपूर्ण कार्यो को अपने हाथ मे लेकर ओभर लोडेड हो जाती है। परिणाम स्वरूप गंभीर अपराधी जेलो मे लम्बे समय तक निर्णय के अभाव मे पडे रहते है, तथा कभी कभी पुलिस ऐसे खतरनाक अपराधियो को फर्जी मुठभेड मे मारकर अपनी नौकरी खतरे मे डालती है। भोपाल के फर्जी मुठभेड का वास्तविक कारण न्यायिक प्रक्रिया मे भी खोजा जाना चाहिये। किन्तु यह मामला या तो सत्ता या विपक्ष के बीच खोजा जा रहा है, अथवा हिन्दू और मुसलमान के बीच। मैं समझता हॅू कि यदि मारे गये आठो लोग मुसलमान नही होते तो यह हल्ला निश्चित रूप से कम होता । मेरे विचार मे यह भोपाल कांड भी संघ परिवार के हिन्दू एकत्रीकरण मे सहायक हो रहा है।

मंथन कैसे ?- बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 2, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

मैंने लम्बे समय तक बौद्धिक व्यायाम किया है किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि यदि लम्बे समय तक व्यायाम करने के बाद व्यायाम बंद कर दिया जाये तो गठिया समेत अनेक बीमारियों की संभावना बन जाती है। ऐसा ही बौद्धिक व्यायाम के साथ भी संभव है। मैं चाहता हॅू कि मेरा व्यायाम भी बंद न हो। जो लोग मंथन में बहुत कमजोर होते है वे मुझसे प्रश्न करने में हिचकिचाते है । जो लोग बहुत मजबूत होते है वे मंथन में मेरे साथ शामिल होने में अपना अपमान समझते है। मुझे व्यायाम की जरुरत है। मैं चाहता हॅू कि आप चाहे मजबूत हो या कमजोर आपको इस व्यायाम के साथ जुडना चाहिए। जो विषय घोषित होता है उस पर आप अपने विस्तृत विचार एक सप्ताह तक भेज सकते है मैं भी उस विषय पर अपने विचार भेजॅूगा। एक सप्ताह तक आये हुये विचारों पर अगले एक सप्ताह तक प्रश्नोंत्तर होगा और उसके बाद विषय बंद हो जायेगा। अब तक विचार मंथन के लिए हमारे साथियों की सलाह पर विषयों की सूची बनी है जो नीचे लिखी गई है। आप लोगों के और सुझाव आने के बाद अन्य विषय भी जोडे जा सकते है।
मैं स्पष्ट कर दूॅ कि इस विचार मंथन का उद्देश्य कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना नहीं है। वह तो अपने आप निकलता रहेगा। साथ ही आपसे यह भी निवेदन है कि आपको बहुत महत्वपूर्ण उपयोगी साथी मानकर इस मंथन में जोडा गया है। इसमें आप अनावश्यक कुछ लिखकर अपनी क्षमता का तथा मंथन प्रक्रिया का नुकसान न करें। दिवाली की शुभकामनाएॅ या अन्य संदेश या सुचनाएॅ आपकी प्रतिष्ठा को कम करेगा क्योंकि यह एकमात्र मंथन कार्यक्रम है। इसका किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग ठीक नहीं। इस कार्यक्रम का किसी भी प्रकार के विचार प्रचार या कोई निष्कर्ष निकालने से कोई संबंध नहीं है। विपरीत विचारों के लोग खुलकर और स्वतंत्रतापूर्वक किसी मंच पर अपने विचार रख सके इतना ही इसका उद्देश्य है। आपसे मेरी यह अपेक्षा है कि आप कुछ अन्य उपयोगी साथियों के नाम और फोन नंम्बर भी भेजे, जो इस दिशा में उपयोगी हो सकते है। उन्हें भी इस योजना से जोडा जायेगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरे इस प्रयत्न में सहभागी होंगे।
अब तक सम्पन्न विषयों की सूची-
मंथन क्रमांक-1 समाज और राज्य मे अहिंसा और सत्य की समीक्षा
मंथन क्रमांक-2 बेरोजगारी
मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा
मंथन क्रमांक-4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान
मंथन क्रमांक-5 परिवार व्यवस्था
मंथन क्रमांक -6 जो वर्तमान में चल रहा है- महिला सशक्तिकरण कितना उचित?
प्रस्तावित विषयांे की सूची
आपराधिक
(1)चोरी,डकैती,लूट
(2)आतंकवाद और समाधान (क) नक्सलवाद (ख) मुस्लिम आतंकवाद (ग) आपराधिक आतंकवाद
(3) अपराध गैर कानूनी और अनैतिक का फर्क
(4)अपराध वृद्धि कारण और निवारण
(5)शोषण अपराध या अनैतिक
(6)मृत्युदण्ड समीक्षा-
(7)मिलावट कमतौल कितना अपराध कितना अनैतिक
(8)जालसाजी धोखाधडी
(9)पुलिस की अति सक्रियता
महिलाओं से जुड़ी
(1)बलात्कार
(2)महिला आरक्षण समस्या या समाधान
(3)कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना नाटक
(4)दहेज प्रथा
(5)महिला उत्पीडन समीक्षा
(6)महिला वर्ग या परिवार का अंग
(7)पर्दा प्रथा
(8)सती प्रथा
(9)परम्परागत या आधुनिक महिलाएॅ
(10) लिब-इन रिलेशनशीप
आर्थिक
(1)आर्थिक असमानता
(2) नई अर्थ नीति
(3)श्रम शोषण
(4)गरीबी रेखा
(5)मंहगाई भ्रम या यथार्थ
(6) सभी आर्थिक समस्याओं का एक आर्थिक समाधान
(7) स्वतंत्र अर्थपालिका
(8)ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
(9) प्राकृतिक उर्जा और कृत्रिम उर्जा
(10) हमारी आदर्श कर प्रणाली
(11 ) राजनैतिक व्यवस्था पर सम्पन्नों और बुद्धिजीवियों का एकाधिकार
(12) किसान आत्महत्या
(13) नरेगा
(14) आर्थिक मंदी
(15) सरकारीकरण निजीकरण समाजीकरण
(16) कर्मचारी आन्दोलन
चारित्रिक
(1)भ्रष्टाचार
(2)चरित्र पतन व्यक्तिगत या व्यवस्थागत
(3) चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन
(4) भावना या विचार
(5)ज्ञान यज्ञ का महत्व और तरीका
(6) भौतिक या नैतिक उन्नति
धार्मिक
(1)धर्म और सम्प्रदाय
(2)जाति और वर्ण व्यवस्था
(3)जातीय आरक्षण
(4)धार्मिक आरक्षण
(5) इस्लाम अब तक और आगे
(6)धर्म और संस्कृति
(7)साम्प्रदायिकता और धर्म
(8)गाय,गंगा,मंदिर,मुददे समस्या और समाधान
(9)संगठन कितना उचित कितना अनुचित
(10)भारतीय संस्कृति हिन्दू संस्कृति का फर्क
(11)आर्य समाज सर्वोदय संघ समीक्षा
(12)संघ इस्लाम और साम्यवाद की समीक्षा
(13)बाबरी मस्जिद राम मंदिर के मुददे और समाधान
(14) धर्मान्तरण
(15) हिन्दू धर्म और इस्लाम ,शाहरुक की पीडा
(16) आश्रमों में बलात्कार
(17) साम्प्रदायिक दंगे समस्या या मजबूरी
संवैधानिक
(1)भारतीय संविधान समीक्षा
(2)मूल अधिकार
(3)ग्राम सभा सशक्तिकरण
(4)राइट टू रिकाल
(5)व्यक्ति और नागरिक का फर्क
(6)नई संवैधानिक व्यवस्था का स्वरुप
(7)लोक ससद
(8)राज्य के दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का फर्क
(9) स्वतंत्रता महत्वपूर्ण या समानता
(10) संविधान संशोधन
सामाजिक
(1)समाज तब और अब
(2)व्यक्ति,परिवार ,समाज
(3)संयुक्त परिवार व्यवस्था में बाधाएॅ और समाधान
(4)वर्ग विद्वेश या वर्ग समन्वय
(5)साहित्य और विचार का अंतर
(6)विवाह पद्धति ,प्रेम विवाह,समलैंगिकता
(7)व्यक्ति, धर्म,समाज और राज्य,
(8)समाज निर्माण और समाज सुरक्षा
(9) पर्यावरण और मानवाधिकारवादी
(10) क्षेत्रियता
(11) सामाजिक अव्यवस्था और समाधान
(12) भय का व्यापार
राजनैतिक
(1)तानाशाही, लोकतंत्र ,लोक स्वराज्य
(2)संसदीय लोकतंत्र या सहभागी लोकतंत्र
(3)पॅूजीवाद,समाजवाद,साम्यवाद
(4)व्यवस्था परिवर्तन क्यों,क्या,कैसे
(5) समान नागरिक संहिता
(6) ग्राम स्वराज्य
(7) नरेन्द्र मोदी
(8) हिन्दू कोड बिल
(9) ग्लोबल वार्मिंग
(10) भारतीय राजनीति और लोकतंत्र
(11) राजनीति में अच्छे लोग
(12) मतदान
(13) गाय की रोटी कुत्ता खाये
न्यायिक
(1)न्यायिक प्रक्रिया कितनी उचित कितनी अनुचित
(2) पुलिस और न्यायालय के संबंधो की समीक्षा
(3) न्यायिक सक्रियता
(4) न्याय और व्यवस्था
अन्य
(1)हिंसा या अहिंसा
(2)गॉधी मार्क्स,अम्बेडकर
(3)गॉधी,भगतसिंह,सुभाष चंद्रबोस
(4)गॉधी और गोड्से
(5)नेहरु पटेल अम्बेडकर
(6)भारत का विभाजन भूल या मजबूरी
(7) कश्मीर समस्या
(8) चिंतन महत्वपूर्ण या क्रिया
(9)ज्ञान, शिक्षा और श्रम का महत्व
(10)भाषा कितनी वैचारिक कितनी भावनात्मक
(11)समीक्षा,आलोचना,विरोध,और संघर्ष का अंतर
(12)अमेरिका हमारा प्रतिद्वंदी, विरोधी या शत्रु
(13)दान चंदा और भीख का फर्क
(14)उपदेश , प्रवचन,भाषण और शिक्षा का फर्क
(15)स्वदेशी का प्रचार कितना आवश्यक
(16)सुख और दुख की उत्पत्ति
(17)भूत,प्रेत,तंत्र,मंत्र कितना भ्रम कितना वास्तविक
(18)निष्कर्ष निकालने में परिभाषाओं का महत्व
(19)समस्याओं के समाधान में हमारी प्राथमिकताएॅ
(20)शराफत,समझदारी, और धूर्तता में फर्क
(21)प्रशंसा , समर्थन, सहयोग, सहभागिता में अंतर
(22) आरक्षण
(23)शिक्षा सरकारी या शासन मुक्त
(24) बाबा रामदेव
(25) विकेन्द्रीयकरण या अकेन्द्रीयकरण
(26) कर्तव्य और अधिकार
(27) बालश्रम कानून
(28) विश्वस्तरीय समस्यायें
(29) गुटनिरपेक्षता
(30) मीडिया
(31) एन जी ओ

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