Just another WordPress site
मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;दुनियां का प्रत्येक व्य...
मंथन क्रमांक-112 ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;धर्म शब्द के अनेक अर्...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय– बजरं मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;आदर्श वर्ण व्यवस्था में ...
मंथन क्रमाॅक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते हैं। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता हैं;किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता हैं, किये जाने वाले कार्य न करना अन...
मंथन क्रमांक 109- आरक्षण- बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमज...
मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगा...
मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा

Posted By: kaashindia on November 19, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

2
स्वतंत्रता पूर्व स्वामी दयानंद द्वारा स्थापित आर्य समाज, श्री हेडगेवार, तथा महात्मा गॉधी लगातार भारत की आतंरिक ,राजनैतिक, सामाजिक व्यवस्था के सुधार में सक्रिय रहे। तीनों ही संगठनों में एक से बढकर एक त्यागी ,तपस्वी लोग शामिल रहे, किन्तु तीनों संगठनों का कुछ मामलों में तालमेल नहीं हो सका। आर्य समाज मुख्य रुप से सामाजिक समस्याओं पर अधिक केन्द्रित रहा। आर्य समाज भावनाओं की अपेक्षा विचारों पर अधिक बल देता था। आर्यसमाज परिस्थिति अनुसार अपनी कार्यप्रणाली में संशोधन भी करता था। यही कारण था कि आर्य समाज ने स्वतंत्रता संघर्ष में सामाजिक कार्यो की अपेक्षा गुलामी से मुक्ति आन्दोलन में अधिक बढ़ चढकर हिस्सा लिया। आर्य समाज के बहुत से लोग गॉधी के मार्ग से भी जुडे रहे, तो दूसरी ओर बहुत से लोग गॉधी मार्ग से ठीक विपरीत क्रांतिकारियों के साथ भी जुडे रहे। मार्ग भले ही भिन्न भिन्न हो किन्तु लक्ष्य दोनों का स्वतंत्रता में सहयोग था। हेडगेवार जी तथा उनके द्वारा स्थापित संघ हिन्दू सुरक्षा तक सीमित था। संघ के लोग इस्लाम को हिन्दू धर्म के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक मानते थे और यह भी सच था कि मुसलमान राजाओं का इतिहास ऐसा ही कलंकित रहा है। मुसलमानों की अपेक्षा संघ परिवार अंग्रेजी शासन को कम खराब मानता था और इसलिए संघ परिवार की एकमात्र सम्पूर्ण शक्ति इस्लाम के विरुद्ध हिन्दू संगठन तक केन्द्रित रही। महात्मा गॉधी राष्ट्रीय गुलामी को सर्वाधिक खतरनाक मानते थे। यह अलग बात है कि स्वतंत्रता संघर्ष में महात्मा गॉधी अहिंसक मार्ग पर चलने के लिए दृढ थे, तो क्रांतिकारी अहिंसक मार्ग को असफल मानते थे। लेकिन लक्ष्य के प्रति दोनों के बीच कोई विरोधाभास नहीं था। महात्मा गॉधी तथा क्रातिकारी इस्लाम की अपेक्षा गुलामी को पहला शत्रु मानते थे , तो संघ परिवार इस्लाम को पहला शत्रु मानता था। आर्य समाज भी इस्लाम को पहला शत्रु मानना बंद करके गुलामी को पहला शत्रु मानने लगा था। यही कारण है कि आर्य समाज प्रारंभ में इस्लाम के पूरी तरह विरुद्ध होते हुए भी स्वतंत्रता संघर्ष के समय उस विरोध को प्राथमिकता नहीं दे रहा था। यही कारण था कि गॉधी पूरी तरह हिन्दू धर्म के पक्षधर होते हुए भी स्वतंत्रता संघर्ष में इस्लाम को साथ लेकर चलना चाहते थे और संघ परिवार स्वतंत्रता भले ही देर से मिले या न भी मिले किन्तु वह इस्लाम से किसी भी प्रकार के समझौते के विरुद्ध था। यही कारण है कि संघ के इक्कादुक्का लोगों को छोडकर अन्य किसी कार्यकर्ता की स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही। बल्कि कहीं कहीं इस संघर्ष को विवादास्पद बनाने में भी सक्रियता देखी जा सकती है।
स्वतंत्रता के बाद आर्य समाज ने यह मान लिया कि उसका काम पूरा हो गया और उसे अब पुनः अपने समाज सुधार के कार्य में लग जाना चाहिए और उसने पूरी तरह राजनीति से किनारा कर लिया। इसके ठीक विपरीत स्वतंत्रता के पूर्व संघ एक सांस्कृतिक संगठन तक सीमित था, किन्तु स्वतंत्रता मिलते ही वह पूरी तरह राजनीति में सक्रिय हो गया। स्वाभाविक था कि अधिकांश मुसलमान भारत के हिन्दुओं में अपना विश्वास खो चुके थे तथा संघ के लिए यह अच्छा अवसर था। यह अलग बात है कि संघ विचारों से प्रभावित कुछ अतिवादी हिन्दुओं ने गॉधी हत्या जैसा भावनात्मक और मूखर्तापूर्ण कृत्य करके उसका खेल बिगाड दिया। गॉधी हत्या के बाद सर्वोदय दो भागों में विभाजित हो गया। गॉधी को मानने वालो का एक भाग राजनीति के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन में लग गया जो बाद में अपनी अवस्था परिवर्तन में बदल गया, तो दूसरा सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन तक सीमित हो गया।
दुनिया में साम्यवादी सबसे अधिक चालाक और बुद्धिवादी माने जाते है, तो दूसरी ओर संघ परिवार सबसे अधिक शरीफ नासमझ और भावना प्रधान। सर्वोदय भी लगभग शरीफ नासमझ और भावनाप्रधान ही माना जाता है। किन्तु गॉधी हत्या ने सर्वोदय के मन में इतनी कटुता भर दी कि साम्यवादी और मुस्लिम संगठनों को सर्वोदय का साथ लेने में सुविधा हो गई। यदि हम सर्वोदय परिवार और संघ परिवार की तुलना करें तो दोनों में अनेक समानताओं के बाद भी दोनों में काफी असमानताएँ हैं। संघ एक संगठन का स्वरूप है जिसके नेता निर्णय करते हैं और कार्यकर्ता तदनुसार आचरण करते हैं। जबकि सर्वोदय का प्रत्येक कार्यकर्ता ही स्वयं में एक नेता है इसमें न तो एक नेतृत्व है, न ही प्रतिबद्ध अनुकरण कर्ता। संघ में पूरी तरह अनुशासन है तो संर्वोदय में पूरी तरह स्वशासन। संघ का एक स्पष्ट लक्ष्य है हिन्दू तुष्टीकरण के माध्यम से भारतीय राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा करना। सर्वोदय दिशाहीन है। उसका कोई स्पष्ट लक्ष्य नहीं। कभी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तो कभी स्वदेशी का नारा। कभी ग्राम स्वराज्य तो कभी साम्प्रदायिकता उन्मूलन। एक वर्ष के लिये भी इनके लक्ष्य टिकाऊ या स्पष्ट नहीं होते। संघ मुस्लिम संगठनों की क्रिया के विरूद्ध तीव्र योजनाबद्ध तथा परिणाम मूलक प्रतिक्रिया करता है। सर्वोदय संघ की प्रतिक्रिया के विरूद्ध लचर अविचारित तथा शक्ति प्रदर्शन के लिये प्रतिक्रिया करता हैं। संघ अन्य संगठनों का उपयोग करना जानता है जबकि सर्वोदय किसी संगठन का उपयोग नहीं कर सकता भले ही उसी का कोई उपयोग कर ले। संघ नेतृत्व पूरी तरह सतर्क सक्रिय और चालाक है। सर्वोदय नेतृत्व सक्रिय तो है किन्तु ढीला ढाला तथा शरीफ प्रवृति का है। संघ का उद्देश्य सत्ता प्रधान है, और परिणाम सफलता है जबकि सर्वोदय का उद्देश्य जनहित का है किन्तु परिणाम शून्य है।
मैंने दोनों संगठनों को निकट से देखा है। सर्वोदय की प्रत्येक चर्चा में गांधी हत्या की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सर्वोदय गांधी हत्या के लिए तो संघ को अक्षम्य दोषी मानता है किन्तु भारत विभाजन में मुसलमानों की भूमिका अथवा सम्पूर्ण विश्व में अन्य धर्मावलम्बियों से निरंतर टकराव में मुसलमानों की भूमिका को भूल जाने योग्य दोष से अधिक नहीं मानता। संघ प्रत्यक्ष रुप से बलप्रयोग का समर्थक है। उसकी कथनी करनी में फर्क नहीं। सर्वोदय प्रत्यक्ष रुप से अहिंसा की बात करता है किन्तु परोक्ष रुप से नक्सलवाद मुस्लिम आतंकवाद तक का समर्थन करता है। कथनी और करनी में आसमान जमीन का फर्क है।
मेरे विचार में सर्वोदय भटक रहा है। सन पचहत्तर में सर्वोदय ने इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरूद्ध एक निर्णायक पहल की। किन्तु सर्वोदय से भूल हुई कि उसने उक्त पहल करने में संघ तथा साम्यवादियों को मिलाकर एक मंच बना दिया। संघ और साम्यवादी उतने ही कटृर होते है जितने कि मुसलमान। ये व्यक्ति के रूप में तो कहीं भी रह सकते हैं किन्तु दल के रूप में ये पूरी तरह सतर्क और सक्रिय रहते हैं। सर्वोदय ने तानाशाही के विरूद्ध ऐतिहासिक संघर्ष का नेतृत्व किया किन्तु देश में कोई निर्णायक परिर्वतन नहीं आ सका। अब तो सर्वोदय लगभग चर्चा से भी बाहर हो रहा है। इस समापन काल मंे स्थिति यहॉ तक आ गई है कि सर्वोदय में ही सम्पत्ति और सत्ता की छीनाझपटी शुरु हो गई है। साम्यवाद के लगभग पतन और कांग्रेस के कमजोर होने के बाद सर्वोदय के सामने कोई अन्य मार्ग नहीं दिख रहा है जबकि संघ परिवार लगातार सशक्त हो रहा है तथा मुसलमानों की बढती अविश्वसनीयता संघ परिवार को और शक्ति प्रदान कर रही है। आर्य समाज की एक स्पष्ट दिषा रही है किन्तु अग्निवेश द्वारा साम्यवाद के समर्थन से आर्य समाज को भी कमजोर करने में बहुत सफलता मिली। यहॉ तक कि साम्यवाद कांग्रेस तथा कुछ विश्व स्तरीय संगठनों के समर्थन से अग्निवेश जैसे चालाक व्यक्ति आर्य संस्कारों के विरुद्ध होते हुए भी आर्य समाज के प्रधान बन बैठे थे।
पिछले दो वर्षो से स्थितियॉ बदली है वर्तमान समय में अधिकांश भावना प्रधान लोगो से भारतीय राजनीति का पिण्ड छूट गया है। तीनों संगठन अर्थात् सर्वोदय, आर्य समाज और संघ, मोदी के सामने समझदारी में बौने सिद्ध हो रहे है। साम्यवाद तो स्वयं ही समाप्त हो रहा था । आर्य समाज का आंशिक स्वरुप परिवर्तन होकर कुछ गायत्री परिवार, कुछ बाबा रामदेव के रुप में बिखर गया। संघ परिवार लगातार शक्तिशाली हो रहा है। स्पष्ट दिखता है कि परिवारवाद मुस्लिम साम्प्रदायिकता तथा आर्थिक कमजोरी से निपटते ही नरेन्द्र मोदी साम्प्रदायिकता से निपटने की पहल करेंगे। हो सकता है कि इस पहल की शुरुवात 2019 के आम चुनाव के बाद ही हो। किन्तु मुझे साफ दिखता है कि यह कार्य होगा अवश्य और ऐसी पहल का मुख्य निशाना संघ परिवार के वे बडबोले लोग और वह ना समझ विचार होगा जिन्हें न हिन्दुत्व का ज्ञान है, न समाज की चिंता है, न विश्वसनीयता की चिंता है बल्कि उन्हें तो अपने मुर्खतापूर्ण विचारों को टी बी और अखबारों में प्रसारित होने देने की तक चिंता है। मैं भारत में संगठनात्मक हिन्दुत्व की तुलना में गुणात्मक हिन्दुत्व के होने का पक्षधर रहा हॅू। मैं उम्मीद करता हॅू कि आर्य समाज तथा सर्वोदय भी वैचारिक तथा गुणात्मक हिन्दुत्व के समर्थन में अपनी पुरानी गलतियों की समीक्षा करेंगे।

महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान– बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 6, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं –
1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेश , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है।
2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है।
3 वर्ग निर्माण सिर्फ प्रवृत्ति के आधार पर ही उपयोगी होता है। अन्य किसी आधार पर होने वाला वर्ग निर्माण धुर्तता का सहायक होता है तथा शराफत को कमजोर करता है।
4 महिला सशक्तिकरण के प्रयत्नों का उद्देश्य वर्ग निर्माण मात्र होता है। लिग भेद के आधार पर महिला या पुरुष का संगठन बनना हमेशा घातक होता है। संस्था बनाई जा सकती है।
इस तरह हम कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण एक समस्या है जिसे समाज में समाधान के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महिला और पुरुष अलग अलग व्यक्ति तक ही सीमित होते है। यदि हम पूरे भारत का सर्वे करें तो भारत में कुल मिलाकर एक दो लाख ही महिलाये होगी क्योंकि अन्य महिलाये तो परिवार की सदस्य होती है। वे माॅ बहन बेटी पत्नी तो हो सकती हैं किन्तु महिला के रुप में उनका तब तक कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता जब तक वे अकेली न हो । यदि किसी महिला या पुरुष द्वारा तीन पैर की दौड अनिवार्य है और उसमें भी एक महिला और एक पुरुष का जुडना आवश्यक है तो ऐसी दौड में किसी एक इकाई को पृथक महत्व देना नुकसानदायक होता है। किसे मजबूत होना चाहिए यह तय करना उन दोनों का स्वतंत्र क्षेत्र है। इसमें कोई बाहर का व्यक्ति कोई नियम कानून नहीं बना सकता। क्योंकि बाहर का व्यक्ति तो स्वयं प्रतिस्पर्धी है तथा वह चाहेगा कि दोनों कभी एक होकर तीन पैर की दौड न जीत सकें। जब महिला का अपवाद स्वरुप ही पृथक अस्तित्व है तो महिला सशक्तिकरण शब्द या तो महत्वहीन है या घातक।
जो धुर्त लोग महिला और पुरुष के रुप में समाज को बांटकर अपना हित साधना चाहते हैं वे दहेज, सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहु विवाह, देव दासी आदि अनेक पुरानी परम्पराओं का उदाहरण देकर महिला अत्याचार प्रमाणित करते है मेरे विचार में समय समय पर देशकाल परिस्थिति के अनुसार सामाजिक मान्यताए बदलती रहती हैं। किसी समय में यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते को ध्येय वाक्य माना गया था तो किसी समय में ढोल गवार शूद्र पशु नारी को। ये वाक्य समय समय पर परिस्थिति अनुसार बदलते रहते है । वर्तमान में विकृति मानी जाने वाली दहेज ,सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहुविवाह, देव दासी आदि की परम्पराए पुराने समय में महिला शोषण के निमित्त नहीं बनी थी बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए इन्हें परम्पराओं के रुप में विकसित किया गया था। ये परम्पराएं बाद में परिस्थितियों के बदलाव होने से टूट गई। एक समय था जब बहुविवाह का अर्थ एक पुरुष की कई पत्नियों के साथ माना जाता था। तो अब भविष्य में ऐसा भी समय आने वाला है जब बहु विवाह का अर्थ एक महिला के साथ कई पुरुषों के विवाह से माना जाने लगेगा। न पहले वाली व्यवस्था विकृति थी और न ही भविष्य की व्यवस्था विकृति मानी जायेगी। विवाह,तलाक आदि व्यवस्थाएं आपसी सहमति से तथा सामाजिक मान्यताओं से चलती है,कानून से नहीं। नासमझ लोगों ने अनावश्यक इन परम्पराओं में कानून को घुसा दिया।
आमतौर पर यह प्रचारित किया जाता है कि महिलाये पुरुषांे की काम वासना पूर्ति की साधन मात्र होती हैं। यह प्रचार पूरी तरह गलत है। सच्चाई यह है कि काम इच्छा पुरुषों की अपक्षा महिलाओं में अधिक मानी जाती है। यह अलग बात है कि प्राकृतिक कारणों से पति पत्नि के बीच पति को हमेशा आक्रामक स्वरुप में होना चाहिए और पत्नि को आकर्षक स्वरुप में। यह प्राकृतिक स्वरुप यदि दोनों में यथावत है तो इसे किसी का किसी पर अत्याचार नहीं कह सकते। यदि काम इच्छा महिलाओं में बहुत कम होती तो महिलाए एक उम्र के बाद पुरुष के अभाव में परेशान नहीं होतीं। महिलाओं पर समाज में भेदभाव का आरोप भी पूरी तरह गलत है। कानून में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त है। समाज में महिलाओं को पुरुषो की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त है। परिवार व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पुरुष से कमजोर मानी जाती है लेकिन यह कमजोर भूमिका भी अत्याचार के रुप में नहीं कही जा सकती। एक कलेक्टर की पत्नी अपने दस पुरुष नौकरों पर अपना आदेश चलाती है। अनेक घरों में पुरुष महिलाओं को पीटते भी है तो अनेक घरों के पुरुष महिलाओं से मार भी खाते हैं। महिला और पुरुष का परिवार में कार्य विभाजन है और यह विभाजन सबकी सहमति से होता है। यदि परिवार में भोजन खराब बनेगा तो महिला डांट खाती है,और भोजन का अभाव है तो महिला पति को डाटती भी है। भारत में पिछले वर्षो में होने वाली लाखों किसान आत्महत्याओं में शायद ही एक दो महिलाओं ने आत्महत्या की होगी। क्योंकि यह पुरुष का दायित्व माना जाता है। समाज में एक मान्यता है कि यदि अत्याचारी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो अत्याचार पीडित प्रसन्न होता है। पति के मरने के बाद पत्नी जितना दुख व्यक्त करती है वह दुख उसका वास्तविक होता है, नाटक नहीं। मतलब साफ है कि यदि भले ही पति पत्नि के बीच पति अत्याचार करता हो किन्तु दोनों के बीच कोई ऐसी बात अवश्य है जो दोनों को जोडकर रखती है और इस जोड को कमजोर नहीं होने देना चाहती। यदि महिलाये यह जानती है कि पुरुष अत्याचारी होता है तो महिलाए सब कुछ समझते बूझते भी पति घर में स्वेच्छा से क्यों जाती है। यहाॅ तक कि यदि कभी कभी उनके जाने में विलम्ब हो जाये तो वे सारी मर्यादाये छोडकर भी जाती है। इसका अर्थ है कि महिला अत्याचार का प्रचार पूरी तरह सोचा समझा षडयंत्र है।
प्राचीन समय में महिलाओ और पुरुषों को कुल मिलाकर समान अधिकार प्राप्त थे। किन्तु वे अधिकार योग प्रधान थे अर्थात कुछ मामलों में महिलाओं को विशेष अधिकार थे तो कुछ मामलो में कम। किन्तु कुल मिलाकर समान थे। ये अधिकारों का विभाजन भी या तो परिवार स्वयं करता था या सामाजिक व्यवस्था। स्वतंत्रता के बाद कानूनी व्यवस्था ने सबको समान अधिकार घोषित कर दिया किन्तु सामाजिक व्यवस्था में पुरानी योग समान प्रणाली जीवित रही।
समाज में दो प्रकार के परिवार है 1 पारम्परिक परिवार 2 आधुनिक परिवार। पारम्परिक परिवार की महिलाओं की संख्या 98 प्रतिषत है और आधुनिक परिवारो की करीब दो प्रतिषत । ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये पूरे समाज का शोषण करना चाहती है। इन्हे सामाजिक व्यवस्था में तो विशेष अधिकार भी चाहिए और कानूनी व्यवस्था में समान अधिकार भी चाहिए। किसी आधुनिक महिला ने आज तक यह नहीं कहा कि उसे समान अधिकार चाहिए या विशेष अधिकार यदि पूरे भारत का सर्वे किया जाये तो ये दो प्रतिषत आधुनिक महिलाये अपने को 98 प्रतिषत पारम्परिक महिलाओं का प्रतिनिधि घोषित करती है। किन्तु यदि इनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डाले तो 98 प्रतिषत की तुलना में इन दो प्रतिषत का चारित्रिक मापदण्ड भी कमजोर होता है तथा पारिवारिक जीवन भी अधिक असंतोषप्रद होता है। यहाॅ तक कि तलाक के मामले का भी प्रतिषत इन दो प्रतिषत आधुनिक महिलाओं में अधिक होता है। ये दो प्र्रतिषत आधुनिक महिलाएं सहजीवन के स्थान पर उच्श्रृंखलता को अधिक महत्व देती है और उसे ही स्वतंत्रता कहती है। यहाॅ तक कि ये महिलाये सारी सुविधाये भी अपने परिवार तक समेट लेना चाहती है। पति को सामान्य नौकरी तो पत्नी को आरक्षित नौकरी। पति सामान्यतया लोकसभा में तो पत्नी आरक्षित सीट पर । यदि यह नियम बन जाये कि एक परिवार का एक ही सदस्य राजनीतिक पद या सरकारी नौकरी पा सकता है तो ये आधुनिक महिलाये आसमान सर पर उठा लेगी किन्तु न ये ऐसा होने देंगी न इनके पति।
कुछ दशक पूर्व पुरुष सशक्तिकरण के नाम से समाज में विकृति आई थी और उसके भी दुष्परिणाम हमें दिखे। अब महिला सशक्तिकरण का एक घातक नारा समाज में प्रचारित किया जा रहा है और वह नारा समस्या का समाधान न होकर नई समस्या पैदा कर रहा है। मैंने दिल्ली के राजघाट पर सरकार की तरफ से एक बडा बोर्ड देखा जिसमें लिखा है ‘‘महिलाओं पर अत्याचार कानूनन अपराध है’’। मैं आज तक नहीं समझा कि क्या समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति पर अत्याचार करने की छूट प्राप्त है? ये महिलाओं शब्द लिखना वास्तव में बहुत घातक है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रसिद्ध संत बाबा रामदेव सरीखे लोग कन्या भ्रुण हत्या को रोकने का अभियान चला रहे है। मेरे विचार में बालक की भ्रूण हत्या तो नगण्य होती है फिर पूरी भ्रूण हत्या को ही यदि रोक दिया जाये तो कैसे गलत होगा ? इतना अवश्य है कि यदि पूरी भ्रूण हत्या को रोका गया तो महिला और पुरुष के बीच वर्ग विद्वेश वर्ग संघर्ष खडा करके अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का काम नहीं हो पायेगा।
यदि इसी तरह महिला सशक्तिकरण का नारा विकसित होता रहा तो एक नई विकृति जन्म ले सकती है। कहा जाता है कि घरों में महिलाओं को दासी समझा जाता है। यदि भविष्य में यह प्रथा उलट जाये और घोषित रुप से दासी कहा जाने लगे तो क्या अन्तर होगा। यदि ऐसी विकृत प्रथा प्रचलित हो जाये कि पुरुष विज्ञापन देने लगे कि उन्हे एक ऐसी दासी चाहिए जो दिन में नौकरी का काम करे और रात में उसके साथ सोये भी। इस विज्ञापन के आधार पर वेतन भत्ते तय करने की प्रथा हो जाये तो आप सोचिये कि यह प्रथा कानून कैसे रोक पायेगा जबकि यह प्रथा वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था से अधिक बुरी होगी।
परिवार में पति पत्नि के बीच अविश्वास की दीवार खडी की जा रही है। यह दीवार कितनी लाभदायक होगी यह तो भविष्य बतायेगा किन्तु यह दीवार परिवार व्यवस्था को तोडेगी अवश्य । छोटे बच्चों के संस्कार खराब होगे। लाभ होना तो संदेहास्पद है किन्तु नुकसान होना निश्चित है । अब पुरानी परिवार और समाज व्यवस्था की ओर लौटना न तो संभव है न उचित किन्तु महिला सशक्तिकरण के नाम पर परिवार तोडक समाज तोडक अभियान भी बंद होने चाहिए। परिवार में कौन सषक्त हो,कार्य विभाजन कैसा हो यह परिवार का आंतरिक मामला है उन्हें मिल बैठकर तय करने दीजिए। कोई कानून बनाना उचित नहीं। यदि उनमें आपसी सहमति नहीं है तो उन्हे अलग अलग मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता दीजिए। अलग होने में भी कोई कानूनी बंधन उचित नहीं। मेरे विचार में एक ही समाधान है कि भारत में व्यक्ति को एक इकाई माना जाये। सबको समान अधिकार माने जाये। कानून किसी को विशेष अधिकार न दे तथा देश सवा सौ करोड व्यक्तियों और परिवारों गांवो का संघ हो। धर्म, जाति, लिंग के आधार पर होने वाले सब प्रकार के भेद भाव मूलक कानून समाप्त कर दिये जाये।
नोटः- मंथन क्रमांक 7 का अगला विषय न्यायिक सक्रियता कितनी उचित कितनी घातक होगा।

संघ परिवार की हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण नीति सफलता की ओर- बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 4, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

लम्बे समय से संघ परिवार एक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत काम करता रहा है कि भारत का मतदाता बहुसंख्यक अल्प संख्यक के नाम पर ध्रुवीकृत हो जाये। स्पष्ट है कि भारत मे हिन्दूओ का प्रतिशत अस्सी से भी ज्यादा है। पिछले कुछ दिनो से विपक्ष की गलत नीतियां संघ परिवार के इस उद्देश्य को पूरा करती दिखाई दे रही हैं।
अभी अभी मायावती जी ने यह कहा है कि उत्तर प्रदेश का मुसलमान एक जुट रहेगा । वह किसी भी अन्य दल के पास नही जायेगा । ऐसी ही कुछ सोच अन्य विपक्षी दलो की भी रही है। सबका यह मानना है कि हिन्दू तो आपस मे बंटेगा ही यदि मुसलमान का एक जुट वोट उसे मिल जाये तो वह हिन्दूओ के जाति के आधार पर किसी वर्ग को तोडकर शासन मे आ सकता है। नरेन्द्र मोदी के आने के बाद धीरे धीरे हिन्दुओ का ध्रुवीकरण भी बढ रहा है तथा विपक्षी दलो की मुस्लिम एकत्रीकरण की नीति हिन्दुओ को और अधिक इकठठा होने मे सहायता कर रही है। मुस्लिम एकत्रीकरण उस समय तक तो लाभदायक रहता है, जब तक हिन्दू एक जुट न हो । किन्तु इसका यह अर्थ नही कि आप पूरी वेशर्मी के साथ मुसलमानो को एक जुट करने की आवाज लगाये और यह मान ले कि हिन्दुओ पर कभी भी किसी भी परिस्थिति मे इसकी प्रतिक्रिया होगी ही नही । मेरे विचार मे विपक्षी दलो का ऐसा मानना गलत है।
अभी अभी भोपाल मे सिमी के आठ आतंकवादी जेल से फरार होने के बाद मुठभेड मे मारे गये। दिग्विजय सिंह जी ने यह प्रश्न उठाया कि आखिर क्या कारण है कि सिर्फ मुसलमान ही जेलो से भागते हैं। इसके पूर्व भी दिग्विजय सिंह सहित अनेक नेता यह प्रश्न उठा चुके है कि आवादी के अनुपात मे मुसलमान ही जेलो मे अधिक बंद क्यो है? मै नही समझता कि मै इस मूर्खता या धूर्तता पूर्ण प्रश्न का क्या उत्तर दॅू। स्पष्ट है कि यह प्रष्न भी हिन्दुओ के ध्रुवीकरण मे सहायक होता है।
मै देख रहा हॅू कि आतंकवादियो के मारे जाने पर जो बहस छिडी है उसमे अधिंकांश विपक्षी नेता या मुसलमान प्रवक्ता एक स्वर से इस प्रश्न को अधिक महत्व दे रहे है कि मुठभेड फर्जी थी और बिना न्यायिक प्रक्रिया के उन्हे मार दिया गया, जो गलत था । मै भी ऐसा सोचता हॅू कि इन आठ लोगो को मार देना फर्जी हो सकता है और बिना न्यायिक प्रकृया के पूरी हुए किसी को पुलिस द्वारा मार देना गैर कानुनी है। फिर भी मै ऐसा सोचता हॅू कि जिन लोगो की हत्या हुई वे भले ही कानून के द्वारा अपराध सिद्ध न हो किन्तु मेरे विश्वास के अनुसार वे अपराधी थे और यदि न्यायालय अनंत काल तक ऐसे अपराधियो को अपराधी घोषित करके दंडित न कर सके तो क्या ऐसे लेागो से समाज को मुक्ति दिलाने मे अन्य इकाइयों को पहल नही करनी चाहिये? यदि वे अपराधी थे, जैसा कि मुझे भी विश्वास है, और न्यायालय उन्हे दंडित नही कर पा रहा है तो पुलिस ने ऐसे लोगो को मारकर अपनी नौकरी जोखिम मे डाली है। इसके लिये भले ही वे कानून से दंडित हो जाये किन्तु सामाजिक दृष्टि से ऐसे पुलिसकर्मी बधाई के पात्र हैं। न्यायपालिका प्रतिदिन जजो की कमी का रोना रोती है, किन्तु यह कभी नही सोचती कि उसकी प्राथमिकताए क्या है? न्यायालय को सेशन कोर्ट के योग्य गंभीर आपराधिक मामलो को प्राथमिकता के आधार पर निपटाना चाहिये था। किन्तु न्यायपालिका अन्य कम महत्वपूर्ण कार्यो को अपने हाथ मे लेकर ओभर लोडेड हो जाती है। परिणाम स्वरूप गंभीर अपराधी जेलो मे लम्बे समय तक निर्णय के अभाव मे पडे रहते है, तथा कभी कभी पुलिस ऐसे खतरनाक अपराधियो को फर्जी मुठभेड मे मारकर अपनी नौकरी खतरे मे डालती है। भोपाल के फर्जी मुठभेड का वास्तविक कारण न्यायिक प्रक्रिया मे भी खोजा जाना चाहिये। किन्तु यह मामला या तो सत्ता या विपक्ष के बीच खोजा जा रहा है, अथवा हिन्दू और मुसलमान के बीच। मैं समझता हॅू कि यदि मारे गये आठो लोग मुसलमान नही होते तो यह हल्ला निश्चित रूप से कम होता । मेरे विचार मे यह भोपाल कांड भी संघ परिवार के हिन्दू एकत्रीकरण मे सहायक हो रहा है।

मंथन कैसे ?- बजरंग मुनि

Posted By: kaashindia on November 2, 2016 in Uncategorized - Comments: No Comments »

मैंने लम्बे समय तक बौद्धिक व्यायाम किया है किन्तु मैं यह भी जानता हॅू कि यदि लम्बे समय तक व्यायाम करने के बाद व्यायाम बंद कर दिया जाये तो गठिया समेत अनेक बीमारियों की संभावना बन जाती है। ऐसा ही बौद्धिक व्यायाम के साथ भी संभव है। मैं चाहता हॅू कि मेरा व्यायाम भी बंद न हो। जो लोग मंथन में बहुत कमजोर होते है वे मुझसे प्रश्न करने में हिचकिचाते है । जो लोग बहुत मजबूत होते है वे मंथन में मेरे साथ शामिल होने में अपना अपमान समझते है। मुझे व्यायाम की जरुरत है। मैं चाहता हॅू कि आप चाहे मजबूत हो या कमजोर आपको इस व्यायाम के साथ जुडना चाहिए। जो विषय घोषित होता है उस पर आप अपने विस्तृत विचार एक सप्ताह तक भेज सकते है मैं भी उस विषय पर अपने विचार भेजॅूगा। एक सप्ताह तक आये हुये विचारों पर अगले एक सप्ताह तक प्रश्नोंत्तर होगा और उसके बाद विषय बंद हो जायेगा। अब तक विचार मंथन के लिए हमारे साथियों की सलाह पर विषयों की सूची बनी है जो नीचे लिखी गई है। आप लोगों के और सुझाव आने के बाद अन्य विषय भी जोडे जा सकते है।
मैं स्पष्ट कर दूॅ कि इस विचार मंथन का उद्देश्य कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना नहीं है। वह तो अपने आप निकलता रहेगा। साथ ही आपसे यह भी निवेदन है कि आपको बहुत महत्वपूर्ण उपयोगी साथी मानकर इस मंथन में जोडा गया है। इसमें आप अनावश्यक कुछ लिखकर अपनी क्षमता का तथा मंथन प्रक्रिया का नुकसान न करें। दिवाली की शुभकामनाएॅ या अन्य संदेश या सुचनाएॅ आपकी प्रतिष्ठा को कम करेगा क्योंकि यह एकमात्र मंथन कार्यक्रम है। इसका किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग ठीक नहीं। इस कार्यक्रम का किसी भी प्रकार के विचार प्रचार या कोई निष्कर्ष निकालने से कोई संबंध नहीं है। विपरीत विचारों के लोग खुलकर और स्वतंत्रतापूर्वक किसी मंच पर अपने विचार रख सके इतना ही इसका उद्देश्य है। आपसे मेरी यह अपेक्षा है कि आप कुछ अन्य उपयोगी साथियों के नाम और फोन नंम्बर भी भेजे, जो इस दिशा में उपयोगी हो सकते है। उन्हें भी इस योजना से जोडा जायेगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरे इस प्रयत्न में सहभागी होंगे।
अब तक सम्पन्न विषयों की सूची-
मंथन क्रमांक-1 समाज और राज्य मे अहिंसा और सत्य की समीक्षा
मंथन क्रमांक-2 बेरोजगारी
मंथन क्रमांक-3 संघ परिवार,आर्य समाज और सर्वोदय परिवार की समीक्षा
मंथन क्रमांक-4 विश्व की प्रमुख समस्याएॅ और समाधान
मंथन क्रमांक-5 परिवार व्यवस्था
मंथन क्रमांक -6 जो वर्तमान में चल रहा है- महिला सशक्तिकरण कितना उचित?
प्रस्तावित विषयांे की सूची
आपराधिक
(1)चोरी,डकैती,लूट
(2)आतंकवाद और समाधान (क) नक्सलवाद (ख) मुस्लिम आतंकवाद (ग) आपराधिक आतंकवाद
(3) अपराध गैर कानूनी और अनैतिक का फर्क
(4)अपराध वृद्धि कारण और निवारण
(5)शोषण अपराध या अनैतिक
(6)मृत्युदण्ड समीक्षा-
(7)मिलावट कमतौल कितना अपराध कितना अनैतिक
(8)जालसाजी धोखाधडी
(9)पुलिस की अति सक्रियता
महिलाओं से जुड़ी
(1)बलात्कार
(2)महिला आरक्षण समस्या या समाधान
(3)कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना नाटक
(4)दहेज प्रथा
(5)महिला उत्पीडन समीक्षा
(6)महिला वर्ग या परिवार का अंग
(7)पर्दा प्रथा
(8)सती प्रथा
(9)परम्परागत या आधुनिक महिलाएॅ
(10) लिब-इन रिलेशनशीप
आर्थिक
(1)आर्थिक असमानता
(2) नई अर्थ नीति
(3)श्रम शोषण
(4)गरीबी रेखा
(5)मंहगाई भ्रम या यथार्थ
(6) सभी आर्थिक समस्याओं का एक आर्थिक समाधान
(7) स्वतंत्र अर्थपालिका
(8)ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
(9) प्राकृतिक उर्जा और कृत्रिम उर्जा
(10) हमारी आदर्श कर प्रणाली
(11 ) राजनैतिक व्यवस्था पर सम्पन्नों और बुद्धिजीवियों का एकाधिकार
(12) किसान आत्महत्या
(13) नरेगा
(14) आर्थिक मंदी
(15) सरकारीकरण निजीकरण समाजीकरण
(16) कर्मचारी आन्दोलन
चारित्रिक
(1)भ्रष्टाचार
(2)चरित्र पतन व्यक्तिगत या व्यवस्थागत
(3) चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन
(4) भावना या विचार
(5)ज्ञान यज्ञ का महत्व और तरीका
(6) भौतिक या नैतिक उन्नति
धार्मिक
(1)धर्म और सम्प्रदाय
(2)जाति और वर्ण व्यवस्था
(3)जातीय आरक्षण
(4)धार्मिक आरक्षण
(5) इस्लाम अब तक और आगे
(6)धर्म और संस्कृति
(7)साम्प्रदायिकता और धर्म
(8)गाय,गंगा,मंदिर,मुददे समस्या और समाधान
(9)संगठन कितना उचित कितना अनुचित
(10)भारतीय संस्कृति हिन्दू संस्कृति का फर्क
(11)आर्य समाज सर्वोदय संघ समीक्षा
(12)संघ इस्लाम और साम्यवाद की समीक्षा
(13)बाबरी मस्जिद राम मंदिर के मुददे और समाधान
(14) धर्मान्तरण
(15) हिन्दू धर्म और इस्लाम ,शाहरुक की पीडा
(16) आश्रमों में बलात्कार
(17) साम्प्रदायिक दंगे समस्या या मजबूरी
संवैधानिक
(1)भारतीय संविधान समीक्षा
(2)मूल अधिकार
(3)ग्राम सभा सशक्तिकरण
(4)राइट टू रिकाल
(5)व्यक्ति और नागरिक का फर्क
(6)नई संवैधानिक व्यवस्था का स्वरुप
(7)लोक ससद
(8)राज्य के दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का फर्क
(9) स्वतंत्रता महत्वपूर्ण या समानता
(10) संविधान संशोधन
सामाजिक
(1)समाज तब और अब
(2)व्यक्ति,परिवार ,समाज
(3)संयुक्त परिवार व्यवस्था में बाधाएॅ और समाधान
(4)वर्ग विद्वेश या वर्ग समन्वय
(5)साहित्य और विचार का अंतर
(6)विवाह पद्धति ,प्रेम विवाह,समलैंगिकता
(7)व्यक्ति, धर्म,समाज और राज्य,
(8)समाज निर्माण और समाज सुरक्षा
(9) पर्यावरण और मानवाधिकारवादी
(10) क्षेत्रियता
(11) सामाजिक अव्यवस्था और समाधान
(12) भय का व्यापार
राजनैतिक
(1)तानाशाही, लोकतंत्र ,लोक स्वराज्य
(2)संसदीय लोकतंत्र या सहभागी लोकतंत्र
(3)पॅूजीवाद,समाजवाद,साम्यवाद
(4)व्यवस्था परिवर्तन क्यों,क्या,कैसे
(5) समान नागरिक संहिता
(6) ग्राम स्वराज्य
(7) नरेन्द्र मोदी
(8) हिन्दू कोड बिल
(9) ग्लोबल वार्मिंग
(10) भारतीय राजनीति और लोकतंत्र
(11) राजनीति में अच्छे लोग
(12) मतदान
(13) गाय की रोटी कुत्ता खाये
न्यायिक
(1)न्यायिक प्रक्रिया कितनी उचित कितनी अनुचित
(2) पुलिस और न्यायालय के संबंधो की समीक्षा
(3) न्यायिक सक्रियता
(4) न्याय और व्यवस्था
अन्य
(1)हिंसा या अहिंसा
(2)गॉधी मार्क्स,अम्बेडकर
(3)गॉधी,भगतसिंह,सुभाष चंद्रबोस
(4)गॉधी और गोड्से
(5)नेहरु पटेल अम्बेडकर
(6)भारत का विभाजन भूल या मजबूरी
(7) कश्मीर समस्या
(8) चिंतन महत्वपूर्ण या क्रिया
(9)ज्ञान, शिक्षा और श्रम का महत्व
(10)भाषा कितनी वैचारिक कितनी भावनात्मक
(11)समीक्षा,आलोचना,विरोध,और संघर्ष का अंतर
(12)अमेरिका हमारा प्रतिद्वंदी, विरोधी या शत्रु
(13)दान चंदा और भीख का फर्क
(14)उपदेश , प्रवचन,भाषण और शिक्षा का फर्क
(15)स्वदेशी का प्रचार कितना आवश्यक
(16)सुख और दुख की उत्पत्ति
(17)भूत,प्रेत,तंत्र,मंत्र कितना भ्रम कितना वास्तविक
(18)निष्कर्ष निकालने में परिभाषाओं का महत्व
(19)समस्याओं के समाधान में हमारी प्राथमिकताएॅ
(20)शराफत,समझदारी, और धूर्तता में फर्क
(21)प्रशंसा , समर्थन, सहयोग, सहभागिता में अंतर
(22) आरक्षण
(23)शिक्षा सरकारी या शासन मुक्त
(24) बाबा रामदेव
(25) विकेन्द्रीयकरण या अकेन्द्रीयकरण
(26) कर्तव्य और अधिकार
(27) बालश्रम कानून
(28) विश्वस्तरीय समस्यायें
(29) गुटनिरपेक्षता
(30) मीडिया
(31) एन जी ओ

Polls

एन्डरसन को फंसी दी जनि चाहिए या नहीं ?

  •  
  •  
  •  

View Results

क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

Categories

Copyright - All Rights Reserved / Developed By Weblinto Technologies Thanks to Tulika & Ujjwal