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मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख

Posted By: kaashindia on January 31, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्ति की स्वयं की भूमिका न हो। यदि ऐसी कोई भूमिका भी हो तो भूमिका के बाद संभावित परिणाम के आकलन और यथार्थ के बीच ही सुख और दुख होता है।
इस विषय को मैं कुछ वास्तविक घटनाओं से समझाता हॅू। मेरे एक मित्र अपने लडके के विवाह के लिए लडकी तय करने गये। तय करके जब वापस लौट रहे थे तो बस एक्सीडेंट हो गई जिसमें दो तीन अन्य यात्री मर गये और मेरे मित्र को मामूली चोट आई। उन्होने वह रिस्ता यह कहकर तोड दिया कि आने वाली बहू के लक्षण ठीक नहीं हैं। रामानुजगंज वापस आने के बाद मैंने उस घटना को सुनकर उन्हें धन्यवाद दिया कि आपकी आने वाली बहु बहुत सुलक्षण है जिससे आप इतने गंभीर एक्सीडेंट में भी मामूली चोट से बच गये। उनकी भावना तुरन्त बदल गई और उन्होने खबर भेजकर वह रिस्ता फिर से स्वीकार कर लिया। इसी तरह मेरे कई रिश्तेदार है जिनके विषय में मेरा अनुमान रहता है कि मेरे जाने पर किसका व्यवहार कैसा होगा। जिसके विषय में मेरा अनुमान रहता है कि वे खडे होकर हाथ जोडकर स्वागत करेंगे। वे अगर बैठे रहे तो मुझे दुख होता है । दूसरी ओर जिनके विषय में मैं अनुमान करता हॅू कि वे बैठे बैठे ही इशारे से ही सम्मान करेंगे वे यदि बैठे बैठे भी हाथ जोडकर मेरा सम्मान करें तो मैं प्रसन्न हो जाता हॅू। मेरे परिवार में कई लोग है। एक सदस्य किसी स्टाफ को बहुत डाटकर बोलता है और उसे दुख नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि उनकी ऐसी ही आदत है। दूसरी ओर मैं किसी को कभी नहीं डाटता । यदि उसी व्यक्ति को मैंने सिर्फ यह कह दिया कि उसने गम्भीर गलती की है तो वह दिन भर खाना नहीं खायेगा। स्पष्ट है कि किसी घटना से होने वाले परिणाम का संभावित आकलन ही सुख और दुख का आधार होता है। मेरे उस स्टाफ का अलग अलग आकलन उसके अलग अलग सुख दुख का आधार बना।
मेरे एक मित्र बरियों में रहते है । जब मिलते है तो इस बात से दुखी रहते है कि सब कुछ बिगड गया है। उनके लडके भी अलग रास्ते पर चलने लगे है और उनकी नहीं सुनते। वे सम्पूर्ण समाज व्यवस्था को भी बहुत गिरी हुई मानते हैं। मेरे परिवार के एक बडे बुजुर्ग भी लगभग इसी तरह अपने बच्चों को गलत मानते है। मैं फेसबुक में शरद कुमार जी की पीडा पढता रहता हॅू। वे अपने बच्चो,पत्नी तथा अन्य कुछ रिश्तेदारो के व्यवहार से भी बहुत दुखी रहते है। दूसरी ओर मैं स्वयं को देखता हॅू तो पाता हॅू कि मैं दुनिया का सबसे अधिक सुखी व्यक्ति हॅू। मेरे परिवार के लोग रिश्तेदार ,मित्र और यहाॅ तक कि स्टाफ के लोग भी कभी ऐसा काम नहीं करते जिससे मुझे कभी कोई दुख हो। इन दोनों बातों से होने वाले सुख और दुख में सामने वाला व्यक्ति कम और व्यक्ति स्वयं अधिक दोशी है क्योंकि व्यक्ति सामने वाले की सोच परिस्थितियाॅ और नीयत का आकलन किये बिना उससे कुछ उम्मीदे करने लगता है जो पूरी नहीं होती अथवा विपरीत होती हैं तब उसे दुख होता है। वास्तविकता यह है कि दुख होने का कारण व्यक्ति का स्वयं का गलत अनुमान है। यदि आप किसी बैठक में जा रहे है और आपने अनुमान किया है कि इस बैठक में 15 लोग आ सकते है। यदि 20 लोग आते है तो आप प्रसन्न और 10 आते है तो दुखी होंगे। कल्पना करिये कि आपने 25 का अनुमान किया है तब 20 आये तो आप दुखी और 10 आये तो नाराज हो जायेंगे। आपकी प्रसन्नता और नाराजगी का संबंध आने वालो की संख्या से नहीं है और आप प्रसन्न या दुखी होकर संख्या को घटा बढा भी नहीं सकते। स्पष्ट है कि आपका गलत आकलन ही आपके सुख और दुख का कारण बना। आप किसी यात्रा में अनुमान किये कि यह ट्रेन 2 घंटे लेट पहुचेगी और वह 1 घंटे ही लेट पहुची तो आप प्रसन्न हो गये और जब वह 3 घंटे लेट पहुंची तो आप दुखी हो गये। स्पष्ट है कि आपका अनुमान ही सुख दुख का कारण था ट्रेन नहीं।
अनेक लोग दूसरों से बहुत अपेक्षाए करते है और उन अपेक्षाओं के आधार पर परिणाम का आकलन कर लेते है। अपेक्षाए भी यथार्थ नहीं होती और परिणाम भी वैसे नहीं होते। अतीत का अनुभव लिये बिना यदि आप काल्पनिक अपेक्षाए करते है तो गलत आप है, सामने वाला नहीं। हमेशा दिमाग में सर्वश्रेष्ठ संभव का सिद्धांत बनाकर रखना चाहिये। जो लोग सर्वश्रेष्ठ का सिद्धांत मानकर चलते है वे अपने जीवन में अंत तक स्वयं भी दुखी रहते है तथा अपने अन्य सम्पर्को को भी निरंतर दुखी रखते है। जो कुछ हो रहा है और उपलब्ध है उसमें सर्वश्रेष्ठ क्या है उसी से संतुष्ट रहना चाहिये और उसी संतुष्टी में सुख का अनुभव करना चाहिये। भगवान बुद्ध के समान संसार दुखो का समुद्र है इस धारणा को मैं गलत मानता हॅू क्योंकि बुद्ध के समय हो सकता है कि ऐसा हो किन्तु वर्तमान समय में तो मैं बिल्कुल ऐसा नहीे देखता।
मेरे विचार से सुख और दुख के प्रभाव से बचने के लिए संभावित परिणाम का अनुमान सही होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। कोई भी व्यक्ति खुश रहने के लिए जानबुझकर अपने अनुमान को घटा बढा नहीं सकता। अनुमान बौद्धिक आकलन से होता है और सुख दुख भावनात्मक। भावना प्रधान लोग जल्दी सुख दुख से प्रभावित हो जाते है क्योंकि उनका अनुमान ही गलत होता है। जबकि बुद्धि प्रधान लोग सुख और दुख से कम प्रभावित होते है क्योंकि उनका अनुमान यथार्थ के नजदीक होता है। भावना प्रधान लोगों के लिए सुख और दुख से बचने का एक और मार्ग है कि वे किसी भी अप्रत्याषित परिणाम के लिए अपना सुख और दुख ईश्वर पर छोड दे अर्थात जो भी हुआ वह स्वाभाविक था,ईश्वर की मर्जी थी और उसमें किसी का कोई दोष नहीं है। इस तरह ईश्वर को शामिल कर लेने से भी सुख और दुख में कुछ कमी की जा सकती है। मैं चाहता हॅू कि हम सुख और दुख के मामले में अपने सोचने के तरीके में कुछ बदलाव करने का प्रयास करें।
मंथन क्रमांक 25 का अगला विषय निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण होगा।

मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण

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दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे प्रकृति प्रदत्त अधिकार जिन्हें राज्य सहित कोई भी अन्य उसकी सहमति के बिना तब तक कटौती नहीं कर सकता जब तक उसने किसी अन्य व्यक्ति के वैसे ही अधिकारों का उल्लंघन न किया हो, उन्हें मौलिक अधिकार कहते है। मौलिक अधिकार प्रकृति प्रदत्त होते है , संविधान प्रदत्त नहीं। संविधान तो व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की गारण्टी मात्र देता है।
मौलिक अधिकार सिर्फ एक ही होता है और वह होता है प्रत्येक व्यक्ति की असीम स्वतंत्रता। मौलिक अधिकार की कोई सीमा नहीं होती। अपने अधिकारों की सीमा व्यक्ति स्वयं तय करता है । इन अधिकारों की सीमा वहाॅ तक होती है जहाॅ से किसी अन्य की स्वतंत्रता की सीमा प्रारंभ होती हो । यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधक होती है तब संविधान या समाज इसमें हस्तक्षेप करता है, अन्यथा नहीं। मौलिक अधिकारों के चार भाग होते हैं-1 जीने का अधिकार 2 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 3 सम्पत्ति 4 स्वनिर्णय। ये चारों अधिकार सिर्फ व्यक्तिगत ही होते है, सामूहिक नहीं होते । ये अधिकार अहस्तांतर्णीय भी होते है अर्थात किसी अन्य के मौलिक अधिकारों का उपयोग कोई अन्य नहीं कर सकता। इस तरह व्यक्ति को किसी भी मामले में अपने विचार रखने का अधिकार मौलिक अधिकार है। किन्तु वह अधिकार किसी अन्य व्यक्ति पर प्रभाव नहीं डाल सकता। व्यक्ति को विचार अभिव्यक्ति तक ही स्वतंत्रता है किन्तु यदि कोई अभिव्यक्ति विचार प्रचार की दिशा में बदल जाती है तो वह संवैधानिक या सामाजिक अधिकार स्वरुप ग्रहण कर लेती है। कोई भी क्रिया विचार अभिव्यक्ति में नहीं शामिल होती। इस तरह नारे लगाना जुलूस निकालना विचार अभिव्यक्ति का भाग नहीं है । क्योेंकि वह समूहगत है, विचार प्रचार है तथा दूसरों की स्वतंत्रता का हनन भी है।
प्रत्येक व्यक्ति का यह स्वभाव होता है कि वह स्वयं तो अधिक से अधिक स्वतंत्रता चाहता है किन्तु दुसरों को अपनी इच्छानुसार संचालित होते हुए देखना चाहता है । यहीं से विवाद शुरु होता है। एक व्यक्ति शराब पीकर अपना और अपने परिवार का नुकसान कर रहा है। तो उसका पडोसी उसे बलपूर्वक इस नुकसान से रोकना अपना अधिकार समझता है। वह पडोसी यदि यज्ञ करता है और शराबी यह कहकर यज्ञ में बाधा पहुचाता है कि वह भूखा है और पडोसी घी तेल जला रहा है तब भी पडोसी उस शराबी को ही गलत कहता है क्योंकि शराब पीना बुरा है और यज्ञ करना अच्छा। ये दोनों ही नियम पडोसी ने बनाये है और दोनों में शराबी की सहमति नहीं है। मेरे विचार में यह व्यवस्था उस शराबी के स्वनिर्णय के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। आप उस शराबी को समझा सकते है,बहिष्कार कर सकते है किन्तु आप उसकी स्वतंत्रता में बाधा नहीं पहुचा सकते। आज ऐसा दिखता है कि सरकार तो अधिकांश मामलों में व्यक्ति के स्वनिर्णय के तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करने के कानून बनाती ही है, कभी कभी सामाजिक व्यवस्थाएॅ भी ऐसा अतिक्रमण करने लगती है।
पांच प्रकार के कार्य ही मूल अधिकारों का उल्लंघन करते है -1 चोरी, डकैती, लूट 2 बलात्कार 3 मिलावट, कमतौलना 4 जालसाजी, धोखाधडी, छलकपट 5 हिंसा, बलप्रयोग, आतंक। कोई छठवा कार्य ऐसा नहीं होता जिसे अपराध कहाॅ जा सके। यदि कोई व्यक्ति इन पांच कार्यो से बच जाता है तो वह किसी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता और उसे अपराधी नहीं कहा जा सकता।
दुनिया में मौलिक अधिकार के संबंध में दो प्रकार के समूह है।-1 हम लोग जो मौलिक अधिकार को प्राकृतिक अधिकार मानते है और दूसरे वे लोग जो मौलिक अधिकार को संवैधानिक या सामाजिक अधिकार मानते है। साम्यवादियों को छोडकर अन्य सभी हिन्दू या इसाई हमारी विचारधारा के पक्षधर माने जाते है। तो साम्यवादी तथा कुछ मुसलमानों को छोडकर अन्य मुसलमान दूसरी विचारधारा के माने जाते है। दोनो विचारधाराओं के बीच टकराव लम्बे समय से चल रहा है। पहली विचारधारा मानने वाले देशो में लोकतंत्र है तो दूसरी विचारधारा मानने वालों में अधिकांश तानाशाही है। भारत में लोकतंत्र है किन्तु भारत की राजनैतिक व्यवस्था में 70 वर्षो तक दूसरे प्रकार के लोगों का अधिक प्रभाव रहा । अब मोदी के बाद हम लोगों का प्रभाव बढना शुरु हुआ है।

प्रत्येक व्यक्ति का एक ही सामाजिक दायित्व होता है और वह होता है सहजीवन अर्थात स्वयं सहजीवन का पालन करना और दूसरों को सहजीवन की ट्रेनिंग देना। कोई भी व्यक्ति अकेला न होकर परिवार ,गाॅव से लेकर समाज रुपी संगठन का सदस्य होता है। व्यक्ति जब परिवार का सदस्य होता है तब उसके मौलिक अधिकार तब तक निष्क्रिय हो जाते है जब तक वह उस परिवार का सदस्य है। इसका अर्थ हुआ कि परिवार में रहते हुए अपनी पारिवारिक सीमा के अंदर भी कोई व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकता जब तक परिवार की सहमति न हो। इसे हम इस प्रकार भी कह सकते है कि परिवार के प्रत्येक सदस्य के मौलिक अधिकार परिवार रुपी संगठन के पास अमानत के रुप में सुरक्षित रहते हैं जिनका उपयोग वह परिवार छोडने का निर्णय करके ही कर सकता है ,अन्यथा नहीं। यही मान्यता गाॅव राष्ट्र या अन्य संगठनों के साथ भी उसकी होती है। सामान्यतया मौलिक अधिकार व्यक्ति के पास एक सुरक्षा कवच या हैंडब्रेक के समान होते है जो आपातकालीन तथा विशेष परिस्थिति में ही उपयोग किये जा सकते है अन्यथा नहीं। इसका अर्थ हुआ कि मौलिक अधिकार का शायद ही कभी उपयोग करने का आवश्यकता पडती हो अन्यथा वे व्यक्ति के पास निष्क्रिय कवच के रुप में सुरक्षित रहते हैं। जो व्यक्ति बार बार मौलिक अधिकार की दुहाई देता है या उपयोग करता है वह आदमी अच्छा नहीं माना जाता । इसी तरह की विशेष परिस्थिति में व्यक्ति को बलप्रयोग का भी अधिकार प्राप्त है। उसके लिए भी तीन परिस्थितियाॅ आवश्यक हैं- 1 आपके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता हो 2 आपको न्याय प्राप्ति का कोई अन्य मार्ग उपलब्ध न हो 3 उस परिस्थिति से बच निकलने का कोई अन्य तरीका आपके पास न हो। यदि इन तीनों के अतिरिक्त आपने किसी अन्य आधार पर बल प्रयोग किया तो वह आपका अपराध माना जायेगा। दुर्भाग्य से हमारे संविधान निर्माताओं को इस बात का ज्ञान नहीं था कि मौलिक अधिकार की परिभाषा क्या है, इसलिए उन्होने कुछ मौलिक अधिकारों को बाहर कर दिया। तो कुछ अनावश्यक अधिकारों को मौलिक अधिकार में शामिल कर लिया। आज अनेक नासमझ रोजगार, भोजन, शिक्षा , स्वास्थ, मतदान आदि को भी मौलिक अधिकार कहते फिरते हैं तो कुछ लोग धर्म आदि को मौलिक अधिकार में गिनते है। ये सब मौलिक अधिकार नहीं है ये या तो स्वनिर्णय के अन्तर्गत आते है या संवैधानिक अधिकारों के।
सहजीवन व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है । भारत में तीन संगठन ऐसे माने जाते है जो मौलिक अधिकारो को नहीं मानते । वे या तो राज्य को बडा मानते है या धर्म को या राष्ट को। वे तीन साम्यवाद संगठित इस्लाम और संघ परिवार हैं। ये तीनों ही अधिकारों की तो बहुत बात करते है किन्तु कर्तव्यों की नहीं करते। जबकि सहजीवन के लिए सिर्फ कर्तव्य ही कर्तव्य आधार होते है,अधिकार नहीं। साम्यवाद सबसे खतरनाक विचारधारा है और संगठित इस्लाम सबसे अधिक खतरनाक जीवन पद्धति किन्तु धार्मिक इस्लाम नहीं। कोई भी साम्यवादी कभी सहजीवन के सिद्धांत को नहीं मानता। जहाॅ वह अल्पमत में होगा वहाॅ स्वतंत्रता की मांग करेगा और जहाॅ बहुमत में होगा वहाॅ सबकी स्वतंत्रता छीन लेगा। भारत का हर साम्यवादी पग पग पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करता दिखता है किन्तु कोई भी साम्यवादी चीन या रुस र्में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत नहीं करता। साम्यवाद की आंतरिक व्यवस्था में कोई साम्यवादी को प्रत्यक्ष रुप से कितनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है यह सब जानते है। भारत के साम्यवादी लोकसभा अध्यक्ष की दुर्गति भी हमने देखी है। इसी तरह इस्लाम में भी जो लोग संगठित इस्लाम से जुडे हुए है वे भी कभी सहजीवन को स्वीकार नहीं करते। टी बी बहस में ऐसे अनेक दाढी वाले मुल्ला बैठकर अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता की दुहाई देते है किन्तु कभी पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की चर्चा नहीं करते। कभी ये मुल्ले यह नहीं कहते कि इस्लाम में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस सीमा तक है । आजकल कालेजो में यह साम्यवादी और कट्टरपंथी इस्लाम का गठजोड जिस तरह मौलिक अधिकारों की बात कर रहा है इससे ऐसा लगता है कि अब उनके अंत का समय आ गया है। अब भारत का आम नागरिक यह समझ गया है कि इन दोनों को सहजीवन सीखने के लिए मजबूर करना आवश्यक है। यही कारण है कि भारत का आम नागरिक संघ परिवार को एक बुराई समझते हुये भी शत्रु का शत्रु मित्र होता है के समान प्रिय लगने लगा है।
मैं मानता हॅू कि वर्तमान परिस्थितियों में संघ परिवार जो कुछ कर रहा है वह ठीक है। फिर भी मुझे लगता है कि संघ परिवार को शाहरुख खान, आमिर खान, प्रशांत भूषण सरीखे मध्यमार्गियों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। हरमिंदर कौर के कथन का दिया गया उत्तर तो उत्तर दाता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानी जा सकती है किन्तु हरमिंदर कौर का विरोध किसी भी रुप में उचित नही कहा जा सकता । इस घटना ने हरमिंदर कौर के प्रति समाज में सहानुभूति का भाव पैदा किया है। साक्षी महराज भी जब भी बोलते है तो वह भाषा कट्टरपंथी मुसलमानों से ही मेल खाती है किन्तु वर्तमान में उन्होने जनसंख्या नियंत्रण समान नागरिक संहिता अथवा कब्रगाह की भूमि के मामले में जो कुछ कहा वह विचार करने योग्य है। यदि हम भारत की राजनैतिक स्थिति का आकलन करे तो भारत मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में निरंतर आगे बढ रहा है। अब साम्यवादी और कट्टरपंथी मुसलमानों का प्रभाव घट रहा है। देश की राजनीति में नरेन्द्र मोदी, नीतिश कुमार ,अखिलेश यादव प्रमुख राजनैतिक प्रतिद्वंदी के रुप में आगे आ रहे है। अरविंद केजरीवाल समेत अन्य सभी नेता पिछडने की दिशा में है। स्पष्ट है कि मौलिक अधिकारों के मामले में भारत की प्रगति संतोषजनक है। संघ परिवार से भी भविष्य में कोई खतरा नहीं है क्योंकि हिन्दुओं ने भले ही वर्तमान खतरे को टालने के लिए संघ परिवार को ढाल बनाया हो किन्तु खतरा टलते ही आम भारतीय सहजीवन को अपना मार्ग बना लेगा ऐसा विश्वास है । साम्यवाद तो अपनी बुरी स्थिति देखकर कट्टरपंथी इस्लाम के कंधे पर बंदूक रख चुका है। अब इस्लाम को समझना है कि वह मौलिक अधिकारों की धारणा को स्वीकार करता है या अपने समापन का मार्ग प्रशस्त करता है । इसका निर्णय इस्लाम को करना है किसी अन्य को नहीं। या तो इस्लाम अपने कठमुल्लों का साथ छोडकर धार्मिक इस्लाम और सहजीवन की ओर बढेगा और या समाप्त होगा। दुनिया में और विशेष कर भारत में मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए ये संभावनाए और आवश्यकताए स्पष्ट दिखती है।

मंथन क्रमांक 24 का अगला विषय सुख और दुख होगा।

मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।

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विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में विकृति पैदा करती है। महापुरुष ऐसी विकृतियों के समाधान के लिए व्यवस्थाओं में संशोधन का प्रयास करते है तो लोकतांत्रिक देशो के राजनेता ऐेसी विकृतियों का लाभ उठाकर स्वयं को स्थापित करने की कोशिश करते है। समाज में कोई भी दो व्यक्ति एक समान सोच और क्षमता के नहीं होते। स्वाभाविक है कि किन्ही दो व्यक्तियों की नीयत भी एक समान नहीं होती। समाज के ठीक ठीक संचालन के लिए प्रत्येक व्यक्ति की अधिकतम स्वतंत्रता की सुरक्षा आवश्यक होती है। दूसरी ओर समाज के सुचारु संचालन के लिए सहजीवन भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। महापुरुष स्वतंत्रता और सहजीवन के बीच तालमेल की व्यवस्था करते है। तो चालाक लोग ऐसे तालमेल को तोडकर निरंतर वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष की दिशा में ले जाने का प्रयास करते है ।
एक प्राकृतिक अनिवार्यता है कि महिला और पुरुष की अपनी अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण रखते हुए भी दोनो के बीच एकत्रीकरण दोनो की अनिवार्य आवश्यकता है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि दोनो का एकत्रीकरण भिन्न परिवारों से होना चाहिए। इस तरह परिवार व्यवस्था हमारी अनिवार्यता है और परिवार किसी व्यवस्था के हिसाब से ही चलना चहिये। चालाक लोग महिला और पुरुष को दो वर्गो में विभाजित करके निरंतर टकराव का तानाबाना बुनते रहते है । ये कभी दोनों के बीच सामंजस्य का प्रयास नहीं करते बल्कि इनका हर प्रयास इन दोनो के बीच टकराव बढाने वाला होता हैं । पुराने जमाने में महिला और पुरुष के बीच अधिकारों की कोई छीनाझपटी नहीं थी। दोनों के अधिकारों का योग समान था। परिवार के सदस्य मिलकर कार्य विभाजन कर लेते थे जिसमें बाहर का काम पुरुष तथा घर का काम महिला के जिम्मे आमतौर पर होता था। धीरे धीरे पारिवारिक सहमति हटकर यह व्यवस्था रुढ हो गई और इस विकृति का चालाक लोगों ने लाभ उठाकर महिला सशक्तिकरण का एक घातक अभियान छेड दिया।
ये चालाक राजनेता दो भागों में बट गये। एक पुरानी परिवार व्यवस्था को उसी तरह बनाये रखने का पक्षधर हो गया तो दूसरा उस व्यवस्था को पूरी तरह बदलने का पक्षधर। इन लोगों ने सात आधारो पर समाज को तो पूरी तरह तोडकर छिन्न भिन्न कर दिया था किन्तु परिवार व्यवस्था अब तक नहीं तोडी जा सकी थी। महिला सशक्तिकरण का नारा अब सफलतापूर्वक उस कार्य को कर रहा है। मैं आज तक नहीं समझ सका कि महिला किससे सशक्त होना चाहती है पति से , पिता से , भाई से या अन्य किससे? वह परिवार से सशक्त होना चाहती है या समाज से। महिलाओं को यह स्पष्ट करना चाहिये कि उन्हें समान अधिकार चाहिये या विशेष अधिकार। आज तक किसी महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाली महिला ने इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया। यदि सशक्त होना है तो महिला या पुरुष को होना चाहिए या परिवार व्यवस्था को समाज व्यवस्था को। मैं मानता हॅू कि पुरुष प्रधान व्यवस्था को परिवार की सहमति से हटकर रुढ हो जाने से कुछ विकृतियाॅ आयी है किन्तु महिला सशक्तिकरण उसका किसी भी रुप में कोई समाधान न होकर बल्कि एक बडी परिवार तोडक, समाज तोडक समस्या के रुप में विस्तार पा रही है। महिला और पुरुष परिवार में आपस में बैठकर अपने निर्णय करें। इसमें किसी अन्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये किन्तु कुछ आधुनिक महिलाये किसी परिवार रुपी खुंटे से बंधकर नहीं रहना चाहती। उन्हें पूरी आजादी चाहिए भले ही उसके दुष्परिणाम कुछ भी क्यों न हो। ऐसी महिलाओं को यदि अपनी स्वतंत्रता में सुख मिलता है तो हमें इससे कोई आपत्ति नहीं। वे अपनी नाक कटाने में भगवान का दर्शन करने को स्वतंत्र हैं किन्तु उन्हें कोई अधिकार नहीं कि वे अन्य परिवारों की महिलाओं में यह विकृत भावना विकसित करें। मैं तो देख रहा हॅू कि आज देश के राजनेता पूरी ताकत से महिला सशक्तिकरण जैसे घातक नारे के विस्तार में लगे हुये है। इन्हे एक ओर तो महिलाओं को सशक्त देखने का प्रयास भी करना पडता है तो दूसरी ओर महिलाओं की घटती हुई संख्या के कारण पुरुषों के समझ होने वाली कठिनाइयों की भी चिंता बनी रहती है। मैं आज तक नहीं समझा कि महिलाओें की संख्या भी बढे और महिलाओं की शक्ति भी बढे ये दोनों कार्य एक साथ कैसे संभव है। यदि महिलाओं की मांग बढेगी तो उनकी शक्ति अपने आप बढेगी और यदि महिलाओं की आवश्यकता कम होगी तो शक्ति पर बुरा प्रभाव पडेगा किन्तु राजनेताओं को इस बात की कोई चिंता नहीं।
हमारे संत गुरु भी परम्परागत परिवार व्यवस्था में कोई संशोधन न करके महिला सशक्तिकरण का घातक समर्थन कर रहे है। स्पष्ट है कि परिवार में महिलाओं को सम्पत्ति तथा परिवार संचालन में समानता का अधिकार मिलना चाहिए जो अभी एकपक्षीय रुप से पुरुषों के पक्ष में है। हमारे संत लोग कोई ऐसे प्रयास नहीं कर रहे है कि परिवार में सम्पत्ति और परिवार संचालन में महिला पुरुष का कोई भेद भाव न रहे अर्थात कानूनी और सामाजिक आधार पर सम्पत्ति और परिवार संचालन में सब समान हो। हमारे नासमझ संत हमारे धूर्त राजनेताओं के चक्कर में फंसकर महिला सशक्तिकरण का घातक नारा लगाने में सहयोग करने लगे है, जो ठीक नहीं। परिवार व्यवस्था लोकतांत्रिक हो इसमें हमारे संत महात्माओं को बुराई दिखती है। तो दूसरी ओर महिला सशक्तिकरण जैसी घातक बीमारी में उन्हें कोई बुराई नहीं दिखती । यहाॅ तक कि अनेक संतगुरु तो अन्य सामाजिक कार्य छोडकर बेटी बचाओं जैसे नारे के प्रचार में ही लग गये है।
किसी भी व्यक्ति को यदि विशेष शक्ति दी जाती है तो उसके दुरुपयोग की संभावना भी बनी रहती है और उस पर नियंत्रण के लिए भी विशेष प्रयास करने पडते है किन्तु यदि किसी वर्ग को विशेष अधिकार दिये जाये तो उस वर्ग के धूर्त लोग समाज के अन्य शरीफ लोगों का भरपूर शोषण करते है। परिणामस्वरुप धूर्तो की शक्ति मजबूत होती जाती है। आज यदि भारत में धुर्तता अधिक शक्तिशाली हो रही है तो उसका एक मात्र कारण है विभिन्न वर्गो को विशेष अधिकार दिया जाना। महिला सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं को विशेष अधिकार दिया जाना भी धूर्त महिलाओं द्वारा शरीफ पुरुषों के शोषण का हथियार बनना निष्चित है बल्कि आमतौर पर देखा जा रहा है कि मुट्ठी भर धूर्त महिलाए शरीफ परिवारों की महिलाओं तक का शोषण करती है। सास और बहू में जो जितनी अधिक धूर्त होगी वह उतनी ही अधिक शरीफ महिला का शोषण करेगी क्योंकि भारत का महिला सशक्तिकरण का नारा धूर्त महिलाओं के लिए एक हथियार का काम करता है। धुर्तो का सशक्तिकरण हमेशा अन्यायपूर्ण होता है और इसलिए किसी वर्ग को कभी भी विशेषधिकार नहीं देना चाहिए।
आज भारत में संवैधानिक रुप से सबको समान अधिकार प्राप्त है। उस अधिकार में किसी भी रुप में छेडछाड करना उचित नहीं किन्तु स्वार्थी तत्व महिला सशक्तिकरण के नाम पर निरंतर ऐसी छेडछाड में व्यस्त हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम महिला सशक्तिकरण के घातक नारे के विरुद्ध जनमत जागृत करें। जो पुरुष अन्जाने में भ्रमवश इस नारे का समर्थन कर रहे है उन्हें हम वास्तविकता समझाने का प्रयास करें। जो लोग वर्तमान सामाजिक विकृति में किसी प्रकार के किसी संशोधन के विरुद्ध है उन्हें भी हम सहमत करें कि वे महिला पुरुष के बीच भेदभाव को न चलने दें। हम सरकार को भी तैयार करें कि वह महिला सशक्तिकरण जैसे घातक प्रयास को छोड दें किन्तु सबसे अधिक सतर्कता उन महिलाओं से आवश्यक है जो अपनी नाक कटने में भगवान का दर्शन होने का घातक विचार समाज में फैला रही है। इन महिलाओं के पास न तो कुछ अन्य लिखने को है,न बोलने को। ये परम स्वतंत्र है। इन्हें न परिवार चलाना है न समाज चलाना है। या तो ऐसी मुट्ठी भर महिलाये अपने शारीरिक या भौतिक सुख के लिए ऐसा दुष्प्रचार करती है या ये किसी विदेशी एजेंट के रुप में विदेशी धन लेकर यह महिला सशक्तिकरण का नारा प्रचारित करती है। हमें इस मामले में सतर्कता बरतनी चाहिए कि हमारे परिवारों की महिलाओं के बीच इस घातक दुष्प्रचार के विषाणू पैदा न हो पावे। ऐसी मुट्ठी भर पेशेवर महिलाओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। बल्कि मैं तो यहाॅ तक सोचता हॅू कि इस प्रकार की विचारधारा युक्त महिलाओं का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए। किसी परिवार के सदस्य अपने आंतरिक जीवन में मिल बैठकर अपना निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हों यहाॅ तक उचित है किन्तु उनके आंतरिक मामलों में टकराव पैदा करने का प्रयास बहुत अधिक घातक होगा। यह भी एक सच्चाई है । परिवार व्यवस्था स्त्री और पुरुष के बीच मिलकर तीन पैर की दौड के समान है जिसमें दोनों को मिलकर उसके तरीके खोजने है । बाहर के लोगों की सलाह या कानूनी हस्तक्षेप उस प्रतिस्पर्धा में हमेशा नुकसान दायक होगा। इस दौड में पुरुष को मजबूत होना चाहिए या महिला को यह वे दोनों मिलकर तय करेंगे अथवा वे बाहर के लोग जो स्वयं इस दौड में प्रतिस्पर्धी है। दुर्भाग्य से बाहर के लोग परिवार व्यवस्था में हस्तक्षेप करने में सफल हो रहे है जिसमें सरकार और ऐसे चालाक लोगों के बीच एक तालमेल दिख रहा है। हमारे लिए उचित है कि हम महिला सशक्तिकरण के प्रयास के नाम पर हो रही किसी भी ऐसी योजना को विफल करने में भरपूर सहयोग करें। इस निमित्त हमें चार काम करने चाहिये-1 पारंपरिक परिवार व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था को प्रोत्साहित करें। 2 पुरुषों को इस बात के लिए तैयार करे कि महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार करने की आदत डाले। 3 महिलाओं को इस बात के लिए तैयार करे कि उनके साथ किसी तरह का कोई अन्याय नहीं हो रहा है बल्कि अन्याय का प्रचार करके सहजीवन और परिवार व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुॅचायी जा रही है। 4 महिलाओं को यह भी आभाष कराया जाये कि यदि पति पत्नी के बीच अविश्वाश की दीवार खडी होगी तो वह महिलाओं के लिए भी हानिकारक होगी। क्योंकि महिला और पुरुष एक दूसरे के पूरक है। यदि अविश्वाश होगा तो संतानउत्पत्ति में भी कठिनाई होगी और उनके लालन पालन संस्कार में भी। यदि हम ये चार बातें समझाने में सफल हो जाये तो महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाले स्वार्थी तत्व अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पायेंगे। मंथन क्रमांक 23 का अगला विषय ‘हमारे मौलिक अधिकार’ होगा।

मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि

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व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।
जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बुद्धिप्रधान कार्यों से होती है उसे बुद्धिजीवी तथा जिसकी धन के माध्यम से होती है उसे पॅूजीपति माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास श्रम भी होता है,बुद्धि भी होती है तथा धन भी होता है। किन्तु किसी व्यक्ति में एक से अधिक गुण प्रधान नहीं होते। प्रधान तो एक ही होता है अन्य तो सहायक होते हैं। कोई भी व्यक्ति किसी भी समय श्रम,बुद्धि या धन की प्रधानता को अपनी क्षमता के अनुसार कभी भी बदल लेता है। श्रमजीवी भी कभी पॅूजीपति बन जाता है तो पॅूजीपति भी कभी श्रमजीवी। पॅूजीपति या बुद्धिजीवी कभी गरीब नहीं हो सकता। आमतौर पर श्रमजीवी ही तथा कुछ मात्रा में अधिक अच्छे बुद्धिजीवी जिन्हें प्राचीन समय में ब्राम्हण कहा जाता था वे गरीब होते है अन्यथा अन्य कोई भी बुद्धिजीवी कभी गरीब नहीं हो सकता क्योंकि श्रमजीवी के पास श्रम के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। जबकि बुद्धिजीवी और पॅूजीपति के पास एक से अधिक विकल्प हमेशा मौजूद रहते हैं। श्रमजीवी की अधिकतम आय 10000 रु मासिक से अधिक नहीं हो सकती किन्तु बुद्धिजीवी की अधिकतम आय लाखों रुपये मासिक तक हो सकती है और पॅूजीपति की अधिकतम आय करोडों रु मासिक तक हो सकती है। सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार भारत में करीब 20 करोड ऐसे लोग मौजूद हैं जिनकी मासिक आय प्रतिव्यक्ति 1000 और पांच व्यक्तियो के परिवार की 5000 से भी कम हैं। सरकार के अनुसार ऐसे व्यक्तियों की प्रतिव्यक्ति दैनिक आय 32 रु और दैनिक श्रममूल्य 160 रु के आसपास है। प्राचीन समय में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालो को भिक्षा मांगने का विकल्प भी दिया गया था। इनमें गरीब,श्रमजीवी तथा गरीब ब्राम्हण शामिल थे बाद में इसमें विकृति आ गई।
श्रमशोषण कब से शुरु हुआ इसका इतिहास मुझे नहीं मालूम। इतना अवश्य पता है कि बहुत प्राचीन समय में समाज में श्रमशोषण नहीं था। योग्यतानुसार परीक्षा के बाद वर्ण का निर्धारण होता था। कालांतर में धीरे-धीरे विकृति आयी और बुद्धिजीवियों ने श्रमशोषण प्रारंभ कर दिया अर्थात जन्म से ही वर्ण का निर्धारण होने लगा। ब्राम्हण का लडका ब्राम्हण और श्रमिक का लडका श्रमिक रहने के लिए और जीवन भर रहने के लिए अधिकृत और बाध्य कर दिया गया। यही है श्रमशोषण का इतिहास । योग्यता रहते हुए भी कोई व्यक्ति अपने वर्णो से बाहर नहीं जा सकता था। इस तरह की विकृति के परिणाम स्वरुप भारत लम्बे समय तक गुलाम भी रहा किन्तु उसने इस विकृति से छुटकारा नहीं किया। इस प्रकार का बौद्धिक आरक्षण ही भारत की गुलामी का मुख्य कारण था। स्वामी दयानंद तथा गाॅधी ने इस समस्या को दूर करने का प्रयत्न किया किन्तु भीमराव अम्बेडकर ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण सब गुड गोबर कर दिया।
स्वतंत्रता के बाद भी बुद्धिजीवियों ने अपना षडयंत्र जारी रखा। स्वतंत्रता के पूर्व समाज में सामाजिक आरक्षण था कानूनी नहीं किन्तु स्वतंत्रता के बाद बुद्धिजीवियों ने ऐसे आरक्षण को कानूनी जामा भी पहना दिया । अंतर यह हुआ कि स्वतंत्रता के पूर्व शतप्रतिषत आरक्षण सवर्ण बुद्धिजीवियों का था तो स्वतंत्रता के बाद अम्बेडकर ,नेहरु का समर्थन पाकर उस शतप्रतिशत आरक्षण में से 20-25 प्रतिषत आरक्षण अवर्ण बुद्धिजीवियों ने भी लेकर श्रमशोषण के अपवित्र कार्य में हिस्सेदार बना लिया। यह लूट के माल में हिस्सेदारी बकायदा कानून बनाकर हुई और आज भी जारी है। भारत के आदिवासियों और हरिजनों की कुल आबादी में स्वतंत्रता के समय भी 90 प्रतिषत श्रमजीवी थे और आज भी 90 प्रतिषत ही हैं। शेष 10 प्रतिषत आदिवासी हरिजन बुद्धिजीवियों ने अपने श्रमजीवी भाईयों के शोषण में हिस्सेदारी लेकर सवर्ण बुद्धिजीवियों के साथ समझौता कर लिया। आज भी आप देखेंगे कि आरक्षण की लडाई में सवर्ण बुद्धिजीवी और अवर्ण बुद्धिजीवी ही आपस में टकराते रहते है किन्तु दोनों में से कोई भी समूह 90 प्रतिषत श्रमजीवियों की चिंता नहीं करता। आज भी आप देखेंगे कि भारत का हर बुद्धिजीवी चाहे वह सवर्ण हो या अवर्ण पूरी ईमानदारी से भीमराव अम्बेडकर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है क्योंकि डाॅ अम्बेडकर ने ही उन्हें मिलकर श्रमशोषण का कानूनी लाइसेंस प्रदान कराया है।
भारत में लोकतांत्रिक तरीके से सफलतापूर्वक श्रमशोषण के लिए चार माध्यम अपनाये जाते है – (1) आरक्षण (2) कृृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण (3) शिक्षित बेरोजगारी (4) श्रममूल्य वृद्धि। सबसे बडा आश्चर्य है कि इन चार आधारों पर बुद्धिजीवी श्रम का शोषण भी करते है तथा इन्हें श्रम समस्याओं का समाधान भी बताते हैं। इस कार्य में सबसे ज्यादा भूमिका वामपंथियों की रही है। वामपंथी पूरी ताकत से चारों आधारों पर सक्रिय रहते हैं किन्तु अब तो धीरे धीरे सभी बुद्धिजीवियों को श्रमशोषण में मजा आने लगा है और भारत का हर बुद्धिजीवी और पॅूजीपति इन चारों सिद्धांतो को विस्तार देने में लगा रहता है। आरक्षण की चर्चा तो हम उपर कर चुके है। कृत्रिम उर्जा मूल्य नियंत्रण भी आज लगातार जारी है। स्पष्ट है कि कृत्रिम उर्जा श्रम की प्रतिस्पर्धा मानी जाती है और श्रम की मांग तथा मूल्यवृद्धि में बाधक होती है किन्तु भारत में कृत्रिम उर्जा का मूल्य सिर्फ इसलिए नहीं बढने दिया जाता क्योकि उससे श्रम का मूल्य और मांग बढ जायेगी। कृत्रिम उर्जा सस्ती हो यह बहुत बडा षडयंत्र है, श्रम का शोषण करने का यह पूॅजीवादी मंत्र है।
दुनिया जानती है कि शिक्षित व्यक्ति कभी बेरोजगार नहीं हो सकता भले ही वह उचित रोजगार की प्रतिक्षा में बेरोजगार बने रहने का नाटक ही क्यों न करें किन्तु हमारे बुद्धिजीवियों ने बेरोजगारी की एक नकली परिभाषा बनाकर उस परिभाषा के आधार पर शिक्षित लोगों को भी बेरोजगार घोषित करना शुरु कर दिया। आज तक इस परिभाषा में कोई संशोधन नहीं किया जा रहा है। कितने दुख की बात है कि श्रमजीवियों द्वारा उत्पादित कृषि उपज वन उपज पर भारी टैक्स लगाकर शिक्षा पर भारी खर्च किया जा रहा है । बेशर्म बुद्धिजीवी आज भी शिक्षा का बजट बढाने की अन्यायपूर्ण मांग करते देखे जाते है किन्तु कोई नहीं कहता कि गरीब ग्रामीण श्रमजीवी द्वारा उत्पादन और उपभोग की वस्तुओं पर टैक्स लगाकर शिक्षा पर व्यय करना अन्याय है। भारत का हर संगठन यह मांग करता है कि श्रम का मूल्य बढाया जाये। एक सीधा सा सिद्धांत है कि किसी वस्तु का मूल्य बढता है तो मांग घटती है और मांग घटती है तो मूल्य घटता है। स्पष्ट है कि भारत में दो प्रकार के श्रम मूल्य चल रहे है- (1) मांग के आधार पर (2) घोषणा के आधार पर । ज्यों ही सरकार श्रम मूल्य बढाती है त्यों ही श्रम की मांग घटकर मशीनों की ओर बढ जाती है और श्रम के बाजार मूल्य तथा कृत्रिम मूल्य के बीच दूरी बढ जाती है। आज भी यह दूरी निरंतर बनी हुई है और इसे घटाने का प्रयास न करके बढाने का प्रयास हो रहा है।
इसके पक्ष में तर्क दिया जाता है कि दुनिया के अनेक विकसित देश इस आधार पर प्रगति कर रहे हैं किन्तु हम यह भूल जाते है कि वे विकसित देश श्रम अभाव देश है और भारत श्रम बहुल देश । यदि हम साम्यवादी देशो की नकल कर रहे हैं तो हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि साम्यवाद में व्यक्ति राष्ट्रीय सम्पत्ति माना जाता है और भारत में स्वतंत्र जीव। साम्यवाद में व्यक्ति को मूल अधिकार नहीं होते और भारत में ऐसे अधिकार होते हैं। इसलिए साम्यवाद या पश्चिम के देशो की नकल करते हुये यदि भारत में श्रमशोषण को न्याय संगत ठहराया जाता है तो यह अमानवीय है और चाहे सारी दुनिया ऐेसे श्रमशोषण के विरुद्ध भले ही आवाज न उठावे किन्तु मैं तो ऐसे अमानवीय कृत्य के विरुद्ध आवाज उठाउॅगा। श्रम के विरुद्ध बुद्धिजीवियों का इतना बडा षडयंत्र होते हुए भी यदि चुप रहा जाये तो मेरी दृष्टि में यह पाप है। आज भारत में यदि नक्सलवाद दिख रहा है तो उसके अनेक कारणों में यह कारण भी एक है । नक्सलवादियों को यह बहाना मिला हुआ है। आप विचार करिये कि बुद्धिजीवियों द्वारा इस तरह श्रमजीवियों के साथ लोकतांत्रिक षडयंत्र होता रहे और हम चुपचाप देखते रहे यह कैसे उचित और संभव है । 20 वर्ष पहले तो मुझे कभी कभी ऐसा लगता था कि मैं भी बंदुक उठाकर नक्सलवादियों के साथ हो जाऊ किन्तु अग्रवाल परिवार में जन्म लेने के कारण संस्कार मुझे रोक देते थे। फिर भी मैं अपनी आवाज उठाने से चुप नहीं रह सकता।
श्रमशोषण से मुक्ति के कुछ उपाय किये जा सकते हे -(1) परिवार व्यवस्था को सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था में कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए। गरीब या बेरोजगार व्यक्ति नहीं परिवार माना जाना चाहिये। (2) गरीब ग्रामीण श्रमजीवी के सभी प्रकार के उत्पादन और उपभोग की वस्तुओं को कर मुक्त करके सारा टैक्स कृत्रिम उर्जा पर लगा देना चाहिये। (3) शिक्षा पर होने वाला सारा बजट शिक्षा प्राप्त कर रहे या कर चुके लोगों से पूरा किया जाना चाहिये। (4) सरकार जो भी श्रममूल्य घोषित करे उस श्रममूल्य पर किसी भी बेरोजगार को रोजगार देने की सरकारी बाध्यता होनी चाहिये।
मैं समझता हॅू कि अभी यदि इतने भी उपाय कर लिये जाये तो श्रम , बुद्धि और धन के बीच बढती हुई अन्यायपूर्ण दूरी कम हो सकती हैं। और भी अन्य उपाय हो सकते है किन्तु श्रमषोषण में सक्रिय चार व्यवस्थाओं पर तत्काल रोक लगनी चाहिये। यदि श्रम के साथ न्याय नहीं हुआ तो यह कभी भी समाज में शांति नहीं स्थापित होने देगा। बंदूके कुछ समय के लिये आवाज को रोक सकती है किन्तु सदा के लिए नहीं रोक सकती। मैं समझता हॅू कि इस विषय पर गंभीरता से विचार मंथन का प्रयास होगा।मंथन क्रमांक 22 का अगला विषय ‘महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान’ होगा?

मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि

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दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।
2 रावण को राम कितना भी मारते थे किन्तु वह मरता नहीं था क्योंकि उसकी नाभि में अमृतकुंड था। विभीषण ने राम को बताया और जब नाभि पर आक्रमण हुआ तब रावण मरा।
हम भारत की वर्तमान राजनैतिक और सामाजिक स्थिति का आकलन करे तो भौतिक उन्नति तेज गति से हो रही है । जीवन स्तर सबका सुधर रहा है। नैतिक पतन भी बहुत तेजी से हो रहा है। ग्यारह समस्याएॅ लगातार बहुत तेजी से बढ रही है-1 चोरी, डकैती,लूट 2 बलात्कार 3 मिलावट कमतौलना 4 जालसाजी, धोखाधडी 5 बल प्रयोग, हिंसा ,आतंकवाद 6 भ्रष्टाचार 7 चरित्रपतन 8 साम्प्रदायिकता 9 जातीय कटुता 10 आर्थिक असमानता 11 श्रम शोषण। स्वतंत्रता के बाद ये सभी ग्यारह समस्याएॅ लगातार बढ रही है और भविष्य में भी किसी के समाधान के कोई लक्षण नहीं दिखते। इनमें से पहली 5 समस्याएॅ तंत्र की निष्क्रियता के कारण बढी हैं तो अंतिम छः तंत्र की अतिसक्रियता के कारण बढी हैं।
तंत्र हमेशा लोक को गुलाम बनाकर रखना चाहता है और लोकतंत्र में लोक ही मतदाता होता है। इसलिए तंत्र मतदाताओं को 10 प्रकार के नाटको के माध्यम से उलझाकर भ्रम में रखता है।
1 समाज में आठ आधारों पर वर्ग विभाजन करके वर्ग विद्वेश फैलाना और उसे वर्ग संघर्ष तक ले जाना
2 समस्याओं का ऐसा समाधान खोजना कि उस समाधान से ही एक नई समस्या पैदा होती हो
.3 समस्या की प्रवृत्ति के विपरीत समाधान की प्रकृति
4 राष्ट्र शब्द को ऊपर उठाकर समाज शब्द को नीचे गिराना
5 वैचारिक मुद्दों पर बहस को पीछे करके भावनात्मक मुद्दों को आगे लाना
6 समाज को शासक और शासित में बांटकर दोनों के मनोबल में फर्क करने का संगठित प्रयास
7 समाज द्वारा स्वयं को अपराधी मानने की भावना का विकास
8 शासन की भूमिका बिल्लियों के बीच बंदर के समान
9 आर्थिक असमानता वृद्धि का प्रजातांत्रिक स्वरूप
10 प्राथमिकताओं के क्रम में सुरक्षा और न्याय की अपेक्षा जन कल्याणकारी कार्यो का उच्च स्थान रखना

तंत्र से जुडी तीनों इकाईयाॅ इन दस प्रकार के नाटको में ईमानदारी से एक जुट होकर लगी रहती हैं। भले ही अन्य मामलों में वे आपस में क्यों न निरंतर टकराती रहें। समाज को तोडकर रखने के लिए वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष का सहारा लिया जाता है उसके लिए 8 आधार निश्चित हैं-1 धर्म 2 जाति 3 भाषा 4 क्षेत्रियता 5 उम्र 6 लिंग 7 गरीब अमीर 8 किसान मजदूर। सभी राजनैतिक दल निरंतर आठों आधारों पर लगातार सक्रिय रहते हैं। सात आधारों पर तो समाज को तोडा जाता है और लिंग भेद का आधार परिवार को भी पूरी तरह तोड रहा है। कोई उत्तर नहीं देता कि यदि सारे देश में मुसलमान और इसाई शून्य हो जावें तो ग्यारह में से दस समस्याओं पर धार्मिक एकीकरण का क्या प्रभाव होगा। कोई गरीबी अमीरी रेखा के नाम पर समाज को तोड रहा है किन्तु कभी यह उत्तर नहीं मिला कि ऐसा होने से आर्थिक असमानता को छोडकर बाकी 10 समस्याओं पर क्या प्रभाव पडेगा।
देशभर में इन समस्याओं के समाधान के लिए आन्दोलन भी बहुत होते रहे हैं। अनेक आन्दोलनों में देश की करोडो अरबों की सम्पत्ति बरबाद हो जाती है। बडी संख्या में लोग अपनी जान तक दे रहे हैं किन्तु समस्याएॅ घटने की अपेक्षा बढती ही जा रही हैं। समाज में जो भी आन्दोलन या टकराव हो रहे है वे भौतिक सुविधाओं के नाम पर हो रहे हैं। आज तक एक भी ऐसा आन्दोलन नहीं चल रहा है जो लोक और तंत्र के बीच गुलाम और मालिक सरीखी दूरी को कम करने के लिए हो। सुविधा और स्वतंत्रता में से स्वतंत्रता की बात करने वाले कोई नहीं दिखते। सब सुविधाओं की बात करते है । आज इसी का परिणाम है कि लोक और तंत्र के बीच मालिक और गुलाम सरीखे संबंध बन गये हैं। तंत्र ने वोट देने का अधिकार देकर बाकी सारे अधिकार अपने पास समेट लिये है। लोक भिखारी और तंत्र दाता बन गया है।
तंत्र ने बहुत चालाकी से संविधान को एक तरफ अपनी ढाल बनाया है तो दूसरी तरफ अपनी मुटठी में कैद रखा है। एक तरफ संविधान को भगवान सरीखे प्रचारित किया जाता है। तो दूसरी ओर जब चाहे तभी तंत्र बिना लोक से पूछे संविधान में मनमाना संषोधन कर देता है और वह संशोधन लोक की इच्छा के रुप में प्रचारित कर दिया जाता है। इसका अर्थ हुआ कि संविधान तंत्र को हमेशाअघोषित सुरक्षा देता है दूसरी ओर तंत्र संविधान का मनमाना दूरुपयोग भी करता रहता है। स्पष्ट है कि भारत में संविधान का शासन है और संविधान पर तंत्र का एकाधिकार है। इसलिए जब तक संविधान तंत्र के एकाधिकार से मुक्त नहीं होता तब तक समस्याओं के समाधान की शुरुवात नहीं हो सकती। तंत्र ने लोक को व्यवस्था में भी सहयोगी माना है और संविधान निमार्ण में भी। इस सहयोग की भावना को सहभागी की दिशा में बदलने की आवश्यकता है अर्थात संविधान संशोधन में लोक और तंत्र एक दूसरे के सहभागी हो । यह स्थिति नहीं होना ही समस्याओं के समाधान की सबसे बडी बाधा है और इस बाधा को दूर किये बिना न रावण रुपी तंत्र पर अंकुश लग सकता है न ही राक्षस रुपी तंत्र पर अंकुश लग सकता है न ही राक्षस को पराजित किया जा सकता है।
इस दिशा में सम्पूर्ण भारत में एक ऐसा अभिनव प्रयास हो रहा है जिसे हम ग्राम संसद अभियान के नाम से कह सकते हैं । इस अभियान के अन्तर्गत पूरे देश के करीब दस लाख गावों और वार्डो को ग्राम संसद का नाम और स्वरुप दिलाये जाने की योजना है। ये ग्राम संसदे मिलकर 543 सदस्यों का चुनाव करेंगी जो निर्दलीय आधार पर चुने जायेंगे। इसे संविधान सभा कहा जायेगा। संविधान सभा वर्तमान संविधान की पूरी समीक्षा करके संशोधन के प्रस्ताव तैयार करेगी तथा वर्तमान संसद को विचारार्थ देगी। यदि किसी सुझाव पर संविधान सभा और वर्तमान संसद अंतिम रुप से असहमत होंगे तो दस लाख ग्राम संसदे उस सुझाव पर अंतिम निर्णय देंगी। मेरे विचार से यह एकमात्र प्रयास है जिस पर सब लोगों को लगना चाहिए। ग्राम संसद अभियान को देश भर में जनजागरण के रुप में फैलाने का दायित्व व्यवस्थापक समूह कर रहा है। एक वर्ष में अब तक 400 जिलो में शुरुवात हो चुकी है। अन्य जिलों में भी प्र्रगति जारी है। आगामी 17 से 19 मार्च 2017 को कम्युनिटी सेंटर, पार्क प्लाजा होटल के पीछे सेक्टर-55, नोएडा उत्तर प्रदेश
में तीन दिनों का एक राष्ट्रीय विचार मंथन सम्मेलन आयोजित है। इस सम्मेलन में आगे की योजना बनेगी। प्रस्ताव है कि यह अभियान सिर्फ जागरण तक ही सीमित होगा। किसी आन्दोलन की दिशा में नहीं जायेगा। किसी भी परिस्थिति में कोई कानून नहीं तोडा जायेगा। एक या डेढ वर्ष के बाद जंतर मंतर पर 10 दिवसीय जनसंदेश कार्यक्रम रखने की भी योजना बनेगी। जंतर मंतर के कार्यक्रम के पूर्व यह अंतिम सम्मेलन है इसलिए काफी गहन विचार विमर्ष की तैयारी है। यह कार्यक्रम किसी संगठन का नहीं होकर जनजागरण का है। इसलिए इसमें शामिल होने के लिए सब लोग स्वतंत्र हैं और आयोजको के अनुसार देश भर के तीन चार सौ लोग इसमें शामिल हो सकते है।
जहाॅ तक मेरी जानकारी है उसके अनुसार यह एकमात्र प्रयास है जो सही दिशा में सही तरीके से आगे बढ रहा है। यह प्रयास सरकार के खिलाफ नहीं है। संविधान के खिलाफ भी नहीं है बल्कि लोक और तंत्र के बीच मालिक और गुलाम के समान असीमित दूरी को घटाने की दिशा में प्रयास है। सारे देश में व्यवस्था परिवर्तन अभियान के नाम से अनेक संगठन कार्य कर रहे है मैने स्वयं सबको समझा। मैं आश्वस्त हैू कि व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में सक्रिय अन्य सभी संगठन व्यवस्था में सुधार तक सीमित है। उन्हें व्यवस्था परिवर्तन का वास्तविक अर्थ ही नहीं मालूम। लोक और तंत्र के बीच तंत्र से सुविधाये लेना व्यवस्था परिवर्तन नहीं है बल्कि व्यवस्था परिवर्तन तो यह है कि वर्तमान लोक और तंत्र के बीच अधिकारों की असीम असमानता समानता तक आवे। मैं स्वयं त्रिदिवसीय इस कार्यक्रम में रहॅूगा। मैं चाहता हॅू कि हमारे अन्य पाठक या विद्वान भी अन्य साथियों सहित कार्यक्रम में आवे और हम आप सब मिलकर ग्राम संसद अभियान की इस योजना को अपने सुझाव मार्गदर्शन या सहयोग पर विचार करें।

मंथन क्रमांक 21 का अगला विषय श्रमशोषण होगा।

मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि

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साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्षों को आधार बनाता है मंथन का अभाव होता है, हृदय ग्राह्य है, कला प्रधान होता है। विचार घी है तो साहित्य मट्ठा, विचार लंगड़ा है तो साहित्य अँधा, बिना साहित्य के विचार की स्थिति एक वस्त्रहीन नारी के समान है और बिना विचार के साहित्य वस्त्रालंकृत मट्टी की मूर्ति। दोनों का प्रभाव एक साथ जोड़कर ही हो सकता है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो विचार और साहित्य किसी एक ही व्यक्ति में पूरा नहीं पाया जाता। किसी भी व्यक्ति में साहित्य या विचार में से कोई एक अधिक होता है तो दूसरा कम। विचारकों द्वारा गंभीर विचार मंथन के बाद निकाले हुए निष्कर्ष को समाज तक पहुंचाने का दायित्व साहित्यकार का है। इस तरह विचार फल का बीज है और साहित्य पेड़। साहित्य अपने परिणाम समाज में इस प्रकार देता है कि वह परिणाम अंत में विचार तक पहुंच जाये। न तो साहित्य के अभाव में विचारक का विचार समाज तक पहुँच पाता है न ही विचारों के अभावों में साहित्य अंत में समाज में विचार का स्वरुप ग्रहण कर पाता है। साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है। यदि साहित्य में कोई विकृति दिखती है तो वह समाज की विकृति है, साहित्य की नहीं क्योंकि साहित्य तो समाज का दर्पण होता है। जो समाज के चेहरे को स्पष्ट मात्र करता है। दूसरी ओर ऐसा भी माना जाता है कि साहित्य ही समाज के स्वरुप का निर्माण करता है। साहित्य वह कारीगर है जो समाजरुपी मूर्ति को निरंतर काट-छांटकर उसे समझने योग्य स्वरुप देने में लगा रहता है। इन दोनों ही सिद्धान्तों की मान्यता है भले ही इनके अर्थ भिन्न-भिन्न ही क्यों न हों।
साहित्य पर विचारों का भी बहुत प्रभाव पड़ता है तथा सामाजिक मान्यताओं का भी। साहित्यकार कभी-कभी महत्वपूर्ण विचारों से प्रभावित होकर साहित्य की रचना करता है तो कभी-कभी सामाजिक मान्यताओं से प्रभावित होकर भले ही ऐसी मान्यताएं या ऐसे विचार विकार ग्रस्त ही क्यों न हों। वर्तमान समय में भारत में सभी सामाजिक इकाईयों का अथःपतन हुआ है। साहित्य भी इस अध:पतन से अछूता नही है। साहित्य में भी वैसी ही गिरावट आयी है। आदर्श स्थिति वह होती है जब विचारक और साहित्यकार दोनों ही स्वतंत्र हों, बीच की स्थिति वह होती है जब विचारक और साहित्यकार दोनों स्वेच्छा से किसी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हो जावें, और सबसे बुरी स्थिति वह होती है जब विचारधाराएं अपने-अपने स्वार्थ के आधार पर विचारक और साहित्यकार तैयार करने लगे तथा ऐसे साहित्यकार चारण या भाट के रूप में उन विचारधाराओं का गुणगान करने पर उतर आवें। वर्तमान समय में समाज में विचारकों का अभाव हो गया है, मंथन प्रक्रिया मृतप्राय है, निष्कर्ष नही निकल रहे हैं, राजनेता या संगठन प्रमुख ही विचारक बन बैठे हैं। ये राजनेता जो निष्कर्ष निकालते हैं वही साहित्यकार के लिए विचार बन जाता है और साहित्यकार उसे निष्कर्ष मानकर पूरी ईमानदारी से समाज तक पहुंचा देता है। उक्त विचार न तो निष्कर्ष होता है न ही मंथन प्रक्रिया होती है अतः ऐसे संगठनो द्वारा निकाले गए निष्कर्ष साहित्यकारों द्वारा समाज तक पहुँचाने के बाद भी परिणाम शून्य या विपरीत भी होते हैं। राजनेता या धर्मगुरु दिल्ली से दहेज चिल्लाते हैं तो साहित्यकार भी दहेज ही दहेज को समस्या के रूप में समाज के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। जब राजनेता महंगाई, गरीबी, महिला अत्याचार का हल्ला करते हैं तब भी साहित्यकार इन मुद्दों को समाज तक पहुँचाने में देर नही करता जबकि स्वतंत्र विचारकों के विचार मंथन के बाद पाया गया कि महंगाई, गरीबी, महिला अत्याचार, दहेज, शिक्षित बेरोजगारी जैसी समस्याएं पूरी तरह अस्तित्वहीन हैं किन्तु साहित्य ने उसे इस तरह समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है कि पूरा समाज इन अस्तित्वहीन समस्याओं से भी स्वयं को पीड़ित करता है। इसका प्रभाव सम्पूर्ण समाज पर वर्ग संघर्ष के रूप में दिख रहा है। दोष तो यह है कि विचारकों के अभाव में राजनेता ही विचारक बन बैठे हैं।
तीसरी तरह के साहित्यकार भी समाज की समस्याएं नही हैं क्योंकि सब लोग उन्हें व्यक्ति पूजक चारण या भाट जानते हैं और मानते भी हैं। ऐसे घोषित प्रतिबद्ध साहित्यकारों तथा विचारकों का समाज पर विशेष प्रभाव नही होता। किन्तु दूसरे तरह के साहित्यकार बहुत घातक प्रभाव छोड़ रहे हैं। ये लोग स्वतंत्र न होकर किसी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। स्वतंत्र साहित्यकार किसी से बंधा नही होता किन्तु ये लोग पूरी तरह बंधे होते हैं। इन प्रतिबद्ध साहित्यकारों में कई लोग मूल रूप से साहित्यकार नही होते बल्कि संस्थाएं ऐसे लोगों की पहचान करके उन्हें दीक्षित करती है और धीरे-धीरे साहित्य के क्षेत्र में स्थापित कर देती हैं। कई विदेशी एजेंट भी ऐसे प्रतिबद्ध लोगों को अंतर्राष्ट्रीय सम्मान देकर उन्हें और बड़ी पहचान दिलाते हैं। ये लोग साहित्य के लिए विचारों का चयन नही कर पाते बल्कि साहित्य की विधा का अपने लिए उपयोग करते हैं। प्राचीनकाल में ऐसी समस्या यदा-कदा ही होती थी किन्तु वामपंथ ने इसका भरपूर उपयोग किया। वामपंथ ने साहित्यकारों का एक अलग वर्ग बना दिया जिसने प्रगतिशील या जनवादी जैसे नामों से साहित्यकारों के गुट खड़े कर लिए। साहित्यकार की स्वतंत्रता पूरी तरह प्रतिबद्ध हो गई। इन साहित्यकारों ने ऐसा ताना-बाना बुना कि धर्मनिरपेक्षता, अमेरिका विरोध आदि विचार इनके बंधक बन गए। ये वामपंथी साहित्यकार धीरे-धीरे साहित्य पर इस तरह छा गए कि स्वतंत्र साहित्य तो दिखना ही बन्द हो गया और धीरे-धीरे दक्षिणपंथी साहित्यकारों ने भी वही मार्ग चुना है। अब संस्कृति और राष्ट्रीयता शब्द इनके गुलाम बन गये हैं। किसी भी बात को किसी भी तरह तोड़-मरोड़कर संघ परिवार के पक्ष में स्थापित करना इनकी साहित्यकला मानी जा रही है। भारत का साहित्यिक परिवेश दो विचारधाराओं के साहित्य युद्ध में फंस गया है। अब तक जिस तरह साहित्य पर वामपंथियों का कब्ज़ा रहा किन्तु प्रारम्भ में महाश्वेता देवी को नारंग जी के माध्यम से चुनाव में हराकर दक्षिण पंथ ने वामपंथी साहित्य को चुनौती दी तथा अब जे. एन. यू. टकराव के माध्यम से हार-जीत का खेल चल रहा है वह न साहित्य के लिए शुभ लक्षण है न विचारों के लिए। स्वतंत्र साहित्यकार को किसी राजनैतिक, धार्मिक विचारधारा मात्र का गुलाम नही होना चाहिये। वामपंथ पूरी तरह राजनैतिक उद्देश्यों के लिए साहित्य का उपयोग कर रहा है। दक्षिणपंथ भी अब संघ परिवार के राजनैतिक उद्देश्यों के लिए समर्पित है। नये-नये शोध, नये-नये निष्कर्षों को समाज तक पहुंचाने के लिए स्वतंत्र साहित्यकार कहाँ मिलेंगे। क्या अब नए विचार इसलिये समाज से बाहर हो जायेंगे कि उसे स्थापित करने के लिए उसके साथ स्वतंत्र साहित्यकारों का अभाव है। आज की जो स्थिति है इसके लिए वामपंथी दोषी हैं कि दक्षिणपंथी यह मेरी चिंता का विषय नहीं है, मेरी चिंता तो यह है कि स्वतंत्रता कहाँ जाकर पैर जमा सकेगी।
मै चाहता हूँ की साहित्य समाज में विचारों का संवाहक बने और रहे। किन्तु वह किसी पेशेवर दुकान का ट्रेडमार्क बनने से बचे अन्यथा साहित्य भी उसी तरह दलदल में फंस जाएगा जिस तरह धर्मनिर्पेक्षता या भारतीय संस्कृति।
पिछले कई सौ वर्षों से भारत में विचार मंथन का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। नए स्वतंत्र और गंभीर विचारक निकल नही पा रहे हैं। और यदि अपवाद स्वरुप कोई निकलता भी है तो उसका स्तर पिछले विचारकों की तुलना में बहुत कमजोर होता है। क्योंकि न तो ऐसे विचारकों को साहित्य का कोई सहारा मिल पाता है, न ही समाज का बल्कि प्रतिबद्ध संगठन ऐसे गंभीर विचारकों के प्राथमिक लक्षण दिखते ही उन्हें अपना पिछलग्गू बनाने के लिए येन-केन प्रकारेण प्रयासरत हो जाते हैं। स्थिति निराशाजनक है। फिर भी पिछले एक दो वर्षों से कुछ अप्रतिबद्ध विचारक सोशल मीडिया तथा अन्य माध्यमों से स्वतंत्र विचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। यद्यपि कभी-कभी ऐसा दिखता है कि ऐसे स्वतंत्र विचारों को प्रतिबद्ध वामपंथी या दक्षिणपंथी साहित्यकारों का विरोध भी झेलना पड़ता है, किन्तु सामाजिक जागरूकता ऐसे स्वतंत्र विचारों को धीरे-धीरे आगे बढा रही है। निराश होने की कोई बात नही है। फिर से विचारकों का स्तर और प्रभाव बढ़ेगा। साहित्य ऐसे स्वतंत्र विचारों को आगे बढ़ाएगा। और समाज का अथःपतन रूककर उत्थान की दिशा में जायेगा।
मंथन का अगला विषय-20 होगा, #ग्रामसंसद

मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि

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भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत से भयभीत रहते है। यहां तक कि छोटे बच्चे भी क्योकि बचपन से ही बच्चो मे भूत का अस्तित्व बना दिया जाता है।
ठीक भूत के समान ही स्थिति मंहगाई शब्द की भी है । न महंगाई है न ही आज तक उसका आम जन जीवन पर कोई बुरा प्रभाव पडा किन्तु स्वतंत्रता के तत्काल बाद से ही आज तक शत प्रतिशत भारत मंहगाई से चिन्तित है। सन सैतालीस से आज तक मै मंहगाई बढने की बात सुनता रहा हॅू तथा आज भी सुन रहा हॅू। किन्तु जब मै प्रचार से दूर होकर वास्तविकता को खोजने लगा तब मैने देखा कि मंहगाई बिल्कुल ही अस्तित्व हीन प्रचार है और षणयंत्र पूर्वक जान बूझकर समाज मे मंहगाई का भय पैदा किया जाता है। लगभग हर सरकार मंहगाई को कम करते करते बदल भी जाती है। फिर भी मंहगाई एक ऐसा काल्पनिक दैत्य है जो लगातार शक्तिशाली होते हुए दिखता है।
मान्य सिद्धान्त है कि किसी वस्तु की तुलना जिस आधार वस्तु से होती है उस आधार वस्तु को स्थिर होना चाहिये। बहुत प्राचीन समय से सोने को आधार माना गया था जो बाद मे भारत की स्वतंत्रता तक चांदी के रूप मे स्थिर रहा। स्वतंत्रता के बाद आधार बदल गया और वह रांगा से गुजरते गुजरते सरकारी मान्यता प्राप्त कागज तक आ गया। मै नही समझ सका कि सन सैतालीस मे एक चांदी के रूपये के बदले जितना सामान मिलता था उसकी तुलना मे आज के रूपये से उतना सामान कैसे संभव है। स्पष्ट है कि रूपया स्थान बदल लिया और उस स्थान बदलाव को धूर्त लोग मंहगाई के नाम से प्रचारित करते रहे।
मंहगाई और मुद्रा स्फीति अलग अलग शब्द हैं । मुद्रा स्फीति का अर्थ होता है नगद रूपया पर अघोषित कर और उसका प्रभाव होता है नगद रूपये का मूल्य ह्रास। इसका वस्तुओ की कीमत पर कोई प्रभाव नही पडता। अन्य किसी भी परिस्थिति मे मंहगाई नही बढती। क्योकि वस्तु मंहगी हो सकती है और वस्तुओ के औसत को मंहगाई कहा जाता है जो सिर्फ मुद्रा स्फीति होती है, मंहगाई नही । सन 47 मे एक मजदूर को दिनभर की मजदूरी के बदले मे जितना अनाज दिया जाता था उसकी तुलना मे आज लगभग 6 से 8 गुना तक अधिक अनाज दिया जाता है। कई बार प्रश्न करने के बाद भी किसी ने यह उत्तर नही दिया कि स्वतंत्रता के बाद अनाज सस्ता हुआ या नही और श्रम मंहगा हुआ या नही। यदि हम सम्पूर्ण भारत के जीवन स्तर का आकलन करे तो जीवन स्तर मे तैतीस प्रतिशत गरीब लोगो के बीच लगभग दो गुना सुधार हुआ है। यदि मंहगाई है तो या तो उसका दुष्प्रभाव नही है या उसका अच्छा प्रभाव पड रहा है। फिर भी स्पष्ट दिखते हुए भी मंहगाई और उसके दुष्प्रभाव की चर्चा निरंतर जारी है। देश विकास कर रहा है। संभव है कि तेतीस प्रतिशत गरीब लोगो की विकास दर एक हो, मध्यम वर्ग की 6 हो, उच्च वर्ग की 12 हो किन्तु विकास दर तो लगातार जारी है। मै नही समझा कि यदि मंहगाई है और उसका दुष्प्रभाव भी है तो तैतीस प्रतिशत गरीब तबके की विकास दर त्रृणात्मक क्यों नहीं है।
मंहगाई का अस्तित्व न होते हुए भी सत प्रतिशत लोगो को मंहगाई दिखती है। वह एक षणयंत्र है। जब किसी व्यक्ति का वेतन बढता है तो एकाएक उसे अधिक वस्तु उपलब्ध होने लगती है। मुद्रा स्फीति बढने से एक वर्ष मे उसे वह वस्तु घटते घटते फिर वही आ जाती है जहां उसे पहले मिलती थी। फिर से उसका वेतन बढता है और फिर वही क्रम शुरू हो जाता है। सन 47 मे किसी व्यक्ति को कुल वेतन मे एक किलो अनाज मिलता था तो आज वेतन 90 गुना बढ गया है और मुद्रा स्फीति भी 90 गुना बढ गई है। इसका अर्थ हुआ कि यदि उसकी क्रय शक्ति और वस्तुओ के मुल्य 90 गुने बढे तो मंहगाई कहां है। सच्चाई यह है कि सोना, चांदी और जमीन मंहगे हुए है। इसी तरह दाल खादय तेल डीजल पेट्रोल बहुत मामुली मंहगे हुए है। अनाज कपडा दूध शक्कर सभी आवश्यक वस्तुए लगभग आधे मूल्य की हो गई हैं और इलेक्ट्रानिक्स वस्तुएं, आवागमन तो मटटी की मोल हो गई है। फिर भी मंहगाई का प्रचार आज भी जारी है।
स्वतंत्रता के पूर्व भी श्रम के साथ बुद्धिजीवियो का लगातार षणयंत्र चलता रहता था । सवर्ण और शुद्र का जातिगत आधार इसी के उपर टिका हुआ था। आज भी वह आधार शब्द बदल कर उसी तरह कायम है। भारत की सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था में बुद्धिजीवियों का एकाधिकार है। उस एकाधिकार के अंतर्गत वे लोग उपभोक्तावादी संस्कृति को विस्तार देते है। उत्पादन का मूल्य न बढे और उपभोक्ताओ की क्रय शक्ति तथा आय निरंतर बढती रहे । इसका पूरा पूरा प्रचार लगातार बुद्धिजीवियों और पूजीपतियों द्वारा किया जाता रहा है। इन्ही के प्रतिनीधि सत्ता मे होते है, और इन्ही के प्रतिनीधियों का प्रचार माध्यमो पर भी एकाधिकार होता है। यही लोग विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका पर भी कब्जा जमाए रहते है। स्वतंत्रता से लेकर आज तक इन लोगो ने मिलजुल कर मंहगाई का भूत खडा किये रखा। विषेष कर सरकारी कर्मचारी अपना वेतन बढवाने के लिये, नेता सत्ता परिवर्तन का खेल खेलने के लिये तथा पूंजीपति अर्थिक असमानता पर से ध्यान हटाने के लिये मंहगाई का प्रचार करते है और इन तीनो द्वारा धन और सुविधा की लालच मे मीडिया इसको हवा देती है।
यदि ठीक से विचार किया जाये ते मंहगाई अस्तित्व हीन शब्द है। मंहगाई आभासीय है, भावनात्मक है, इसका वास्तविकता से कोई संबंध नही। सन 39 से 47 तक क्रय शक्ति की तुलना मे वस्तुओ के मुल्य 12 गुना अधिक बढ गये थे तो उस समय वास्तव मे मंहगाई बढी थी और लोग परेषान थे किन्तु स्वतंत्रता के बाद स्थिति ठीक उल्टी हो गई । यदि रूपया 90 गुना गिरा है और सन 47 मे एक रूपया का एक किलो सामान मिलता था आज 90 रूपये मे मिल रहा है तो स्पष्ट समीकरण है कि वस्तु का मूल्य समतुल्य है, किन्तु उसे मंहगाई के साथ जोडा जाता है। आज तक किसी अर्थ शास्त्री ने यह नहीं बताया कि स्वतंत्रता के बाद आज तक मंहगाई कितने गुना बढी और उसका कितने गुना दुष्प्रभाव पडा? न तो उनके पास उत्तर है और न ही वे इस विषय पर चर्चा करना चाहते है। मै टीवी देखता हॅू तो मोटी मोटी बडे घरो की औरते सडक पर मंहगाई का रोना रोती दिखती है। उनका रोज बजट ही बिगडा रहता है। उन्हे क्या पता कि किसान कितनी मेहनत से उत्पादन करता है, कितनी मेहनत से वह लाकर बेचता है और उस उत्पादन और बिक्री पर भी वह टैक्स देता है। फिस टैक्स और उत्पादन की कीमत पर ये मोटे लोग और उनके एजेन्ट टीवी वाले मंहगाई का हल्ला करते हैं । सरकारें जान बूझकर घाटे का बजट बनाती हैं जिससे मंहगाई का अस्तित्व दिखता है।
कल्पना करिये कि यदि वर्तमान सरकार एकाएक घोषणा कर दे कि सौ रूपये का मूल्य भविष्य मे एक रूपया होगा तो यथार्थ मे किसी प्रकार का कोई अंतर नही पडेगा । सबकुछ वैसा ही रहेगा और सारी वस्तुओ का मूल्य सौ गुना घट जायेगा। क्या आप मानेंगे कि मंहगाई खत्म हो गई? इसका अर्थ हुआ कि रूपये के मूल्य परिवर्तन से मंहगाई का कोई संबंध नही है। मंहगाई का संबंध तो तब है जब औसत व्यक्ति की क्रय शक्ति की तुलना मे आम लोगो की सामान्य उपभोक्ता वस्तुए कम उपलब्ध होने लगे। वर्तमान समय मे वस्तु स्थिति इससे ठीक विपरीत है और मंहगाई का हल्ला हो रहा है। यदि सरकारो की नीयत ठीक हो और वे घाटे का बजट बनाना बंद कर दे तो मंहगाई का हल्ला अपने आप खत्म हो जायेगा। किन्तु सरकारो को लोक हित की जगह लोक प्रिय बजट बनाने की जल्दी रहती है। और इसलिये समाज को घोखा देने के लिये घाटे का बजट बनाते है। सभी सरकारे जानती है कि मंहगाई शब्द पूरी तरह असत्य है किन्तु विपक्ष मंहगाई बढने का हल्ला करता है और सत्ता पक्ष मंहगाई घटाने का आश्वासन देता है जबकि दोनो ही बाते झूठ होती है। स्वतंत्रता से लेकर आजतक भारत की आम जनता इस मंहगाई के प्रचार से भयभीत रहती है और धूर्त लोग इससे लाभान्वित होते रहते है। इस प्रचार को चुनौती देने की आवश्यकता है।
मंथन का अगला विषय होगा, विचार और साहित्य

अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि

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धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन पैदा हो गया है। धर्म का स्थान सम्प्रदाय ने, राष्ट्र का राज्य ने,और समाज का संगठित वर्गों ने ले लिया है। परिणाम दुनिया में स्पष्ट दिख रहे हैं।
अपराध दो प्रकार के होते हैं- 1 सामूहिक अपराध 2 व्यक्तिगत अपराध। पूरी दुनिया में सब मिलाकर जितने अपराध होते हैं उनका 90 प्रतिशत धर्म और राष्ट्र के नाम पर किये जाते है। ये अपराध धर्म और राष्ट्र की अतिसक्रियता के परिणाम होते हैं। व्यक्तिगत अपराध पूरी दुनिया में बहुत कम होते हैं। फिर भी हम इस लेख के माध्यम से सिर्फ व्यक्तिगत अपराधों की चर्चा तक सीमित हैं। धर्म और राष्ट्र के नाम पर होने वाले,अपराधों की चर्चा अलग से करेंगे।
सबसे बडी बिडम्बना यह है कि दुनिया में आज तक अपराध की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं बन सकी और जब अपराधों की परिभाषा ही नहीं है और पहचान ही नहीं है तो नियंत्रण कैसे संभव है? भारत में भी ऐसी कोई परिभाषा और पहचान अस्तित्व में नहीं है। न तो संविधान, न ही सरकार और न ही न्यायपालिका आज तक स्पष्ट कर सकी है कि अपराध क्या है?
व्यक्ति के अधिकार तीन प्रकार के होते हैं- 1 प्राकृतिक 2 संवैधानिक 3 सामाजिक। प्राकृतिक अधिकारों का उल्लंघन अपराध होता है। संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन गैरकानूनी होता है अपराध नहीं। सामाजिक अधिकारों का उल्लंघन अनैतिक होता है, न तो गैरकानूनी होता है, न ही अपराध। आश्चर्य कि इतनी छोटी सी बात भी आज तक दुनिया में परिभाशित नहीं हो सकी, न ही भारत में हो सकी है । आप किसी अच्छे से अच्छे अन्तर्राष्ट्रीय,या राष्ट्रीय विद्वान से पूछ कर देखिये कि अपराध गैरकानूनी और अनैतिक में क्या फर्क होता है तो आपको पता चल जायेगा। आप किसी से पूछ कर देखिये कि भारत में अपराधियों की मात्रा का प्रतिशत क्या है तो कोई आपको 50 बतायेगा , तो कोई 90 और कोई 99 जबकि सच्चाई यह है कि भारत में अपराधियो और अपराधों का प्रतिशत कुल मिलाकर एक से दो के बीच होता है। अपराध गैरकानूनी और अनैतिक को एक साथ मिला देने से यह प्रतिशत बढ जाता है। स्वाभाविक है कि भूसे के ढेर से सुई का खोजना जितना कठिन होता है उतना ही कठिन समाज के बीच से अपराधी को खोजना होता है। मैं नहीं कह सकता कि भारत में यह भ्रम जानबूझकर फैलाया गया अथवा दुनिया की नकल करते हुये किन्तु यह सच है कि यह भ्रम सम्पूर्ण भारत में एक समान रुप में फैला हुआ है।
अपराध वृद्धि के कई कारण हैं- भारत में पुलिस और न्यायालय को इतना ओभरलोडेड बना दिया गया है कि वे अपराध की ठीक विवेचना कर ही नहीं पाते। पुलिस जल्दी जल्दी अपरिपक्व विवेचना के आधार पर न्यायालय में मुकदमा प्रस्तुत करती है तो न्यायालय धीरे धीरे अनंतकाल तक उसके न्याय में बाल की खाल निकालता रहता है। न्यायालय आज तक यह नहीं समझ सका कि किसी अपराधी का निर्दोष छूट जाना भी पीडित के साथ अन्याय है। न्यायालय को चाहिये था कि वह पुलिस को न्याय सहायक माने और पुलिस न्यायालय की संयुक्त भूमिका को अपराध नियंत्रण का आधार किन्तु न्यायालय अपने को अपराधी और पुलिस के बीच में न्यायकर्ता के रुप में स्थापित करने लगा जिसका परिणाम हुआ कि अपराधियों का बहुमत निर्दोष सिद्ध होकर छूटने लगा।
दूसरा कारण ये रहा कि हमारी विधायिका कभी दायित्व और कर्तव्य का अंतर नहीं समझ सकी। सुरक्षा और न्याय राज्य का दायित्व होता है तथा अन्य जनकल्याणकारी कार्य उसके स्वैच्छिक कर्तव्य। हमारी विधायिका ने विदेषों की नकल करते हुए जनकल्याणकारी कार्यो को अपना दायित्व मान लिया और उन्हें प्राथमिकता देने लगे । स्वाभाविक था कि अपराध नियंत्रण पीछे छूट गया। आज निकम्मे और बैठे ठाले परजीवी निरंतर, शिक्षा,स्वास्थ, गरीबी और भूख मिटाने के नाम पर इतनी बडी बडी मांगे प्रस्तुत करते रहते हैं कि पुलिस और न्यायालय का बजट सौतेला दिखने लगता है। सम्पूर्ण भारत के कुल बजट का एक प्रतिशत से भी कम पुलिस और न्यायालय पर खर्च होता है तो सेना पर तेरह प्रतिशत और अन्य जनकल्याण के कार्यो पर 86 प्रतिशत । इस एक प्रतिशत में भी 90 प्रतिशत घुसपैठ जनकल्याणकारी कार्यो की हो जाती है और कुल बजट का 10 नया पैसा ही वास्तविक अपराध नियंत्रण पर खर्च होता है। कानून भी इतने गलत बनते है कि बन्दूक और पिस्तौल को छोटा अपराध माना जाता है तो अवैध गांजा और अवैध अनाज को अधिक गंभीर। यहा तक कि गंभीर अपराधों में दोष सिद्धी का भार पुलिस पर डाला गया है और संदेह का लाभ अपराधी को मिलता है जबकि दहेज वन अपराध, आदिवासी हरिजन, कानून जैसे मामलों में इसका ठीक विपरीत है। भारत में पश्चिम की नकल करते हुये सिद्धांत बना कि भले ही 99 अपराधी निर्दोष सिद्ध हो जाये किन्तु एक भी निर्दोष दण्डित न हो जाये। एक ओर तो इतना उंचा आदर्श और दूसरी ओर इतना लचर बजट। कोई तुलना ही नहीं हो सकती।
हमें समाधान के भी उपाय सुझाने होंगे। अपराध गैरकानूनी और अनैतिक का साफ साफ अंतर स्पष्ट करना होगा। हमें सरकार को भी समझाना होगा कि अपराध नियंत्रण उसका पहला दायित्व है और जनकल्याणकारी कार्य उसका स्वैच्छिक कर्तव्य । तदनुसार सरकार को अपनी बजट प्राथमिकताए भी बदलनी होंगी। न्यायापालिका को भी यह समझाना होगा कि उसे अपराध नियंत्रण को पहली प्राथमिकता मानना चाहिये। उसे यह भी समझना चाहिये कि पुलिस उनकी न्याय सहायक है, पक्षकार नहीं। यह बात भी भारत में साफ साफ दिखती है कि देश के अनेक क्षेत्रों में लोग गवाही देने से डरते हैं। यदि कोई गवाही देता भी है तो उसकी सुरक्षा को खतरा है। यदि पुलिस कानून तोडकर सुरक्षा देती है तो न्यायालय भी अपने प्रभाव का उपयोग करता है। ऐसी परिस्थिति में एक तात्कालिक उपाय करना चाहिये अर्थात अल्पकाल के लिए यह व्यवस्था होनी चाहिये कि किसी जिले का कलेक्टर,एस पी, जिला न्यायाधीश, संयुक्त रुप से महसूस करें कि उस जिले के लोग भय के कारण गवाही नहीं दे पा रहे हैं तो उस जिले में आपात व्यवस्था लागू कर सकते हैं। जिसका अर्थ होगा कि उस जिले में कुछ गंभीर अपराधों का गुप्तचर न्यायालय में गुप्त मुकदमा चलेगा जिसकी अपील भी गुप्तचर न्यायालय में ही होगी और सर्वोच्च गुप्तचर न्यायालय का निर्णय अंतिम होगा जो अपराधी कभी नहीं जान पायेगा। वर्तमान समय में राज्य को न्यूनतम हिंसा और बलप्रयोग की जगह संतुलित हिंसा और बल प्रयोग का मार्ग अपनाना चाहिये। राज्य द्वारा दण्ड और हिंसा की मात्रा भय की आवश्यकता के अनुसार तय करनी चाहिये , किसी सिद्धांत के आधार पर नहीं। अल्पकाल के लिए कुछ अधिक कठोर दण्ड की भी व्यवस्था हो सकती है और उसके अंतर्गत खुलेआम फांसी का भी प्रावधान किया जा सकता है। यदि उसके बाद भी स्थिति नियंत्रित होते न दिखे तो यह भी घोषणा हो सकती है कि तीन महिने के अंदर पूरे देश से गुप्त मुकदमा प्रणाली के अन्तर्गत 50 लोगो को फांसी 500 को आजीवन कारावास दिया जायेगा।
अपराध नियंत्रण में धर्म, और समाज की भी भूमिका होनी चाहिए। धर्म तो व्यक्ति को अपराध से बचने का मार्ग सुझाता है और समाज उसे अनुशासित करता है । प्राचीन समय में समाज की अपराध नियंत्रण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी जिसे सामाजिक बहिष्कार कहा जाता था। मुस्लिम शासनकाल में बहिष्कार को हिंसा के साथ जोड दिया गया तो अंग्रेजों के शासनकाल में बहिष्कार को पूरी तरह अपराध बना दिया गया। वास्तव में सामाजिक बहिष्कार अपराध नियंत्रण का एक मजबूत माध्यम है जिसे कानूनी मान्यता भी मिलनी चाहिए, उस सीमा तक जब तक वह किसी के प्राकृतिक अधिकारों का उल्लंघन न करे और सामाजिक अधिकारों तक ही सीमित हो । इसके साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को परिवार व्यवस्था से भी जुडना अनिवार्य कर दिया जाये और यह घोषित किया जाये कि परिवार का कोई सदस्य यदि अपराध करता है और परिवार जानते हुए भी उसे न नियंत्रित करता है, न ही परिवार से निकालता है तो उक्त व्यक्ति के अपराध के लिए परिवार को भी उत्तरदायी माना जा सकता है।
मैं समझता हॅू कि अपराध नियंत्रण कोई असंभव कार्य नहीं है यदि हम ठीक नीयत और ठीक योजना से मिलकर इस कार्य को करें। मुझे उम्मीद है कि अपराध नियंत्रण की दिशा में कुछ रचनात्मक प्रगति संभव होगी।
मंथन का अगला विषय ‘महंगाई का भूत’ होगा।

जे एन यू संस्कृति और भारत

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भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू या भारतीय संस्कृति भी कहते हैं, तो नेहरु विचारधारा में आर्य संस्कारों को छोड़कर पाश्चात्य , इस्लामिक, साम्यवादी तथा अन्य सबका मिलाजुला समावेश था। इसमें भी सर्वाधिक प्रभाव समाजवादी धारा का था। तीसरी साम्प्रदायिक विचारधारा का प्रभाव नहीं था क्योंकि विभाजन के बाद मुस्लिम धारा प्रभावहीन हुई तो गॉधी हत्या के बाद संघ विचार भी कटघरे में आ गया। फिर भी संघ परिवार ने हिन्दू शब्द पर अपना अधिकार जमाया तो साम्यवाद ने समाज शब्द पर जबकि दोनों का ही न हिन्दू शब्द से कभी कुछ लेना देना रहा न ही समाज शब्द से।
गॉधी विचारधारा का मुख्य तत्व है सामाजिक राजनीति और नेहरु विचारधारा का है राजनैतिक समाज। गांधी मानते थे लोकतांत्रिक संसद और नेहरु मानते थे संसदीय लोकतंत्र। गॉधी तंत्र को प्रबंधक मानते थे तो नेहरु तंत्र को संरक्षक। गॉधी विचारधारा में सत्य, अहिंसा, वर्ग समन्वय, हिन्दुत्व, व्यक्ति स्वतंत्रता, सहजीवन, अधिकारों का अकेन्द्रियकरण, कर्तव्य प्रधानता, श्रम सम्मान, नैतिकता, संस्थागत चरित्र, सत्ता का अकेन्द्रियकरण आदि गुण माने जाते हैं। दूसरी ओर नेहरु विचार धारा में चालाकी, बल प्रयोग, वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष, उच्चश्रृंखलता अल्पसंख्यक प्रोत्साहन, सुशासन, कुटनीति, अधिकार प्रधानता, संगठन शक्ति, बुद्धिजीवी महत्व आदि शामिल रहे। गॉधी की हत्या होते ही नेहरु संस्कृति सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करने लगी। गॉधी विचारधारा को आगे बढाने के लिए बनी संस्था सर्वोदय भी नेहरु विचारों से प्रभावित होती चली गई क्योंकि सर्वोदय परिवार में संस्कारित और चरित्रवान लोगों का बाहुल्य रहा है। ये लोग चालाकी को न समझ कर संघ विचार को ही हिन्दू संस्कृति मानने लगे और सर्वोदय गॉधी के अभाव में नेहरु की ओर झुकता चला गया।
कुछ वर्ष बाद ही पंडित नेहरु ने अपनी विचारधारा के विस्तार के लिए जवाहर लाल नेहरु युनिवर्सिटी की स्थापना की और धीरे धीरे उसे भारत की सर्वश्रेष्ठ युनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया । जे एन यू इस तरह नेहरु की विचारधारा के संवाहक और पोषक के रुप में काम करने लगी। वहॉ से अनेक स्थापित विद्वान निकले जिनमें से अधिकांश वामपंथी विचारों के संवाहक रहे। दूसरी ओर उसी नेहरु की पारिवारिक सत्ता ने जे एन यू से निकले विद्वानों को देश के महत्वपूर्ण राजनैतिक सामाजिक साहित्यिक पदों पर स्थापित करना शुरु कर दिया । इस तरह सत्ता और जे एन यू संस्कृति के तालमेल ने पूरे देश में जे एन यू संस्कृति को एक राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त विचार धारा के रुप में स्थापित कर दिया जो 65 वर्षो तक निरंतर फलती फूलती रही।
भारत में हिंसा ,चरित्रपतन, वर्ग विद्वेष, अल्प संख्यक तुष्टिकरण, सत्ता का केन्द्रियकरण, संगठनो का टकराव जैसी समस्याए सत्ता और जे एन यू संस्कृति के तालमेल का ही परिणाम रही। इस विचारधारा ने नेहरु की सोच से भी आगे बढकर लोक को संरक्षक की जगह शासक,वर्ग विद्वेश की जगह वर्ग संघर्ष, बुद्धिजीवी प्रोत्साहन की जगह श्रम शोषण, अल्पसंख्यक प्रोत्साहन की जगह हिन्दू विरोध, कूटनीति की जगह धूर्तता,बल प्रयोग की जगह हिंसा जैसी बुराईयों को बढाया। जे एन यू ने कोई ऐसा अवसर नहीं छोडा जिसने गॉधी विचारधारा को पराजित और अपमानित न किया हो। जे एन यू में खुलेआम नक्सलियों द्वारा भारतीय सैनिको की हत्या को सम्मानित किया गया। साम्यवाद धर्म को अफीम कहता है और रामकृष्ण, देवी दुर्गा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता किन्तु हिन्दुत्व को अपमानित करने के लिए रावण, कुँभ करण और महिशासुर का अस्तित्व स्वीकार करता है। चीन और भारत के टकराव के समय भी जे एन यू की विचारधारा विपरीत ही दिखती है। कश्मीर के मामले में जे एन यू बिल्कुल नग्न स्वरुप में सामने आता है और अल्प संख्यकों का तो वह प्रमुख वकील बन जाता है । जे एन यू में सबसे पहले बालिग होते ही चरित्रहीनता का प्रशिक्षण दिया जाता है और उन्हे भावना विहीन बनाया जाता है। महिला और पुरुष के बीच की दूरी घटाने के प्रशिक्षण का पूरा नेतृत्व जे एन यू के पास है किन्तु महिला अधिकार के लिए वर्ग संघर्ष का तानाबाना भी जे एन यू ही बुनता रहता है। यदि महिला पुरुष के बीच दूरी घटने का मामूली सा भी दुष्परिणाम दिखा तो जे एन यू आसमान सर पर उठा लेता है। यदि ठीक से सर्वेक्षण किया जाये तो जे एन यू प्रशिक्षित आन्दोलनकारी महिलाओ का व्यक्तिगत जीवन परम्परागत महिलाओं की तुलना में अधिक परिवार तोडक और दुश्चरित होना संभव है। जे एन यू से प्रशिक्षण प्राप्त साहित्यकार ,कलाकार, लेखक और कवि आदिवासी गैर आदिवासी, सवर्ण हरिजन, गरीब अमीर, श्रमजीवी पूॅजीपति, महिला और पुरुष युवा वृद्ध के नारे पर एक वर्ग के पक्ष में वातावरण बनाते हैं और उसी संस्कृति के पोषक शासकीय अधिकारी, न्यायाधीश , और नेता उस वातावरण को सर्वाधिक महत्व देकर अनुपालन में कानून बना देते हैं। यह कानून वर्ग संघर्ष का आधार बन जाता है। मुझे याद है कि गोधरा में हुआ रेल अग्निकांड के समय जे एन यू के प्रचार और उनके अधिकारियों के समर्थन से यह असत्य भी सत्य के समान स्थापित हो गया कि रेलडब्बे में आग अंदर से लगाई गई थी, बाहरी भीड द्वारा नहीं। कल्पना की जा सकती है कि इतना सफेद झूठ भी सत्य के समान स्थापित कर दिया गया । मोदी के पूर्व तक भारत में जे एन यू संस्कृति का इतना प्रभाव था कि उसे सर्व सत्ता सम्पन्न तक माना जाता था और भारत में किसी की ऐसी स्थिति नहीं थी कि उनके गलत कार्यो पर प्रश्न उठा सके। सत्ता, संसद, संविधान, साहित्य, कला आदि सब जगह चाहे पक्ष हो या विपक्ष, सब जगह जे एन यू संस्कृति के समर्थकों का एक छत्र साम्राज्य था।
मोदी जी के आने के बाद जे एन यू संस्कृति को चुनौती मिली। प्रारंभ में तो उस संस्कृति के स्थापित कलाकार साहित्यकार राजनेता जे एन यू के छात्रो को आगे करके टकराने का भरपूर प्रयोग किये। किन्तु संघ विचार धारा के सामने आने के बाद वे अब तक सफल नहीं हो सके हैं। यह सही है कि अब भी जे एन यू संस्कृति के पोषक अनेक लोग न्यायपालिका और कार्यपालिका में बैठकर पूरी ईमानदारी से सत्य को असत्य और असत्य को सत्य सिद्ध करते रहते हैं। ऐसे लोग पूरी तरह ईमानदार होते हैं किन्तु वे जिस संस्कृति में पले बढे हैं उस संस्कृति को ही वे श्रेष्ठ मान कर ईमानदारी से अपने कार्य करते रहते हैं। किन्तु यह भी सच है कि कालान्तर में जे एन यू संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर एकाधिकार समाप्त हो जायेगा।
मैं मानता हॅू कि जे एन यू संस्कृति का स्थान यदि संघ संस्कृति ने ले लिया तो वह भी घातक ही होगा क्योंकि एक नागनाथ और दूसरी सापनाथ है। किन्तु गॉधी की आर्य संस्कृति अभी इस स्थिति में नहीं है कि वह दोनों से एक साथ मुकाबला कर सके। इसलिये मजबूरी है कि अपनी सुरक्षा के लिये जे एन यू संस्कृति के समक्ष ताल ठोककर खडी संघ संस्कृति का पूरा समर्थन किया जाये । वैसे भी जे एन यू संस्कृति की तुलना मे संघ संस्कृति बहुत कम खतरनाक है तथा इसे सत्ता मे भी वैसा स्थान प्राप्त नहीं है जैसा जे एन यू संस्कृति का पिछली सरकारों के समय रहा । इसलिये हमारा कर्तव्य है कि हम भारत से जे एन यू संस्कृति के समापन के लिये पूरा प्रयास करें। हमें इतना अवश्य सतर्क रहना चाहिये कि नेहरू संस्कृति के विरूद्ध संघ संस्कृति का हम समर्थन सहयोग भले ही करें किन्तु उसे अपनी संस्कृति मानने की भूल न करे । क्योकि हमारी भारतीय संस्कृति तो वह आर्य संस्कृति है जिसके अनुपालन मे गांधी जी ने अपना सबकुछ लगाया। मेरा अपने मित्रों से निवेदन है कि वे इस संक्रमण काल मे सत्य के समान स्थापित असत्य को चुनौती देने का प्रयास करे और ऐसा प्रयास ही जे एन यू संस्कृति और संघ संस्कृति से सामूहिक मुकाबला कर सकता है।
मंथन का अगला विषय अपराध और अपराध नियंत्रण होगा।
कल शनिवार है! कल से जे एन यू संस्कृति और भारत विषय पर मंथन में चर्चा प्रारंभ होगी।

मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा

Posted By: kaashindia on January 30, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार समान हैं।
फिर भी महिला और पुरुष के बीच कुछ प्राकृतिक और सामाजिक असमानताए हैं। दोनों की शारीरिक संरचना भिन्न-भिन्न है। सामाजिक संरचना में भी कुछ भिन्नताए हैं। अर्थात एक महिला और पुरुष को संतान उत्पत्ति के लिए किसी अन्य परिवार के साथ जुड़ना अनिवार्य है। यह वैज्ञानिक कारण से है या परम्परागत किन्तु पूरे विश्व में इसकी मान्यता अवश्य है। इसी तरह पति-पत्नी के बीच यह भी आवश्यक है कि पति को सामान्यतया आक्रामक और पत्नी को आकर्षक स्वरुप में रहना चाहिये। इन सब स्थितियों को देखते हुए ही संयुक्त परिवार को समाज की पहली व्यवस्थागत इकाई माना गया। यह व्यवस्था की गई कि परिवार के सदस्य मिलकर यह तय करेंगे कि किस सदस्य को किस प्रकार का कार्य प्रमुखता से करना है। इस कार्य विभाजन में भी महिला और पुरुष का भेद स्वाभाविक होता है। इस तरह यह व्यवस्था आवश्यक हो जाती है कि महिला और पुरुष में से कोई एक दूसरे के परिवार में जाकर रहे और इस परिवार परिवर्तन में महिलाओं को अधिक महत्व दिया जाता है।
समाज व्यवस्था में स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक हस्तक्षेप बढा। हर राजनेता को पारिवारिक और सामाजिक एकता से हमेशा भय बना रहता है इसलिए हर राजनैतिक दल किसी न किसी रुप में इस एकता को छिन्न-भिन्न करता रहता है। वह चाहता है कि धर्म जाति की तरह ही महिला और पुरुष का लिंग भेद भी उसकी परिवार तोडक, समाज तोडक भूमिका में सहायक हो। पारिवारिक संरचना एक बहुत जटिल प्रक्रिया है किसी एक परिवार का पला बड़ा सदस्य परिवार छोड़कर किसी दूसरे परिवार में शामिल होने के लिए मजबूर होता है तो इस परिस्थिति की कल्पना करना भी कठिन होता है किन्तु इसके अलावा कोई मार्ग नहीं होता। इस जटिलता की कमजोरियों का राजनेता लाभ उठाते हैं। महिला और पुरुष के बीच एक दूसरे के प्रति कुछ स्वाभाविक आकर्षण होता है। इस आधार पर महिला और पुरुष के बीच दूरी घटनी चाहिये या बढनी चाहिये इसका निर्णय उन महिला और पुरुष अथवा उनके परिवार पर छोड़ा जाना चाहिये था किन्तु हमारे राजनेताओं ने जबरदस्ती इस दूरी घटाने और बढाने में अपना कानूनी पैर फसाया। सामान्यतया व्यवस्था है कि लड़की और लड़के के परिवार यह अवश्य देखते हैं कि परिवार बदलते समय लड़की की तुलना में लड़के की योग्यता अधिक हो। इसमें भी राजनेता महिला सशक्तिकरण के नाम पर हस्तक्षेप करता है। परिवार में जन्म लिया बालक परिवार समाज और राष्ट्र के सम्मिलित अधिकार का माना जाता है किन्तु इसमें भी कानून बालक को राष्ट्रीय सम्पत्ति मानने की तिकडम करता रहता है।
मैंने अपने अनुभव से देखा कि सम्पूर्ण भारत में लगभग 99 प्रतिशत लोग दहेज का विरोध करते हैं और लगभग सबके सब अपने लड़के के विवाह में अधिक से अधिक दहेज लेने का प्रयास करते हैं। एक ओर तो ऐसे दहेज विरोधी लड़की के पिता के प्रति बहुत दया भाव प्रकट करते हैं दूसरी ओर वही लोग विवाहित लड़की को पिता से सम्पत्ति लेने के लिए मुकदमा लडने तक की प्रेरणा देते देखे जाते हैं। कानून तो पूरी तरह ऐसे पिता पुत्री टकराव का तानाबाना हमेशा बुनता ही रहता है। किन्तु कभी-कभी तो धर्मगुरु तक इस प्रचार में शामिल हो जाते हैं। परिवार का अर्थ सम्पूर्ण समपर्ण और सहजीवन होता है। इस सहजीवन में बाहर का हस्तक्षेप विशेष परिस्थिति में ही होना चाहिए किन्तु हमारे कानून हर मामले में हस्तक्षेप भी करते हैं और यदि दो लोग अलग होना चाहे तो उन्हे अलग होने की स्वतंत्रता में भी बाधा उत्पन्न करते हैं।
मैं भी बचपन में दहेज विरोधी रहा। मेरे लड़के के विवाह के लिए एक परिचित गरीब व्यक्ति ने इच्छा व्यक्त की। मैंने उन्हें एक अन्य बहुत योग्य लडका सुझाया तो उन्होंने यह कहकर इन्कार कर दिया कि वे तो मेरे ही घर में लडकी देना चाहते है । मुझे लगा कि उन्हें लडका या परिवार की अपेक्षा मेरी जमीन और आर्थिक सम्पन्नता से अधिक मोह है। मैंने इन्कार कर दिया और दहेज विरोध के प्रति मेरा मोह भंग हो गया। मैंने महसूस किया कि दहेज कोई बुराई न होकर एक सामाजिक व्यवस्था रहा है। विवाह के समय एक लडकी अपने पिता के घर से अपना अनुमानित हिस्सा लेकर जाती है और पति परिवार अपने लडके के हिस्से के अनुपात में जेवर के रुप में बहू को देता है। यह जेवर अंत तक उस लडकी की व्यक्तिगत सम्पत्ति मानी जाती है। अपवाद स्वरुप ही माता पिता इसमें कोई गड़बड़ी करते रहे हैं। मैं नहीं समझता कि इस दहेज प्रथा को क्यों तोड़कर लड़की को पिता की सम्पत्ति में कानूनी अधिकार को मान्यता दी गई। यदि ऐसा करने वाले की नीयत पर संदेह किया जाये तो क्या गलत है? पुराने समय में तो वैसे भी सम्पत्ति का बटवारा न के बराबर होता था। यह तो कानूनी बटवारा भारत में अंग्रेजो की देन है जो न समाज व्यवस्था मानते हैं न ही परिवार व्यवस्था को। वे तो केवल व्यक्ति को ही समाज की एक मात्र इकाई मानते हैं। वैसे भी भारत में आधी आबादी दहेज से संबंध नहीं रखती। शेष आधी आबादी भी ऐसी है जो सम्पन्न माने जाते है । पता नहीं हमारे नेताओं को इन सम्पन्नों की दहेज प्रथा के बारे में सोचने की जरुरत क्यों पड़ी। इन्होंने दहेज के नाम पर व्यवस्था को तोड़ा। जबकि यदि इनमें कोई कमी थी तो उसे सुधारना चाहिये था। मैं सोचता हॅू कि दहेज का विरोध करना बिल्कुल ही अव्यावहारिक है। कोई अच्छी लडकी बिना दहेज के सम्पन्न कमजोर लड़के के साथ स्वेच्छा से जाती है या कोई सम्पन्न कमजोर लडकी धन देकर किसी गरीब के साथ चली जाती है तो यह उनका आंतरिक मामला है और यदि सहमति है तो इसमें समाज या कानून का हस्तक्षेप क्यों ? भारत में जितने प्रतिश त गरीब हैं, उतने ही प्रतिशत गरीब लड़को की भी संख्या है और गरीब लड़कियों की भी। यदि कोई सामाजिक क्रांति करके या कानून बनाकर बड़े घर के लड़कों के साथ बिना दहेज के गरीब लड़कियों का विवाह कराने की पहल की गई तो मेरे विचार से तो यह प्रयास बहुत ही हानिकारक होगा क्योंकि क्या यह भी प्रयास होगा कि फिर बडे़ घर की लड़कियों को गरीब लड़कों के साथ जोड़ने की मुहिम शुरु की जाये। मैं तो सोच भी नहीं सकता कि दहेज का विरोध करने वाले इतनी साधारण सी बात भी क्यों नहीं समझ पाते।
यदि हम वर्तमान स्थिति की समीक्षा करें तो देख रहे हैं कि स्वाभाविक रूप सेे दहेज पूरी तरह समाप्त हो गया है। विवाह योग्य लड़कियों की संख्या बहुत कम हो गई है। कहीं कहीं तो लड़के वाले दहेज देने लगे हैं। जाति प्रथा भी टूट रही है। इसके बाद भी कुछ पेशेवर नेता और सामाजिक कार्यकर्ता दहेज को समस्या के रूप मे बताते रहते हैं। उनकी आदत हो गई है। एक विचारणीय सिद्धान्त यह भी है कि किसी वर्ग मे सभी व्यक्ति अच्छे या बुरे नहीं होते। यदि किसी वर्ग विशेष को विशेष अधिकार दिये जाते है तो उस अधिकार प्राप्त वर्ग के धूर्त अपराधी प्रवृत्ति के लोग उस वि विशेषाधिकार का लाभ उठाते हैं और उस वर्ग से बाहर के शरीफ लोगों का शोषण होता है। दहेज के कानून का कितना दुरूपयोग हुआ यह पूरा देष जानता है। फिर भी पता नहीं क्यो ऐसे ऐसे धूर्त सशक्तिकरण के वि विशेषाधिकार कानून बनाये भी जाते है और रखे भी जाते है।
मैं जानता हॅू कि दहेज के मामले में ऐसी सोच रखने वाला मैं अकेला ही हो सकता हॅू किन्तु मैं आशवस्त हॅू कि परिवार के पारिवारिक मामलों में किसी भी प्रकार का कोई कानूनी हस्तक्षेप बहुत घातक होगा। हिन्दू कोड बिल तो पूरा का पूरा समाज व्यवस्था के लिए एक कलंक है ही। यह परिवार को तोड़ता है, समाज को तोड़ता है, और किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं देता। फिर भी मैं यह महसूस करता हॅू कि पुरानी व्यवस्था पर न तो अब लौटना संभव है, न ही उचित। इसलिए मैं एक संशोधित व्यवस्था का सुझाव देता हॅू। इसके अनुसार सरकार को पारिवारिक मामलों में सारे कानून हटा लेने चाहिये। साथ ही एक नई व्यवस्था बनानी चाहिये कि परिवार की सम्पत्ति में परिवार के प्रत्येक सदस्य का जन्म से मृत्यु तक समान अधिकार होगा। इसमें उम्र, लिंग आदि का कोई भेद नहीं किया जायेगा। परिवार की आंतरिक व्यवस्था परिवार के लोग बिना बाहरी हस्तक्षेप के आपसी सहमति से स्वतंत्रतापूर्वक कर सकेंगे। यदि परिवार का कोई सदस्य कभी भी परिवार छोड़ना चाहे तो वह अपना हिस्सा लेकर परिवार छोड़ सकता हैं।
मैं यह भी जानता हॅू कि कोई भी राजनेता ऐसे सुझाव को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि इससे तो उसका समाज तोड़क उद्देश्य ही खत्म हो जायेगा किन्तु मैं समझता हॅू कि हमें इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मैं देखता हॅू कि मेरे कई साथी समाज सेवा के नाम पर दहेज प्रथा के विरोध में कुछ न कुछ करते बोलते रहते है। मेरा उन साथियों से भी निवेदन है कि वे राजनेताओं के दहेज विरोधी प्रचार से अपने को मुक्त करें और महसूस करें कि दहेज कोई सामाजिक समस्या या अन्याय अत्याचार नहीं बल्कि एक सामाजिक व्यवस्था है जो आपसी सहमति से चलती हैं।
नोट- मंथन का अगला विषय होगा- कृषि भूमि और कृषि का संतुलन

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