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मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था

Posted By: kaashindia on January 29, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं-
(1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक। परिवार एक से अधिक व्यक्तियों को मिलाकर बनता है। इसलिए परिवार को संगठनात्मक अथवा संस्थागत इकाई माना जा सकता है,प्राकृतिक नहीं।
(2) प्रत्येक व्यक्ति को एक प्राकृतिक अधिकार प्राप्त होता है,और वह है उसकी स्वतंत्रता।
(3) प्रत्येक व्यक्ति का एक सामाजिक दायित्व होता है और वह होता है उसका सहजीवन।
(4) प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है, उस सीमा तक जब तक किसी अन्य व्यक्ति की सीमा प्रारंभ न हो जाये।
(5) प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा राज्य का दायित्व होता है तथा व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग देना समाज का दायित्व होता है।
(6) परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था की एक पहली इकाई होती है, जो अपनी सीमा में स्वतंत्र होते हुए भी उपर की इकाईयों की पूरक होती है।
उपरोक्त धारणाओं के आधार पर हम कह सकते है कि परिवार व्यवस्था सहजीवन की पहली पाठशाला है और प्रत्येक व्यक्ति को परिवार व्यवस्था के साथ अवश्य ही जुडना चाहिए। किन्तु पिछले कुछ सौ वर्षो से हम देख रहे है कि परिवार व्यवस्था टूट रही है। किसी भी व्यवस्था में यदि रुढिवाद आता है तो उसके दुष्परिणाम भी स्वाभाविक है । भारत की परिवार व्यवस्था कई हजार वर्षो से अनेक समस्याओं के बाद भी सफलतापूर्वक चल रही है। यहाॅ तक कि लम्बी गुलामी के बाद भी चलती रही। इसके लिए वह बधाई की पात्र है। किन्तु स्वतंत्रता के बाद परिवार व्यवस्था में विकृतियों का लाभ उठाने के लिए अनेक समूह सक्रिय रहे। इन समूहों में धर्मगुरु, राजनेता, पश्चिमी संस्कृति तथा वामपंथी विचार धारा विशेष रुप से सक्रिय रहे। परम्परागत परिवारों के बुजुर्ग भी किसी तरह के सुधार के विरुद्ध रहे। परिणाम हुआ कि परिवारो में आंतरिक घुटन बढती रही और परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने वालो को इसका लाभ मिला।
वर्तमान समय में परिवार व्यवस्था के पक्ष और विपक्ष में दो विपरीत धारणाये सक्रिय है-
(1) रुढिवादी धारणा जो परिवार व्यवस्था को एक प्राकृतिक इकाई मानती है तथा उसमें किसी तरह के संशोधन के विरुद्ध है।
(2) आधुनिक धारणा जो किसी न किसी तरह इस व्यवस्था को नुकसान पहुचाने के लिए प्रयत्नशील है, किन्तु उसके पास परिवार व्यवस्था का कोई नया विकल्प या सुझाव नहीं है। रुढिवाद का यह परिणाम स्वाभाविक होता हैं, यदि उसमें देशकाल परिस्थिति के अनुसार संशोधन न किया जाये। संशोधन का अभाव ही अव्यवस्था का कारण बनता है और यही परिवार व्यवस्था के साथ भी हो रहा है।
मैं जिन मुददो पर गंभीरतापूर्वक सोचता हॅू किन्तु साथ ही यह भी महसूस करता हॅू कि मेरी सोच वर्तमान प्रचलित धारणाओं के विपरीत है उन्हें समाज के बीच प्रस्तुत करने के पूर्व मैें लम्बा प्रयोग भी अवश्य करता हॅू। मैं बचपन से ही महसूस करता था कि परिवार व्यवस्था बहुत अच्छी व्यवस्था है किन्तु उसमें विकृति आ गई है और उसे टूटने से बचाने के लिए कुछ सुधार करने होंगे। मैंने ऐसे सुधार के लिए करीब 50 वर्ष पूर्व ही अपने परिवार को चुना। उस समय मेरे परिवार में कुल 10 सदस्य थे और हम सबने बैठकर चार महत्वपूर्ण निर्णय लिये-
(1) परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर दसो सदस्यों का सामूहिक अधिकार होगा, जो उसके अलग होते समय ही उसे समान रुप से प्राप्त हो सकेगा।
(2) परिवार का प्रत्येक सदस्य सामूहिक अनुशासन में रहने के लिए बाध्य होगा।
(3) परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी परिवार छोड सकता है अथवा कभी भी बिना कारण बताये परिवार से हटाया जा सकता है।
(4) परिवार में किसी भी प्रकार का विवाद होने पर हमारे कुटुम्ब प्रमुख के समक्ष अपील हो सकती है जिनका निर्णय सबके लिए बाध्यकारी होगा।
हमारे परिवार में 50 वर्षो से लगातार संख्या घटती बढती रही। अब हमारा एक परिवार विभाजित होकर तीन परिवार बन गये है तथा हमारे कुटुम्ब में कुल 6 परिवार है। हमारे पूरे परिवार में उपरोक्त व्यवस्था सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। यहाॅ तक कि कुटुम्ब अर्थात 6 परिवारों के पूरे 50 सदस्य हर चार महिने में कहीं एक साथ बैठकर विचार मंथन किया करते है। यह प्रक्रिया भी 50 वर्षो से निरंतर चल रही है। परिवार की आंतरिक बैठक तो समय समय पर होती ही रहती है। हमारे कुटुम्ब का प्रमुख भी सभी सदस्य मिलकर ही चुनते है। वर्तमान में हमारे कुटुम्ब के प्रमुख हमारे सबसे छोटे भाई है जबकि तीन बडे भाई अभी भी सक्रिय है। कुछ महिने पूर्व हमारे परिवार ने यह महसूस किया कि अब इस प्रणाली को सार्वजनिक तथा कानूनी स्वरुप दिया जाये । हम लोगो ने परिवार का एक सार्वजनिक और कानूनी स्वरुप इस प्रकार बनाया –
समझौता ज्ञापन (एम.ओ.यू.)
यह समझौता ज्ञापन आज दिनांक 23.10.2016 को नीचे लिखे तेरह सदस्यों की आपसी सहमति से तैयार तथा कार्यान्वित हो रहा है। सबने आपसी सहमति से स्वयं को भौतिक तथा कानूनी रुप से ज्ञापन में लिखे नियमों से एक सूत्र मंे बांधा है।
नियम-
(1)समूह का नाम कांवटिया परिवार क्रमांक एक होगा।
(2)परिवार के प्रत्येक सदस्य का परिवार के सभी सदस्यों की चल, अचल, नगद, ज्वेलरी, बान्ड, लेनदारी, देनदारी या अन्य किसी भी प्रकार की वर्तमान तथा भविष्य में अर्जित सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार होगा। अर्थात् वर्तमान में प्रत्येक सदस्य का हिस्सा तब तक तेरहवा हिस्सा होगा जब तक सदस्य संख्या कम या अधिक न हो।
(3)परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने व्यापार, आय, व्यय, संग्रह, कर्ज, अलग रखने के लिये उस सीमा तक स्वतंत्र होगा जब तक परिवार को आपत्ति न हो।
(4)परिवार का कोई भी सदस्य पूरी तरह परिवार के अनुशासन से बंधा होगा। उसकी राजनैतिक ,धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक अथवा अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधि उस सीमा तक ही स्वतंत्र होगी जब तक परिवार को आपत्ति न हो।
(5)परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी परिवार छोड़ सकता है अथवा परिवार द्वारा परिवार से हटाया जा सकता है किन्तु हटने वाला सदस्य परिवार से हटते समय की सम्पूर्ण सम्पत्ति में से सदस्य संख्या के आधार पर अपना हिस्सा ले सकता है।
(6) परिवार में रहते हुये परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर प्रत्येक सदस्य का सामूहिक अधिकार होगा, व्यक्तिगत नहीं। कोई सदस्य किसी अन्य को भविष्य के लिये कोई विल, दानपत्र अथवा अधिकार पत्र या घोषणा नहीं कर सकेगा क्योंकि परिवार में रहते हुए उसकी किसी सम्पत्ति पर उसका परिवार की सहमति तक ही व्यक्तिगत अधिकार है।
(7) परिवार के किसी सदस्य का नवजात बालक तत्काल ही परिवार का सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त सदस्य प्राकृतिक रुप से ही मान लिया जायेगा। तत्काल ही सम्पूर्ण सम्पत्ति में उसका बराबर हिस्सा हो जायगा। परिवार में रहते हुए किसी सदस्य की मृत्यु होती है तो प्राकृतिक रुप से उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी।
(8)परिवार के बाहर के कोई भी व्यक्ति (स्त्री,पुरुष,या बालक,बालिका) परिवार की सहमति से परिवार के सदस्य बन सकते हैं। सदस्य बनते ही उन पर ज्ञापन की सभी कंडिकाओं के अधिकार और कर्तव्य लागू हो जायेंगे।
(9)परिवार का कोई बालक बारह वर्ष की उम्र तक ना बालिग माना जायगा। उम्र पूरी होते तक बालक के परिवार से निकलने अथवा निकालने की स्थिति में उस क्षेत्र की स्थानीय इकाई अर्थात् ग्राम सभा या नगरीय निकाय को सूचना दी जायगी। उसके हिस्से की सम्पत्ति भी उक्त स्थानीय निकाय की सहमति से बनाई गई व्यवस्था के अन्तर्गत ही स्थानान्तरित हो सकेगी।
(10) परिवार के सदस्य आपसी सहमति से परिवार के संचालन के लिये आंतरिक उपनियम बना सकेंगे तथा आवश्यकतानुसार उनमें फेर बदल भी कर सकेंगे। ऐसे सभी नियम या फेर बदल सभी सदस्यों के हस्ताक्षर से ही लागू होंगे।
(11) यदि परिवार का कोई सदस्य परिवार की सहमति के बिना कोई कर्ज लेता है, नुकसान करता है, सरकारी कानून का उल्लंघन करता है तो उक्त सदस्य की व्यक्तिगत सम्पत्ति तक ही सीमित होगी। परिवार के किसी अन्य सदस्य की सम्पत्ति उससे प्रभावित नही होगी। किन्तु परिवार मे रहते तक उस सदस्य का सामुहिक सम्पत्ति मे बराबर का हिस्सा बना रहेगा जो उसे परिवार छोडने की स्थिति मे प्राप्त हो सकता है।
(12 ) परिवार का कोई सदस्य परिवार के निर्णय से असंतुष्ट हो तो वह उच्चसमिति के समक्ष अपनी बात रख सकता है। उच्चसमिति में तीन सदस्य होंगे-1. राजेन्द्र कुमार ,आत्मज-धुरामल जी, 2. कन्हैयालाल,आत्मज-धुरामल जी, 3. सुशील कुमार, आत्मज-राधेश्याम जी । उच्चसमिति का निर्णय अंतिम होगा।
(13) यदि इस ज्ञापन की कोई कन्डिका किसी कानून के विरुद्ध जाती है तो न्यायालय का निर्णय अंतिम होगा। किसी तरह के विवाद की स्थिति में भी विवाद के समय प्रचलित कानून के नियमों के अनुसार लिये गये न्यायालयीन निर्णय मान्य होंगे।
(14) ज्ञापन की किसी कंडिका में कुछ जोड़ना,घटाना या सुधार करना हो तो उसी प्रक्रिया से हो सकता है जिस प्रक्रिया से यह समझौता ज्ञापन बना है।
इस कानूनी स्वरुप को हम लोगो ने नोटरी के द्वारा रजिस्टर्ड भी कराया जिससे कि भविष्य में कोई समस्या पैदा हो तो कानूनी समाधान निकल सके। मैं समझता हॅू कि उपरोक्त पारिवारिक ढाॅचा से अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। परिवारों में महिला अधिकार अथवा महिलाओं को सम्पत्ति और संचालन व्यवस्था में समानता के अधिकार की मांग अपने आप समाप्त हो जायेगी और मेरे विचार से ऐसा होना न्याय संगत भी है। परिवार में रहते हुये कोई कानूनी रुप से अपने को माता-पिता,पति-पत्नी जैसी अन्य कोई विशेष मान्यता नहीं रख सकेगा और न ही देश का कोई कानून परिवार के आंतरिक मामलो मे कोई हस्तक्षेप कर सकेगा। विवाह तलाक बालक बालिका आदि के झगडे या कोड बिल अपने आप समाप्त हो जायेगे। सारे संबंध पारिवारिक या सामाजिक तक ही सीमित होंगे। इस व्यवस्था में यह बात भी विशेष महत्व रखती है कि अब तक सारी दुनिया में प्रचारित व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार संशोधित हो जायेगा और परिवार की सम्पत्ति सभी सदस्यों की सामूहिक होगी,व्यक्तिगत नहीं। इस व्यवस्था से अनेक प्रकार के सम्पत्ति अथवा अन्य कानूनी मुकदमें समाप्त हो जायेंगे। मैं तो अपने अनुभव से तथा कल्पना के आधार पर यह घोषित करने की स्थिति में हॅॅू कि उपरोक्त पारिवारिक व्यवस्था दुनिया की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था का आधार बन सकती है। मैं मानता हॅू कि अन्य परिवारों को परिस्थिति अनुसार उपरोक्त प्रारुप में कई जगह बदलाव भी करने पड सकते है और उन्हें करने चाहिए किन्तु मेरा एक सुझाव अवश्य है कि सम्पत्ति की समानता के अधिकार में कोई संशोधन करना उचित नहीं है।
यदि हम देश में तानाशाही की जगह लोकतंत्र को सफल होता हुआ देखना चाहते है तो हमें इसकी शुरुवात परिवार से करनी चाहिए। परिवार व्यवस्था में तानाशाही और राज्य व्यवस्था मे लोकतंत्र एक अव्यावहारिक कल्पना है। हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने कुछ ऐसी विचित्र कल्पना की कि उन्होने परिवार व्यवस्था में तो लोकतंत्र को शून्य हो जाने दिया और राज्य व्यवस्था में लोकतंत्र की बात करते रहे। परिणाम हुआ कि परिवार व्यवस्था लोकतंत्र के अभाव में टूटती रही और राज्य व्यवस्था निरंतर तानाशाही की तरफ अर्थात पारिवारिक केन्द्रीयकरण की तरफ बढती गई। मेरा सुझाव है कि देश के लोगों को संशोधित परिवार व्यवस्था पर विचार करना चाहिए और अपने-अपने परिवारों में लागू करना चाहिए।
नोटः- मंथन क्रमांक 6 का अगला विषय महिला सशक्तिकरण का होगा।

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