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मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।

Posted By: kaashindia on January 30, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य।
1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी जाती है- 1 चोरी, डकैती और लूट 2 बलात्कार 3 मिलावट और कमतौलना 4 जालसाजी धोखाधडी 5 बलप्रयोग हिंसा आतंकवाद। ये 5 प्रकार की समस्याए भारत में स्वतंत्रता के बाद लगातार बढ रही हैं सरकारे चाहे किसी की भी बनी हो। क्योंकि राज्य इन समस्याओं के समाधान में आवश्यकता से बहुत कम सक्रिय है।
2 कृत्रिम समस्याए मुख्य रुप से 6 प्रकार की मानी जाती हैं- 1 चरित्र पतन 2 भ्रष्टाचार 3 जातीय कटुता 4 साम्प्रदायिकता 5 आर्थिक असमानता वृद्धि 6 श्रम,बुद्धि और धन के बीच बढती दूरी अर्थात श्रम शोषण। इन 6 समस्याओं के अतिरिक्त महिला उत्पीडन, वन अपराध असमानता, विदेशी कम्पनियों का संकट, वेश्यावृत्ति ब्लैक, तस्करी, जुआ, शराब, अफीम आदि भी ऐसी समस्याए है जो या तो कृत्रिम है अथवा राज्य ने अनावश्यक अपने हाथ में लेकर इनको बढावा दिया है। ये समस्याए भी स्वतंत्रता के बाद लगातार इसलिए बढती गई है क्योंकि राज्य ने इन समस्याओं के समाधान में अनावश्यक अथवा आवश्यकता से अधिक सक्रियता दिखाई। अप्रत्यक्ष रुप से कहा जा सकता है कि ये समस्याए राज्य अपनी गल्तियों को छिपाने के लिए योजनापूर्वक बढाता है।
3 प्राकृतिक इसमें बाढ, भूकम्प, बीमारियॉ, तूफान, अनावृष्टि या अतिवृष्टि आदि शामिल हैं। ये समस्याएॅ स्वतंत्रता के बाद कुछ घटी हैं।
4 भूमण्डलीय इसमें पर्यावरण प्रदूषण, आबादी वृद्धि, जल संकट, मानव स्वभाव तापवृद्धि, मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि, उग्रराष्ट्रवाद आदि शामिल है। ये समस्याए भी पूरे विश्व की तरह ही भारत में भी लगातार बढ रही हैं क्योंकि भारत में इनके समाधान के लिए कोई मौलिक चिन्तन का अभाव है तथा भारत इन मामलों में दुनिया के अन्य देशो की अंध नकल करता रहता है।
5 भ्रम या असत्य समस्याए अनेक हैं जैसे मंहगाई, शिक्षत बेरोजगारी, बढती गरीबी दहेज, मुद्रास्फीति का दुष्प्रभाव, अशिक्षा , बालश्रम, वेश्यावृत्ति, तस्करी, ब्लैकमेल आदि शामिल हैं। इनमें से कुछ समस्याए तो बिल्कुल ही अस्तित्वहीन है और उन्हें समाज में भ्रम फैलाने के लिए प्रचारित किया गया है। इन समस्याओं को राज्य इसलिए स्थापित करता है जिससे समाज का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटकर इन समस्याओं के समाधान में लग जाये।
वास्तविक समस्याओं का समाधान करना राज्य का दायित्व होता है और इसलिए प्राथमिकता का क्रम इस प्रकार होना चाहिए था कि पहली प्राथमिकता वास्तविक तथा उसी क्रम से चौथी प्राथमिकता भुमण्डलीय समस्याओं के समाधान के लिए होनी चाहिए थी। भ्रमपूर्ण समस्याओं से तो राज्य को बिल्कूल विपरीत हो जाना चाहिए था किन्तु स्वतंत्रता के बाद लगातार देखा जा रहा है कि प्राथमिकताओं के क्रम में वास्तविक समस्याए पाचवे नम्बर पर है और भ्रमपूर्ण समस्याए पहले नम्बर पर। विचित्र बात है कि जिन समस्याओं का कोई अस्तित्व ही नहीं है ऐसी समस्याओं के समाधान का प्रयत्न लगातार क्यों हो रहा है? महंगाई नाम की कोई समस्या सम्पूर्ण भारत में न कभी थी, न है। किन्तु पिछले 70 वर्षो से समाज में ऐसा असत्य प्रचार हुआ कि भारत का प्रत्येेक नागरिक महंगाई के भ्रम से परेशान है।
पिछले दो वर्षो से नरेन्द्र मोदी जी की सरकार बनी है। उसके पूर्व की सरकारे लगातार साम्यवाद के पूर्णतः या आंशिक प्रभाव में थी। साम्यवाद का प्रभाव सभी समस्याओं के विस्तार का जनक माना जाता है। पश्चिम की अंध नकल भी समाधान में बाधक होती है। भारत ने या तो साम्यवाद की नकल की या पश्चिम की। दो वर्षो से नरेन्द्र मोदी सरकार धीरे धीरे भारतीय विचारधारा तथा पश्चिम की विचारधारा के बीच सामंजस्य स्थापित करके सुधार का प्रयास कर रही है। चोरी, डकैती, लूट, जालसाजी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता पर कुछ नियंत्रण हुआ है। नक्सलवाद अथवा कश्मीर का आतंकवाद धीरे धीरे समाप्त हो रहा है। किन्तु बलात्कार, श्रम शोषण और मिलावट पर अभी कोई परिणाम नहीं दिखा है। इसी तरह साम्प्रदायिकता पर भी पर्याप्त सुधार हुआ है। मुस्लिम साम्प्रदायिकता तो रुकी ही है किन्तु संघ परिवार की साम्प्रदायिकता भी संकट के घेरे में आती जा रही है। जातिवाद,महिला उत्पीडन जैसी कृत्रिम समस्याओं पर अभी काम नहीं हुआ है अथवा मोदी सरकार अभी इस पर कुछ समझ नहीेें पा रही है।
सबसे बडी समस्या वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष को बढाकर वर्ग संघर्ष की दिशा में रही है। इसका वास्तविक समाधान तो वर्ग समन्वय से ही संभव था किन्तु इसके ठीक विपरीत पिछली सरकारों ने वर्ग समन्वय को कमजोर करके वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेश को लगातार बढाया। ये आधार है धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रियता, उम्र, लिंग, गरीब अमीर, किसान मजदूर, शहर ग्रामीण आदि। इनमें मोदी जी ने भाषा के मामले में पहल करके करीब करीब ठीक दिशा पकड ली हैं। समान नागरिक संहिता की आवाज बुलंद करके साम्प्रदायिकता, जाति भेद, लिंग भेद, पर भी नकेल कसने की तैयारी है। अन्य मामलों में भी नरेन्द्र मोदी सरकार धीरे धीरे कदम उठा रही है। जिस तरह 67 वर्षो तक समस्याएॅ बढी या बढायी गई और उनका जितना बडा भण्डार इक्कठा हो गया है। उन पर नियंत्रण करना कोई साधारण काम नहीं । उन परिस्थितियों में तो यह काम और भी कठिन हो जाता है जब जे एन यू से पढे हुये छात्र निकल कर न्यायपालिका और कार्यपालिका के महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हो तथा समाधानकर्ता की यह मजबूरी हो कि उसे इन सबको साथ लेकर ही आगे बढना होगा। आप कल्पना कर सकते हैं कि कार्य कितना कठिन है फिर भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व की भारत सरकार धीरे धीरे एक एक समस्या को हल करने की दिशा में निरंतर बढ रही है।
फिर भी अभी मोदी जी के लिए अनेक काम करने बाकी है जिनकी अभी शुरुवात भी नहीं हुई है। कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि की दिशा में अब तक कोई कदम नहीं बढाया गया है जबकि श्रम शोषण, आर्थिक असमानता, पर्यावरण प्रदूषण सहित सब प्रकार की आर्थिक समस्याओं के समाधान में इसका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।
समान नागरिक संहिता और समान आचार संहिता के बीच का अंतर या तो मोदी जी अब तक स्वयं नहीं समझ पाये है अथवा वे प्रतिक्षा कर रहे हैं। इसी तरह अपराध गैरकानूनी और असामाजिक समस्याओं के वर्गीकरण की दिशा में भी कोई प्रयत्न नहीं दिख रहा है। मैं मानता हॅू कि भारत में विचार मंथन का अभाव इसके लिए सर्वाधिक दोषी है। हम सारा दोष सरकार पर ही नहीं डाल सकते। विचार मंथन ही सरकार को नई दिशा दे सकता है। हमें पूरा प्रयत्न करके अन्य उन मुददों पर सरकार को सलाह देनी चाहिए जिनके विषय में अब तक सरकार ठीक दिशा में नहीं सोच पा रही है।
मैं आश्वस्त हॅू कि नरेन्द्र मोदी के आने के बाद भारत की समस्याओं के समाधान की गति ठीक दिशा में और ठीक गति से आगे बढ रही है। हमारा कर्तव्य है कि हम इस गति को और बढाने में सहायक हो । हम निरंतर विचार मंथन को प्रोत्साहित करें,जनमत जागृत करें,सरकार को उचित सलाह भी दें तथा सरकार के सही कार्यो का पूरा पूरा समर्थन भी करें तभी इतनी पुरानी जड पकड चुकी समस्याओं का समाधान संभव हैं।
नोट- मंथन क्रमांक 9 का विषय होगा-किसान आत्महत्या की एक समीक्षा

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