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मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?

Posted By: kaashindia on January 30, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की किन्तु उपरोक्त दोनो अवधारणाओ का गांधी को समर्थन नही मिला। गोडसे कटटरवादी हिन्दूत्व की धारणाओ से ओत प्रोत था तो पंडित नेहरू हिन्दुत्व विरोधी अवधारणाओ के प्रतीक रहे।
व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। 1 संचालक 2 संचालित। संचालक को अंग्रेजी मे मोटिवेटर कहते है और संचालित को मोटिवेटेड। जो विचारधारा संचालक की मृत्यु के पश्चात भी बढती जाती है वह विचार धारा वाद बन जाती है और जो संचालित होते है वे ऐसी विचार धारा के भक्त हो जाते है। स्वामी दयानंद हेडगेवार गांधी संचालक की श्र्रेणी मे माने जा सकते है। इसी तरह पंडित नेहरू को भी हम संचालक मान सकते है और गोडसे को संचालित । स्पष्ट है कि संचालक बुद्धि प्रधान होता है संचालित भावना प्रधान। गोडसे किसी विचार धारा से प्रभावित था, नेहरू की अपनी स्वयं की विचार धारा थी। नेहरू ने गांधी के साथ स्वतंत्रता संघर्ष मे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया किन्तु नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन को छोडकर किसी भी मामले मे कभी गांधी विचारो से सहमत नही रहे । गोडसे कटटर वादी हिन्दुत्व की विचार धारा के प्रति पूर्ण समर्पित था तो नेहरू किसी के प्रति कभी समर्पित नही रहे।
स्वतंत्रता के शीघ्र बाद गोडसे ने गांधी के शरीर की हत्या कर दी और पंडित नेहरू ने विचारो की । गांधी हत्या के साथ गांधी युग भी समाप्त हो गया और गांधी विचार भी । क्योकि एक पक्ष गांधी के नाम का विरोधी था तो दूसरा गांधी विचार का। मै यह कह सकता हॅू कि गांधी की हत्या गोडसे के मूर्खता पूर्ण कार्य का परिणाम थी। गोडसे की इस मूर्खता ने पंडित नेहरू का काम और आसान कर दिया क्योकि यदि गांधी जीवित रहते तो पंडित नेहरू को परेशानी हो सकती थी। गोडसे की मूर्खता ने संध को भी अल्पकाल के लिये प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। जिससे नेहरू जी को और आसानी हो गई।
पंडित नेहरू का कार्य ठीक था और नीयत पर हमेशा संदेह रहा। उनका व्यक्ति गत जीवन भी गांधी के विपरीत था तथा सामाजिक जीवन भी । गांधी अकेन्दित और न्यूनतम शासन के पक्षधर थे तो नेहरू केन्द्रित ओर अधिकतम शासन के । गांधी किसी की नकल न करके देश काल परिस्थिति अनुसार स्वतंत्र कार्य प्रणाली के पक्षधर थे तो नेहरू पश्चिम या साम्यवाद की नकल करते थे। दूसरी ओर गोडसे का कार्य गलत था किन्तु नीयत ठीक थी । गोडसे की नीयत मे अंध राष्ट भक्ति थी तो नेहरू की नीयत मे व्यक्तिगत और परिवारिक स्वार्थ भी छिपा हुआ था। नेहरू ने लम्बी जेल काटी । इस उम्मीद के साथ कि स्वतंत्र भारत मे उन्हे कुछ न कुछ सत्ता का लाभ मिलेगा। दूसरी ओर गोडसे यह जानता था कि गांधी हत्या के बाद उसे फांसी ही होगी, और जीवित रहने का कोई व्यक्गित या पारिवारिक लाभ नही मिलेगा । प्रश्न उठता है कि दोनो की तुलना मे ठीक कौन? यह स्पष्ट है कि गोडसे के कार्य और नेहरू की सोच ने मिलकर देश को अपूर्णनीय क्षति पहुंचाई और आज तक उसका परिणाम भारत भुगत रहा है। प्रश्न उठता है कि यदि एक पिता ने अपने परिवार के कष्ट दूर करने के लिये किसी ज्योतिशी के समझाने से अपने पूत्र की बलि चढा दी तो उस पिता ने किस सीमा तक गलत किया । एक मूर्ख्र ने अपने पिता द्वारा बहुत मेहनत से इकठठा की गर्इ्र चंदन की लकडी को चाय बनाने मे जला दिया तो पूत्र कितना अपराधी? यदि किसी मूर्ख पुत्र ने अपने पिता की गर्दन मे लिपटा जहरीला साप देखकर साप सहित गर्दन काट दी तो पुत्र कितना अपराधी ? यदि गोडसे ने किसी विचार धारा से प्रभावित होकर गांधी हत्या को ही राष्ट की समस्याओ का उचित समाधान मानकर उनकी हत्या कर दी तो गोडसे का कार्य कितना गलत माना जाय और कितनी गलत? यदि किसी व्यक्ति का कार्य गलत होता है तो कानून उसे दंडित करता है। इस तरह गोडसे को कानून के द्वारा फॉसी दिया जाना उचित कदम है। किन्तु भारत मे अभिव्यक्ति की आजादी है। ऐसी आजादी का दुरूपयोग करके कोई संगठन सामान्य युवको को गलत दिशा मे जाने का उत्प्रेरित करे तो ऐसे संगठन की विचार धारा को समाज ही चुनौती दे सकता है कानून नही, सरकार नही। दुर्भाग्य है कि भारत मे ऐसी विचार धारा भी आजतक विस्तार पा रही है क्योकि उसे चुनौती देने की अपेक्षा उसकी गलतियो का लाभ उठाने का प्रयास हो रहा है।
भारत के लिये आदर्श स्थिति होती कि गोडसे सरीखा देश भक्त बालक गांधी के सम्पर्क मे आया होता तो आज नेहरू की विचार धारा की तुलना मे गांधी की विचार धारा गोडसे के माध्यम से अधिक अच्छी तरह स्थापित हो पाती परन्तु ऐसा नही हुआ और गोडसे एक गलत विचार धारा के प्रभाव मे चला गया और उसके दुष्परिणाम आज तक हम देख रहे है।
वर्तमान स्थिति मे अब पुनः भारत को तीस जनवरी 1947 से अपनी विचार यात्रा प्रारंभ करनी चाहिये। दोनो ही विचार धाराए भारत के लिये धातक है। चाहे वह गोडसे की हो या नेहरू की । गोडसे से घृणा और नेहरू का महिमामंडन भारत के लिये घातक है। क्योकि गोडसे की क्रिया गलत थी नीयत राष्ट भक्ति की और नेहरू की क्रिया ठीक थी नीयत अपने व्यक्तिगत उत्थान की। दोनो की उचित समीक्षा करके भारत को नये मार्ग पर चलना चाहिये । मेरा स्पष्ट मत है कि भारत को कटटर वादी हिन्दूत्व और विदेशो की अन्धाधुंध नकल का मार्ग छोडकर अपने भारतीय यथार्थ को देश काल परिस्थिति की कसौटी पर कसकर नया मार्ग तलाशना चाहिये । गांधी हमारे आदर्श थे, हैं और भविष्य मे भी मार्ग दर्शक बने रहेंगे।
नोट- अगला विषय होगा ‘‘सावधान, युग बदल रहा है‘‘।

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