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जे एन यू संस्कृति और भारत

Posted By: kaashindia on January 31, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू या भारतीय संस्कृति भी कहते हैं, तो नेहरु विचारधारा में आर्य संस्कारों को छोड़कर पाश्चात्य , इस्लामिक, साम्यवादी तथा अन्य सबका मिलाजुला समावेश था। इसमें भी सर्वाधिक प्रभाव समाजवादी धारा का था। तीसरी साम्प्रदायिक विचारधारा का प्रभाव नहीं था क्योंकि विभाजन के बाद मुस्लिम धारा प्रभावहीन हुई तो गॉधी हत्या के बाद संघ विचार भी कटघरे में आ गया। फिर भी संघ परिवार ने हिन्दू शब्द पर अपना अधिकार जमाया तो साम्यवाद ने समाज शब्द पर जबकि दोनों का ही न हिन्दू शब्द से कभी कुछ लेना देना रहा न ही समाज शब्द से।
गॉधी विचारधारा का मुख्य तत्व है सामाजिक राजनीति और नेहरु विचारधारा का है राजनैतिक समाज। गांधी मानते थे लोकतांत्रिक संसद और नेहरु मानते थे संसदीय लोकतंत्र। गॉधी तंत्र को प्रबंधक मानते थे तो नेहरु तंत्र को संरक्षक। गॉधी विचारधारा में सत्य, अहिंसा, वर्ग समन्वय, हिन्दुत्व, व्यक्ति स्वतंत्रता, सहजीवन, अधिकारों का अकेन्द्रियकरण, कर्तव्य प्रधानता, श्रम सम्मान, नैतिकता, संस्थागत चरित्र, सत्ता का अकेन्द्रियकरण आदि गुण माने जाते हैं। दूसरी ओर नेहरु विचार धारा में चालाकी, बल प्रयोग, वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेष, उच्चश्रृंखलता अल्पसंख्यक प्रोत्साहन, सुशासन, कुटनीति, अधिकार प्रधानता, संगठन शक्ति, बुद्धिजीवी महत्व आदि शामिल रहे। गॉधी की हत्या होते ही नेहरु संस्कृति सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करने लगी। गॉधी विचारधारा को आगे बढाने के लिए बनी संस्था सर्वोदय भी नेहरु विचारों से प्रभावित होती चली गई क्योंकि सर्वोदय परिवार में संस्कारित और चरित्रवान लोगों का बाहुल्य रहा है। ये लोग चालाकी को न समझ कर संघ विचार को ही हिन्दू संस्कृति मानने लगे और सर्वोदय गॉधी के अभाव में नेहरु की ओर झुकता चला गया।
कुछ वर्ष बाद ही पंडित नेहरु ने अपनी विचारधारा के विस्तार के लिए जवाहर लाल नेहरु युनिवर्सिटी की स्थापना की और धीरे धीरे उसे भारत की सर्वश्रेष्ठ युनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया । जे एन यू इस तरह नेहरु की विचारधारा के संवाहक और पोषक के रुप में काम करने लगी। वहॉ से अनेक स्थापित विद्वान निकले जिनमें से अधिकांश वामपंथी विचारों के संवाहक रहे। दूसरी ओर उसी नेहरु की पारिवारिक सत्ता ने जे एन यू से निकले विद्वानों को देश के महत्वपूर्ण राजनैतिक सामाजिक साहित्यिक पदों पर स्थापित करना शुरु कर दिया । इस तरह सत्ता और जे एन यू संस्कृति के तालमेल ने पूरे देश में जे एन यू संस्कृति को एक राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त विचार धारा के रुप में स्थापित कर दिया जो 65 वर्षो तक निरंतर फलती फूलती रही।
भारत में हिंसा ,चरित्रपतन, वर्ग विद्वेष, अल्प संख्यक तुष्टिकरण, सत्ता का केन्द्रियकरण, संगठनो का टकराव जैसी समस्याए सत्ता और जे एन यू संस्कृति के तालमेल का ही परिणाम रही। इस विचारधारा ने नेहरु की सोच से भी आगे बढकर लोक को संरक्षक की जगह शासक,वर्ग विद्वेश की जगह वर्ग संघर्ष, बुद्धिजीवी प्रोत्साहन की जगह श्रम शोषण, अल्पसंख्यक प्रोत्साहन की जगह हिन्दू विरोध, कूटनीति की जगह धूर्तता,बल प्रयोग की जगह हिंसा जैसी बुराईयों को बढाया। जे एन यू ने कोई ऐसा अवसर नहीं छोडा जिसने गॉधी विचारधारा को पराजित और अपमानित न किया हो। जे एन यू में खुलेआम नक्सलियों द्वारा भारतीय सैनिको की हत्या को सम्मानित किया गया। साम्यवाद धर्म को अफीम कहता है और रामकृष्ण, देवी दुर्गा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता किन्तु हिन्दुत्व को अपमानित करने के लिए रावण, कुँभ करण और महिशासुर का अस्तित्व स्वीकार करता है। चीन और भारत के टकराव के समय भी जे एन यू की विचारधारा विपरीत ही दिखती है। कश्मीर के मामले में जे एन यू बिल्कुल नग्न स्वरुप में सामने आता है और अल्प संख्यकों का तो वह प्रमुख वकील बन जाता है । जे एन यू में सबसे पहले बालिग होते ही चरित्रहीनता का प्रशिक्षण दिया जाता है और उन्हे भावना विहीन बनाया जाता है। महिला और पुरुष के बीच की दूरी घटाने के प्रशिक्षण का पूरा नेतृत्व जे एन यू के पास है किन्तु महिला अधिकार के लिए वर्ग संघर्ष का तानाबाना भी जे एन यू ही बुनता रहता है। यदि महिला पुरुष के बीच दूरी घटने का मामूली सा भी दुष्परिणाम दिखा तो जे एन यू आसमान सर पर उठा लेता है। यदि ठीक से सर्वेक्षण किया जाये तो जे एन यू प्रशिक्षित आन्दोलनकारी महिलाओ का व्यक्तिगत जीवन परम्परागत महिलाओं की तुलना में अधिक परिवार तोडक और दुश्चरित होना संभव है। जे एन यू से प्रशिक्षण प्राप्त साहित्यकार ,कलाकार, लेखक और कवि आदिवासी गैर आदिवासी, सवर्ण हरिजन, गरीब अमीर, श्रमजीवी पूॅजीपति, महिला और पुरुष युवा वृद्ध के नारे पर एक वर्ग के पक्ष में वातावरण बनाते हैं और उसी संस्कृति के पोषक शासकीय अधिकारी, न्यायाधीश , और नेता उस वातावरण को सर्वाधिक महत्व देकर अनुपालन में कानून बना देते हैं। यह कानून वर्ग संघर्ष का आधार बन जाता है। मुझे याद है कि गोधरा में हुआ रेल अग्निकांड के समय जे एन यू के प्रचार और उनके अधिकारियों के समर्थन से यह असत्य भी सत्य के समान स्थापित हो गया कि रेलडब्बे में आग अंदर से लगाई गई थी, बाहरी भीड द्वारा नहीं। कल्पना की जा सकती है कि इतना सफेद झूठ भी सत्य के समान स्थापित कर दिया गया । मोदी के पूर्व तक भारत में जे एन यू संस्कृति का इतना प्रभाव था कि उसे सर्व सत्ता सम्पन्न तक माना जाता था और भारत में किसी की ऐसी स्थिति नहीं थी कि उनके गलत कार्यो पर प्रश्न उठा सके। सत्ता, संसद, संविधान, साहित्य, कला आदि सब जगह चाहे पक्ष हो या विपक्ष, सब जगह जे एन यू संस्कृति के समर्थकों का एक छत्र साम्राज्य था।
मोदी जी के आने के बाद जे एन यू संस्कृति को चुनौती मिली। प्रारंभ में तो उस संस्कृति के स्थापित कलाकार साहित्यकार राजनेता जे एन यू के छात्रो को आगे करके टकराने का भरपूर प्रयोग किये। किन्तु संघ विचार धारा के सामने आने के बाद वे अब तक सफल नहीं हो सके हैं। यह सही है कि अब भी जे एन यू संस्कृति के पोषक अनेक लोग न्यायपालिका और कार्यपालिका में बैठकर पूरी ईमानदारी से सत्य को असत्य और असत्य को सत्य सिद्ध करते रहते हैं। ऐसे लोग पूरी तरह ईमानदार होते हैं किन्तु वे जिस संस्कृति में पले बढे हैं उस संस्कृति को ही वे श्रेष्ठ मान कर ईमानदारी से अपने कार्य करते रहते हैं। किन्तु यह भी सच है कि कालान्तर में जे एन यू संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर एकाधिकार समाप्त हो जायेगा।
मैं मानता हॅू कि जे एन यू संस्कृति का स्थान यदि संघ संस्कृति ने ले लिया तो वह भी घातक ही होगा क्योंकि एक नागनाथ और दूसरी सापनाथ है। किन्तु गॉधी की आर्य संस्कृति अभी इस स्थिति में नहीं है कि वह दोनों से एक साथ मुकाबला कर सके। इसलिये मजबूरी है कि अपनी सुरक्षा के लिये जे एन यू संस्कृति के समक्ष ताल ठोककर खडी संघ संस्कृति का पूरा समर्थन किया जाये । वैसे भी जे एन यू संस्कृति की तुलना मे संघ संस्कृति बहुत कम खतरनाक है तथा इसे सत्ता मे भी वैसा स्थान प्राप्त नहीं है जैसा जे एन यू संस्कृति का पिछली सरकारों के समय रहा । इसलिये हमारा कर्तव्य है कि हम भारत से जे एन यू संस्कृति के समापन के लिये पूरा प्रयास करें। हमें इतना अवश्य सतर्क रहना चाहिये कि नेहरू संस्कृति के विरूद्ध संघ संस्कृति का हम समर्थन सहयोग भले ही करें किन्तु उसे अपनी संस्कृति मानने की भूल न करे । क्योकि हमारी भारतीय संस्कृति तो वह आर्य संस्कृति है जिसके अनुपालन मे गांधी जी ने अपना सबकुछ लगाया। मेरा अपने मित्रों से निवेदन है कि वे इस संक्रमण काल मे सत्य के समान स्थापित असत्य को चुनौती देने का प्रयास करे और ऐसा प्रयास ही जे एन यू संस्कृति और संघ संस्कृति से सामूहिक मुकाबला कर सकता है।
मंथन का अगला विषय अपराध और अपराध नियंत्रण होगा।
कल शनिवार है! कल से जे एन यू संस्कृति और भारत विषय पर मंथन में चर्चा प्रारंभ होगी।

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