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मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।

Posted By: kaashindia on January 31, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में विकृति पैदा करती है। महापुरुष ऐसी विकृतियों के समाधान के लिए व्यवस्थाओं में संशोधन का प्रयास करते है तो लोकतांत्रिक देशो के राजनेता ऐेसी विकृतियों का लाभ उठाकर स्वयं को स्थापित करने की कोशिश करते है। समाज में कोई भी दो व्यक्ति एक समान सोच और क्षमता के नहीं होते। स्वाभाविक है कि किन्ही दो व्यक्तियों की नीयत भी एक समान नहीं होती। समाज के ठीक ठीक संचालन के लिए प्रत्येक व्यक्ति की अधिकतम स्वतंत्रता की सुरक्षा आवश्यक होती है। दूसरी ओर समाज के सुचारु संचालन के लिए सहजीवन भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। महापुरुष स्वतंत्रता और सहजीवन के बीच तालमेल की व्यवस्था करते है। तो चालाक लोग ऐसे तालमेल को तोडकर निरंतर वर्ग विद्वेष, वर्ग संघर्ष की दिशा में ले जाने का प्रयास करते है ।
एक प्राकृतिक अनिवार्यता है कि महिला और पुरुष की अपनी अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण रखते हुए भी दोनो के बीच एकत्रीकरण दोनो की अनिवार्य आवश्यकता है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि दोनो का एकत्रीकरण भिन्न परिवारों से होना चाहिए। इस तरह परिवार व्यवस्था हमारी अनिवार्यता है और परिवार किसी व्यवस्था के हिसाब से ही चलना चहिये। चालाक लोग महिला और पुरुष को दो वर्गो में विभाजित करके निरंतर टकराव का तानाबाना बुनते रहते है । ये कभी दोनों के बीच सामंजस्य का प्रयास नहीं करते बल्कि इनका हर प्रयास इन दोनो के बीच टकराव बढाने वाला होता हैं । पुराने जमाने में महिला और पुरुष के बीच अधिकारों की कोई छीनाझपटी नहीं थी। दोनों के अधिकारों का योग समान था। परिवार के सदस्य मिलकर कार्य विभाजन कर लेते थे जिसमें बाहर का काम पुरुष तथा घर का काम महिला के जिम्मे आमतौर पर होता था। धीरे धीरे पारिवारिक सहमति हटकर यह व्यवस्था रुढ हो गई और इस विकृति का चालाक लोगों ने लाभ उठाकर महिला सशक्तिकरण का एक घातक अभियान छेड दिया।
ये चालाक राजनेता दो भागों में बट गये। एक पुरानी परिवार व्यवस्था को उसी तरह बनाये रखने का पक्षधर हो गया तो दूसरा उस व्यवस्था को पूरी तरह बदलने का पक्षधर। इन लोगों ने सात आधारो पर समाज को तो पूरी तरह तोडकर छिन्न भिन्न कर दिया था किन्तु परिवार व्यवस्था अब तक नहीं तोडी जा सकी थी। महिला सशक्तिकरण का नारा अब सफलतापूर्वक उस कार्य को कर रहा है। मैं आज तक नहीं समझ सका कि महिला किससे सशक्त होना चाहती है पति से , पिता से , भाई से या अन्य किससे? वह परिवार से सशक्त होना चाहती है या समाज से। महिलाओं को यह स्पष्ट करना चाहिये कि उन्हें समान अधिकार चाहिये या विशेष अधिकार। आज तक किसी महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाली महिला ने इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया। यदि सशक्त होना है तो महिला या पुरुष को होना चाहिए या परिवार व्यवस्था को समाज व्यवस्था को। मैं मानता हॅू कि पुरुष प्रधान व्यवस्था को परिवार की सहमति से हटकर रुढ हो जाने से कुछ विकृतियाॅ आयी है किन्तु महिला सशक्तिकरण उसका किसी भी रुप में कोई समाधान न होकर बल्कि एक बडी परिवार तोडक, समाज तोडक समस्या के रुप में विस्तार पा रही है। महिला और पुरुष परिवार में आपस में बैठकर अपने निर्णय करें। इसमें किसी अन्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये किन्तु कुछ आधुनिक महिलाये किसी परिवार रुपी खुंटे से बंधकर नहीं रहना चाहती। उन्हें पूरी आजादी चाहिए भले ही उसके दुष्परिणाम कुछ भी क्यों न हो। ऐसी महिलाओं को यदि अपनी स्वतंत्रता में सुख मिलता है तो हमें इससे कोई आपत्ति नहीं। वे अपनी नाक कटाने में भगवान का दर्शन करने को स्वतंत्र हैं किन्तु उन्हें कोई अधिकार नहीं कि वे अन्य परिवारों की महिलाओं में यह विकृत भावना विकसित करें। मैं तो देख रहा हॅू कि आज देश के राजनेता पूरी ताकत से महिला सशक्तिकरण जैसे घातक नारे के विस्तार में लगे हुये है। इन्हे एक ओर तो महिलाओं को सशक्त देखने का प्रयास भी करना पडता है तो दूसरी ओर महिलाओं की घटती हुई संख्या के कारण पुरुषों के समझ होने वाली कठिनाइयों की भी चिंता बनी रहती है। मैं आज तक नहीं समझा कि महिलाओें की संख्या भी बढे और महिलाओं की शक्ति भी बढे ये दोनों कार्य एक साथ कैसे संभव है। यदि महिलाओं की मांग बढेगी तो उनकी शक्ति अपने आप बढेगी और यदि महिलाओं की आवश्यकता कम होगी तो शक्ति पर बुरा प्रभाव पडेगा किन्तु राजनेताओं को इस बात की कोई चिंता नहीं।
हमारे संत गुरु भी परम्परागत परिवार व्यवस्था में कोई संशोधन न करके महिला सशक्तिकरण का घातक समर्थन कर रहे है। स्पष्ट है कि परिवार में महिलाओं को सम्पत्ति तथा परिवार संचालन में समानता का अधिकार मिलना चाहिए जो अभी एकपक्षीय रुप से पुरुषों के पक्ष में है। हमारे संत लोग कोई ऐसे प्रयास नहीं कर रहे है कि परिवार में सम्पत्ति और परिवार संचालन में महिला पुरुष का कोई भेद भाव न रहे अर्थात कानूनी और सामाजिक आधार पर सम्पत्ति और परिवार संचालन में सब समान हो। हमारे नासमझ संत हमारे धूर्त राजनेताओं के चक्कर में फंसकर महिला सशक्तिकरण का घातक नारा लगाने में सहयोग करने लगे है, जो ठीक नहीं। परिवार व्यवस्था लोकतांत्रिक हो इसमें हमारे संत महात्माओं को बुराई दिखती है। तो दूसरी ओर महिला सशक्तिकरण जैसी घातक बीमारी में उन्हें कोई बुराई नहीं दिखती । यहाॅ तक कि अनेक संतगुरु तो अन्य सामाजिक कार्य छोडकर बेटी बचाओं जैसे नारे के प्रचार में ही लग गये है।
किसी भी व्यक्ति को यदि विशेष शक्ति दी जाती है तो उसके दुरुपयोग की संभावना भी बनी रहती है और उस पर नियंत्रण के लिए भी विशेष प्रयास करने पडते है किन्तु यदि किसी वर्ग को विशेष अधिकार दिये जाये तो उस वर्ग के धूर्त लोग समाज के अन्य शरीफ लोगों का भरपूर शोषण करते है। परिणामस्वरुप धूर्तो की शक्ति मजबूत होती जाती है। आज यदि भारत में धुर्तता अधिक शक्तिशाली हो रही है तो उसका एक मात्र कारण है विभिन्न वर्गो को विशेष अधिकार दिया जाना। महिला सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं को विशेष अधिकार दिया जाना भी धूर्त महिलाओं द्वारा शरीफ पुरुषों के शोषण का हथियार बनना निष्चित है बल्कि आमतौर पर देखा जा रहा है कि मुट्ठी भर धूर्त महिलाए शरीफ परिवारों की महिलाओं तक का शोषण करती है। सास और बहू में जो जितनी अधिक धूर्त होगी वह उतनी ही अधिक शरीफ महिला का शोषण करेगी क्योंकि भारत का महिला सशक्तिकरण का नारा धूर्त महिलाओं के लिए एक हथियार का काम करता है। धुर्तो का सशक्तिकरण हमेशा अन्यायपूर्ण होता है और इसलिए किसी वर्ग को कभी भी विशेषधिकार नहीं देना चाहिए।
आज भारत में संवैधानिक रुप से सबको समान अधिकार प्राप्त है। उस अधिकार में किसी भी रुप में छेडछाड करना उचित नहीं किन्तु स्वार्थी तत्व महिला सशक्तिकरण के नाम पर निरंतर ऐसी छेडछाड में व्यस्त हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम महिला सशक्तिकरण के घातक नारे के विरुद्ध जनमत जागृत करें। जो पुरुष अन्जाने में भ्रमवश इस नारे का समर्थन कर रहे है उन्हें हम वास्तविकता समझाने का प्रयास करें। जो लोग वर्तमान सामाजिक विकृति में किसी प्रकार के किसी संशोधन के विरुद्ध है उन्हें भी हम सहमत करें कि वे महिला पुरुष के बीच भेदभाव को न चलने दें। हम सरकार को भी तैयार करें कि वह महिला सशक्तिकरण जैसे घातक प्रयास को छोड दें किन्तु सबसे अधिक सतर्कता उन महिलाओं से आवश्यक है जो अपनी नाक कटने में भगवान का दर्शन होने का घातक विचार समाज में फैला रही है। इन महिलाओं के पास न तो कुछ अन्य लिखने को है,न बोलने को। ये परम स्वतंत्र है। इन्हें न परिवार चलाना है न समाज चलाना है। या तो ऐसी मुट्ठी भर महिलाये अपने शारीरिक या भौतिक सुख के लिए ऐसा दुष्प्रचार करती है या ये किसी विदेशी एजेंट के रुप में विदेशी धन लेकर यह महिला सशक्तिकरण का नारा प्रचारित करती है। हमें इस मामले में सतर्कता बरतनी चाहिए कि हमारे परिवारों की महिलाओं के बीच इस घातक दुष्प्रचार के विषाणू पैदा न हो पावे। ऐसी मुट्ठी भर पेशेवर महिलाओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। बल्कि मैं तो यहाॅ तक सोचता हॅू कि इस प्रकार की विचारधारा युक्त महिलाओं का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए। किसी परिवार के सदस्य अपने आंतरिक जीवन में मिल बैठकर अपना निर्णय करने के लिए स्वतंत्र हों यहाॅ तक उचित है किन्तु उनके आंतरिक मामलों में टकराव पैदा करने का प्रयास बहुत अधिक घातक होगा। यह भी एक सच्चाई है । परिवार व्यवस्था स्त्री और पुरुष के बीच मिलकर तीन पैर की दौड के समान है जिसमें दोनों को मिलकर उसके तरीके खोजने है । बाहर के लोगों की सलाह या कानूनी हस्तक्षेप उस प्रतिस्पर्धा में हमेशा नुकसान दायक होगा। इस दौड में पुरुष को मजबूत होना चाहिए या महिला को यह वे दोनों मिलकर तय करेंगे अथवा वे बाहर के लोग जो स्वयं इस दौड में प्रतिस्पर्धी है। दुर्भाग्य से बाहर के लोग परिवार व्यवस्था में हस्तक्षेप करने में सफल हो रहे है जिसमें सरकार और ऐसे चालाक लोगों के बीच एक तालमेल दिख रहा है। हमारे लिए उचित है कि हम महिला सशक्तिकरण के प्रयास के नाम पर हो रही किसी भी ऐसी योजना को विफल करने में भरपूर सहयोग करें। इस निमित्त हमें चार काम करने चाहिये-1 पारंपरिक परिवार व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था को प्रोत्साहित करें। 2 पुरुषों को इस बात के लिए तैयार करे कि महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार करने की आदत डाले। 3 महिलाओं को इस बात के लिए तैयार करे कि उनके साथ किसी तरह का कोई अन्याय नहीं हो रहा है बल्कि अन्याय का प्रचार करके सहजीवन और परिवार व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुॅचायी जा रही है। 4 महिलाओं को यह भी आभाष कराया जाये कि यदि पति पत्नी के बीच अविश्वाश की दीवार खडी होगी तो वह महिलाओं के लिए भी हानिकारक होगी। क्योंकि महिला और पुरुष एक दूसरे के पूरक है। यदि अविश्वाश होगा तो संतानउत्पत्ति में भी कठिनाई होगी और उनके लालन पालन संस्कार में भी। यदि हम ये चार बातें समझाने में सफल हो जाये तो महिला सशक्तिकरण का नारा लगाने वाले स्वार्थी तत्व अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पायेंगे। मंथन क्रमांक 23 का अगला विषय ‘हमारे मौलिक अधिकार’ होगा।

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