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मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख

Posted By: kaashindia on January 31, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्ति की स्वयं की भूमिका न हो। यदि ऐसी कोई भूमिका भी हो तो भूमिका के बाद संभावित परिणाम के आकलन और यथार्थ के बीच ही सुख और दुख होता है।
इस विषय को मैं कुछ वास्तविक घटनाओं से समझाता हॅू। मेरे एक मित्र अपने लडके के विवाह के लिए लडकी तय करने गये। तय करके जब वापस लौट रहे थे तो बस एक्सीडेंट हो गई जिसमें दो तीन अन्य यात्री मर गये और मेरे मित्र को मामूली चोट आई। उन्होने वह रिस्ता यह कहकर तोड दिया कि आने वाली बहू के लक्षण ठीक नहीं हैं। रामानुजगंज वापस आने के बाद मैंने उस घटना को सुनकर उन्हें धन्यवाद दिया कि आपकी आने वाली बहु बहुत सुलक्षण है जिससे आप इतने गंभीर एक्सीडेंट में भी मामूली चोट से बच गये। उनकी भावना तुरन्त बदल गई और उन्होने खबर भेजकर वह रिस्ता फिर से स्वीकार कर लिया। इसी तरह मेरे कई रिश्तेदार है जिनके विषय में मेरा अनुमान रहता है कि मेरे जाने पर किसका व्यवहार कैसा होगा। जिसके विषय में मेरा अनुमान रहता है कि वे खडे होकर हाथ जोडकर स्वागत करेंगे। वे अगर बैठे रहे तो मुझे दुख होता है । दूसरी ओर जिनके विषय में मैं अनुमान करता हॅू कि वे बैठे बैठे ही इशारे से ही सम्मान करेंगे वे यदि बैठे बैठे भी हाथ जोडकर मेरा सम्मान करें तो मैं प्रसन्न हो जाता हॅू। मेरे परिवार में कई लोग है। एक सदस्य किसी स्टाफ को बहुत डाटकर बोलता है और उसे दुख नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि उनकी ऐसी ही आदत है। दूसरी ओर मैं किसी को कभी नहीं डाटता । यदि उसी व्यक्ति को मैंने सिर्फ यह कह दिया कि उसने गम्भीर गलती की है तो वह दिन भर खाना नहीं खायेगा। स्पष्ट है कि किसी घटना से होने वाले परिणाम का संभावित आकलन ही सुख और दुख का आधार होता है। मेरे उस स्टाफ का अलग अलग आकलन उसके अलग अलग सुख दुख का आधार बना।
मेरे एक मित्र बरियों में रहते है । जब मिलते है तो इस बात से दुखी रहते है कि सब कुछ बिगड गया है। उनके लडके भी अलग रास्ते पर चलने लगे है और उनकी नहीं सुनते। वे सम्पूर्ण समाज व्यवस्था को भी बहुत गिरी हुई मानते हैं। मेरे परिवार के एक बडे बुजुर्ग भी लगभग इसी तरह अपने बच्चों को गलत मानते है। मैं फेसबुक में शरद कुमार जी की पीडा पढता रहता हॅू। वे अपने बच्चो,पत्नी तथा अन्य कुछ रिश्तेदारो के व्यवहार से भी बहुत दुखी रहते है। दूसरी ओर मैं स्वयं को देखता हॅू तो पाता हॅू कि मैं दुनिया का सबसे अधिक सुखी व्यक्ति हॅू। मेरे परिवार के लोग रिश्तेदार ,मित्र और यहाॅ तक कि स्टाफ के लोग भी कभी ऐसा काम नहीं करते जिससे मुझे कभी कोई दुख हो। इन दोनों बातों से होने वाले सुख और दुख में सामने वाला व्यक्ति कम और व्यक्ति स्वयं अधिक दोशी है क्योंकि व्यक्ति सामने वाले की सोच परिस्थितियाॅ और नीयत का आकलन किये बिना उससे कुछ उम्मीदे करने लगता है जो पूरी नहीं होती अथवा विपरीत होती हैं तब उसे दुख होता है। वास्तविकता यह है कि दुख होने का कारण व्यक्ति का स्वयं का गलत अनुमान है। यदि आप किसी बैठक में जा रहे है और आपने अनुमान किया है कि इस बैठक में 15 लोग आ सकते है। यदि 20 लोग आते है तो आप प्रसन्न और 10 आते है तो दुखी होंगे। कल्पना करिये कि आपने 25 का अनुमान किया है तब 20 आये तो आप दुखी और 10 आये तो नाराज हो जायेंगे। आपकी प्रसन्नता और नाराजगी का संबंध आने वालो की संख्या से नहीं है और आप प्रसन्न या दुखी होकर संख्या को घटा बढा भी नहीं सकते। स्पष्ट है कि आपका गलत आकलन ही आपके सुख और दुख का कारण बना। आप किसी यात्रा में अनुमान किये कि यह ट्रेन 2 घंटे लेट पहुचेगी और वह 1 घंटे ही लेट पहुची तो आप प्रसन्न हो गये और जब वह 3 घंटे लेट पहुंची तो आप दुखी हो गये। स्पष्ट है कि आपका अनुमान ही सुख दुख का कारण था ट्रेन नहीं।
अनेक लोग दूसरों से बहुत अपेक्षाए करते है और उन अपेक्षाओं के आधार पर परिणाम का आकलन कर लेते है। अपेक्षाए भी यथार्थ नहीं होती और परिणाम भी वैसे नहीं होते। अतीत का अनुभव लिये बिना यदि आप काल्पनिक अपेक्षाए करते है तो गलत आप है, सामने वाला नहीं। हमेशा दिमाग में सर्वश्रेष्ठ संभव का सिद्धांत बनाकर रखना चाहिये। जो लोग सर्वश्रेष्ठ का सिद्धांत मानकर चलते है वे अपने जीवन में अंत तक स्वयं भी दुखी रहते है तथा अपने अन्य सम्पर्को को भी निरंतर दुखी रखते है। जो कुछ हो रहा है और उपलब्ध है उसमें सर्वश्रेष्ठ क्या है उसी से संतुष्ट रहना चाहिये और उसी संतुष्टी में सुख का अनुभव करना चाहिये। भगवान बुद्ध के समान संसार दुखो का समुद्र है इस धारणा को मैं गलत मानता हॅू क्योंकि बुद्ध के समय हो सकता है कि ऐसा हो किन्तु वर्तमान समय में तो मैं बिल्कुल ऐसा नहीे देखता।
मेरे विचार से सुख और दुख के प्रभाव से बचने के लिए संभावित परिणाम का अनुमान सही होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। कोई भी व्यक्ति खुश रहने के लिए जानबुझकर अपने अनुमान को घटा बढा नहीं सकता। अनुमान बौद्धिक आकलन से होता है और सुख दुख भावनात्मक। भावना प्रधान लोग जल्दी सुख दुख से प्रभावित हो जाते है क्योंकि उनका अनुमान ही गलत होता है। जबकि बुद्धि प्रधान लोग सुख और दुख से कम प्रभावित होते है क्योंकि उनका अनुमान यथार्थ के नजदीक होता है। भावना प्रधान लोगों के लिए सुख और दुख से बचने का एक और मार्ग है कि वे किसी भी अप्रत्याषित परिणाम के लिए अपना सुख और दुख ईश्वर पर छोड दे अर्थात जो भी हुआ वह स्वाभाविक था,ईश्वर की मर्जी थी और उसमें किसी का कोई दोष नहीं है। इस तरह ईश्वर को शामिल कर लेने से भी सुख और दुख में कुछ कमी की जा सकती है। मैं चाहता हॅू कि हम सुख और दुख के मामले में अपने सोचने के तरीके में कुछ बदलाव करने का प्रयास करें।
मंथन क्रमांक 25 का अगला विषय निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण होगा।

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