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मंथन क्रमांक-113 ’’पर्यावरण प्रदूषण’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा पंच रचित यह अधम शरीरा। इसका आशय है कि दुनियां का प्रत्येक जीव इन्हीं पांच तत्वों के सन्तुलन एवं सम्मिलन से बना है;दुनियां का प्रत्येक व्य...
मंथन क्रमांक-112 ’’धर्म और सम्प्रदाय’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः दुनियां में जिस शब्द को अधिक प्रतिष्ठा मिलती है उस शब्द की नकल करके उसका वास्तविक अर्थ विकृत करने की परंपरा रही है। धर्म शब्द के साथ भी यही हुआ;धर्म शब्द के अनेक अर्...
मंथन क्रमांक-111’’ भारतीय राजनीति कितनी समाज सेवा कितना व्यवसाय– बजरं मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। समाज के सुचारू संचालन के लिये भारत की प्राचीन वर्ण व्यवस्था पूरी दुनियां के लिये आदर्श रही हैं। बाद में आयी कुछ विकृतियों ने इसे नुकसान पहुॅचाया;आदर्श वर्ण व्यवस्था में ...
मंथन क्रमाॅक-110 ’’हमारी प्राथमिकता चरित्र निर्माण या व्यवस्था परिवर्तन–बजरंग मुनि
कुछ निष्कर्ष हैं। मानवीय चेतना से नियंत्रित व्यवहार को चरित्र कहते हैं। चरित्र मानवता और नैतिकता से जुडा हुआ होता हैं;किये जाने योग्य कार्य करना नैतिकता हैं, किये जाने वाले कार्य न करना अन...
मंथन क्रमांक 109- आरक्षण- बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष है। 1 किसी भी प्रकार का आरक्षण घातक होता है, वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का आधार होता है। आरक्षण पूरी तरह समाप्त होना चाहिये। 2 किसी भी प्रकार का आरक्षण समाज मे शराफत को कमज...
मंथन क्रमांक- 108 ’’भारत की आदर्श अर्थनीति’’–बजरंग मुनि
कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- आर्थिक समस्याओं का सिर्फ आर्थिक समाधान होना चाहिये। किसी भी परिस्थिति में प्रशासनिक समाधान उचित नहीं है।भारत जैसे देश में आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों पर कर लगा...
मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद

Posted By: kaashindia on January 30, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीमाएं निर्धारित करता है। लोकतंत्र मे संविधान का शासन होता है और संसद सहित तीनो अंग संविधान के नियन्त्रण मे कार्य करते हैं। संविधान के नीचे संसद , संसद के नीचे कानून, कानून के अंतर्गत नागरिक होता है। कोई भी नागरिक, चाहे कितने भी बडे पद पर हो, किन्तु कानून से उपर नही हो सकता। तंत्र ही कानून बनाता है और उसका पालन भी कराता है। किन्तु यदि कानून बनाने वाला और पालन कराने वाला तंत्र ही संविधान भी संशोधित परिवर्तित करने लगे तो कानून और संविधान की अलग-अलग स्थिति ढोंग बन जाती है, जैसा भारत मे हो रहा है। तंत्र के पास जो शक्ति अर्थात ताकत होती है वह लोक की अमानत होती है, तंत्र का अधिकार नही। दुर्भाग्य से भारत मे तंत्र से जुडी तीनो इकाईयां संविधान से प्राप्त इस शक्ति को लोक की अमानत न समझकर अपना अधिकार समझने लगती है।
मैने कई जगह देखा है कि कुछ लोग अपने व्यावसायिक या अन्य कुत्सित उद्देश्यों की पूर्ति के लिये धर्म का सहारा लेते हैं। ये एक मंदिर बनाते हैं, उस मंदिर मे किसी भगवान या साई बाबा की मूर्ति स्थापित करते हैं, और स्वयं उसके पुजारी बन जाते है। यह मंदिर और भगवान उस पुजारी के सारे गलत कार्यो मे अप्रत्यक्ष सहायक होता है। मेरा एक मित्र साधु बनकर, मंदिर बनाकर, भगवान को स्थापित करके राजनेताओं को महिलाएं सप्लाई करने का धंधा करता था। मैने उससे किनारा किया। यह कोई एक घटना नहीं हो सकती। ठीक इसी तरह राजनीति भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये मंदिर और भगवान बनाकर स्वयं पुजारी के रूप मे उसकी संचालन बन जाती है। आप विचार करिये कि भारत में राजनीति के नाम पर ऐसा कौन सा अपराध बचा है जो नहीं किया जा रहा । यहां तक कि नरेन्द्र मोदी जी भी संसद मे जाने के पहले उसकी सीढियों को प्रणाम करने का नाटक कर के लोक के समक्ष यह प्रमाणित करते है कि संसद एक मंदिर है और संविधान भगवान। वहां जाने वाला हर नेता संविधान की शपथ लेता है और जब मर्जी उस संविधान मे फेर बदल भी कर देता है। मैं नही समझता कि इतना ढोंग करने का उद्देश्य क्या है।
कुछ बाते स्वयं सिद्ध दिख रही है। 1. किसी भी संविधान का मुख्य उद्देश्य स्वतः कानून का पालन कर रहे नागरिको को भयमुक्त तथा कानून का उल्लंघन करने वालो को पालन करने के लिये मजबूर करना होता है। भारत में संविधान के सक्रिय हुए लगभग सत्तर वर्ष हो गये और इतनी अवधि में कानून का पालन करने वाले कानून से भयभीत हैं और उल्लंघन करने वाले लगभग भयमुक्त।संविधान का कार्य तंत्र से जुडे तीनो अंगो के बीच समन्वय स्थापित करना होता है । भारत मे तंत्र से जुडे दो अंग न्यायपालिका और विधायिका आपस मे इतना नीचे उतर कर अधिकारों की छीना झपटी मे लगे हैं, जैसे दो लुटेरे लूट का माल बंटवारा करने मे झगडा करते हैं। स्पष्ट है कि लोक अर्थात समाज को वोट देने के अतिरिक्त सभी मामलो मे अधिकार विहीन करने का यह परिणाम है। आज हर प्रकार के अपराधियों का राजनीति के तरफ अधिक से अधिक बढता आकर्षण इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कही न कही लोक और तंत्र के बीच मालिक और गुलाम की स्थिति बिल्कुल विपरीत हो गई है। लोकतंत्र लोक नियंत्रित तंत्र की जगह तंत्र नियंत्रित लोक के समान बन गया है। स्थिति यहां तक खराब हो गई है कि अब तो जनहित की परिभाषा भी तंत्र ही करने लगा है। हमारे क्या अधिकार हों, यह तंत्र ही तय करेगा और तंत्र के क्या अधिकार हों वह स्वयं तय कर लेगा। हमारा वेतन कितना हो इसका अंतिम निर्णय तंत्र करेगा और तंत्र से जुडे लोगो का वेतन तंत्र स्वयं तय कर लेगा। उसमे कोई लोक से पूछने की आवश्यकता नहीं ।
हरियाणा मे जनहित मे शराब बंद हुई और कुछ वर्ष बाद जनहित मे ही शराब चालू हो गई। क्योकि जनहित की परिभाषा करने का अंतिम अधिकार शराब बंद और चालू करने वाले के पास ही था। उसने जब चाहा तब जनहित की मनमानी परिभाषा बना दी और यदि कही संविधान उसमे बाधक बना तो जनहित मे संविधान की ही व्याख्या बदल दी। इस प्रकार भारत का संविधान संसद का गुलाम है । गुलाम संविधान को माध्यम बनाकर भारत का तंत्र सत्तर वर्षो से समाज को गुलाम बनाकर रखे हुए है।
समस्या क्या है, यह बताने वाले तो आपको गली गली मिल जायेगे, किन्तु हमारा उद्देश्य सिर्फ समस्याओं का रोना नहीं है, बल्कि समाधान की चर्चा करना हैं। अनेक गुलाम यह कहते हुए भी दिख जाते है कि यदि हम सुधर जायेगे तो सब कुछ सुधर जायेगा। मै ऐसी गुलाम मानसिकता वालों मे शामिल नहीं हॅू । मैं तो समस्या के समाधान और उस समाधान मे अपनी प्रत्यक्ष भूमिका की चर्चा करना चाहता हॅू।
संविधान मे व्यापक संशोधन की आवश्यकता है, यह मैं भी समझता हॅू। किन्तु यदि हमने अपनी सुरक्षा के लिये किसी पहरेदार को बंदूक देकर सुरक्षा कर्मी नियुक्त किया और वह पहरेदार ही उस बंदूक से मुझे समाप्त करके सब कुछ ले लेने की नीयत कर ले तो यह तय करना बहुत कठिन है कि प्रारंभ कहां से किया जाये और उसका तरीका क्या हो? स्पष्ट है कि वह बंदूक उसके हाथ से लेना सबसे पहली प्राथमिकता है। आज हमारा संविधान ससंद के कब्जे में है और उस संविधान को संसद से मुक्त कराने के बाद ही हम कुछ अन्य व्यापक संशोधन की बात सोच सकते हैं । इसलिये हमारी सबसे पहली प्राथमिकता यह है कि संविधान संशोधन के संसद के असीम अधिकारो की स्थिति मे कुछ फेर बदल हो। इस संबंध मे कई प्रस्ताव हैं जिनमे एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह है कि एक लोक संसद भी बने और यह लोक संसद वर्तमान संसद के समकक्ष होे । इसका चुनाव और चुनाव प्रणाली संसद के ही समान हो और साथ साथ हो। किन्तु लोक संसद और वर्तमान संसद के अधिकार और दायित्व बिल्कुल अलग अलग हों। अर्थात लोक संसद वर्तमान संसद के संविधान संशोधन के एक मात्र अधिकार को छोडकर किसी भी कार्य मे कोई भूमिका अदा नहीं कर सकेगी। यदि कोई संविधान संशोधन का प्रस्ताव लोक संसद अथवा वर्तमान संसद के समक्ष आता है तो लोक संसद और वर्तमान संसद अलग अलग बैठकर सहमति के द्वारा ही संविधान संशोधन कर सकते हैं। यदि दोनो के बीच किसी विषय पर पूरी सहमति नही बनी और अंत तक टकराव कायम रहा तो उक्त संविधान संशोधन के लिये जनमत संग्रह अनिवार्य होगा। लोक संसद का कार्य सिर्फ संविधान संशोधन तक होगा । इसलिये उसकी सक्रियता बहुत कम होगी। इससे जुडे लोगो का कोई वेतन नही होगा, कोई अलग से आफिस भी नही होगा। लोक संसद का चुनाव निर्दलीय होगा यदि आवश्यक समझा जाये तो लोक संसद को चार कार्य और भी दिये जा सकते है। 1 राईट टू रिकाल का प्रावधान बनाना। 2 लोकपाल की नियुक्ति और नियंत्रण 3 संसद सदस्यो के वेतन भत्ते का निर्धारण। 4 किन्ही दो संवैधानिक इकाइयों के बीच टकराव की स्थिति मे निपटारा करना। इसके अतिरिक्त लोक संसद की कोई भूमिका नही होगी।
प्रश्न उठता है कि यह कार्य होगा कैसे। संविधान संशोधन के अतिरिक्त कोई और मार्ग नही है। संविधान संशोधन के अब तक दुनिया मे चार मार्ग दिखते हैं। 1. जय प्रकाश जी का अर्थात संसद मे जाकर संविधान संशोधन । 2. अन्ना हजारे का मार्ग जिसमे प्रबल जनमत खडा करके संविधान संशोधन करने हेतु संसद को सहमत करना । 3. ट्यूनीशिया और मिश्र का मार्ग । 4. लीबिया का मार्ग । अंतिम दो मार्ग भारत मे अनावश्यक और अनुपयुक्त हैं। प्रथम दो मार्गो का प्रयोग किया जा सकता है। इन दोनो पर निरंतर सक्रियता बनी हुई है। राजनीति मे जाकर संविधान संशोधन के प्रयास मे कुछ संगठन निरंतर सक्रिय है। हरियाणा मे रणवीर शर्मा भी लगातार इस कार्य मे लगे हुए है। दूसरी ओर व्यवस्था परिवर्तन अभियान कमेटी अन्ना मार्ग से चलकर लगातार जनमत जागरण का प्रयास कर रही है। मुख्य रूप से दो प्रस्तावो पर अधिक जोर दिया जा रहा है। 1. परिवार, गांव, जिले को संवैधानिक अधिकार। 2. लोक संसद की स्थापना। इन दोनो विषयो पर पिछले एक वर्ष से निरंतर संपूर्ण भारत मे एक साथ जनमत जागरण किया जा रहा है। इन दोनो प्रयासों से कौन सा सफल होगा, यह नहीं कहा जा सकता, किन्तु दोनो प्रयास अलग अलग निरंतर जारी हैं और लोग अपनी अपनी रूचि अनुसार जुडते जा रहे हैं। यहां तक कि व्यवस्था परिवर्तन अभियान कमेटी की ओर से सत्रह, अठारह, उन्नीस मार्च को नोएडा मे एक राष्ट्रीय सम्मेलन की भी योजना बनी है। कमेटी ने आम लोगो से शामिल होने का भी निवेदन किया है।
मै एक विचारक हॅू। उम्र और स्वास्थ के हिसाब से आवागमन या सक्रियता कठिन है। फिर भी मै एक विचारक के रूप मे इन प्रयासो का सहयोग और समर्थन करता हॅू। साथ ही मै एक आस्थावान हिन्दू होने के आधार पर ईश्वर से भी निवेदन करता हॅू कि समाज व्यवस्था को गंदी राजनीति की गुलामी से मुक्त होने मे सहायता करे।
नोट- मंथन का अगला विषय दहेज प्रथा होगा।

मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा

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पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख मे भारतीय संविधान तक समीक्षा करने तक सीमित है।
तानाशाही और लोकतंत्र बिल्कुल विपरीत प्रणालिया हैं। तानाशाही में शासन का संविधान होता है और लोकतंत्र मे संविधान का शासन । भारत एक लोकतांत्रिक देश है और इसलिये हम कह सकते है कि यहां संविधान का शासन है भी और होना भी चाहिये। दुनियां के अधिकांश लोकतांत्रिक देशो संविधान का शासन माना जाता है। स्वाभाविक है कि लम्बे समय के बाद संविधान मे कुछ बदलाव की आवश्यक होती है। यदि हम पूरी दुनियां का आकलन करे तो अन्य लोकतांत्रिक देशो मे भी वर्तमान संविधान अपेक्षित परिणाम नही दे पा रहे किन्तु यदि हम भारत का आकलन करे तो भारतीय संविधान सत्तर वर्षो मे ही विपरीत परिणाम देता रहा है और यह गति आज तक बढ रही है। दुनियां के संविधान बनाने वालों की यदि समीक्षा करें तो हो सकता है कि उनसे कुछ भुले ही हुई हो अथवा लम्बा समय बीतने के बाद कुछ परिस्थितियां बदली हों । किन्तु भारतीय संविधान बनाने वालो से अनेक भूले तो हुई ही किन्तु उनकी नीयत पर भी संदेह होता है।
यदि हम लोकतंत्र को ठीक ठीक परिभाषित करे तो लोकतंत्र का अर्थ होना चाहिये लोक नियंत्रित तंत्र । भारतीय संविधान निर्माताओ ने इसे बदल कर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित कर दिया। वेसे तो पूरी दुनियां मे कही भी लोकतंत्र की आदर्श परिभाषा स्पष्ट नही है किन्तु भारत में तो दुनियां से अलग लोकतंत्र की अपनी अलग परिभाषा बना ली। ऐसा लगता है कि हमारे संविधान निर्माताओ मे सत्ता प्राप्त करने की बहुत ज्यादा जल्दी थी। आदर्श स्थिति मे तंत्र प्रबंधक होता है और लोक मालिक किन्तु भारतीय संविधान निर्माताओ ने तंत्र को प्रबंधक की जगह शासक कहना शुरू कर दिया, जिसका अर्थ हुआ कि लोक मालिक नही बल्कि शासित है। तंत्र के अधिकार लोक की अमानत होते है किन्तु हमारे तंत्र से जुडे लोगो ने उन्हे अमानत न समझ कर अपना अधिकार मान लिया।
पुरी दुनियां मे न तो संविधान की कोई स्पष्ट परिभाषा बनी न ही मूल अधिकार की। यहां तक कि अपराध, गैर कानुनी, अनैतिक की भी अलग अलग व्याख्या दुनियां मे नही हो पाई। राज्य का दायित्व क्या हो और स्वैच्छिक कर्तब्य क्या हो, यह भी नही हो पाया। दुर्भाग्य से हमारे संविधान निर्माताओ ने जल्दवाजी मे या ना समझी मे इस प्रकार की परिभाषाओ पर चिंतन मंथन करने की अपेक्षा विदेशी संविधानों की नकल करना उचित समझा। परिणाम आपके सामने है कि आज तक ऐसे गहन मौलिक विषयो को कभी परिभाशि त नही किया गया। न ही भारत मे और न ही दुनियां मे। संविधान की परिभाषा यह होती है कि तंत्र के अधिकतम और लोक के न्युनतम अधिकारो की सीमाए निश्चित करने वाले दस्तावेज को संविधान कहते है और व्यक्ति के अधिकतम तथा तंत्र के न्यूनतम अधिकारो की सीमाएं निश्चित करने का कार्य कानून कहा जाता है। कानून तो तंत्र के द्वारा बनना स्वाभाविक है किन्तु संविधान या तो लोक के द्वारा बनाया जायेगा अथवा लोक और तंत्र की समान भुमिका होगी। किन्तु हमारे संविधान निर्माताओ ने तंत्र को ही संविधान संषोधन के असीम अधिकार दे दिये जिसका अप्रत्यक्ष अर्थ हुआ कि भारत मे संविधान तंत्र नियंत्रित हो गया अर्थात तंत्र की तानाशाही हो गई । संविधान के मौलिक सूत्रो का निर्माण समाज शास्त्र का विषय है और व्यावहारिक स्वरूप या भाषा राजनीति शास्त्र का । भारत का संविधान बनाने मे मौलिक सोच भी राजनेताओ की रही और भाषा देने मे भी लगभग अधिवक्ताओ का ही अधिक योगदान रहा। परिणाम हुआ कि भारत की संवैधानिक संरचना वकीलो के लिये स्वर्ग के समान बन गई।
भारतीय संविधान मे कुछ कमियां प्रारंभ से ही दिखती हैं। 1 संविधान को हमेशा स्पष्ट अर्थ प्रदाता होना चाहिये, द्विअर्थी नही। आज स्थिति यह है कि न्यायालय तक संविधान की विपरीत व्याख्या करते देखे जाते है। ऐसा महसूस हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की फुल बेंच के उपर भी कोई और बेंच होती तो फुल बेंच के अनेक निष्कर्ष बदल सकते थे।
2 परन्तु के बाद मूल अर्थ न बदलकर अपवाद ही आना चाहिये किन्तु भारत के संविधान मे परन्तु के बाद उसके मूल स्वरूप को ही बदल दिया जाता है। भारत मे धर्म जाति, लिंग, का भेद नही होगा। सबको समान अधिकार होगे। किन्तु महिलाओ, अल्प संख्यको, आदिवासियों, पिछडों के लिये विशेष कानून बनाये जा सकते है। स्पष्ट है कि भारत की 90 प्रतिशत आबादी समानता के अधिकारो से वंचित हो जाती है।
3 धर्म जाति भाषा लिंग आदि के भेद समाज के आंतरिक मामले है जबकि परिवार गांव जिले व्यवस्था की इकाइया है। भारतीय संविधान ने परिवार, गांव जिले को तो संविधान से बाहर कर दिया और धर्म जाति भाषा लिंग भेद को संविधान मे घुसा दिया। परिणाम हुआ कि वर्ग समन्वय टूटा और वर्ग विद्वेष वर्ग संधर्ष बढ गया।
4 संविधान बनाने वालो ने तंत्र के दायित्व और स्वैच्छिक कर्तब्य का अंतर नही समझा । तंत्र का दायित्व होता है सुरक्षा और न्याय और स्वैच्छिक कर्तब्य होता है अन्य जन कल्याणकारी कार्यो मे सहायता। संविधान निर्माताओ ने सुरक्षा और न्याय की तुलना मे जन कल्याण को अधिक महत्व दिया। यहां तक कि संविधान मे व्यावहारिकता का भी पूर्णतः अभाव रहा । ऐसी ऐसी आदर्श वादी घोषणाए कर दी गई जो संभव नही थी। उसका परिणाम हुआ अव्यवस्था ।
5 संविधान निर्माताओ उद्देशिका मे नासमझी मे समानता शब्द शामिल कर दिया जबकि समानता की जगह स्वतंत्रता शब्द होना चाहिये था। उन्होने समानता का अर्थ भी ठीक ठीक नही समझा। आर्थिक असमानता की तुलना मे राजनैतिक असमानता अधिक घातक होती है। हमारा संविधान आर्थिक सामाजिक असमानता को अधिक महत्व देता है और उसके कारण राजनैतिक असमानता बढती चली जाती है।
6 सिद्धान्त रूप से कमजोरो की सहायता मजबूतो का कर्तब्य होता है, कमजोरो का अधिकार नही। हमारे संविधान निर्माताओ ने इस सहायता को कमजोरो का अधिकार बना दिया। इसके कारण अक्षम और सक्षम के बीच वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष बढा । मजबूतो को कमजोरो ने सहायक न मानकर शोषक मान लिया।
किसी संविधान मे यदि एक मौलिक कमी हो तो वह अकेली कमजोरी भी दूरगामी प्रभाव डालती है । किन्तु भारतीय संविधान मे तो सारी कमियां ही विद्यमान हैं और हर साख पर उल्लू बैठा है के अन्जाम के आधार पर परिणाम स्पष्ट दिख रहा है । आज यदि भारत की जनता बढती हुई अव्यवस्था के समाधान के लिये किसी तानाशाह का भी सम्मान करने को तैयार है तो यह दोष जनता का न होकर हमारे संविधान निर्माताओ का ही माना जाना चाहिये। इसलिये मै समझता हॅू कि कही न कही संविधान निर्माताओ की नीयत मे भी खराबी थी तभी उन्हेाने संविधान संशोधन तक के अधिकार लोक से छीनकर तंत्र को दे दिये तथा लोकतंत्र की परिभाषा पूरी तरह बदल कर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित कर दी।
हम भारतीय संविधान के कुछ परिणामो की व्याख्या करें। 1 भारतीय संविधान का पहला परिणाम यह दिख रहा है कि तंत्र शरीफो, गरीबो, ग्रामीणो, श्रमजीवियों के विरूद्ध धूर्तो, अमीरों, शहरीयों, बुद्धिजीवियों का मिला जुला षणयंत्र दिखने लगा है। 2 स्पष्ट दिख रहा है कि संसद एक जेल खाना है जिसमे हमारा भगवान रूपी संविधान कैद है। संविधान एक ओर तो संसद की ढाल बन जाता है तो दूसरी ओर संविधान संसद की मुठ्ठी मे कैद भी है। 3 न्यायपालिका और विधायिका के बीच ऐसी अधिकारो की छीना झपटी दिख रही है जैसे लूट के माल के बटवारे मे दिखती है। 4 लोक और तंत्र के बीच दूरी लगातार बढती जा रही है । लोक हर क्षेत्र मे तंत्र का मुखापेक्षी हो गया है । यहा तक कि तंत्र और लोक के बीच शासक और शासित भावना तक घर कर गई है। 5 समाज के हर क्षेत्र मे वर्ग समन्वय के स्थान पर वर्ग विद्वेष बढ रहा है। 6 तंत्र का प्रत्येक अंग हर कार्य मे समाज को दोष देने का अभ्यस्त हो गया है। तंत्र का काम सुरक्षा और न्याय है । किन्तु तंत्र इसके लिये भी लोक को ही दोषी कहता हे। यहा तक कि कुछ वर्ष पूर्व भारत के प्रधान मंत्री राष्ट्रपति और विपक्ष के नेता तक ने कहा या कि संविधान दोषी नही है बल्कि उसका ठीक ठीक पालन नही होता। पालन न करने वाले दोषी है। दोषी संविधान है, व्यवस्था है, तंत्र है, और समाज मे हम सुधरेगें जग सुधरेगा जैसा गलत विचार प्रसारित किया जा रहा है। 7 भारत मे लगातार अब्यवस्था बढती जा रही है । भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और उससे भी अधिक तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।
समस्याओ पर हमने विचार किया किन्तु समाधान भी सोचना होगा। समस्या विश्व व्यापी है किन्तु समाधान की शुरूआत भारत कर सकता है और भारत की शुरूआत हम आप कर सकते है। 1 परिवार और गांव को तत्काल संवैधानिक अधिकार दिये जाने चाहिये। इससे तंत्र का बोझ घटेगा और तंत्र सुरक्षा और न्याय की ओर अधिक सक्रिय हो सकेगा। 2 संविधान को संसद के जेलखाने के से मुक्त कराने की पहल होनी चाहिये। संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्रमुक्त किसी इकाई को दिये जाने चाहियें। 3 लोक तंत्र, मूल अधिकार अपराध, समानता आदि की वर्तमान भ्रम पूर्ण मान्यताओ को चुनौती देकर वास्तविक अर्थ स्थापित करने का प्रयास करना चाहिये। 4 संविधान कानून आदि शब्दो की भी स्पष्ट परिभाषा बननी चाहिये। भले ही अब तक दुनियां मे न बनी हो। संसदीय लोकतंत्र को बदल कर सहभागी लोकतंत्र की दिशा मे बढना चाहिये। 5 सांसद को दल प्रतिनिधि की जगह जन प्रतिनिधि होना चाहिये। संसदीय लोकतंत्र को बदलकर निर्दलीय व्यवस्था की ओर जाना चाहिये। जिस तरह आज संसद असंसदीय दृष्य प्रस्तुत करती है वह हमारे लिये शर्म और चिन्ता का विषय है। भारतीय संविधान मे कुछ मौलिक सुधार की आवश्यकता है। ऐसे सुधार भी होने चाहिये।
मुझे विश्वास है कि भारतीय संविधान की कमजोरियां को दूर करने की हमारी कोशिष विश्व व्यापी परिवर्तन की दिशा मे ले जा सकती है हमे इस दिशा मे विचार मंथन करना चाहिये।
मंथन का अलगा विषय होगा दहेज प्रथा, कितनी व्यवस्था कितनी कुरीति?

मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।

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भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 विचार प्रधान (2) शक्ति प्रधान (3) अर्थ प्रधान (4) उन्मुक्त प्रधान। इन्हे ही भारत में क्रमशः ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र संस्कृति माना जाता है। पहली संस्कृति हिन्दुत्व के साथ जोड़कर देखी जाती है तो दूसरी इस्लाम तीसरी इसाईयत और चैथी साम्यवाद। वर्तमान समय में हम चारों का अनुभव कर चुके है। यह कहना गलत है कि श्रृष्टि के प्रांरभ से लेकर अब तक संस्कृतियों का प्रभाव घटते घटते पहली बार कलयुग के रुप में आया है। बल्कि यथार्थ यह है कि देवासुर संग्राम कई बार हुआ है और पृथ्वी पर कई बार संस्कृतियों का उतार चढाव होता रहा है।
बहुत प्राचीन समय में क्या व्यवस्था थी यह ठीक ठीक नहीं बताया जा सकता क्योंकि किंवदंती के अनुसार ही हम रामकृष्ण, रावण, कंस, का अस्तित्व स्वीकार करके अपनी धारणा को पुष्ट करते है किन्तु बुद्ध महावीर के काल से लेकर स्वतंत्रता तक का इतिहास उपलब्ध है जिस आधार पर कुछ पुष्ट धारणा बनाई जा सकती है। यद्यपि इस इतिहास मे भी कितनी मिलावट है कितना यथार्थ यह नहीं कहा जा सकता किन्तु कुछ बाते यथार्थ के रुप में कहीं जा सकती है क्योंकि उनका प्रभाव आज तक दिखाई दे रहा है। स्वतंत्रता के बाद का सारा घटनाक्रम प्रत्यक्ष दिख रहा है और उसकी वास्तविक समीक्षा विश्वासपूर्वक की जा सकती है।
यदि हम स्वतंत्रता के बाद का इतिहास और वर्तमान स्थिति की तुलना करें तो कुछ बाते विश्व से लेकर भारत तक में साफ देखी जा सकती हंै। भारत ने राजतंत्र, इस्लाम, अंग्रेज तथा साम्यवाद का पर्याप्त अनुभव किया है। स्वतंत्रता के बाद यद्यपि भारत में लोकतंत्र था किन्तु वह लोकतंत्र पूरी तरह वामपंथ के प्रभाव में था जो 91 के बाद बदलना शुरु हुआ। वर्तमान समय में साम्यवाद वामपंथ अथवा समाजवाद इतिहास की वस्तु बन चुके हैं। अब यह विचारधारा लगभग समापन की ओर है।स्वतंत्रता के बाद भारत में इस्लाम भी लगातार विस्तार पाता रहा। यहाॅ तक कि भारत में हिन्दुओं का तीन चैथाई बहुमत होते हुये भी हिन्दू मुसलमानों की तुलना में दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रहे। जनसंख्या और मनोबल के आधार पर भारत में मुसलमान सर्वाधिक शक्तिशाली रहे। भारत में अव्यवस्था भी चरम तक बढी और भ्रष्टाचार भी। नक्सलवाद और आतंकवाद भी लगातार बढता गया। ऐसा लगा कि वास्तव में कलयुग अपने चरम पर है। हिन्दुत्व और इस्लाम की मान्यताओं में एक विशेष अंतर यह होता है कि इस्लाम धर्म को ही मानवता मानकर चलता है जबकि हिन्दुत्व मानवता को ही धर्म मानता है। इस्लाम धर्म नहीं होता बल्कि सिर्फ संगठन मात्र होता है जबकि हिन्दुत्व संगठन बिल्कुल नहीं होता सिर्फ धर्म होता है। इस्लाम में अंतिम सत्य खोजने पर पूरी तरह प्रतिबंध होता है जबकि हिन्दुत्व अंतिम सत्य खोजने की पूरी स्वतंत्रता देता है। इस्लाम संगठन शक्ति को सहजीवन से अधिक महत्व देता है। इस्लाम न्याय की तुलना में अपनत्व को अधिक महत्वपूर्ण मानता है। जबकि हिन्दुत्व संगठन की तुलना में संस्था को अधिक महत्व देता है तथा अपनत्व की जगह भी न्याय महत्वपूर्ण मानता है। आज दुनिया इतनी आगे चली गई है फिर भी यदि संगठित इस्लाम धार्मिक इस्लाम में आज तक नहीं बदला जा सका तो यह कलियुग का प्रभाव ही माना जा सकता है।
पिछले कुछ वर्षो से ऐसा लग रहा है कि युग बदलने लगा है। चार लक्षण बिल्कुल स्पष्ट दिख रहे हैं-
1 साम्यवादी विचारधारा लगभग समाप्त हो गई है इसलिए उस पर किसी प्रकार की चर्चा उचित नहीं।
2 संघे शक्ति कलौयुगे अर्थात संगठन में ही शक्ति है की विचारधारा राडार पर है। सबसे पहले बुद्ध ने इस विचारधारा का प्रतिपादन किया था किन्तु संगठन में ही शक्ति है, इस विचारधारा का सबसे अधिक लाभ इस्लाम ने उठाया। 1400 वर्षो तक इस्लाम इस विचारधारा को माध्यम बनाकर सारी दुनिया में छा गया। यहाॅ तक कि स्वतंत्रता के पूर्व संघ परिवार ने भी हार थक कर इस्लाम की नकल की और संगठन बनाकर भारत में बडी सफलता प्राप्त की। किन्तु पिछले कुछ वर्षो से यह विचारधारा संकट में आ गई है। सारी दुनिया में इस्लाम अविश्वसनीय हो गया है। भारत में नरेन्द्र मोदी और अमेरिका में ट्रम्प की विजय में इस नफरत का बहुत बडा योगदान रहा है। इस्लाम सारी दुनिया को दारुल इस्लाम में बदलने के लिए प्रयत्नशील रहा है। किन्तु अब तो ऐसा दिखने लगा है कि या तो उसे दारुल अमन की ओर लौटना होगा अन्यथा वह चैदहवी सदी की कहावत के अनुसार समापन की ओर चला जायेगा। इजराइल या वर्मा हो अथवा कश्मीर ही क्यों न हो कहीं भी इस्लामिक कटटरवाद को अब समर्थन नहीं मिल रहा है। यहाॅ तक कि अनेक मुस्लिम देश भी अब ऐसे आतंकवाद का विरोध करने लगे हैं। पाकिस्तान अलग थलग पडता जा रहा है। कश्मीर की स्थिति यह है कि कहीं लेने के देने न पड जाये। दुनिया के मुसलमानों को सहजीवन अपनाना ही होगा । यदि थोडे दिनों के लिए भी संघ परिवार चुप हो जाये तो इस्लाम की अकल ठीकाने आने में देर नहीं लगेगी और मोदी के आने के बाद यह संभव भी दिखता है। आज कल सुब्रमन्यम स्वामी योगी आदित्यनाथ आदि भी कम बोलने लगे है। यह शुभ लक्षण है।
3 भारत में राजनीति का स्तर ठीक होने लगा है। सत्ता पक्ष में नरेन्द्र मोदी एक ध्रुव के रुप में स्थापित हो रहे है , तो विपक्ष में भी नीतिश कुमार और अखिलेश यादव लगातार लोकप्रियता की ओर बढ रहे है । अरविन्द केजरीवाल भी नीचे जा रहे है और भविष्य में ममता बनर्जी की भी यही संभावना दिखती है। इससे स्पष्ट है कि अब राजनीति में नैतिकता का ग्राफ उपर होगा। वर्तमान नोटबंदी कार्यक्रम ने भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाने की शुरुवात कर दी है। मैं स्पष्ट हॅू कि भारत की राजनीति ठीक दिशा में जा रही है।
4 दुनिया में फेसबुक, वाटसअप आदि का प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। यह प्रचलन विचार मंथन में सहायक हो रहा है। अब विचार प्रचार की संभावनाएॅ घटनी शुरु हो गई है। यहाॅ तक कि मीडिया का भी महत्व घट रहा है और फेसबुक आदि के माध्यम से प्रत्यक्ष विचार मंथन हो रहा है । यह भी एक शुभ लक्षण है।
युग परिवर्तन अपने आप नहीं होता है बल्कि उसमें परिस्थिति अनुसार स्वयं को भी सक्रिय होना पडता है। साम्यवाद की चर्चा बंद कर देनी चाहिए। इस्लाम पर विचार करते समय ध्यान रखना होगा कि दस प्रतिशत कटटरवादी मुल्लामौलवी 80 प्रतिशत सामान्य मुसलमानों को अपने साथ जोडे रखते है। जो दस प्रतिशत आधुनिक सोच के मुसलमान है उन्हें ये 90 प्रतिशत एक जुट होकर अलग थलग कर देते है। इन बीच वाले 80 प्रतिशत मुसलमानों के विचार परिवर्तन की जरुरत है जिससे वे कटटरपंथी मूल्लामौलवीयों के नियंत्रण से बाहर आ सके । यह कार्य संबंधो के आधार पर भी हो सकता है और विचारों के आधार पर भी। सभी मुसलमानों को गाली देने की प्रवृत्ति बहुत घातक है। जहाॅ तक भारतीय राजनीति का संबंध है तो नरेन्द्र मोदी , नीतिश कुमार, अखिलेश यादव की राजनीति बीच का पडाव मात्र है। आदर्श स्थिति नहीं नहीं। आदर्श स्थिति के लिए एक निष्पक्ष दल विहीन तीसरे पक्ष को सामने आना चाहिए जो दलगत राजनीति से दूर रहकर जनमत पर मजबूत प्रभाव बना सके। सौभाग्य से व्यवस्थापक इस दिशा में निरंतर सफलतापूर्वक बढ रहा है। वाटसअप फेसबुक बेबसाइट आदि को माध्यम बनाकर स्वस्थ विचार मंथन को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। इस दिशा में भी निरंतर प्रयास जारी है। मैं पूरी तरह आश्वस्त हॅू कि अब कलयुग का अंतिम चरण समाप्त होने तथा युग परिवर्तन के लक्षण सारी दुनिया में दिखने शुरु हो गये है। आवश्यकता यह है कि हम इस यज्ञ में अपनी आहुति कितनी और किस प्रकार दे सकते हैं, इसकी तैयारी करें। सारी दुनिया में इस्लाम को उसके वास्तविक स्वरुप में पहचानने की शुरुवात हो गई है। अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प का अप्रत्याशित जीतना अथवा भारत में नरेन्द्र मोदी की अप्रत्याशित बढती लोकप्रियता में इस्लाम के प्रति बढते संदेह का बहुत बडा योगदान है। जिस तरह पाकिस्तान अलग थलग होता जा रहा है। जिस तरह वर्मा में रोहिंग्या मुसलमान अकेले दिखने लगे हैं तथा उन्हे मानवता के नाम पर भी शरण नहीं मिल पा रही , जिस तरह सारी दुनिया में मानवता के नाम पर होने वाला मुसलमानों के साथ अच्छे व्यवहार का दृष्टिकोण बदलता जा रहा है वह वास्तव में युग परिवर्तन का संकेत है। चैदह वर्षो तक इस्लाम अपनी संगठन शक्ति के बल पर ही अपना विस्तार करता रहा। अब ऐसे लक्षण दिखने लगे हैं कि इस्लाम को या तो अपनी संगठनात्मक विचारधारा छोडनी होगी अथवा अपने समापन की प्रतिक्षा करनी होगी। जिस तरह इस्लाम बढता रहा उस तरह अब दुनिया स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती। ये लक्षण सारी दुनिया में भी दिख रहे है और भारत में भी। भारत में भी कश्मीरी आतंकवाद आज कल कुछ शराफत की भाषा बोलना शुरु कर दिया है।
यदि भारत की समीक्षा करें तो सिर्फ इस्लाम ही नहीं बल्कि अन्य मामलों में भी युग परिवर्तन के संकेत दिखने लगे है। राजनीति में तीन अलग अलग समूह स्पष्ट है । सत्ता पक्ष के रुप में नरेन्द्र मोदी का एक छत्र प्रभाव बढ रहा है दूसरी ओर विपक्ष में भी अब नीतिश कुमार और अखिलेश यादव ही स्पष्ट आगे बढ रहे है तथा अन्य अनेक विपक्षी कहे जाने वाले नेताओं का प्रभाव घट रहा है। अरविंद केजरीवाल भी लगातार नीचे जा रहे है। ममता बनर्जी को भी दो चार वर्षो में चुनौती मिलेगी ही। इस तरह राजनीति में साफ सुथरी नीयत और नीति वालो का बढता प्रभाव साफ दिख रहा है। व्यवस्था परिवर्तन अभियान के नाम से पक्ष विपक्ष के बीच एक निष्पक्ष प्रयत्न का निरंतर मजबूत होना भी युग परिवर्तन का संकेत दे रहा है।
आर्थिक नीतियाॅ भी सारी दुनिया में बदल रही हैं। भारत में तो नोटबंदी प्रकरण ने आर्थिक नीतियों में सकारात्मक बदलाव की गति बहुत तेज कर दी है। समाज व्यवस्था भी ठीक दिषा में जाती दिख रही है। वर्ग संघर्ष घटकर आंशिक रुप से वर्ग समन्वय की तरफ बढने के संकेत दिखने लगे है।
फिर भी अभी कुछ कार्य भारत में युग परिवर्तन में बाधक है। भारत की न्यायपालिका अभी भी अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने पर अडी हुई है। अभी न्यायपालिका में जे एन यू संस्कृति का प्रभाव खत्म नहीं हुआ है। इसी तरह इस्लाम के संदेह के घेरे में आने से तथा नरेन्द्र मोदी के बढते प्रभाव से साम्प्रदायिक हिन्दुत्व तथा संगठनवादी विचारधारा का मनोबल बढने लगा है। युग परिवर्तन में इनका बढता प्रभाव भी बाधक होगा क्योंकि संगठन शक्ति हमेशा सहजीवन में असंतुलन पैदा करती है। जिस तरह साम्यवाद अपने आप गया इस्लाम अपने आप कटटरवाद को छोडेगा, उसी तरह भारत की न्यायपालिका तथा संगठनप्रिय हिन्दुत्व को भी बदलना ही होगा।
मेरी अपने मित्रों को सलाह है कि वे किसी पक्ष विपक्ष में झुकने की अपेक्षा निष्पक्ष रहने दिखने की आदत डाले। वे यदि सक्रिय होना चाहते है तो व्यवस्था परिवर्तन के प्रयत्नों से भी सम्पर्क करें। वे क्रिया के पूर्व विचार मंथन को अधिक महत्व दें। साथ ही उन्हें यह भी ध्यान देना है कि वे मुसलमानों से किसी प्रकार की घृणा या भेदभाव न करें। क्योंकि मुसलमानों में भी दस प्रतिषत ही कटटरवादी है और इन कटटरवादियों के प्रभाव में शामिल 80 प्रतिषत मुसलमान समझाये जा सकते है।हमारा कर्तव्य है कि हम इन 80 प्रतिशत को 10 प्रतिशत उग्रवादियों से अलग थलग करने का प्रयास करें। दोष इस्लाम में नहीं बल्कि दोष उसके संगठनवादी चरित्र में है। युग परिवर्तन के लिए उस संगठनवादी चरित्र में बदलाव करना होगा।
अंत में मैं पूरी तरह आश्वस्त हॅू कि अब विश्व कलियुग से धीरे धीरे सदयुग की ओर जाने की शुरुवात कर रहा है और हमारा कर्तव्य है कि हम इन प्रयत्नों में सहयोग और समर्थन करें।

मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?

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भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की किन्तु उपरोक्त दोनो अवधारणाओ का गांधी को समर्थन नही मिला। गोडसे कटटरवादी हिन्दूत्व की धारणाओ से ओत प्रोत था तो पंडित नेहरू हिन्दुत्व विरोधी अवधारणाओ के प्रतीक रहे।
व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। 1 संचालक 2 संचालित। संचालक को अंग्रेजी मे मोटिवेटर कहते है और संचालित को मोटिवेटेड। जो विचारधारा संचालक की मृत्यु के पश्चात भी बढती जाती है वह विचार धारा वाद बन जाती है और जो संचालित होते है वे ऐसी विचार धारा के भक्त हो जाते है। स्वामी दयानंद हेडगेवार गांधी संचालक की श्र्रेणी मे माने जा सकते है। इसी तरह पंडित नेहरू को भी हम संचालक मान सकते है और गोडसे को संचालित । स्पष्ट है कि संचालक बुद्धि प्रधान होता है संचालित भावना प्रधान। गोडसे किसी विचार धारा से प्रभावित था, नेहरू की अपनी स्वयं की विचार धारा थी। नेहरू ने गांधी के साथ स्वतंत्रता संघर्ष मे कंधे से कंधा मिलाकर काम किया किन्तु नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन को छोडकर किसी भी मामले मे कभी गांधी विचारो से सहमत नही रहे । गोडसे कटटर वादी हिन्दुत्व की विचार धारा के प्रति पूर्ण समर्पित था तो नेहरू किसी के प्रति कभी समर्पित नही रहे।
स्वतंत्रता के शीघ्र बाद गोडसे ने गांधी के शरीर की हत्या कर दी और पंडित नेहरू ने विचारो की । गांधी हत्या के साथ गांधी युग भी समाप्त हो गया और गांधी विचार भी । क्योकि एक पक्ष गांधी के नाम का विरोधी था तो दूसरा गांधी विचार का। मै यह कह सकता हॅू कि गांधी की हत्या गोडसे के मूर्खता पूर्ण कार्य का परिणाम थी। गोडसे की इस मूर्खता ने पंडित नेहरू का काम और आसान कर दिया क्योकि यदि गांधी जीवित रहते तो पंडित नेहरू को परेशानी हो सकती थी। गोडसे की मूर्खता ने संध को भी अल्पकाल के लिये प्रतिस्पर्धा से बाहर कर दिया। जिससे नेहरू जी को और आसानी हो गई।
पंडित नेहरू का कार्य ठीक था और नीयत पर हमेशा संदेह रहा। उनका व्यक्ति गत जीवन भी गांधी के विपरीत था तथा सामाजिक जीवन भी । गांधी अकेन्दित और न्यूनतम शासन के पक्षधर थे तो नेहरू केन्द्रित ओर अधिकतम शासन के । गांधी किसी की नकल न करके देश काल परिस्थिति अनुसार स्वतंत्र कार्य प्रणाली के पक्षधर थे तो नेहरू पश्चिम या साम्यवाद की नकल करते थे। दूसरी ओर गोडसे का कार्य गलत था किन्तु नीयत ठीक थी । गोडसे की नीयत मे अंध राष्ट भक्ति थी तो नेहरू की नीयत मे व्यक्तिगत और परिवारिक स्वार्थ भी छिपा हुआ था। नेहरू ने लम्बी जेल काटी । इस उम्मीद के साथ कि स्वतंत्र भारत मे उन्हे कुछ न कुछ सत्ता का लाभ मिलेगा। दूसरी ओर गोडसे यह जानता था कि गांधी हत्या के बाद उसे फांसी ही होगी, और जीवित रहने का कोई व्यक्गित या पारिवारिक लाभ नही मिलेगा । प्रश्न उठता है कि दोनो की तुलना मे ठीक कौन? यह स्पष्ट है कि गोडसे के कार्य और नेहरू की सोच ने मिलकर देश को अपूर्णनीय क्षति पहुंचाई और आज तक उसका परिणाम भारत भुगत रहा है। प्रश्न उठता है कि यदि एक पिता ने अपने परिवार के कष्ट दूर करने के लिये किसी ज्योतिशी के समझाने से अपने पूत्र की बलि चढा दी तो उस पिता ने किस सीमा तक गलत किया । एक मूर्ख्र ने अपने पिता द्वारा बहुत मेहनत से इकठठा की गर्इ्र चंदन की लकडी को चाय बनाने मे जला दिया तो पूत्र कितना अपराधी? यदि किसी मूर्ख पुत्र ने अपने पिता की गर्दन मे लिपटा जहरीला साप देखकर साप सहित गर्दन काट दी तो पुत्र कितना अपराधी ? यदि गोडसे ने किसी विचार धारा से प्रभावित होकर गांधी हत्या को ही राष्ट की समस्याओ का उचित समाधान मानकर उनकी हत्या कर दी तो गोडसे का कार्य कितना गलत माना जाय और कितनी गलत? यदि किसी व्यक्ति का कार्य गलत होता है तो कानून उसे दंडित करता है। इस तरह गोडसे को कानून के द्वारा फॉसी दिया जाना उचित कदम है। किन्तु भारत मे अभिव्यक्ति की आजादी है। ऐसी आजादी का दुरूपयोग करके कोई संगठन सामान्य युवको को गलत दिशा मे जाने का उत्प्रेरित करे तो ऐसे संगठन की विचार धारा को समाज ही चुनौती दे सकता है कानून नही, सरकार नही। दुर्भाग्य है कि भारत मे ऐसी विचार धारा भी आजतक विस्तार पा रही है क्योकि उसे चुनौती देने की अपेक्षा उसकी गलतियो का लाभ उठाने का प्रयास हो रहा है।
भारत के लिये आदर्श स्थिति होती कि गोडसे सरीखा देश भक्त बालक गांधी के सम्पर्क मे आया होता तो आज नेहरू की विचार धारा की तुलना मे गांधी की विचार धारा गोडसे के माध्यम से अधिक अच्छी तरह स्थापित हो पाती परन्तु ऐसा नही हुआ और गोडसे एक गलत विचार धारा के प्रभाव मे चला गया और उसके दुष्परिणाम आज तक हम देख रहे है।
वर्तमान स्थिति मे अब पुनः भारत को तीस जनवरी 1947 से अपनी विचार यात्रा प्रारंभ करनी चाहिये। दोनो ही विचार धाराए भारत के लिये धातक है। चाहे वह गोडसे की हो या नेहरू की । गोडसे से घृणा और नेहरू का महिमामंडन भारत के लिये घातक है। क्योकि गोडसे की क्रिया गलत थी नीयत राष्ट भक्ति की और नेहरू की क्रिया ठीक थी नीयत अपने व्यक्तिगत उत्थान की। दोनो की उचित समीक्षा करके भारत को नये मार्ग पर चलना चाहिये । मेरा स्पष्ट मत है कि भारत को कटटर वादी हिन्दूत्व और विदेशो की अन्धाधुंध नकल का मार्ग छोडकर अपने भारतीय यथार्थ को देश काल परिस्थिति की कसौटी पर कसकर नया मार्ग तलाशना चाहिये । गांधी हमारे आदर्श थे, हैं और भविष्य मे भी मार्ग दर्शक बने रहेंगे।
नोट- अगला विषय होगा ‘‘सावधान, युग बदल रहा है‘‘।

मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा

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किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली गई अथवा किसी दुर्घटनावश परिणाम अप्रत्यशित हुए तभी व्यक्ति को असीमित दुख होता है। ऐसा व्यक्ति ही कभी कभी आत्महत्या कर लेता है। आत्महत्या करने वालों में सब प्रकार के लोग होते हैं। छात्र भी बडी संख्या में आत्महत्या करते हैं तो महिलाएॅ अथवा व्यापारी भी। कभी कभी तो राजा तक आत्महत्या करते पाये जाते हैं। यह अलग बात है कि किसानों की आत्महत्या कुछ अधिक प्रचारित हुई।
किसान तीन प्रकार हैं-
(1) जो अपनी भूमि में स्वयं खेती करते है।
(2) जो अपनी भूमि में मजदूरों से खेती कराते है।
(3)जो उन्नत तकनीक तथा कृत्रिम उर्जा के सहारे खेती करते है।
ऐसे उन्नत किसानों को ही फार्म हाउस वाला किसान कहा जाता है। जिन किसानों ने आत्महत्या की है उनमें फार्महाउस वाला उन्नत किसान लगभग नहीं है। जो किसान अपनी जमीन पर स्वयं खेती करता है और अपने उपयोग में लाता है,वह भी आत्महत्या नहीं करता। भारत में जिन लाखों किसानों ने आत्महत्या की है वे लगभग बीच वाले किसान थे जो छोटी जोत के मालिक थे और मजदूरों के माध्यम से खेती कराते रहे है । विचारणीय प्रश्न यह है कि किसी मजदूर ने आत्महत्या नहीं की। दूसरा विचारणीय प्रश्न यह भी है कि यदि खेती घाटे का सौदा है तो देश में लगातार कृषि उत्पादन बढ रहा है। ये दोनों प्रश्न सही होते हुये भी यह प्रश्न सच है कि बडी मात्रा में बीच वाले किसान आत्महत्या कर रहे है। इसके कई कारण हैं –
(1) स्वतंत्रता के बाद श्रम का मूल्य बढा और कृषि उत्पादन का मूल्य घटा। भारत में स्वतंत्रता के बाद मुद्रा का अवमूल्यंन 91 गुना हुआ है। इसका अर्थ है कि यदि सन 47 में किसी वस्तु का मूल्य 1 रु था और आज 91 रु है तो वह समतुल्य है । यदि हम श्रममूल्य का आकलन करे तो वह वर्तमान में 91 की तुलना में लगभग 170 हो गया है। दूसरी ओर यदि हम अनाज के मूल्य का आकलन करें तो वह दालों को छोडकर लगभग 45 गुना ही बढा है। इसका अर्थ हुआ कि श्रम मूल्य की तुलना में कृषि उत्पादन का मूल्य एक चैथाई ही रह गया है। उपर से मंहगाई का झूठा हल्ला उस बेचारे उत्पादक को और भी अधिक परेशान किये रहता है। वैसे भी हम देख सकते है कि यदि स्वतंत्रता के समय एक मजदूर को एक दिन का डेढ़ किलो अनाज देते थे तो आज 8 किलो दे रहे है । इसमें कुछ बढ़ती हुई विकास दर का भी योगदान है किन्तु किसान पूर्व की तुलना में चार गुना अधिक अनाज श्रमिक को देता है। साधारण किसान किसी तरह सामान्य रुप से तो अपना खर्च चलाता है किन्तु आकस्मिक विपत्ति के समय उसका धैर्य टूट जाता है और वह भावनाओं में बहकर आत्महत्या कर लेता है।
(2) किसान के उत्पादन का मूल्य बढ नहीं पाता क्योंकि अपेक्षाकृत सस्ती कृत्रिम उर्जा और तकनीक से खेती करने वालो के साथ वह बीच वाला किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाता। उन्नत तकनीक से उत्पादित कृषि उत्पादन सम्पूर्ण कृषि उत्पादन का मूल्य बढने ही नहीं देता। साथ ही राजनैतिक व्यवस्था पर उपभोक्ताओं का प्रभाव अधिक रहता है और वे बाजार तथा राजनीति पर पूरी तरह हावी रहते है तो उपभोक्ता किसी भी रुप में किसी उत्पादन का मूल्य संतुलित होने ही नहीं देते। भले ही उत्पादक आत्महत्या ही क्यों न कर ले।
(3) किसानों का भावनात्मक रुप से जमीन के साथ मोह पैदा कर दिया जाता है जिससे किसान अपनी जमीन बेचकर या खाली छोडकर किसी अन्य दिशा में नहीं जा पाता। सामाजिक तथा राजनैतिक वातावरण किसानों की झूठी प्रशंसा करके उन्हें जमीन के साथ जोडे रखना चाहता है। यदाकदा राजनैतिक व्यवस्था भीख के बतौर कुछ सुविधायें देकर भी ऐसे मजबूर किसानों को खेती के प्रति लगाव बनाये रखती है। इस तरह तीन ऐसे कारण है जो किसानों की आत्महत्या के कारण के लिए माने जाते है। स्पष्ट है कि अन्य लोगों की आत्महत्याएॅ भले ही भावनात्मक कारणों से होती हों किन्तु किसानों की आत्महत्या में कोई भावनात्मक कारण न होकर मजदूरी ही एकमात्र कारण होती है।
यदि हम समाधान पर विचार करें तो समाधान भी साधारण बात नहीं है। कृषि उत्पादन का मूल्य बढा दिया जाये तब बडे किसान ही बहुत ज्यादा लाभान्वित होंगे। यदि खाद, बीज, बिजली, पानी सस्ता कर दिया जाये तब भी बडे किसान ही लाभान्वित होंगे। इन आत्महत्या करने वालों के हिस्से में कुछ नहीं आयेगा। श्रम का मूल्य कम नहीे किया जा सकता क्योंकि श्रम बुद्धि और धन की तुलना में बहुत ज्यादा असमानता हो गई है और श्रम का मूल्य और अधिक बढना चाहिए। किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए श्रममूल्य वृद्धि को नहीं रोका जा सकता। मैं स्पष्ट कर दॅू कि वर्तमान समय में किसान आत्महत्या के नाम पर जो भी किसान आन्दोलन हो रहे है वे बडे किसानों के नेतृत्व में हो रहे है। ये किसान खाद, बिजली, पानी का मूल्य घटाने की बात करते है। ये किसान श्रममूल्य वृद्धि के भी विरुद्ध वातावरण बनाते है किन्तु ये बडे किसान खेती की दुर्दशा के मूल कारण को नहीं खोज पाते।
मैंने राष्ट्रीय और सामाजिक भावनाओं में बहकर व्यापार छोड दिया और जनहित में खेती का व्यापार करने लगा। 30 वर्षो तक पूरा पूरा परिश्रम करने के बाद भी मेरी स्थिति इतनी खराब हुई कि मेरे समक्ष आत्महत्या के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था। मैंने सन 95 में हार मानकर खेती छोड दी। मैं स्पष्ट कर दॅॅू कि खेती छोडकर मेरे परिवार ने बहुत अच्छा किया। मुझे पूूरा अनुभव है कि खेती घाटे का व्यवसाय है यदि उन्नत तकनीक से न किया जाये तो। इसका अर्थ हुआ कि जिस तरह सम्पूर्ण भारत में लघु उद्योग मरणासन्न है,छोटे व्यापारी परेशान है, छोटे उद्योगपति परेशान है उसी तरह आज छोेटे किसान भी आत्महत्या कर रहे है क्योंकि सम्पूर्ण भारत में सब प्रकार के कार्यो का केन्द्रियकरण हो रहा है और इस केन्द्रियकरण की चपेट में छोटे किसान भी है। इसका अर्थ हुआ कि समस्या कही और है और समाधान कही और । किसानों की आत्महत्या रोकने का एक ही इमानदार समाधान हो सकता है कि कृत्रिम उर्जा का मूल्य इतना अधिक बढा दिया जाये कि उन्नत किसान मध्यम किसान और छोटे किसान एक दूसरे के साथ खुली प्रतिस्पर्धा कर सके या कम से कम इतना अवश्य हो कि तकनीक तकनीक वंचित का तथा श्रम का शोषण न कर सके। मैं जानता हॅू कि इस मूल्यवृद्धि का आयात निर्यात पर दुष्प्रभाव हो सकता है किन्तु उसका समाधान कठिन नहीं । कितने दुख की बात है कि स्वतंत्रता के बाद से लेकर सन 2010 तक लगभग सभी कृषि उत्पादनों पर टैक्स वसूला जाता था और वह टैक्स वसूल कर उपभोक्ताओं को सस्ता अनाज बांटने में खर्च किया जाता था। कुछ कृषि उत्पादों पर तो आज तक टैक्स माफ नहीं हुआ है।
हमारी राजनैतिक व्यवस्था गरीब, ग्रामीण, श्रमजीवी, छोटे किसान के विषय में भाषण तो बहुत देती है किन्तु इन चारों के उत्पादनों और उपभोग की वस्तुओं पर भारी कर लगाकर शिक्षा , स्वास्थ ,सस्ता आवागमन आदि पर खर्च करती है। यदि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में छोटा किसान आत्महत्या करता है तो विचार करिये कि दोष किसान का है या समाज का है या हमारी राजनैतिक व्यवस्था का?ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चौपट करके शहरी अर्थव्यवस्था का प्रोत्साहन इससे अतिरिक्त अन्य कोई परिणाम नहीं दे सकता। मैं चाहता हॅू कि किसान आत्महत्या पर गंभीरता से विचार करके इसका समाधान खोजा जाना चाहिए।
नोटः- मंथन क्रमांक 10 का अगला विषय कौन कितना राष्ट्र भक्त पंडित नेहरु या नाथूराम गोड्से होगा।

मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।

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भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य।
1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी जाती है- 1 चोरी, डकैती और लूट 2 बलात्कार 3 मिलावट और कमतौलना 4 जालसाजी धोखाधडी 5 बलप्रयोग हिंसा आतंकवाद। ये 5 प्रकार की समस्याए भारत में स्वतंत्रता के बाद लगातार बढ रही हैं सरकारे चाहे किसी की भी बनी हो। क्योंकि राज्य इन समस्याओं के समाधान में आवश्यकता से बहुत कम सक्रिय है।
2 कृत्रिम समस्याए मुख्य रुप से 6 प्रकार की मानी जाती हैं- 1 चरित्र पतन 2 भ्रष्टाचार 3 जातीय कटुता 4 साम्प्रदायिकता 5 आर्थिक असमानता वृद्धि 6 श्रम,बुद्धि और धन के बीच बढती दूरी अर्थात श्रम शोषण। इन 6 समस्याओं के अतिरिक्त महिला उत्पीडन, वन अपराध असमानता, विदेशी कम्पनियों का संकट, वेश्यावृत्ति ब्लैक, तस्करी, जुआ, शराब, अफीम आदि भी ऐसी समस्याए है जो या तो कृत्रिम है अथवा राज्य ने अनावश्यक अपने हाथ में लेकर इनको बढावा दिया है। ये समस्याए भी स्वतंत्रता के बाद लगातार इसलिए बढती गई है क्योंकि राज्य ने इन समस्याओं के समाधान में अनावश्यक अथवा आवश्यकता से अधिक सक्रियता दिखाई। अप्रत्यक्ष रुप से कहा जा सकता है कि ये समस्याए राज्य अपनी गल्तियों को छिपाने के लिए योजनापूर्वक बढाता है।
3 प्राकृतिक इसमें बाढ, भूकम्प, बीमारियॉ, तूफान, अनावृष्टि या अतिवृष्टि आदि शामिल हैं। ये समस्याएॅ स्वतंत्रता के बाद कुछ घटी हैं।
4 भूमण्डलीय इसमें पर्यावरण प्रदूषण, आबादी वृद्धि, जल संकट, मानव स्वभाव तापवृद्धि, मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि, उग्रराष्ट्रवाद आदि शामिल है। ये समस्याए भी पूरे विश्व की तरह ही भारत में भी लगातार बढ रही हैं क्योंकि भारत में इनके समाधान के लिए कोई मौलिक चिन्तन का अभाव है तथा भारत इन मामलों में दुनिया के अन्य देशो की अंध नकल करता रहता है।
5 भ्रम या असत्य समस्याए अनेक हैं जैसे मंहगाई, शिक्षत बेरोजगारी, बढती गरीबी दहेज, मुद्रास्फीति का दुष्प्रभाव, अशिक्षा , बालश्रम, वेश्यावृत्ति, तस्करी, ब्लैकमेल आदि शामिल हैं। इनमें से कुछ समस्याए तो बिल्कुल ही अस्तित्वहीन है और उन्हें समाज में भ्रम फैलाने के लिए प्रचारित किया गया है। इन समस्याओं को राज्य इसलिए स्थापित करता है जिससे समाज का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटकर इन समस्याओं के समाधान में लग जाये।
वास्तविक समस्याओं का समाधान करना राज्य का दायित्व होता है और इसलिए प्राथमिकता का क्रम इस प्रकार होना चाहिए था कि पहली प्राथमिकता वास्तविक तथा उसी क्रम से चौथी प्राथमिकता भुमण्डलीय समस्याओं के समाधान के लिए होनी चाहिए थी। भ्रमपूर्ण समस्याओं से तो राज्य को बिल्कूल विपरीत हो जाना चाहिए था किन्तु स्वतंत्रता के बाद लगातार देखा जा रहा है कि प्राथमिकताओं के क्रम में वास्तविक समस्याए पाचवे नम्बर पर है और भ्रमपूर्ण समस्याए पहले नम्बर पर। विचित्र बात है कि जिन समस्याओं का कोई अस्तित्व ही नहीं है ऐसी समस्याओं के समाधान का प्रयत्न लगातार क्यों हो रहा है? महंगाई नाम की कोई समस्या सम्पूर्ण भारत में न कभी थी, न है। किन्तु पिछले 70 वर्षो से समाज में ऐसा असत्य प्रचार हुआ कि भारत का प्रत्येेक नागरिक महंगाई के भ्रम से परेशान है।
पिछले दो वर्षो से नरेन्द्र मोदी जी की सरकार बनी है। उसके पूर्व की सरकारे लगातार साम्यवाद के पूर्णतः या आंशिक प्रभाव में थी। साम्यवाद का प्रभाव सभी समस्याओं के विस्तार का जनक माना जाता है। पश्चिम की अंध नकल भी समाधान में बाधक होती है। भारत ने या तो साम्यवाद की नकल की या पश्चिम की। दो वर्षो से नरेन्द्र मोदी सरकार धीरे धीरे भारतीय विचारधारा तथा पश्चिम की विचारधारा के बीच सामंजस्य स्थापित करके सुधार का प्रयास कर रही है। चोरी, डकैती, लूट, जालसाजी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता पर कुछ नियंत्रण हुआ है। नक्सलवाद अथवा कश्मीर का आतंकवाद धीरे धीरे समाप्त हो रहा है। किन्तु बलात्कार, श्रम शोषण और मिलावट पर अभी कोई परिणाम नहीं दिखा है। इसी तरह साम्प्रदायिकता पर भी पर्याप्त सुधार हुआ है। मुस्लिम साम्प्रदायिकता तो रुकी ही है किन्तु संघ परिवार की साम्प्रदायिकता भी संकट के घेरे में आती जा रही है। जातिवाद,महिला उत्पीडन जैसी कृत्रिम समस्याओं पर अभी काम नहीं हुआ है अथवा मोदी सरकार अभी इस पर कुछ समझ नहीेें पा रही है।
सबसे बडी समस्या वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष को बढाकर वर्ग संघर्ष की दिशा में रही है। इसका वास्तविक समाधान तो वर्ग समन्वय से ही संभव था किन्तु इसके ठीक विपरीत पिछली सरकारों ने वर्ग समन्वय को कमजोर करके वर्ग निर्माण और वर्ग विद्वेश को लगातार बढाया। ये आधार है धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्रियता, उम्र, लिंग, गरीब अमीर, किसान मजदूर, शहर ग्रामीण आदि। इनमें मोदी जी ने भाषा के मामले में पहल करके करीब करीब ठीक दिशा पकड ली हैं। समान नागरिक संहिता की आवाज बुलंद करके साम्प्रदायिकता, जाति भेद, लिंग भेद, पर भी नकेल कसने की तैयारी है। अन्य मामलों में भी नरेन्द्र मोदी सरकार धीरे धीरे कदम उठा रही है। जिस तरह 67 वर्षो तक समस्याएॅ बढी या बढायी गई और उनका जितना बडा भण्डार इक्कठा हो गया है। उन पर नियंत्रण करना कोई साधारण काम नहीं । उन परिस्थितियों में तो यह काम और भी कठिन हो जाता है जब जे एन यू से पढे हुये छात्र निकल कर न्यायपालिका और कार्यपालिका के महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हो तथा समाधानकर्ता की यह मजबूरी हो कि उसे इन सबको साथ लेकर ही आगे बढना होगा। आप कल्पना कर सकते हैं कि कार्य कितना कठिन है फिर भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व की भारत सरकार धीरे धीरे एक एक समस्या को हल करने की दिशा में निरंतर बढ रही है।
फिर भी अभी मोदी जी के लिए अनेक काम करने बाकी है जिनकी अभी शुरुवात भी नहीं हुई है। कृत्रिम उर्जा की भारी मूल्य वृद्धि की दिशा में अब तक कोई कदम नहीं बढाया गया है जबकि श्रम शोषण, आर्थिक असमानता, पर्यावरण प्रदूषण सहित सब प्रकार की आर्थिक समस्याओं के समाधान में इसका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।
समान नागरिक संहिता और समान आचार संहिता के बीच का अंतर या तो मोदी जी अब तक स्वयं नहीं समझ पाये है अथवा वे प्रतिक्षा कर रहे हैं। इसी तरह अपराध गैरकानूनी और असामाजिक समस्याओं के वर्गीकरण की दिशा में भी कोई प्रयत्न नहीं दिख रहा है। मैं मानता हॅू कि भारत में विचार मंथन का अभाव इसके लिए सर्वाधिक दोषी है। हम सारा दोष सरकार पर ही नहीं डाल सकते। विचार मंथन ही सरकार को नई दिशा दे सकता है। हमें पूरा प्रयत्न करके अन्य उन मुददों पर सरकार को सलाह देनी चाहिए जिनके विषय में अब तक सरकार ठीक दिशा में नहीं सोच पा रही है।
मैं आश्वस्त हॅू कि नरेन्द्र मोदी के आने के बाद भारत की समस्याओं के समाधान की गति ठीक दिशा में और ठीक गति से आगे बढ रही है। हमारा कर्तव्य है कि हम इस गति को और बढाने में सहायक हो । हम निरंतर विचार मंथन को प्रोत्साहित करें,जनमत जागृत करें,सरकार को उचित सलाह भी दें तथा सरकार के सही कार्यो का पूरा पूरा समर्थन भी करें तभी इतनी पुरानी जड पकड चुकी समस्याओं का समाधान संभव हैं।
नोट- मंथन क्रमांक 9 का विषय होगा-किसान आत्महत्या की एक समीक्षा

न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान

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सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्र प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक न्याय की सुरक्षा की गारण्टी देता है। इसलिये व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार की सुरक्षा तंत्र का दायित्व होता हैं। संवैधानिक न्याय तंत्र स्वेच्छा से व्यक्ति या व्यक्ति समूह को दे सकता है। संवैधानिक अधिकार देना तंत्र का कर्तव्य होता है,दायित्व नहीं। सामाजिक न्याय सिर्फ समाज का ही कर्तव्य होता है। सामाजिक मामलों में तंत्र की भूमिका शून्य होती है। न उसका दायित्व होता है न ही कर्तव्य। तंत्र सामाजिक मामलों में समाज की सहायता मात्र कर सकता है किन्तु हस्तक्षेप नहीं कर सकता। स्वतंत्रता के समय हमारे संविधान बनाने वालों को दायित्व, कर्तव्य, प्राकृतिक संवैधानिक सामाजिक न्याय आदि का पर्याप्त अनुभव नहीं रहा होगा इसलिये वे इन सबको साफ साफ अलग नहीं कर सके। दूसरी बात यह भी है कि उन लोगों ने भारतीय चिन्तन की मौलिक सोच को किनारे करके विदेशी संविधानों की नकल की। तीसरी बात यह भी रही है कि हमारे संविधान बनाने वालों की नीयत साफ नहीं थी। यही कारण रहा कि उन्होंने लोक को अवयस्क घोषित करके तंत्र को कस्टोडियन अर्थात् संरक्षक घोषित कर दिया। स्वाभाविक है कि वयस्क होने के लिये संरक्षित के सभी सामाजिक तथा संवैधानिक अधिकार संरक्षक के पास ही होते हैं जो वयस्क होने के बाद मिल जाते हैं। लोकतंत्र में तंत्र तीन समकक्ष इकाइयों को मिलाकर बनता है। ये तीनों इकाईयाॅ किसी संविधान से संचालित होती हैं। वे इकाइयाॅ हैं- 1 विधायिका 2 न्यायपालिका 3 कार्यपालिका। तीनों इकाइयां अपने अपने दायित्व पूरे करने के लिये स्वतंत्र होती हैं। साथ ही वे दूसरी इकाइयों के लिये सहायक की भूमिका में भी होती हैं तथा नियंत्रक की भूमिका में भी। इसका अर्थ हुआ कि यदि कोई इकाई कभी पिछड रही होती है तो अन्य दो इकाइयां उसकी पूरक का काम करती हैं तथा यदि कोई इकाई कभी अपनी सीमाएॅ तोडकर उच्श्रृंखलता की दिशा में बढती हैं तब अन्य दो इकाइयां उस पर लगाम लगाने का भी काम करती हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने भूलवश या जानबूझकर संविधान संशोधन तक के असीम अधिकार संसद को दे दिये। इस अधिकार के कारण तीनों इकाइयों में शक्ति संतुलन असंतुलित हो गया। इस अधिकार का अनैतिक दुरुपयोग करते हुए हमारी विधायिका ने संविधान बनने के एक वर्ष बाद ही लगातार न्यायपालिका तथा कार्यपालिका के अधिकारों में कटौती करनी शुरु कर दी। यहाॅ तक कि अप्रत्यक्ष रुप से न्यायपालिका तथा कार्यपालिका विधायिका की गुलाम सरीखी हो गई। सन तिहत्तर में न्यायपालिका ने थोडी हिम्मत करके केशवानन्द भारती प्रकरण के माध्यम से विधायिका की तानाशाही पर रोक लगानी चाही। किन्तु उसे कार्यपालिका अर्थात राष्ट्रपति का पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। परिणाम स्वरुप सन पचहत्तर के आपातकाल न भारत में सम्पूर्ण तानाशाही ला दी। आपातकाल के बाद लोक ने हस्तक्षेप किया और तंत्र के तीनों अंगो को तानाशाही की कैद से मुक्त कराया।
आपातकाल के बाद मिली जुली सरकारों का युग आया। न्यायपालिका धीरे धीरे मजबूत होने लगी। अटल जी की सरकार आते तक न्यायपालिका लगभग विधायिका के बराबर ही एक दूसरे की पूरक और नियंत्रक के रुप में आ चुकी थी। यद्यपि दोनों ही सन पचास से ही कार्यपालिका को दबाकर रखे जो आज भी जारी है। आज भी न्यायपालिका के छोटे से छोटे जज तथा विधायिका के छोटे से छोटे सांसद विधायक और कभी कभी तो उनके चमचे तक बडे बडे सरकारी अधिकारी या पुलिस वाले की अपनी सीमा में जो दुर्गति करते हैं वह किसी से छिपा नहीं हैं। अटल जी के बाद जब मनमोहन सिंह सरीखे शरीफ और लोकतंत्र की दिशा में सर्वाधिक सक्रिय व्यक्ति प्रधानमंत्री बने तो न्यायपालिका अधिक सशक्त होने लगी। यह सक्रियता यदि न्यायिक प्रक्रिया की दिशा में होती तब तो वह सक्रियता तंत्र सहायक होती किन्तु न्यायपालिका की यह सक्रियता विधायिका की तुलना में न्यायिक सर्वोच्चता स्थापित करने की छीना झपटी की ओर बढी और ऐसी सक्रियता घातक सिद्ध हुई।
न्यायपालिका का दायित्व होता है प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा। यह सुरक्षा प्रत्येक व्यक्ति के लिये किसी अन्य व्यक्ति,व्यक्ति समूह,समाज या राज्य सहित सभी इकाईयो से आवश्यक होती है। किसी अन्य इकाई से तो सुरक्षा संविधान करता है किन्तु यदि संविधान ही अतिक्रमण करने लगे तब समस्या पैदा होती है। ऐसी स्थिति में संविधान की कोई धारा ऐसी स्वतंत्रता का अतिक्रमण करती है तो न्यायपालिका ऐसे संविधान संशोधन को रदद भी कर सकती है। इस दायित्व के साथ साथ न्यायपालिका को कुछ संवैधानिक अधिकार भी दिये गये हैं। न्यायपालिका संविधान विरुद्ध कानून, कानून विरुद्ध आदेश और आदेश विरुद्ध क्रिया को भी रदद कर सकती है। न्यायपालिका सीमा के बाहर किये गये ऐसे संविधान संशोधन,कानून,आदेश और क्रिया को रोक तो सकती है किन्तु कोई नई व्यवस्था नहीं दे सकती। न्यायपालिका को कहीं से यह अधिकार नहीं कि वह किसी संविधान, कानून, आदेश या क्रिया के लिये कोई आदेश दे सके या संशोधित कर सके। न्यायपालिका जब अति सक्रियता की ओर बढी तो वह अपनी सीमाएॅ भूल गई और वह न्यायिक आदेशो की अपेक्षा प्रशासनिक तथा विधायी आदेश देने लगी। न्यायपालिका ने जनहित याचिकाएॅ सुनने का असंवैधानिक आदेश देकर बदनाम और उच्श्रृंखल विधायिका के घोडे को जब लगाम लगाई तो लोक ने न्यायपालिका की भरपूर प्रशंसा और उत्साह वर्धन किया। न्यायपालिका ने जब कालेजियम सिस्टम बनाने,जैसा भी अधिकार विहीन आदेश दिया तब भी न्यायपालिका की कोई आलोचना नहीं हुई किन्तु धीरे धीरे न्यायपालिका को प्रशंसा में मजा आने लगा और विधायिका या कार्यपालिका को नीचा दिखाना उसकी आदत सी बन गई। मनमोहन सिंह के पूर्व तक हर राजनेता डंके की चोट पर संसद सर्वोच्च की बात कहता था और तर्क देता था कि तंत्र की तीन इकाइयों में एक मात्र वही अकेली इकाई है जो सीधे जनता द्वारा चुनी जाती है तो मनमोहन सिंह के आने के बाद हर अधिवक्ता या न्यायिक प्रक्रिया से जुडा चपरासी भी डंके की चोट पर न्यायपालिका सवोच्च की बात इस तर्क के साथ कहता है कि न्यायपालिका को संविधान सहित हर मामले में समीक्षा का अंतिम अधिकार है। मनमोहन सिंह के कार्यकाल तक न्यायपालिका का मनोबल लगातार बढता रहा। न्यायपलिका ने न कभी प्रधानमंत्री की परवाह की, न राष्ट्रपति की। मनमोहन सिंह के कार्यकाल में न्यायपालिका ने बहुत अशोभनीय तरीके से प्रधानमंत्री के निर्णय के लिये तथा फांसी की सजा के लिये राष्ट्रपति के निर्णय के लिये भी एक समय सीमा तय कर दी। लेकिन न्यायपालिका यह भूल गई कि उसने अपने निर्णय के लिये आज तक कोई समय सीमा नहीं बनाई है। फांसी की सजा प्राप्त व्यक्ति यदि उस सीमा से अधिक समय तक राष्ट्रपति की दया याचिका के निर्णय के अभाव में जेल में बन्द रहा तो न्यायपालिका ने ऐसे कार्य को उस व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना किन्तु कोई व्यक्ति न्यायपालिका के निर्णय की प्रतीक्षा में दस दस वर्ष जेल में रहकर निर्दोष छूटता है तो कभी न्यायपालिका ने अपना दोष नहीं माना। बल्कि कभी कभी तो ऐसे न्यायिक विलम्ब के लिये भी न्यायपालिका कार्यपालिका पर ही दोष मढकर स्वयं को पाक साफ सिद्ध रखने की चेष्टा करती रही। मैं मानता हॅू कि सभी अधिवक्ता न्यायपालिका को भगवान की तरह प्रचारित करते रहते हैं। मीडिया या अन्य लोग भी न्यायिक अपमानना के डण्डे के भय से या तो उनकी प्रशंसा करते रहते हैं या चुप रहते हैं किन्तु स्पष्ट है कि किसी निर्दोष व्यक्ति को आवश्यकता से एक दिन भी अधिक जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और ऐसा उल्लंघन करने में कहीं न्यायपालिका भी दोषी है तो उसे उत्तरदायी होना चाहिये। यह अलग बात है कि न्यायिक सक्रियता को ढाल बनाकर न्यायपलिका ने तो विधायिका और कार्यपालिका को उत्तरदायी बना दिया किन्तु न्यायिक गलतियों के लिये उसने न कभी अपनी समीक्षा की न ही कोई अन्य तंत्र विकसित किया जो ऐसे विलम्ब के लिये न्यायपालिका की समीक्षा कर सके।
न्यायपालिका जानती है कि लंबित मुकदमो के अंबार लगे हैं। न्यायपालिका इसके लिये जजों की कमी का रोना रोती है। विधायिका के भी अपने तर्क हैं। भारत में जितने प्रतिषत न्यायाधीशो के स्वीकृत पद खाली हैं उससे अधिक प्रतिषत के स्वीकृत पद पुलिस,स्कूल, अस्पताल जैसे अनेक आवश्यक स्थानों पर भी खाली हैं। यदि कोई न्यायिक पदाधिकारी भावुक होकर अपने न्यायिक पदों की पूर्ति प्राथमिकता के आधार पर कराने में सफल हो जावे तो पुलिस, शिक्षक और अस्पतालों का क्या होगा? उनकी चिंता कौन करेगा? क्या न्यायिक प्रक्रिया देश की अन्य समस्याओं से अधिक प्राथमिकता रखती है कि चाहे अन्य पद भले ही न भरे किन्तु न्यायिक पद अवश्य भरे जावें। अरुण जेटली ने जब हिम्मत करके टिप्पणी की थी कि अब न्यायपालिका ही देश का बजट भी बनाना शुरु कर दे तब न्यायपालिका निरुत्तर थी । बात भी सच है । न्यायपालिका आपराधिक मुकदमों के निर्णय में विलम्ब की कीमत पर दिन रात पर्यावरण प्रदूषण के लिये कभी दिल्ली सरकार तो कभी किसी अन्य को फटकार लगाने की वाहवाही लूटने में व्यस्त रहेगी तो आपराधिक मुकदमो में विलम्ब स्वाभाविक है। हमारी न्यायपालिका सरकार को बिना मांगे सलाह देती है कि वह नक्सलवाद के समाधान के लिये बातचीत का मार्ग अपनावे। मैं नहीं समझता कि यह सलाह किसी भी रुप में न्यायिक प्रक्रिया का भाग है। न्यायपालिका उत्तराखंड में आई बाढ के लिये कार्यपालिका से प्रश्न करती है तो कभी दिल्ली की गाडियों में काले शीशे बन्द करने का फर्मान सुनाती है। न्यायपालिका रोज ही बैठे ठाले पेशेवर जनहित याचिका दाखिल करने वालों को भी न्यायिक प्रक्रिया में शामिल करके स्वयं को ओवर लोडेड करती रहती है तो दोष किसका? यदि हम अस्पताल के डाकघरों की भर्ती रोक कर जज बढा भी दें और न्यायपालिका जनहित याचिकाओं में स्वयं को और ज्यादा सक्रिय कर ले तो क्या समाधान हुआ? क्यों नहीं न्यायपालिका अन्य सब काम छोडकर अपनी सारी शक्ति आपराधिक मुकदमों के निर्णय पर केन्द्रित कर लेती? जब लोक समस्या महसूस करेगा तब अपने आप सब लोग मिलकर समाधान सोचेंगे। किन्तु न्यायपालिका अनावष्यक पहल करके पूरी तंत्र व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने की भूल कर रही है। बार बार प्रष्न उठता है कि यदि विधायिका या कार्यपालिका अपना काम न करे तो क्या न्यायपालिका भी हाथ पर हाथ धरे बैठी रहें? ऐसे प्रश्न एकपक्षीय उठाये जाते हैं। स्पष्ट है कि यदि न्यायपालिका गलत करें तो प्रश्न कौन और किससे किया जा सकता है? क्या न्यायपालिका मालिक है जिससे कोई प्रश्न नहीं हो सकता ? क्या न्यायपालिका भगवान है जिससे गलती नहीं हो सकती? कम से कम विधायिका से पांच वर्ष में एक बार चुनाव के समय तो प्रश्न हो सकता है किन्तु न्यायपालिका से तो वह भी व्यवस्था नहीं।
न्यायपालिका समय समय पर अपनी सीमाएॅ भी खुद ही बदल लेती है। सिद्धान्त रुप से तो न्यायपालिका संविधान संशोधन की समीक्षा के अतिरिक्त हर मामले में कानून के अनुसार न्याय करने को बाध्य है। स्पष्ट है कि न्यायपालिका को स्वतंत्र न्याय का कभी कोई अधिकार नहीं। किन्तु न्यायपालिका अपनी सुविधा अनुसार जब चाहे तब स्वयं को न्यायकर्ता भी मानना शुरु कर देती है और जब चाहे तब कानून से बंधा हुआ मान लेती है। वस्तु स्थिति यह है कि तंत्र के दो भाग न्यायपालिका और कार्यपालिका अर्थात पुलिस मिलकर विधायिका द्वारा बनाई गई प्रक्रिया अनुसार न्याय और सुरक्षा देते हैं। पुलिस भी न्याय का एक अहम हिस्सा होती है। पुलिस द्वारा आरोपित अपराधी निर्दोष न होकर संदिग्ध अपराधी होता है। पता नहीं क्यों और कब से न्यायपालिका पुलिस को एक पक्षकार के रुप में मानकर अपराधी और पुलिस के बीच ही निष्पक्ष न्याय करने लगती है। संदिग्ध अपराधी भले ही घोषित अपराधी न हो किन्तु वह परीक्षण काल तक निर्दोष भी नहीं कहा जा सकता। न्यायपालिका सौ अपराधी भले ही छूट जायें किन्तु कोई निरपराध दडिण्त न हो मानकर न्यायालय में ऐसी बाल की खाल निकालती है कि एक अनुमान के अनुसार लगभग सत्तर प्रतिषत तक वास्तविक अपराधी निर्दोष छूट जाते हैं या जमानत पर छूटकर पुनः पुनः अपराध करते हैं । यदि कोई खंूखार अपराधी दर्जनों अपराध करने के बाद भी न्यायिक प्रक्रिया के अन्तर्गत जमानत पर छूटकर पुनः अपराध करें तो दोष किसका? यदि न्यायपालिका अनन्त काल तक या तो अपराधी का फैसला ही न करें या करे भी तो ऐसे अपराधी को सबूत के अभाव में मुक्त कर दे और पुलिस अति सक्रिय होकर उसे गैर कानूनी तरीके से सजा दे दे तो पुलिस द्वारा दी गई गैर कानूनी सजा अन्याय होगी या न्यायालय द्वारा कानूनी तरीके से अनन्तकाल तक लटकाये रखने का कार्य अन्याय है? न्यायपालिका ऐसी पुलिस की अति सक्रियता के मामलों में अधिक रुचि क्यों लेती है। यदि न्याय और कानून विपरीत दिशा में चलते हैं तो या तो कानून को न्याय की दिशा में सुधरना चाहिये अन्यथा कानून की तुलना में न्याय का पक्ष लिया जाना चाहिए। किसी अपराधी का निर्दोष छूटना पीडित पक्ष के प्रति अन्याय है। यदि ऐसा अन्याय बडी मात्रा में हो रहा है तो या तो कानून को सुधरना होगा अन्यथा समाज में स्वयं दण्ड देने की इच्छा जाग्रत होगी। आज यदि समाज में प्रत्यक्ष हिंसा का प्रभाव बढ रहा है तो उसका महत्वपूर्ण कारण है विलम्बित न्याय, अपराधियों का निर्दोष छूटना और पुलिस की गैर कानूनी सक्रियता के मामलो में न्यायपालिका की अतिसक्रियता । किसी पुलिस वाले ने जनहित की भावना से गैर कानूनी तरीके से किसी की हत्या कर दी तो यह कार्य अपराध न होकर गैर कानूनी मात्र ही होगा। तब तक जब तक उस पुलिस वाले ने अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये वह कार्य न किया हो। अपराध और गैरकानूनी का अंतर करने में कर्ता की नीयत महत्वपूर्ण होती है जो न्यायपालिका नहीं समझती या समझना नहीं चाहती। न्यायपालिका कानून की रक्षा के लिये न्याय की अन्देखी करे और पुलिस वाला न्याय के निमित्त कानून की अन्देखी करे तो हम न्यायलय की प्रशंसा करें या पुलिस की। अभी तो हम मानहानि के डर से पुलिस की प्रशंसा नहीं कर पाते किन्तु क्या लम्बे समय तक हम चुप रह सकते हैं? स्वाभाविक है नहीं।
अब सरकार बदली है । पुनः एक दलीय सरकार बनी है। अब तक न्यायपालिका सर्वोच्च के एकपक्षीय नारे को चुनौती मिलनी शु रु हुई है। किन्तु मेरे विचार में सर्वोच्च कौन का यह विवाद पहले भी गलत था और अब भी गलत है। यह सच है कि केशवानन्द भारती केस के माध्यम से न्यायपालिका ने विधायिका पर आंशिक नकेल डालकर भारत में लोकतंत्र को बचा लिया अन्यथा भारत का लोकतंत्र खतरे में था। तत्कालीन न्यायपालिका अपनी इस हिम्मत के लिये बधाई की पात्र है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि न्यायपालिका भी सर्वोच्चतम की छीना झपटी में लग जावे। लोकतंत्र में सर्वोच्च तो सिर्फ लोक ही होता है। तंत्र तो प्रवंधक मात्र होता है। तंत्र के तीनों भाग समकक्ष होते है, उपर नीचे नहीं। यह टकराव अनावश्यक है । फिर भी इसलिये हो रहा है कि तंत्र ने लोक को गुलाम या संरक्षित मानकर स्वयं को मालिक मान लिया है। तंत्र के दोनों भाग न्यायपालिका और विधायिका अपनी सर्वोच्चता की लडाई इस तरह लड रहे हैं जैसे दो लुटेरे मिलकर माल लूट लें और बाद में बंटवारे के लिये आपस में ही छीना झपटी करें। क्या यह अच्छा नहीें होगा कि दोनों स्वयं किनारे होकर लूट का माल वास्तविक मालिक लोक को वापस कर दें? मेरी सलाह है कि अब तंत्र को चाहिये कि वह लोक को अवयस्क की जगह वयस्क मानकर स्वयं को शासन की जगह प्रबंधक मान ले तो भारत का लोकतंत्र इस सर्वोच्चता के अनावश्यक विवाद से बच जायेगा।

मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान

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कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं –
1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है।
2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है।
3 वर्ग निर्माण सिर्फ प्रवृत्ति के आधार पर ही उपयोगी होता है। अन्य किसी आधार पर होने वाला वर्ग निर्माण धुर्तता का सहायक होता है तथा शराफत को कमजोर करता है।
4 महिला सशक्तिकरण के प्रयत्नों का उद्देश्य वर्ग निर्माण मात्र होता है। लिग भेद के आधार पर महिला या पुरुष का संगठन बनना हमेशा घातक होता है। संस्था बनाई जा सकती है।
इस तरह हम कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण एक समस्या है जिसे समाज में समाधान के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महिला और पुरुष अलग अलग व्यक्ति तक ही सीमित होते है। यदि हम पूरे भारत का सर्वे करें तो भारत में कुल मिलाकर एक दो लाख ही महिलाये होगी क्योंकि अन्य महिलाये तो परिवार की सदस्य होती है। वे माॅ बहन बेटी पत्नी तो हो सकती हैं किन्तु महिला के रुप में उनका तब तक कोई पृथक अस्तित्व नहीं होता जब तक वे अकेली न हो । यदि किसी महिला या पुरुष द्वारा तीन पैर की दौड अनिवार्य है और उसमें भी एक महिला और एक पुरुष का जुडना आवश्यक है तो ऐसी दौड में किसी एक इकाई को पृथक महत्व देना नुकसानदायक होता है। किसे मजबूत होना चाहिए यह तय करना उन दोनों का स्वतंत्र क्षेत्र है। इसमें कोई बाहर का व्यक्ति कोई नियम कानून नहीं बना सकता। क्योंकि बाहर का व्यक्ति तो स्वयं प्रतिस्पर्धी है तथा वह चाहेगा कि दोनों कभी एक होकर तीन पैर की दौड न जीत सकें। जब महिला का अपवाद स्वरुप ही पृथक अस्तित्व है तो महिला सशक्तिकरण शब्द या तो महत्वहीन है या घातक।
जो धुर्त लोग महिला और पुरुष के रुप में समाज को बांटकर अपना हित साधना चाहते हैं वे दहेज, सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहु विवाह, देव दासी आदि अनेक पुरानी परम्पराओं का उदाहरण देकर महिला अत्याचार प्रमाणित करते है मेरे विचार में समय समय पर देशकाल परिस्थिति के अनुसार सामाजिक मान्यताए बदलती रहती हैं। किसी समय में यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते को ध्येय वाक्य माना गया था तो किसी समय में ढोल गवार शूद्र पशु नारी को। ये वाक्य समय समय पर परिस्थिति अनुसार बदलते रहते है । वर्तमान में विकृति मानी जाने वाली दहेज ,सती प्रथा,पर्दा प्रथा,बहुविवाह, देव दासी आदि की परम्पराए पुराने समय में महिला शोषण के निमित्त नहीं बनी थी बल्कि सामाजिक व्यवस्था के लिए इन्हें परम्पराओं के रुप में विकसित किया गया था। ये परम्पराएं बाद में परिस्थितियों के बदलाव होने से टूट गई। एक समय था जब बहुविवाह का अर्थ एक पुरुष की कई पत्नियों के साथ माना जाता था। तो अब भविष्य में ऐसा भी समय आने वाला है जब बहु विवाह का अर्थ एक महिला के साथ कई पुरुषों के विवाह से माना जाने लगेगा। न पहले वाली व्यवस्था विकृति थी और न ही भविष्य की व्यवस्था विकृति मानी जायेगी। विवाह,तलाक आदि व्यवस्थाएं आपसी सहमति से तथा सामाजिक मान्यताओं से चलती है,कानून से नहीं। नासमझ लोगों ने अनावश्यक इन परम्पराओं में कानून को घुसा दिया।
आमतौर पर यह प्रचारित किया जाता है कि महिलाये पुरूषों की काम वासना पूर्ति की साधन मात्र होती हैं। यह प्रचार पूरी तरह गलत है। सच्चाई यह है कि काम इच्छा पुरुषों की अपक्षा महिलाओं में अधिक मानी जाती है। यह अलग बात है कि प्राकृतिक कारणों से पति पत्नि के बीच पति को हमेशा आक्रामक स्वरुप में होना चाहिए और पत्नि को आकर्षक स्वरुप में। यह प्राकृतिक स्वरुप यदि दोनों में यथावत है तो इसे किसी का किसी पर अत्याचार नहीं कह सकते। यदि काम इच्छा महिलाओं में बहुत कम होती तो महिलाए एक उम्र के बाद पुरुष के अभाव में परेशान नहीं होतीं। महिलाओं पर समाज में भेदभाव का आरोप भी पूरी तरह गलत है। कानून में महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त है। समाज में महिलाओं को पुरुषो की तुलना में अधिक सम्मान प्राप्त है। परिवार व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पुरुष से कमजोर मानी जाती है लेकिन यह कमजोर भूमिका भी अत्याचार के रुप में नहीं कही जा सकती। एक कलेक्टर की पत्नी अपने दस पुरुष नौकरों पर अपना आदेश चलाती है। अनेक घरों में पुरुष महिलाओं को पीटते भी है तो अनेक घरों के पुरुष महिलाओं से मार भी खाते हैं। महिला और पुरुष का परिवार में कार्य विभाजन है और यह विभाजन सबकी सहमति से होता है। यदि परिवार में भोजन खराब बनेगा तो महिला डांट खाती है,और भोजन का अभाव है तो महिला पति को डाटती भी है। भारत में पिछले वर्षो में होने वाली लाखों किसान आत्महत्याओं में शायद ही एक दो महिलाओं ने आत्महत्या की होगी। क्योंकि यह पुरुष का दायित्व माना जाता है। समाज में एक मान्यता है कि यदि अत्याचारी व्यक्ति की मृत्यु हो जाये तो अत्याचार पीडित प्रसन्न होता है। पति के मरने के बाद पत्नी जितना दुख व्यक्त करती है वह दुख उसका वास्तविक होता है, नाटक नहीं। मतलब साफ है कि यदि भले ही पति पत्नि के बीच पति अत्याचार करता हो किन्तु दोनों के बीच कोई ऐसी बात अवश्य है जो दोनों को जोडकर रखती है और इस जोड को कमजोर नहीं होने देना चाहती। यदि महिलाये यह जानती है कि पुरुष अत्याचारी होता है तो महिलाए सब कुछ समझते बूझते भी पति घर में स्वेच्छा से क्यों जाती है। यहाॅ तक कि यदि कभी कभी उनके जाने में विलम्ब हो जाये तो वे सारी मर्यादाये छोडकर भी जाती है। इसका अर्थ है कि महिला अत्याचार का प्रचार पूरी तरह सोचा समझा षडयंत्र है।
प्राचीन समय में महिलाओ और पुरुषों को कुल मिलाकर समान अधिकार प्राप्त थे। किन्तु वे अधिकार योग प्रधान थे अर्थात कुछ मामलों में महिलाओं को विशेष अधिकार थे तो कुछ मामलो में कम। किन्तु कुल मिलाकर समान थे। ये अधिकारों का विभाजन भी या तो परिवार स्वयं करता था या सामाजिक व्यवस्था। स्वतंत्रता के बाद कानूनी व्यवस्था ने सबको समान अधिकार घोषित कर दिया किन्तु सामाजिक व्यवस्था में पुरानी योग समान प्रणाली जीवित रही।
समाज में दो प्रकार के परिवार है 1 पारम्परिक परिवार 2 आधुनिक परिवार। पारम्परिक परिवार की महिलाओं की संख्या 98 प्रतिशत है और आधुनिक परिवारो की करीब दो प्रतिशत । ये दो प्रतिशत आधुनिक महिलाये पूरे समाज का शोषण करना चाहती है। इन्हे सामाजिक व्यवस्था में तो विशेष अधिकार भी चाहिए और कानूनी व्यवस्था में समान अधिकार भी चाहिए। किसी आधुनिक महिला ने आज तक यह नहीं कहा कि उसे समान अधिकार चाहिए या विशेष अधिकार यदि पूरे भारत का सर्वे किया जाये तो ये दो प्रतिशत आधुनिक महिलाये अपने को 98 प्रतिशत पारम्परिक महिलाओं का प्रतिनिधि घोषित करती है। किन्तु यदि इनके व्यक्तिगत जीवन पर नजर डाले तो 98 प्रतिशत की तुलना में इन दो प्रतिशत का चारित्रिक मापदण्ड भी कमजोर होता है तथा पारिवारिक जीवन भी अधिक असंतोषप्रद होता है। यहाॅ तक कि तलाक के मामले का भी प्रतिशत इन दो प्रतिशत आधुनिक महिलाओं में अधिक होता है। ये दो प्र्रतिशत आधुनिक महिलाएं सहजीवन के स्थान पर उच्श्रृंखलता को अधिक महत्व देती है और उसे ही स्वतंत्रता कहती है। यहाॅ तक कि ये महिलाये सारी सुविधाये भी अपने परिवार तक समेट लेना चाहती है। पति को सामान्य नौकरी तो पत्नी को आरक्षित नौकरी। पति सामान्यतया लोकसभा में तो पत्नी आरक्षित सीट पर । यदि यह नियम बन जाये कि एक परिवार का एक ही सदस्य राजनीतिक पद या सरकारी नौकरी पा सकता है तो ये आधुनिक महिलाये आसमान सर पर उठा लेगी किन्तु न ये ऐसा होने देंगी न इनके पति।
कुछ दशक पूर्व पुरुष सशक्तिकरण के नाम से समाज में विकृति आई थी और उसके भी दुष्परिणाम हमें दिखे। अब महिला सशक्तिकरण का एक घातक नारा समाज में प्रचारित किया जा रहा है और वह नारा समस्या का समाधान न होकर नई समस्या पैदा कर रहा है। मैंने दिल्ली के राजघाट पर सरकार की तरफ से एक बडा बोर्ड देखा जिसमें लिखा है ‘‘महिलाओं पर अत्याचार कानूनन अपराध है’’। मैं आज तक नहीं समझा कि क्या समाज में किसी भी अन्य व्यक्ति पर अत्याचार करने की छूट प्राप्त है? ये महिलाओं शब्द लिखना वास्तव में बहुत घातक है। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रसिद्ध संत बाबा रामदेव सरीखे लोग कन्या भ्रुण हत्या को रोकने का अभियान चला रहे है। मेरे विचार में बालक की भ्रूण हत्या तो नगण्य होती है फिर पूरी भ्रूण हत्या को ही यदि रोक दिया जाये तो कैसे गलत होगा ? इतना अवश्य है कि यदि पूरी भ्रूण हत्या को रोका गया तो महिला और पुरुष के बीच वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष खडा करके अपनी राजनैतिक रोटी सेकने का काम नहीं हो पायेगा।
यदि इसी तरह महिला सशक्तिकरण का नारा विकसित होता रहा तो एक नई विकृति जन्म ले सकती है। कहा जाता है कि घरों में महिलाओं को दासी समझा जाता है। यदि भविष्य में यह प्रथा उलट जाये और घोषित रुप से दासी कहा जाने लगे तो क्या अन्तर होगा। यदि ऐसी विकृत प्रथा प्रचलित हो जाये कि पुरुष विज्ञापन देने लगे कि उन्हे एक ऐसी दासी चाहिए जो दिन में नौकरी का काम करे और रात में उसके साथ सोये भी। इस विज्ञापन के आधार पर वेतन भत्ते तय करने की प्रथा हो जाये तो आप सोचिये कि यह प्रथा कानून कैसे रोक पायेगा जबकि यह प्रथा वर्तमान पारिवारिक व्यवस्था से अधिक बुरी होगी।
परिवार में पति पत्नि के बीच अविश्वास की दीवार खडी की जा रही है। यह दीवार कितनी लाभदायक होगी यह तो भविष्य बतायेगा किन्तु यह दीवार परिवार व्यवस्था को तोडेगी अवश्य । छोटे बच्चों के संस्कार खराब होगे। लाभ होना तो संदेहास्पद है किन्तु नुकसान होना निश्चित है । अब पुरानी परिवार और समाज व्यवस्था की ओर लौटना न तो संभव है न उचित किन्तु महिला सशक्तिकरण के नाम पर परिवार तोडक समाज तोडक अभियान भी बंद होने चाहिए। परिवार में कौन सशक्त हो,कार्य विभाजन कैसा हो यह परिवार का आंतरिक मामला है उन्हें मिल बैठकर तय करने दीजिए। कोई कानून बनाना उचित नहीं। यदि उनमें आपसी सहमति नहीं है तो उन्हे अलग अलग मार्ग पर चलने की स्वतंत्रता दीजिए। अलग होने में भी कोई कानूनी बंधन उचित नहीं। मेरे विचार में एक ही समाधान है कि भारत में व्यक्ति को एक इकाई माना जाये। सबको समान अधिकार माने जाये। कानून किसी को विशेष अधिकार न दे तथा देश सवा सौ करोड व्यक्तियों और परिवारों गांवो का संघ हो। धर्म, जाति, लिंग के आधार पर होने वाले सब प्रकार के भेद भाव मूलक कानून समाप्त कर दिये जाये।
नोटः- मंथन क्रमांक 7 का अगला विषय न्यायिक सक्रियता कितनी उचित कितनी घातक होगा।

मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था

Posted By: kaashindia on January 29, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं-
(1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक। परिवार एक से अधिक व्यक्तियों को मिलाकर बनता है। इसलिए परिवार को संगठनात्मक अथवा संस्थागत इकाई माना जा सकता है,प्राकृतिक नहीं।
(2) प्रत्येक व्यक्ति को एक प्राकृतिक अधिकार प्राप्त होता है,और वह है उसकी स्वतंत्रता।
(3) प्रत्येक व्यक्ति का एक सामाजिक दायित्व होता है और वह होता है उसका सहजीवन।
(4) प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता असीम होती है, उस सीमा तक जब तक किसी अन्य व्यक्ति की सीमा प्रारंभ न हो जाये।
(5) प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा राज्य का दायित्व होता है तथा व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग देना समाज का दायित्व होता है।
(6) परिवार व्यवस्था समाज व्यवस्था की एक पहली इकाई होती है, जो अपनी सीमा में स्वतंत्र होते हुए भी उपर की इकाईयों की पूरक होती है।
उपरोक्त धारणाओं के आधार पर हम कह सकते है कि परिवार व्यवस्था सहजीवन की पहली पाठशाला है और प्रत्येक व्यक्ति को परिवार व्यवस्था के साथ अवश्य ही जुडना चाहिए। किन्तु पिछले कुछ सौ वर्षो से हम देख रहे है कि परिवार व्यवस्था टूट रही है। किसी भी व्यवस्था में यदि रुढिवाद आता है तो उसके दुष्परिणाम भी स्वाभाविक है । भारत की परिवार व्यवस्था कई हजार वर्षो से अनेक समस्याओं के बाद भी सफलतापूर्वक चल रही है। यहाॅ तक कि लम्बी गुलामी के बाद भी चलती रही। इसके लिए वह बधाई की पात्र है। किन्तु स्वतंत्रता के बाद परिवार व्यवस्था में विकृतियों का लाभ उठाने के लिए अनेक समूह सक्रिय रहे। इन समूहों में धर्मगुरु, राजनेता, पश्चिमी संस्कृति तथा वामपंथी विचार धारा विशेष रुप से सक्रिय रहे। परम्परागत परिवारों के बुजुर्ग भी किसी तरह के सुधार के विरुद्ध रहे। परिणाम हुआ कि परिवारो में आंतरिक घुटन बढती रही और परिवार व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने वालो को इसका लाभ मिला।
वर्तमान समय में परिवार व्यवस्था के पक्ष और विपक्ष में दो विपरीत धारणाये सक्रिय है-
(1) रुढिवादी धारणा जो परिवार व्यवस्था को एक प्राकृतिक इकाई मानती है तथा उसमें किसी तरह के संशोधन के विरुद्ध है।
(2) आधुनिक धारणा जो किसी न किसी तरह इस व्यवस्था को नुकसान पहुचाने के लिए प्रयत्नशील है, किन्तु उसके पास परिवार व्यवस्था का कोई नया विकल्प या सुझाव नहीं है। रुढिवाद का यह परिणाम स्वाभाविक होता हैं, यदि उसमें देशकाल परिस्थिति के अनुसार संशोधन न किया जाये। संशोधन का अभाव ही अव्यवस्था का कारण बनता है और यही परिवार व्यवस्था के साथ भी हो रहा है।
मैं जिन मुददो पर गंभीरतापूर्वक सोचता हॅू किन्तु साथ ही यह भी महसूस करता हॅू कि मेरी सोच वर्तमान प्रचलित धारणाओं के विपरीत है उन्हें समाज के बीच प्रस्तुत करने के पूर्व मैें लम्बा प्रयोग भी अवश्य करता हॅू। मैं बचपन से ही महसूस करता था कि परिवार व्यवस्था बहुत अच्छी व्यवस्था है किन्तु उसमें विकृति आ गई है और उसे टूटने से बचाने के लिए कुछ सुधार करने होंगे। मैंने ऐसे सुधार के लिए करीब 50 वर्ष पूर्व ही अपने परिवार को चुना। उस समय मेरे परिवार में कुल 10 सदस्य थे और हम सबने बैठकर चार महत्वपूर्ण निर्णय लिये-
(1) परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर दसो सदस्यों का सामूहिक अधिकार होगा, जो उसके अलग होते समय ही उसे समान रुप से प्राप्त हो सकेगा।
(2) परिवार का प्रत्येक सदस्य सामूहिक अनुशासन में रहने के लिए बाध्य होगा।
(3) परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी परिवार छोड सकता है अथवा कभी भी बिना कारण बताये परिवार से हटाया जा सकता है।
(4) परिवार में किसी भी प्रकार का विवाद होने पर हमारे कुटुम्ब प्रमुख के समक्ष अपील हो सकती है जिनका निर्णय सबके लिए बाध्यकारी होगा।
हमारे परिवार में 50 वर्षो से लगातार संख्या घटती बढती रही। अब हमारा एक परिवार विभाजित होकर तीन परिवार बन गये है तथा हमारे कुटुम्ब में कुल 6 परिवार है। हमारे पूरे परिवार में उपरोक्त व्यवस्था सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। यहाॅ तक कि कुटुम्ब अर्थात 6 परिवारों के पूरे 50 सदस्य हर चार महिने में कहीं एक साथ बैठकर विचार मंथन किया करते है। यह प्रक्रिया भी 50 वर्षो से निरंतर चल रही है। परिवार की आंतरिक बैठक तो समय समय पर होती ही रहती है। हमारे कुटुम्ब का प्रमुख भी सभी सदस्य मिलकर ही चुनते है। वर्तमान में हमारे कुटुम्ब के प्रमुख हमारे सबसे छोटे भाई है जबकि तीन बडे भाई अभी भी सक्रिय है। कुछ महिने पूर्व हमारे परिवार ने यह महसूस किया कि अब इस प्रणाली को सार्वजनिक तथा कानूनी स्वरुप दिया जाये । हम लोगो ने परिवार का एक सार्वजनिक और कानूनी स्वरुप इस प्रकार बनाया –
समझौता ज्ञापन (एम.ओ.यू.)
यह समझौता ज्ञापन आज दिनांक 23.10.2016 को नीचे लिखे तेरह सदस्यों की आपसी सहमति से तैयार तथा कार्यान्वित हो रहा है। सबने आपसी सहमति से स्वयं को भौतिक तथा कानूनी रुप से ज्ञापन में लिखे नियमों से एक सूत्र मंे बांधा है।
नियम-
(1)समूह का नाम कांवटिया परिवार क्रमांक एक होगा।
(2)परिवार के प्रत्येक सदस्य का परिवार के सभी सदस्यों की चल, अचल, नगद, ज्वेलरी, बान्ड, लेनदारी, देनदारी या अन्य किसी भी प्रकार की वर्तमान तथा भविष्य में अर्जित सम्पत्ति पर बराबर का अधिकार होगा। अर्थात् वर्तमान में प्रत्येक सदस्य का हिस्सा तब तक तेरहवा हिस्सा होगा जब तक सदस्य संख्या कम या अधिक न हो।
(3)परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने व्यापार, आय, व्यय, संग्रह, कर्ज, अलग रखने के लिये उस सीमा तक स्वतंत्र होगा जब तक परिवार को आपत्ति न हो।
(4)परिवार का कोई भी सदस्य पूरी तरह परिवार के अनुशासन से बंधा होगा। उसकी राजनैतिक ,धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक अथवा अन्य किसी भी प्रकार की गतिविधि उस सीमा तक ही स्वतंत्र होगी जब तक परिवार को आपत्ति न हो।
(5)परिवार का कोई भी सदस्य कभी भी परिवार छोड़ सकता है अथवा परिवार द्वारा परिवार से हटाया जा सकता है किन्तु हटने वाला सदस्य परिवार से हटते समय की सम्पूर्ण सम्पत्ति में से सदस्य संख्या के आधार पर अपना हिस्सा ले सकता है।
(6) परिवार में रहते हुये परिवार की सम्पूर्ण सम्पत्ति पर प्रत्येक सदस्य का सामूहिक अधिकार होगा, व्यक्तिगत नहीं। कोई सदस्य किसी अन्य को भविष्य के लिये कोई विल, दानपत्र अथवा अधिकार पत्र या घोषणा नहीं कर सकेगा क्योंकि परिवार में रहते हुए उसकी किसी सम्पत्ति पर उसका परिवार की सहमति तक ही व्यक्तिगत अधिकार है।
(7) परिवार के किसी सदस्य का नवजात बालक तत्काल ही परिवार का सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त सदस्य प्राकृतिक रुप से ही मान लिया जायेगा। तत्काल ही सम्पूर्ण सम्पत्ति में उसका बराबर हिस्सा हो जायगा। परिवार में रहते हुए किसी सदस्य की मृत्यु होती है तो प्राकृतिक रुप से उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी।
(8)परिवार के बाहर के कोई भी व्यक्ति (स्त्री,पुरुष,या बालक,बालिका) परिवार की सहमति से परिवार के सदस्य बन सकते हैं। सदस्य बनते ही उन पर ज्ञापन की सभी कंडिकाओं के अधिकार और कर्तव्य लागू हो जायेंगे।
(9)परिवार का कोई बालक बारह वर्ष की उम्र तक ना बालिग माना जायगा। उम्र पूरी होते तक बालक के परिवार से निकलने अथवा निकालने की स्थिति में उस क्षेत्र की स्थानीय इकाई अर्थात् ग्राम सभा या नगरीय निकाय को सूचना दी जायगी। उसके हिस्से की सम्पत्ति भी उक्त स्थानीय निकाय की सहमति से बनाई गई व्यवस्था के अन्तर्गत ही स्थानान्तरित हो सकेगी।
(10) परिवार के सदस्य आपसी सहमति से परिवार के संचालन के लिये आंतरिक उपनियम बना सकेंगे तथा आवश्यकतानुसार उनमें फेर बदल भी कर सकेंगे। ऐसे सभी नियम या फेर बदल सभी सदस्यों के हस्ताक्षर से ही लागू होंगे।
(11) यदि परिवार का कोई सदस्य परिवार की सहमति के बिना कोई कर्ज लेता है, नुकसान करता है, सरकारी कानून का उल्लंघन करता है तो उक्त सदस्य की व्यक्तिगत सम्पत्ति तक ही सीमित होगी। परिवार के किसी अन्य सदस्य की सम्पत्ति उससे प्रभावित नही होगी। किन्तु परिवार मे रहते तक उस सदस्य का सामुहिक सम्पत्ति मे बराबर का हिस्सा बना रहेगा जो उसे परिवार छोडने की स्थिति मे प्राप्त हो सकता है।
(12 ) परिवार का कोई सदस्य परिवार के निर्णय से असंतुष्ट हो तो वह उच्चसमिति के समक्ष अपनी बात रख सकता है। उच्चसमिति में तीन सदस्य होंगे-1. राजेन्द्र कुमार ,आत्मज-धुरामल जी, 2. कन्हैयालाल,आत्मज-धुरामल जी, 3. सुशील कुमार, आत्मज-राधेश्याम जी । उच्चसमिति का निर्णय अंतिम होगा।
(13) यदि इस ज्ञापन की कोई कन्डिका किसी कानून के विरुद्ध जाती है तो न्यायालय का निर्णय अंतिम होगा। किसी तरह के विवाद की स्थिति में भी विवाद के समय प्रचलित कानून के नियमों के अनुसार लिये गये न्यायालयीन निर्णय मान्य होंगे।
(14) ज्ञापन की किसी कंडिका में कुछ जोड़ना,घटाना या सुधार करना हो तो उसी प्रक्रिया से हो सकता है जिस प्रक्रिया से यह समझौता ज्ञापन बना है।
इस कानूनी स्वरुप को हम लोगो ने नोटरी के द्वारा रजिस्टर्ड भी कराया जिससे कि भविष्य में कोई समस्या पैदा हो तो कानूनी समाधान निकल सके। मैं समझता हॅू कि उपरोक्त पारिवारिक ढाॅचा से अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। परिवारों में महिला अधिकार अथवा महिलाओं को सम्पत्ति और संचालन व्यवस्था में समानता के अधिकार की मांग अपने आप समाप्त हो जायेगी और मेरे विचार से ऐसा होना न्याय संगत भी है। परिवार में रहते हुये कोई कानूनी रुप से अपने को माता-पिता,पति-पत्नी जैसी अन्य कोई विशेष मान्यता नहीं रख सकेगा और न ही देश का कोई कानून परिवार के आंतरिक मामलो मे कोई हस्तक्षेप कर सकेगा। विवाह तलाक बालक बालिका आदि के झगडे या कोड बिल अपने आप समाप्त हो जायेगे। सारे संबंध पारिवारिक या सामाजिक तक ही सीमित होंगे। इस व्यवस्था में यह बात भी विशेष महत्व रखती है कि अब तक सारी दुनिया में प्रचारित व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार संशोधित हो जायेगा और परिवार की सम्पत्ति सभी सदस्यों की सामूहिक होगी,व्यक्तिगत नहीं। इस व्यवस्था से अनेक प्रकार के सम्पत्ति अथवा अन्य कानूनी मुकदमें समाप्त हो जायेंगे। मैं तो अपने अनुभव से तथा कल्पना के आधार पर यह घोषित करने की स्थिति में हॅॅू कि उपरोक्त पारिवारिक व्यवस्था दुनिया की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था का आधार बन सकती है। मैं मानता हॅू कि अन्य परिवारों को परिस्थिति अनुसार उपरोक्त प्रारुप में कई जगह बदलाव भी करने पड सकते है और उन्हें करने चाहिए किन्तु मेरा एक सुझाव अवश्य है कि सम्पत्ति की समानता के अधिकार में कोई संशोधन करना उचित नहीं है।
यदि हम देश में तानाशाही की जगह लोकतंत्र को सफल होता हुआ देखना चाहते है तो हमें इसकी शुरुवात परिवार से करनी चाहिए। परिवार व्यवस्था में तानाशाही और राज्य व्यवस्था मे लोकतंत्र एक अव्यावहारिक कल्पना है। हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने कुछ ऐसी विचित्र कल्पना की कि उन्होने परिवार व्यवस्था में तो लोकतंत्र को शून्य हो जाने दिया और राज्य व्यवस्था में लोकतंत्र की बात करते रहे। परिणाम हुआ कि परिवार व्यवस्था लोकतंत्र के अभाव में टूटती रही और राज्य व्यवस्था निरंतर तानाशाही की तरफ अर्थात पारिवारिक केन्द्रीयकरण की तरफ बढती गई। मेरा सुझाव है कि देश के लोगों को संशोधित परिवार व्यवस्था पर विचार करना चाहिए और अपने-अपने परिवारों में लागू करना चाहिए।
नोटः- मंथन क्रमांक 6 का अगला विषय महिला सशक्तिकरण का होगा।

मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान

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यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बीच की दूरी बहुत तेजी से बढ़ रही है किन्तु समुचे विश्व में भी दूरी बढती ही जा रही है, भले ही इसकी गति कम ही क्यों न हो। सारे विश्व में जितनी हत्याएॅ या अन्य अपराध अपराधियों के द्वारा हो रहे हंै,उससे कई गुना अधिक धर्म अथवा राज्य व्यवस्थाओं के आपसी टकराव से हो रहे हंै। मानवता की सुरक्षा के नाम पर जितनी सुरक्षा हो रही है उससे कई गुना ज्यादा मानवता का हनन हो रहा है। वैसे तो सम्पूर्ण विश्व में अनेक प्राकृतिक सामाजिक राजनैतिक समस्याएॅ व्याप्त हैं किन्तु उन सब में भी कुछ महत्वपूर्ण समस्याएॅ चिन्हित की गई हंै जिनके समाधान का कोई मार्ग खोजना आवश्यक है। मैं स्पष्ट कर दॅू कि पिछले कई दशकों से ये समस्याएॅ सम्पूर्ण विश्व में बढी ही है तथा लगातार बढती जा रही है-
(1)निष्कर्ष निकालने में विचार मंथन की जगह प्रचार का अधिक प्रभावकारी होना।
(2)संचालक और संचालित के बीच बढती दूरी ।
(3)राजनीति, धर्म और समाज सेवा का व्यवसायीकरण।
(4)भौतिक पहचान का संकट।
(5)समाज का टूटकर वर्गो में बदलना।
(6)राज्य द्वारा दायित्व और कर्तव्य की परिभाषाओं को विकृत करना।
(7)मानव स्वभाव तापवृद्धि।
(8) मानव स्वभाव स्वार्थ वृद्धि।
(9)धर्म और विज्ञान के बीच बढती दूरी।
1)आज सम्पूर्ण विश्व मंे प्रचार करने की होड़ मची हुई है। अनेक असत्य सत्य के समान स्थापित हो गये है, तथा लगातार होते जा रहे है। भावनाओं का विस्तार किया जा रहा है तथा विचार मंथन को कमजोर या किनारे किया जा रहा है। विचार मंथन तथा विचारकों का अभाव हो गया है और प्रचार के माध्यम से तर्क को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है। संसद तक मंे विचार मंथन का वातावरण नहीं दिखता। कभी कभी तो संसद में भी बल प्रयोग की स्थिति पैदा होने लगी है। इसके समाधान के लिए उचित होगा कि विचार, शक्ति, व्यवसाय और श्रम के आधार पर योग्यता रखने वालो को बचपन से ही अलग अलग प्रशिक्षण देने की व्यवस्था हो। प्रवृत्ति और क्षमता का अलग अलग टेस्ट हो। विधायिका, अनुसंधान आदि के क्षेत्र विचारको के लिए आरक्षित कर दिया जाये।
(2)सारी दुनिया मंे राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन बिगडता जा रहा है। समाज के आंतरिक मामलों में भी राज्य का हस्तक्षेप बढता जा रहा है। परिवार, गाॅव की आतंरिक व्यवस्था में भी राज्य निरंतर हस्तक्षेप करने का अधिकार अपने पास समेट रहा है। लोकतंत्र की परिभाषा लोक नियंत्रित तंत्र से बदलकर लोक नियुक्त तंत्र तक सीमित की जा रही है। संविधान तंत्र और लोक के बीच पुल का काम करता है किन्तु संविधान संशोधन में भी तंत्र निरंतर लोक को बाहर करता जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में मेरा सुझाव है कि लोकतंत्र की जगह सम्पूर्ण विश्व में लोक स्वराज्य की दिशा में बढा जाये। लोक स्वराज्य लोक और तंत्र के बीच बढती दूरी को कम करने में बहुत सहायक हो सकता है। इस कार्य के लिए सबसे पहला कदम यह उठना चाहिए कि किसी भी देश का संविधान तंत्र अकेले ही संशोधित न कर सके। या तो लोक द्वारा बनाई गई किसी अलग व्यवस्था से संशोधित हो अथवा दोनो की सहमति अनिवार्य हो। उसके साथ साथ परिवार तथा स्थानीय इकाईयों को भी सम्प्रभुता सम्पन्न मानने के बाद कुुछ थोडे से महत्वपूर्ण अधिकार तंत्र के पास रहने चाहिए।
(3)सारी दुनिया में समाज व्यवस्था की जगह पॅूजीवाद का विस्तार हो रहा है। प्राचीन समय में विचारकों और समाज सेवियों को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था,राजनेताओं से भी उपर। किन्तु वर्तमान समय में विचारको और समाज सेवियों का अभाव हो गया है। यहाॅ तक कि धर्मगुरु,समाज सेवी राजनेता सभी किसी न किसी रुप में धन बटोरने में लग गये है। समाज सेवा के नाम पर एन जी ओ के बोर्ड लगाकर धन इकटठा किया जा रहा है। सारी दुनिया के राजनेताओं मंे धन संग्रह की प्रवृत्ति बढती जा रही है। इस बढती जा रही समस्या के समाधान के लिए हमें यह प्र्रयत्न करना चाहिए कि सम्मान,शक्ति,सुविधा कही भी एक जगह किसी भी रुप में इक्टठी न हो जाये। जो व्यक्ति इच्छा और क्षमता रखता है, वह सम्मान शक्ति और सुविधा मंे से किसी एक का चयन कर ले किन्तु यह आवश्यक है कि उसे अन्य दो की इच्छा त्यागनी होगी।इन तीनों के बीच खुली और स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा हो सकती है। किन्तु श्रमजीवियों को मूलभूत आवश्यकताओं की गारण्टी व्यवस्था दे। यह व्यवस्था कुछ कठिन अवश्य है किन्तु इसके अतिरिक्त कोई अन्य समाधान नहीं है।
(4)प्राचीन समय में गुण कर्म स्वभाव के अनुसार वर्ण व्यवस्था बनाकर व्यक्तियों की अलग अलग पहचान बनाई गई थी। यह पहचान यज्ञोपवीत के माध्यम से अलग अलग होती थी। संन्यासियों के लिए भी अलग वेशभूषा का प्रावधान था। विवाहित,अविवाहित की भी पहचान अलग थी। यहाॅ तक कि समाज बहिष्कृत लोगों को भी अलग से पहचाना जा सकता था। दुनिया के अनेक देशो में अधिवक्ता,पुलिस,न्यायाधीश आदि की भी ऐसी अलग अलग पहचान होती थी कि कोई अन्य भ्रम में न पड़ सके। यदि बिना किसी व्यवस्था के इस प्रकार की नकली पहचान सुविधाजनक हो जाये तो अव्यवस्था फैलना स्वाभाविक है। वर्तमान समय में धीरे धीरे ये ही हो रहा है। अब विद्वान, संन्यासी ,फकीर, समाज सेवी बिना किसी योग्यता और परीक्षा के नकली पहचान बनाने में सफल हो जा रहे है। एन जी ओ का बोर्ड लगाकर कोई मानवाधिकारी हो जा रहा है, तो कोई पर्यावरणवादी जिनका दूर दूर तक न मानवाधिकार से कोई संबंध है, न ही पर्यावरण से। ऐसे लोग व्यवस्था को ब्लैकमेल भी करने लगे हैं। इस समस्या के समाधान के लिए ऐसी पहचान को तब तक प्रतिबंधित कर देना चाहिए जब तक कि उसने किसी स्थापित व्यवस्था से प्रमाण पत्र प्राप्त न किया हो,साथ ही नकली प्रमाण पत्रों पर भी कठोर दण्ड की व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए।
(5)पूरे विश्व में वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष,वर्ग संघर्ष की आंधी चल रही है। वर्ग समन्वय लगातार टूट रहा है तथा वर्ग विद्वेष बढ़ रहा है। प्रवृत्ति कि आधार पर दो ही वर्ग हो सकते है-(1) शरीफ (2) बदमाश । इस सामाजिक वर्ग निर्माण की जगह धर्म-जाति, भाषा, राष्ट्र, उम्र,लिंग, गरीब-अमीर,किसान-मजदूर ,गाॅव-शहर जैसे अन्य अनेक वर्ग बन रहे है तथा बनाये जा रहे है। बिल्लयों के बीच बंदर के समान हमारी शासन व्यवस्था वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष के माध्यम से समाज व्यवस्था को छिन्न भिन्न करके अपने को मजबूत करने का प्रयास कर रही है। यह प्रयास बहुत घातक है। समाज को चाहिए कि वह प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार के वर्ग निर्माण को तत्काल अवांछित घोषित कर दे। साथ ही वर्तमान समय में बन चुके वर्गो में भी वर्ग समन्वय की भावना विकसित की जाये।
(6)प्राकृतिक रुप से दो ही कार्य करने आवश्यक होते है-(1) व्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा तथा (2) व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग। राज्य का दायित्व होता है कि वह व्यक्ति की न्याय और सुरक्षा के माध्यम से स्वतंत्रता को सुरक्षित करे। समाज का दायित्व होता है कि वह व्यक्ति को सहजीवन की ट्रेनिंग दे। पूरी दुनिया में राज्य दायित्व और स्वैच्छिक कर्तव्य का अंतर या तो भूल गया अथवा जानबूझकर भूलने का नाटक कर रहा है। जनकल्याणकारी कार्य राज्य के स्वैच्छिक कर्तव्य होते है,दायित्व नहीं। राज्य समाज को गुलाम बनाकर रखने के उद्देश्य से जनकल्याणकारी कार्यो को अपने दायित्व घोषित करता है। इस भ्रम निर्माण से सुरक्षा और न्याय पर भी विपरीत प्रभाव पडता है। सुरक्षा और न्याय प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार होता है जबकि राज्य द्वारा दी गई अन्य सुविधायें व्यक्ति का अधिकार नहीं होता किन्तु राज्य द्वारा जनकल्याणकारी कार्यो को अपना दायित्व मान लेने से आम नागरिक इन सुविधाआंे को अपना अधिकार समझने लगते है। इस भ्रम के कारण ही समाज में अनेक टकराव उत्पन्न हो रहे है। आम लोग राज्य के मुखापेक्षी हो गये है। क्योंकि सुविधा लेना प्रत्येक व्यक्ति ने अपना अधिकार मान लिया है।
समाधान के लिए राज्य को सुरक्षा और न्याय तक सीमित हो जाना चाहिए। जनकल्याण के अन्य कार्य राज्य अतिरिक्त कर्तव्य के रुप में चाहे तो कर सकता है किन्तु यह उसका दायित्व नहीं होगा और न ही राज्य उसके लिए समाज पर कोई बाध्यकारी टैक्स लगा सकता है।
(7) लगातार मानव स्वभाव आवेश,हिंसा,प्रति हिंसा की दिशा में बढ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग का वास्तविक आशय मानवस्वभाव तापवृद्धि होता है जो पूरी दुनिया में बढ रहा है। किन्तु हम मानव स्वभाव तापवृद्धि के स्थान पर पर्यावरणीय तापवृद्धि को अधिक महत्व दे रहे है। पर्यावरण की भी चिंता होनी चाहिए किन्तु मानव स्वभाव को तापवृद्धि की तुलना में पर्यावरण को अधिक महत्वपूर्ण मानना गलत है। इस तापवृद्धि के कारण सारी दुनिया में हिंसक टकराव बढ रहे है। पश्चिमी जगत ऐसे टकरावों से अपने आर्थिक लाभ उठाकर संतुष्ट हो जाता है। इस समस्या के समाधान के लिए हमें चाहिए कि सुरक्षा और न्याय के अतिरिक्त अन्य सारी व्यवस्था राज्य से लेकर परिवार,गाॅव,जिला,प्रदेश तथा केन्द्रिय समाज तक बांट दी जावें। इससे राज्य सफलतापूर्वक न्याय और सुरक्षा को संचालित कर सकेगा, तथा अन्य कार्य भी सामाजिक ईकाइयाॅ राज्य मुक्त अवस्था में ठीक से कर पायेंगी।
(8)सम्पूर्ण विश्व में मानव स्वभाव में स्वार्थ बढ रहा है। स्वार्थ के कारण अनेक प्रकार के टकराव बढ रहे है। स्वार्थ के दुष्प्रभाव से ही परिवार व्यवस्था भी छिन्न भिन्न हो रही है तथा समाज व्यवस्था में भी लगातार टूटन आ रही है। स्वार्थ लगातार मानव स्वभाव में बढता जा रहा है। कमजोरों का शोषण आम बात हो गई है। आमतौर पर व्यक्ति अपने मानवीय कर्तव्यों को भी भूल रहा है। स्वार्थ के कारण ही सम्पत्ति के झगडे पैदा हो रहे है।
मानव स्वभाव में स्वार्थ के बढने का महत्वपूर्ण कारण है पश्चिम का सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार। अभी तक सम्पत्ति की तीन व्यवस्थाएॅ मानी गई है-(1) व्यक्तिगत सम्पत्ति (2) सार्वजनिक सम्पत्ति जो साम्यवाद का सिद्धांत है तथा असफल हो चुका है। (3) गाॅधी जी का ट्रस्टीशिप जो अभी तक अस्पष्ट है। यही कारण है कि व्यक्तिगत सम्पत्ति का सिद्धांत लगातार बढ रहा है। इस समस्या का समाधान संभव है। व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा ट्रस्टीशिप को मिलाकर एक नया सिद्धांत बना है जिसमें सम्पत्ति परिवार की मानी जायेगी तथा परिवार में रहते हुए व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का ट्रस्टी मात्र होगा,मालिक नहीं। इस संशोधन से स्वार्थ वृद्धि पर अंकुश लगना संभव है।
(9)धर्म और विज्ञान के बीच भी दूरी लगातार बढती जा रही है। जब से धर्म ने गुणात्मक स्वरुप छोडकर संगठनात्मक स्वरुप ग्रहण किया है तब से उसमें लगातार रुढिवाद बढता जा रहा है। रुढिवाद धर्म को विज्ञान से बहुत दूर ले जाता है। रुढिवाद के कारण ही भावनाओं का विस्तार होता है तथा विचार शक्ति घटती है। जबकि विज्ञान विचार के माध्यम से निष्कर्ष निकालता है तथा गलत को सुधारने की प्रक्रिया मेें लगा रहता है। इसके कारण भी पूरे विश्व में अनेक समस्याएॅ पैदा हो रही है। पहले तो इस्लाम ही रुढिवाद का एकमात्र पोषक था किन्तु अब तो धीरे धीरे यह बीमारी हिन्दुओं में भी बढती जा रही है।
इसके समाधान के लिए रुढिवाद की जगह यथार्थवाद को प्रोत्साहित करना होगा। यथार्थवाद और विज्ञान के बीच तालमेल होने से इस समस्या का समाधान संभव है।
उपरोक्त नौ समस्याओं के अतिरिक्त भी समाज में अनेक समस्याएॅ व्याप्त है जो परिवार से लेकर सारे विश्व तक को प्रभावित करती है किन्तु मैंने उनमें से कुछ महत्वपूर्ण समस्याओं को इंगित करके समाधान का प्रयास किया है। समाधान में से भी कई बाते एक दूसरे से जुडी हुई है। लोकतंत्र की जगह लोकस्वराज्य ,व्यक्तिगत सम्पत्ति की जगह पारिवारिक सम्पत्ति,परम्परागत परिवार व्यवस्था की जगह लोकतांत्रिक परिवार व्यवस्था,जन्मना वर्ण व्यवस्था की जगह प्रवृत्ति अनुसार वर्ण व्यवस्था तथा संविधान संशोधन के असीम अधिकारों को संसद से निकालना जैसे कुछ महत्वपूर्ण सुधार विश्व समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकते है।
नोटः- मंथन का अगला विषय होगा परिवार व्यवस्था कितनी पारम्परिक? कितनी लोकतांत्रिक?

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