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मंथन क्रमांक-107 ’’भारत की राजनीति और राहुल गांधी’
’ कुछ स्वीकृत निष्कर्ष हैः- 1.धर्म और राजनीति में बहुत अंतर होता है। धर्म मार्ग दर्शन तक सीमित होता है और राजनीति क्रियात्मक स्वरूप में । धर्म सिद्धान्त प्रधान होता है ...
मंथन क्रमांक 106-समस्या कौन ? इस्लाम या मुसलमान
कुछ निश्चित सिद्धान्त है। 1 प्राचीन समय मे धर्म व्यक्तिगत होता था कर्तब्य के साथ जुडा होता था । वर्तमान समय मे धर्म संगठन के साथ भी जुडकर विकृत हो गया है। 2 हिन्दू विचार धारा धर्म की वास्तविक ...
मंथन क्रमाॅक-105 ’’जीव दया सिद्धांत’’
कुछ निष्कर्ष हैः- 1. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत सीमा तक ही किसी अन्य पर दया कर सकता है, अमानत का उपयोग नहीं किया जा सकता। राजनैतिक सत्ता समाज की अमानत होती है, व्यक्तिगत नहीं। 2. समाज में चार प्रकार ...
मंथन क्रमाॅक-104 ’’गांधी, गांधीवाद और सर्वोदय’’
कुछ वैचारिक निष्कर्ष हैः-पिछले 100-200 वर्षो में गांधी एक सर्वमान्य सामाजिक विचारक के रूप में स्थापित हुये जिन्हें सम्पूर्ण विश्व में समान मान्यता प्राप्त है। आज भी गांधी की प्रासंगिकता उसी तर...
मंथन क्रमाॅक-103 ’’परिवार में महिलाओं को पारवरिक होना उचित या आधुनिक’’
कुछ सर्वमान्य निष्कर्ष हैंः- 1। परिवार व्यवस्था के ठीक संचालन में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि परिवार की अगली पीढी के निर्माण में महिलाए ही महत्वपू...
मंथन क्रमांक 102 “समस्याएं अनेक समाधान एक”
1 अपराध और समस्याएं अलग अलग होते हैं, एक नहीं। अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है, समस्याओं को रोकना कर्तब्य। 2 अपराध रोकना सरकार का दायित्व होता है और समाज को उसमे सहयोग करना चाहिये। समस्य...
मंथन क्रमांक- 101 ’’कौन शरणार्थी कौन घुसपैठिया’’
कुछ मान्य धारणाएं हैः- (1) व्यक्ति और समाज मूल इकाईयां होती हैं। परिवार, गांव, जिला, प्रदेश और देश व्यवस्था की इकाईयां है। (2) किसी भी इकाई में सम्मिलित होने के लिए उस इकाई की सहमति आवश्यक है चाहे ...
मंथन क्रमाॅक-100 ’’वर्ण व्यवस्था’’
कुछ सिद्धान्त हैः- 1. दुनियां में व्यक्ति दो विपरीत प्रवृत्ति के होते हैं। सामाजिक और समाज विरोधी। इन प्रवृत्तियों में जन्म पूर्व के संस्कार, पारिवारिक वाता...
मंथन क्रमाँक: 99 “पुलिस सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित?”
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त है। 1. राज्य का दायित्व प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की गारंटी होता है। राज्य के अन्तर्गत काम कर रही पुलिस सुरक्...
मंथन क्रमांक 98 “विभाजन का दोषी कौन
कुछ सिद्धान्त है। 1 प्रवृत्ति के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का वर्ग निर्माण विभाजन का आधार होता है। वर्ग निर्माण से गुट बनते है, आपस मे टकराते है और अंत मे विभाजन होता है। 2 किसी भी प्रकार की सत्त...
मंथन क्रमांक-97 “दान चंदा और भीख”
कुछ सिद्धान्त है।1 बाधा रहित प्रतिस्पर्धा और सहजीवन के बीच समन्वय ही आदर्श व्यवस्था मानी जाती है। प्रतिस्पर्धा के लिये असीम स्वतंत्रता और सहजीवन के लिये अनुशासन अनिवार्य है।2 समाज को एक बृ...
मंथन क्रमाॅक-96बालिग मताधिकार या सीमित मताधिकार
कुछ सर्वस्वीकृत निष्कर्ष हैं।1. किसी भी इकाई के संचालन के लिए एक सर्वस्वीकृत संविधान होता है जिसे मानना इकाई के प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी होता है।2. किसी भी संविधान के निर्माण में इस ...
मंथन क्रमॉक-95 ’’कश्मीर समस्या’’
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धांत हैं। कश्मीर समस्या दो देशों के बीच कोई बॉर्डर विवाद नहीं है बल्कि विश्व की दो संस्कृति दो विचारधाराओं के बीच का विवाद है।जब अल्पसंख्यक संगठित होकर बहुसंख्यक असं...
मंथन क्रमाॅक-94 अहिंसा और हिंसा
कुछ सिद्धांत है अहिंसा की सुरक्षा के उद्देश्य से किसी भी सीमा तक हिंसा का प्रयोग किया जा सकता है। शांति व्यवस्था हमारा लक्ष्य होता है। हिंसा और अहिंसा मार्ग । अह...
मंथन क्रमांक-93 “डालर और रूपये की तुलना कितना वास्तविक कितना प्रचार”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 समाज को धोखा देने के लिये चालाक लोग परिभाषाओ को ही विकृत कर देते है उससे पूरा अर्थ भी बदल जाता है। ऐसी विकृत परिभाषा को प्रचार के माध्यम से सत्य के समान स्थापि...
मंथन क्रमाँक 92 सन् 75 का आपातकाल और वर्तमान मोदी सरकार की एक समीक्षा
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है1. शासन का संविधान तानाशाही होती है और संविधान का शासन लोकतंत्र। तानाशाही मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार नही होते जबकि लोकतंत्र मे होते है। ...
मंथन क्रमाँक-91 स्वतंत्रता और समानता की एक समीक्षा
1. प्रत्येक व्यक्ति की दो भूमिकाए होती है। 1. व्यक्ति के रूप मे 2. समाज के अंग के रूप मे। दोनो भूमिकाए बिल्कुल अलग अलग होते हुए भी कुछ मामलो मे एक दूसरे की पूरक होती है। 2. जब तक व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक – 90 “भारतीय समाज मे हिंसा पर बढता विश्वास”
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है।1 पूरी दुनियां मे आदर्श सामाजिक व्यवस्था हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है और राजनैतिक व्यवस्था पहला शस्त्र ।2 हिन्दू संस्कृति मे वर्ण व्यवस्था का निर्धारण गुण क...
मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”
धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रत...
मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित
कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष...
मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा
कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष...
मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी
किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहु...
मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”
पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती ह...
मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट
प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बा...
मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम
दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और...
मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता
भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाज...
मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?
हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही ...
मंथन क्रमांक-79जनता के लिये महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा अथवा सामाजिक सुरक्षा
किसी भी देश मे जो सरकार बनती है उसके प्रमुख दो उद्देश्य होते है- 1 सामाजिक सुरक्षा 2 राष्ट्रीय सीमाओ की सुरक्षा। सामाजिक सुरक्षा के अतर्गत सरकार प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा ...
मंथन क्रमांक-78 अमेरिका हमारा मित्र, प्रतिस्पर्धी, विरोधी या शत्रु
किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति से व्यवहार आठ स्थितियों से निर्धारित होता है। 1. शत्रु 2. विरोधी 3. आलोचक 4. समीक्षक 5. प्रशंसक 6. समर्थक 7. सहयोगी 8. सहभागी। ये भूमिकाएं बिल्कुल अलग-अलग होती ह...
मंथन क्रमांक-77 क्या न्यायपालिका सर्वोच्च है।
समाज में व्यक्ति एक मूल और सम्प्रभुता सम्पन्न स्वतंत्र इकाई मानी जाती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता पर तब तक कोई अन्य कोई अंकुश नहीं लगा सकता जब तक उसने किसी अन्य की स्वतंत्रता में बाधा न पहुं...
मंथन क्रमांक-76 भय का व्यापार
सारी दुनियां मे व्यापार का महत्व बढता जा रहा है । दुनियां की राजनीति मे पूंजीवाद सबसे आगे बढ रहा है। यहूदी व्यापार को माध्यम बनाकर लगातार अपनी बढत बनाए हुए हैं। व्यापार की ताकत पर ही अंग्रे...
मंथन क्रमांक 75 व्यक्ति और नागरिक मे फर्क
व्यक्ति और समाज दुनियां की मूल इकाईयां होती हैं । उनके कभी किसी भी परिस्थिति मे भाग नही किये जा सकते। व्यक्ति एक प्रत्यक्ष इकाई है तो समाज अप्रत्यक्ष । राष्ट्र एक कृत्रिम इकाई है जो व्यक्त...
मंथन क्रमांक-74 चरित्र पतन का कारण व्यक्ति या व्यवस्था
किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण मे उसके जन्म पूर्व के संस्कारो का महत्व होता है। साथ ही पारिवारिक वातावरण और सामाजिक परिवेश भी महत्व रखते है। सामाजिक परिवेश को ही समाजिक व्यवस्था का नाम ...
मंथन क्रमांक-73 शिक्षित बेरोजगारी शब्द कितना यथार्थ? कितना षणयंत्र?
दुनियां मे दो प्रकार के लोग है । 1 श्रम प्रधान 2 बुद्धि प्रधान । बहुत प्राचीन समय मे बुद्धि प्रधान लोग श्रम जीवियों के साथ न्याय करते होंगे किन्तु जब तक का इतिहास पता है तब से स्पष्ट दिखता है क...
मंथन क्रमांक 72-विवाह पारंपरिक या स्वैच्छिक
कुछ स्वीकृत सिद्धान्त है1 प्रत्येक महिला और पूरूष के बीच एक प्राकृतिक आकषर्ण होता है । यदि आकर्षण सहमति से हो तो उसे किसी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता, अनुशासित किया जा सकता है। इस अन...
मंथन क्रमांक 71 गरीबी रेखा
कुछ निश्चित निष्कर्ष प्रचलित हंैं।1 कोई भी व्यक्ति न गरीब होता है न अमीर । गरीबी और अमीरी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नही। प्रत्येक व्यक्ति उपर वाले की तुलना मे गरीब होता है और नीचे वाले की तु...
मंथन क्रमांक 70 सती प्रथा
समाज मेें कुछ निष्कर्ष प्रचलित हैं-1 समाज मेें प्रचलित गलत प्रथायें अथवा परम्पराएं धीरे धीरे समाज द्वारा स्वयं ही लुप्त कर दी जाती हैं। राज्य को इस संबंध में कभी कोई कानून नहीं बनाना चाहिए।2 ...
मंथन क्रमांक 69 उग्रवाद आतंकवाद और उसका भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत मान्यताये है ।1 कोई संगठन सिर्फ विचारो तक हिंसा का समर्थक होता है तो वह उग्रवादी तथा क्रिया मे हिंसक होता है तो आतंकवादी माना जाता है। आतंकवाद को कभी संतुष्ट या सहमत नहीं किय...
मंथन क्रमांक 68 अभिमान, स्वाभिमान, निरभिमान
कुछ सर्वमान्य सिद्धांत हैं-1 किसी इकाई का प्रमुख जितना ही अधिक भावनाप्रधान होता है, उस इकाई की असफलता के खतरे उतने ही अधिक बढते जाते है । दूसरी ओर जिस इकाई का संचालक जितना ही अधिक विचार प्रधा...
मंथन क्रमांक 67 भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना
कुछ मान्य सिद्धान्त है।1 धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक होते है वर्तमान समय मे इन दोनो के बीच संतुलन बिगड गया है।2 जो कुछ प्राचीन है वही सत्य है ऐसा अंध विश्वास ठीक नही। जो कुछ प्राचीन है वह पू...
मंथन क्रमांक 66 -हिन्दू कोड बिल
कुछ मान्य सिद्धांत प्रचलित हैः-1 व्यवस्था तीन के संतुलन से चलती है-1 सामाजिक 2 संवैधानिक 3 आर्थिक। यदि संतुलन न हो तो अव्यवस्था निश्चित है। वर्तमान समय में संवैधानिक व्यवस्था ने अन्य दो को गुल...
मंथन क्रमांक 65 भारत की प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था-बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-(1) व्यवस्था कई प्रकार की होती हैं-(1) सामाजिक (2) संवैधानिक (3) आर्थिक (4) धार्मिक (5) विश्व स्तरीय। भारत में राजनैतिक व्यवस्था ने अन्य सभी व्यवस्थाओं पर अपना एकाधिकार ...
मंथन क्रमांक 64 धर्म और संस्कृति- बजरंग मुनि
किसी अन्य के हित में किये जाने वाले निःस्वार्थ कार्य को धर्म कहते है। कोई व्यक्ति जब बिना सोचे बार बार कोई कार्य करता है उसे उसकी आदत कहते है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह व्यक्ति का सं...
मंथन क्रमांक 63 भारत की आर्थिक समस्या और समाधान- बजरंग मुनि
कुछ सर्व स्वीकृति सिद्धान्त है1 पूरी दुनिया तेज गति से भौतिक उन्नति कर रही है और उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन हो रहा है।2 प्राचीन समय मे भारत विचारों का भी निर्यात करता था तथा आर्थिक दृष्टि से...
मंथन क्रमांक- 62 भौतिक या नैतिक उन्नति
कुछ सर्वे स्वीकृत सिद्धांत हैं-1 किसी भी व्यक्ति की भौतिक उन्नति का लाभ मुख्य रुप से व्यक्तिगत होता है और नैतिक उत्थान का लाभ समूहगत या सामाजिक।2 अधिकारों के लिए चिंता या प्रयत्न भौतिक उन्न...
मंथन क्रमांक- 61 नई अर्थनीति-‎बजरंग मुनि
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं-1 राज्य का एक ही दायित्व होता है जानमाल की सुरक्षा। अन्य सभी कार्य राज्य के कर्तव्य होते है, दायित्व नहीं।2 सम्पत्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है बिन...
मंथन क्रमांक 60 कन्या भ्रूण हत्या कितनी समस्या और कितना समाधान
कुछ स्वयं सिद्ध सिद्धांत हैं-(1) समस्याओं के तीन प्रकार के समाधान दिखते है-(1) प्राकृतिक (2) सामाजिक (3) संवैधानिक। अधिकांश समस्याओं के प्राकृतिक समाधान होते हैं। सामाजिक समाधान कुछ विकृति पैदा ...
मंथन क्रमांक 59 अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद और भारत
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैंः-1 समाज को अधिकतम अहिंसक तथा राज्य को संतुलित हिंसा का उपयोग करना चाहिए। राज्य द्वारा न्यूनतम हिंसा के परिणामस्वरुप समाज में हिंसा बढती है, जैसा आज हो रहा है।2 ...
मंथन क्रमांक 58 राजनीति में कुछ नाटक और परिणाम
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैंः- (1) देश का प्रत्येक व्यक्ति तीन प्रकार के शोषण से प्रभावित हैः-(1) सामाजिक शोषण (2) आर्थिक शोषण (3) राजनैतिक शोषण। स्वतंत्रता के पूर्व सामाजिक शोषण अधिक था, आर्थिक र...
मंथन क्रमांक 57 योग और बाबा रामदेव
कुछ सिद्धान्त सर्वमान्य है1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते हैं। योग एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति और समाज दोनो के लिये एक साथ उपयोगी है।2 पूरी दुनियां मे भारतीय संस्कृति को सर्वश्र्रेष्...
मंथन क्रमांक 56 उत्तराधिकार का औचित्य और कानून
किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति के स्वामित्व का अधिकार उत्तराधिकार माना जाता है। इस संबंध में कुछ सिद्धांतो पर भी विचार करना होगा-1 जो कुछ परम्परागत है वह पूरी तरह गलत...
मंथन क्रमांक 55 गाॅधी, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 गुलामी कई प्रकार की होती है। धार्मिक राजनैतिक सामाजिक। समाधान का तरीका भी अलग अलग होता है। 2 मुस्लिम शासनकाल में भारत धार्मिक, अंग्रेजो के शासनकाल में राजनैति...
मंथन क्रमांक 54 न्याय और व्यवस्था
व्यवस्था बहुत जटिल है। न्याय और व्यवस्था को अलग अलग करना बहुत कठिन कार्य है, किन्तु हम मोटे तौर पर इस संबंध में अपने विचार रखकर मंथन की चर्चा शुरु कर रहे है । प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे के सा...
मंथन क्रमांक 53 पॅूजीवाद, समाजवाद और साम्यवाद
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत हैं- 1 न्याय और व्यवस्था एक दूसरे के पूरक होते है। दोनों का अस्तित्व भी एक दूसरे पर निर्भर होता है। 2 तीन असमानतायें घातक होती हैं-(1) सामाजिक असमानता (2) आर्थिक असमानता (3) ...
मंथन क्रमांक 52 राईट टू रिकाल
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं।1 व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो के अलग अलग अस्तित्व हैं और अलग अलग सीमाएं भी ।2 अधिकार और शक्ति अलग अलग होते है । अधिकार को राईट और शक्ति को पाव...
मंथन क्रमांक 51 इस्लाम और भविष्य
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं। 1 हिन्दुत्व मे मुख्य प्रवृत्ति ब्राम्हण, इस्लाम मे क्षत्रिय, इसाइयत मे वैश्य , और साम्यवाद मे शूद्र के समान पाई जाती है। 2 यदि क्षत्रिय प्रवृत्ति अनियंत्रि...
मंथन क्रमांक 50 ज्ञान यज्ञ की महत्ता और पद्धति
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त है। 1 दुनियां के प्रत्येक व्यक्ति मे भावना और बुद्धि का समिश्रण होता है। किन्तु किन्हीं भी दो व्यक्तियो मे बुद्धि और भावना का प्रतिशत समान नहीं होता। 2 प्रत्येक व...
मंथन क्रमांक 49 ग्रामीण और शहरी व्यवस्था
हजारों वर्षो से बुद्धिजीवियों तथा पूॅजीपतियों द्वारा श्रम शोषण के अलग-अलग तरीके खोजे जाते रहे हैं। ऐसे तरीकों में सबसे प्रमुख तरीका आरक्षण रहा है। स्वतंत्रता के पूर्व आरक्षण सिर्फ सामाज...
मंथन क्रमांक – 48 लिव इन रिलेशन शिप और विवाह प्रणाली
एक लडकी को प्रभावित करके कुछ मित्र उसका धर्म परिवर्तन कराते है तथा परिवार की सहमति के बिना किसी विदेशी मुस्लिम युवक से उसका विवाह करा देते है जो उसकी सहमति से होता है । वह लडकी विदेश जाने का प्...
मंथन क्रमांक 47 मिलावट कितना अपराध कितना अनैतिक
दो प्रकार के काम अपराध होते है तथा अन्य सभी या तो नैतिक या अनैतिक। नैतिक को सामाजिक, अनैतिक को असामाजिक तथा अपराध को समाज विरोधी कार्य कहते है। इस परिभाषा के अनुसार दो ही प्रवृत्तियां अपराध क...
मंथन क्रमांक 46 भगवत गीता का ज्ञान
मेरी पत्नी अशिक्षित है किन्तु बचपन से ही उसकी गीता के प्रति अपार श्रद्धा थी। वह गीता का अर्थ लगभग नही के बराबर समझती थी। कभी कभी मैं उसे गीता के किसी श्लोक का भावार्थ समझा देता था। धीरे धीरे मै...
मंथन क्रमांक 45 शिक्षा व्यवस्था
कुछ सर्व स्वीकृत सिद्धान्त हैं- 1 ज्ञान और शिक्षा बिल्कुल अलग अलग होते है। ज्ञान घट रहा है और शिक्षा बढ रही है। 2 शिक्षा का चरित्र पर कोई अच्छा या बुरा प्रभाव नही पडता क्योकि शिक्षा व्यक्ति ...
मंथन क्रमांक 44 एन0 जी0 ओ0 समस्या या समाधान
कुछ सर्वस्वीकृत सिद्धांत है-(1)राज्य एक आवश्यक बुराई माना जाता है। राज्यविहीन समाज व्यवस्था युटोपिया होती है और राज्य नियंत्रित समाज व्यवस्था गुलामी। राज्ययुक्त किन्तु राज्य मुक्त समाज व...
मंथन क्रमांक 43 दुनिया में लोकतंत्र कितना आदर्श कितना विकृत
दुनिया में भारत विचारों की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। भारत जब गुलाम हुआ तब भारत में चिंतन बंद हुआ तथा भारत विदेशो की नकल करने लगा। पश्चिम के देशो ने तानाशाही के विकल्प के र...
मंथन क्रमांक 42 आश्रमों में व्यभिचार
किसी सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत बने धर्म स्थानों में कुछ स्थानों को मंदिर या आश्रम कहते है। मंदिर सामाजिक व्यवस्था से संचालित होते है तो आश्रम व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्रता पूर्वक चलाये ...
मंथन क्रमांक 41 आरक्षण
(1)किसी वस्तु या सुविधा का उपयोग उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई न कर सके उस व्यवस्था को आरक्षण कहते है। (2)सामान्यतया राज्य को स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। (3)कोई भी सुवि...
मंथन क्रमांक 40 भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार नियंत्रण
आज सारा भारत भ्रष्टाचार से परेशान है। भ्रष्टाचार सबसे बडी समस्या के रुप में स्थापित हो गया है। नरेन्द्र मोदी सरीखा मजबूत प्रधानमंत्री आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर मजबूत नियंत्रण नहीं हो सका ...
मंथन क्रमांक 39 अर्थ पालिका, एक व्यावहारिक सुझाव
दुनियां में साम्प्रदायिकता, धन और उच्श्रृंखलता के बीच बड़ी होड़ मची हुई है। तीनों ही येन केन प्रकारेण राज्य शक्ति के साथ अधिक से अधिक जुड़कर दुनियां में सबसे आगे निकलने की कोषिष कर रहे हंै। ...
मंथन क्रमांक 38 महिला वर्ग या परिवार का अंग
दुनिया में मुख्य रुप से चार संस्कृतियों के लोग रहते हैं-1 पाश्चात्य या इसाई 2 इस्लाम 3 साम्यवादी अनिश्वरवादी । 4 भारतीय या हिन्दू। पाश्चात्य में व्यक्ति सर्वोच्च होता है, परिवार धर्म समाज,राष्...
मंथन क्रमांक 37 मृत्युदण्ड समीक्षा
कोई भी व्यवस्था तीन इकाईयों के तालमेल से चलती है- (1) व्यक्ति (2) समाज (3) राज्य। व्यक्ति का स्वशासन होता है। समाज का अनुशासन और राज्य का शासन होता है। बहुत कम व्यक्ति उचित अनुचित का निर्णय कर पाते ह...
मंथन क्रमांक 36 वर्ग संघर्ष, एक सुनियोजित षडयंत्र
कुछ स्वयं सिद्ध यथार्थ हैं- (1) शासन दो प्रकार के होते हैंः-(1) तानाशाही (2) लोकतंत्र। तानाशाही में शासक जनता की दया पर निर्भर नहीं होता इसलिए उसे वर्ग निमार्ण की जरुरत नहीं पडती। तानाशाही में वर्ग...
मंथन क्रमांक -35 आर्थिक असमानता का परिणाम और समाधान
प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार होता है कि वह प्रतिस्पर्धा करते हुये किसी भी सीमा तक धन सम्पत्ति संग्रह कर सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक कर्तव्य होता है कि वह काफिला पद्धति क...
मंथन क्रमांक -34 भीम राव अंबेडकर कितने नायक कितने खलनायक?
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति की सम्पूर्ण समीक्षा के बाद या तो हम उसे नायक के रुप में मानते है या खलनायक के रुप में या औसत और सामान्य। आकलन करते समय तीन का आकलन किया जाता हैं- (1) नीति (2) नीयत (3) कार्य...
मंथन क्रमांक -33 पर्सनल ला क्या, क्यों और कैसे?
आज कल पूरे भारत मे पर्सनल ला की बहुत चर्चा हो रही है । मुस्लिम पर्सनल ला के नाम पर तो पूरे देश मे एक बहस ही छिडी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बडी बेंच इस मुद्दे पर विचार कर रही है कि पर्सनल ला औ...
मंथन क्रमांक 32 उपदेश ,प्रवचन, भाषण और शिक्षा का फर्क
दुनिया में कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह एक समान नही  होते, उनमें कुछ न कुछ अंतर अवश्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहता है और दूसरों को शिक्षा भी देता रह...
मंथन क्रमांक 31 कश्मीर समस्या और हमारा समाज
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं- 1 समाज सर्वोच्च होता है और पूरे विश्व का एक ही होता है अलग अलग नहीं। भारतीय समाज सम्पूर्ण समाज का एक भाग है, प्रकार नहीं। 2 राष्ट्र भारतीय समाज व्यवस्था का प्रबंधक मात...
मंथन क्रमांक 30 सामाजिक आपातकाल और वर्तमान वातावरण
जब किसी अव्यवस्था से निपटने के लिए नियुक्त इकाई पूरी तरह असफल हो जाये तथा अल्पकाल के लिए सारी व्यवस्था में मुख्य इकाई को हस्तक्षेप करना पडे तो ऐसी परिस्थिति को आपातकाल कहते हैं। व्यक्ति और ...
मंथन क्रमांक 29 ‘‘समाज में बढ़ते बलात्कार का कारण वास्तविक या कृत्रिम’’
कुछ निष्कर्ष स्वयं सिद्ध हैं- (1)महिला और पुरुष कभी अलग-अलग वर्ग नहीं होते। राजनेता अपने स्वार्थ केे लिए इन्हें वर्गों में बांटते हैं। (2)महिला हो या पुरुष, सबके मौलिक और संवैधानिक अधिकार समान ह...
मंथन क्रमांक 28 शोषण रोकने में राज्य की सक्रियता कितनी उचित कितनी अनुचित- बजरंग मुनि
किसी मजबूत द्वारा किसी कमजोर की मजबूरी का लाभ उठाना शोषण माना जाता है। शोषण में किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं हो सकता। शोषण किसी की इच्छा और सहमति के बिना नहीं हो सकता। शोषण किसी कमजोर द्वारा ...
मंथन क्रमांक 27 भारत में नक्सलवाद
मैं गढ़वा रोड़ में स्टेशन पर टिकट के लिये लाइन में खड़ा था। मेरी लाइन आगे नहीं बढ़ रही थी और कुछ दबंग लोग आगे जाकर टिकट ले लेते थे, तो कुछ पैसे देकर भी ले आते थे। मेरे लड़के ने भी मेरी सहमति से धक्का दे...
मंथन क्रमांक 26 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व की समस्या या समाधान
दवा और टाॅनिक मे अलग अलग परिणाम भी होते है तथा उपयोग भी। दवा किसी बीमारी की स्थिति में अल्पकाल के लिए उपयोग की जाती है जबकि टाॅनिक स्वास्थवर्धक होता है और लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। ...
मंथन क्रमांक 25 –निजीकरण,राष्ट्रीयकरण,समाजीकरण
व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। दोनो मिलकर ही एक व्यवस्था बनाते है। व्यक्ति की उच्श्रृंखलता पर समाज नियंत्रण नहीं कर सकता क्योंकि समाज एक अमूर्त इकाई है इसलिए राज्य की आवश्यकता हो...
मंथन क्रमांक 24 सुख और दुख
किसी कार्य के संभावित परिणाम का आकलन और वास्तविक परिणाम के बीच का अंतर ही सुख और दुख होता हैं। सुख और दुख सिर्फ मानसिक होता है। उसका किसी घटना से कोई संबंध नहीं होता जब तक उस घटना में उस व्यक्त...
मंथन क्रमांक 23 मौलिक अधिकार और वर्तमान भारतीय वातावरण
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति के तीन प्रकार के अधिकार होते हैं- 1 मौलिक अधिकार 2 संवैधानिक अधिकार 3 सामाजिक अधिकार । मौलिक अधिकार को ही प्राकृतिक, मानवीय या मूल अधिकार भी कहते हैं। व्यक्ति के वे ...
मंथन क्रमांक 22 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान।
विचार मंथन के बाद कुछ व्यवस्थाए बनती हैं। यदि देशकाल परिस्थिति के अनुसार व्यवस्थाओं में संशोधन की प्रक्रिया बंद हो जाये तो व्यवस्थाएॅ रुढि बन जाती हैं । ऐसी रुढि ग्रस्त व्यवस्थाए समाज में व...
मंथन क्रमांक 21 श्रमशोषण और मुक्ति–बजरंग मुनि
व्यक्ति अपने जीवनयापन के लिए तीन माध्यमों का उपयोग करता है- (1) श्रम (2) बुद्धि (3) धन।जिस व्यक्ति के जीवनयापन की आधे से अधिक आय शारीरिक श्रम से होती है उसे श्रमजीवी कहा जाता है। जिसकी आधे से अधिक बु...
मंथन क्रमांक 20 ग्राम संसद अभियान–बजरंग मुनि
दो कथानक विचारणीय है- 1 प्रबल राक्षस किसी तरह मर ही नहीं रहा था क्योंकि कथानक के अनुसार उसके प्राण सात समुद्र पार पिंजरे में बंद तोते के गले में थे। तोते को मारते ही राक्षस की मृत्यु हो गई।2 रा...
मंथन क्रमांक-19 #विचार और #साहित्य–बजरंग मुनि
साहित्य और विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं। एक के अभाव में दूसरे की शक्ति का प्रभाव नही होता। विचार तत्व होता है, मंथन का परिणाम होता है, मस्तिष्क ग्राह्य होता है तो साहित्य विचारक के निष्कर्ष...
मंथन क्रमांक 18 मंहगाई का भूत–बजरंग मुनि
भूत और भय एक दूसरे के पूरक होते है। भूत से भय होता है और भय से भूत। भूत का अस्तित्व लगभग न के बराबर ही होता है और इसलिये उसका अच्छा या बुरा प्रभाव भी नही होता किन्तु लगभग शत प्रतिशत व्यक्ति भूत स...
अपराध और अपराध नियंत्रण–बजरंग मुनि
धर्म ,राष्ट्र और समाज रुपी तीन इकाईयों के संतुलन से व्यवस्था ठीक चलती है। यदि इन तीनों में से कोई भी एक खींचतान करने लगे तो अपराधों का बढना स्वाभाविक हैं । दुनिया में इन तीनों में भारी असंतुलन ...
जे एन यू संस्कृति और भारत
भारत में स्वतंत्रता के समय से ही दो विचारधाराए एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा कर रही थीं (1)गॉधी विचार (2) नेहरु विचार। गॉधी विचारधारा आर्य संस्कारों से प्रभावित थी जिसे अब वैदिक,सनातन हिन्दू ...
मंथन क्रमांक-14 विषय- #दहेजप्रथा
भारत 125 करोड़ व्यक्तियों का देश है और उसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकार समान हैं। इनमें किसी भी प्रकार का महिला या पुरुष या कोई अन्य भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्य...
मंथन क्रमांक-13 विषय-#लोेकसंसद
लोकतंत्र का अर्थ लोक नियंत्रित तंत्र होता है। तंत्र लोक का प्रबंधक होता हैं प्रतिनिधि नहीं। लोक और तंत्र के बीच एक संविधान होता है जो लोक का प्रतिनिधित्व करता है तथा लोक की ओर से तंत्र की सीम...
मंथन क्रमांक-12 भारतीय संविधान की एक समीक्षा
पुरी दुनियां मे छोटी छोटी इकाइयों से लेकर राष्ट्रीय सरकारो तक के अपने अपने संविधान होते हैं और उक्त संविधान के अनुसार ही तंत्र नीतियां भी बनाता है और कार्य भी करता है किन्तु हम वर्तमान लेख म...
मंथन क्रमांक 11 सावधान! युग बदल रहा है।
भारतीय संस्कृति में चार युग माने गये है- सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग। चारों युगों का चरित्र और पहचान अलग अलग मानी जाती है। यदि आधुनिक युग से तुलना करें तब भी चार संस्कृतियाॅ अस्तित्व में है-(1 व...
मंथन क्रमांक -10 राष्टभक्त कौन? पंडित नेहरू या नाथु राम गोडसे?
भारत मे दो धारणाए लम्बे समय से सक्रिय रही है। कटटरवादी हिन्दूत्व की अवधारणा 2 हिन्दूत्व विरोधी अवधारणा। स्वतंत्रता संघर्ष मे महात्मा गांधी ने उदारवादी हिन्दुत्व की अवधारणा प्रस्तुत की कि...
मंथन क्रमांक 9- विषय- किसान आत्महत्या की समीक्षा
किसी कार्य के परिणाम की कल्पना और यथार्थ के बीच जब असीमित दूरी का अनुभव होता है तब कभी कभी व्यक्ति आत्म हत्या की ओर अग्रसर होता है। इसका अर्थ हुआ कि यदि परिणाम की कल्पना असंभव की सीमा तक कर ली ग...
मंथन क्रमांक 8 – भारत की प्रमुख समस्याए और समाधान।
भारत में कुल समस्याए 5 प्रकार की दिखती हैं-1 वास्तविक 2 कृत्रिम 3 प्राकृतिक 4 भूमण्डलीय 5 भ्रम या असत्य। 1 वास्तविक समस्याए वे होती हैं जो अपराध भी होती है तथा समस्या भी। ये समस्याए 5 प्रकार ही मानी ...
न्यायिक सक्रियता समस्या या समाधान
सिद्धांत रुप से न्याय तीन प्रकार के होते हैं-1 प्राकृतिक न्याय 2 संवैधानिक न्याय 3 सामाजिक न्याय। न्याय प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार होता है,सामूहिक अधिकार नहीं। तंत्...
मंथन क्रमांक 6 महिला सशक्तिकरण कितनी समस्या कितना समाधान
कुछ बातें स्वयं सिद्ध हैं - 1 वर्ग निर्माण,वर्ग विद्वेष , वर्ग संघर्ष हमेशा समाज को तोडता है। 2 वर्ग निर्माण वर्ग सुरक्षा के नाम पर प्रांरभ होता है और सशक्त होते ही शोषण की दिशा में बढ जाता है। 3 व...
मंथन क्रमांक (5) परिवार व्यवस्था
परिवार की मान्य परम्पराओं तथा मेरे व्यक्तिगत चिंतन के आधार पर कुछ निष्कर्ष हैं जो वर्तमान स्थिति में अंतिम सत्य के समान दिखते हैं- (1) व्यक्ति एक प्राकृतिक इकाई है और व्यक्ति समूह संगठनात्मक।...
मंथन क्रमांक 4- विश्व की प्रमुख समस्याए और समाधान
यदि हम विश्व की सामाजिक स्थिति का सामाजिक आकलन करे तो भारत में भौतिक उन्नति तो बहुत तेजी से हो रही है किन्तु नैतिक उन्नति का ग्राफ धीरे धीरे गिरता जा रहा है। भारत में तो प्रगति और गिरावट के बी...
बजरंग मुनि
ऐसी भी खबरें प्रकाशित हो रही हैं की भारत में मुस्लिम सांप्रदायिकता को उभारने के लिए सांप्रदायिक तत्वों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च किया 120 करोड़ की बात सामने आ रही है उसमें यह भी सामने आ रहा है ...

मंथन क्रमाँक-89 “हिन्दू संस्कृति या भारतीय संस्कृति”

Posted By: kaashindia on February 22, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

धर्म और संस्कृति कुछ मामलो मे एक दूसरे के पूरक भी होते है और कुछ मामलो मे अलग अलग भी। धर्म दूसरे के प्रति किये जाने वाले हमारे कर्तब्य तक सीमित होता है। जबकि संस्कृति का प्रभाव दूसरो के प्रति किये जाने वाले कार्य पर निर्भर होता है, चाहे वह कार्य अच्छा हो या बुरा। कोई व्यक्ति बिना सोचे तत्काल किसी कार्य को बार बार करने लगता है तब वह उस व्यक्ति की आदत मान ली जाती है। ऐसी आदत लम्बे समय तक चलती रहे तब वह संस्कार बन जाती है। ऐसे संस्कार किसी इकाई के अधिकांश लोगो के हो जावे तब वह उस इकाई की संस्कृति मान ली जाती है। सोच समझकर लिया गया निर्णय और तदनुसार किया गया कार्य संस्कार नही माना जाता है । धर्म व्यक्तिगत होता है समूह गत नही होता जबकि संस्कृति समूहगत होती है व्यक्तिगत नहीं। हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति को लगभग एक ही बताया जाता है इसलिये दोनो के बीच अंतर करना बहुत कठिन कार्य है। किन्तु मुझे दोनो के बीच मे बहुत अंतर दिखता हैं इसलिये मै इस विषय की विस्तृत समीक्षा कर रहा हॅू। करीब एक हजार वर्ष पहले जब तक भारत मे विदेशी गुलामी नही आयी थी तब तक भारतीय संस्कृति और हिन्दू संस्कृत एक मानी जाती थी । इस संस्कृति मे जैन बौद्ध सिख आर्य वैदिक और सनातनी मिलकर माने जाते है। जबसे भारत मे इसाई और मुसलमान शासक के रूप मे स्थापित हुए उस समय से हिन्दू संस्कृति पर धीरे धीेरे विदेशी संस्कृति का प्रभाव पडना शुरू हुआ। स्वाभाविक है कि प्राचीन संस्कृति मे धीरे धीरे विदेशी संस्कृति की मिलावट हुई और स्वतंत्रता के बाद जब उस संसकृति मे साम्यवाद शामिल हुआ तब वह मिलावट बहुत ज्यादा हो गई। इसलिये स्पष्ट है कि हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति मे इतना अधिक अंतर हो गया कि दोनो मे समानता खोजना ही बहुत कठिन हो गया।
हम भारत की प्राचीन संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के नाम से नामकरण कर रहे है । प्राचीन संस्कृति मे विचार प्रधान होता था और विचारो के आधार पर निकले निष्कर्ष को शेष समाज अपनी संस्कृति के रूप मे विकसित करता था। हिन्दू संस्कृति मे त्याग महत्वपूर्ण था, गुलामी के बाद विकसित भारतीय संस्कृति मे त्याग की जगह संग्रह प्रधान बन गया। विचारो के स्थान पर भी सत्ता और धन महत्वपूर्ण हो गये। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे स्पष्ट देखा जा सकता है कि धन और पद के लिये इतनी अधिक छीना झपटी हो गई है कि हर नई पीढी का सदस्य धन और पद की छीना झपटी मे इस तरह लग गया है कि उसे नैतिकता या अनैतिकता की न कोई चिंता है न ज्ञान। इसी तरह हिन्दू संस्कृति मे वर्ग समन्वय महत्वपूर्ण था। कोई भी समूह सख्या विस्तार को महत्व नही देता था बल्कि हर समूह गुण प्रधानता को अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। भारतीय संस्कृति मे हिन्दू संस्कृति के ठीक विपरीत संख्या विस्तार को महत्व दिया जाने लगा । येन केन प्रकारेण हिन्दू संस्कृति के लागो की मान्यता और विष्वास को बदलकर उसे अपने साथ ले लेने को महत्व दिया गया । दुनिया मे हिन्दू संस्कृति आज तक ऐसा कीर्तिमान बनाये हुए है कि वह किसी अन्य संस्कृति के व्यक्ति को किसी तरह अपने साथ शामिल करने का प्रयत्न नही करती। अन्य विदेशी संस्कृतियां इन सब प्रयत्नो मे कितना भी नीचे उतरने के लिये तैयार रहती है। हिन्दू संस्कृति गुलामी सह सकती है किन्तु गुलाम नही बना सकती । वर्तमान भारतीय संस्कृति गुलामी सह तो सकती ही नही है बल्कि गुलाम बनाने को अपनी सफलता मानने लगी है। यही कारण है कि वर्तमान भारतीय संस्कृति मे निरंतर हिंसा के प्रति विश्वास बढ रहा है। यह भी प्रत्यक्ष है कि हिन्दू संस्कृति अपने को सुरक्षात्मक मार्ग पर आगे बढ रही है तो भारतीय संस्कृति विस्तार वादी नीति पर चल रही है। हिन्दू संस्कृति का पक्षधर एक महत्वपूर्ण अंश संघ परिवार के नाम से भारतीय संस्कृति के मार्ग पर तेजी से बढने का प्रयास कर रहा है। नई पीढी शराफत को छोडकर अधिक से अधिक चालाक बनने की ओर अग्रसर है। वर्तमान भारतीय संस्कृति एक मुख्य पहचान बना चुकी है कि मजबूत से दबो और कमजोर को दबाओ। इसका प्रमुख कारण है कि प्राचीन हिन्दू संस्कृति मे संगठन का कोई महत्व नही था जबकि वर्तमान भारतीय संस्कृति मे सगठन को ही सबसे अधिक सफलता का मापदंड मान लिया गया है। गर्व के साथ संधे शक्ति कलौ युगे का खुले आम नारा लगाया जाता है। मै समझता हॅू कि हिन्दू संस्कृति पर आये विस्तारवादी संकट से सुरक्षा की आवश्यकता समझकर कुछ लोगो ने यह नारा लगाया है कि किन्तु यह नारा हिन्दू संस्कृति की परंपरा और पहचान के रूप मे स्वीकार नही किया जा सकता। प्राचीन संस्कृति मे व्यवस्था प्रमुख थी, राजनैतिक व्यवस्थ का हस्तक्षेप सामाजिक व्यवस्था मे न्युनतम था। दूसरी ओर सामाजिक व्यवस्था भी राजनैतिक व्यवस्था मे हस्तक्षेप नही करती थी। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे धन और सत्ता इतने महत्व पूर्ण हो गये है कि इन्होने मिलकर पूरे समाज को ही गुलाम बना दिया । प्राचीन हिन्दू संस्कृति लगभग सत्ता निरपेक्ष थी लेकिन वर्तमान भारतीय संस्कृति पूरी तरह सत्ता और धन सापेक्ष हो गई है। हिन्दू संस्कृति मे वसुधैव कुटुम्बकम सर्वधर्म समभाव का महत्व था। उस समय धर्म और राष्ट्र की तुलना मे समाज को सर्वाधिक महत्व पूर्ण माना जाता था। धर्म और राज्य समाज के सहायक होते थे । वर्तमान भारतीय संस्कृति मे समाज और धर्म की परिभाषा भी बदल दी गई और महत्व भी बदल दिया गया। अब समाज की जगह या तो धर्म को उपर माना जाता है या राष्ट को। धर्म का अर्थ गुण प्रधान से बदलकर पहचान प्रधान हो गया है तो राष्ट का अर्थ बदलकर राज्य तक सीमित हो गया है। अब समाज सर्वोच्च तो रहा ही नही । हमारी प्राचीन संस्कृति मे नैतिक प्रगति को भौतिक उन्नति की तुलना मे अधिक महत्व दिया जाता था। वर्तमान भारतीय संस्कृति मे नैतिक पतन की तो कोई चिंता ही नही है। भौतिक उन्नति ही सब कुछ मान ली गई है। इस तरह यदि हम वर्तमान भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण व्याख्या करे तो उसमे दो निष्कर्ष निकलते है। 1 कमजोर को दबाना और मजबूत से दबना। 2 कम से कम परिश्रम और अधिक से अधिक लाभ का प्रत्यन करना । दोनो दिशाओ मे भारत दूनिया के अन्य देशो की तुलना मे अधिक तेज गति से छलांग लगा रहा है। हम इसके कारणो पर विचार करे तो पायेंगे कि हमारी प्राचीन संस्कृति की सुरक्षा के लिये धर्मगुरू और राजनेता महत्वपूर्ण हुआ करते थे। सम्पूर्ण समाज इन दो के पीछे चला करता था। आज भी सम्पूर्ण समाज तो इन दो के पीछे चल रहा है किन्तु इन दोनो की नीयत खराब हो गई है। धर्मगुरू भी समाज को गुलाम बनाने का प्रयास कर रहे है जबकि उन्हे मार्ग दर्शन देना चाहिये था तो सत्ता भी गुलाम बनाने का प्रयास कर रही है जबकि उन्हे सुरक्षा और न्याय की गारंटी देनी चाहिये थी। हमारी प्राचीन हिन्दू संस्कृति मे प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा और न्याय की गारंटी थी, प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार प्राप्त थे। समाज किसी को भी अनुशासित तो कर सकता था किन्तु दंडित नही कर सकता था । वर्तमान संस्कृति मे समाज विदेशियो की नकल करके दंडित करना सीख गया तो राज्य समाज के हाथ से अनुशासित करने के अधिकार को भी छीन चुका है। अब खाप पंचायते दंड भी देने लग गई है तो राज्य समाज को बहिष्कार के अधिकार से भी वंचित कर रहा है। प्राचीन और वर्तमान संस्कृति मे आये बदलाव का परिणाम साफ दिख रहा है। परिवार व्यवस्था टूट रही हैे। राज्य व्यवस्था भी अव्यवस्था की तरफ जा रही है। सुरक्षा और न्याय पर से विश्वास घटकर सामाजिक हिंसा पर विश्वास बढ रहा है। लोकतंत्र की जगह तानाशाही की आवश्यकता महसूस हो रही है। सम्पूर्ण समाज किं कर्तब्य विमूढ की स्थिति मे है। वह अपनी गौरव शाली प्राचीन संस्कृति का अनुकरण करके ठगा जाता रहे अथवा वर्तमान भारतीय संस्कृति के साथ घुल मिलकर समाज को ठग ले यह निश्चय करना कठिन हो रहा है। ऐसी परिस्थिति मे क्या करना चाहिये यह बहुत कठिन है। न तो हम ठगे जाने तक की शराफत की सलाह दे सकते है न ही ठग लेने तक की चालाकी को हम अच्छा मान सकते है। इसलिये जो कुछ हमारी हिन्दू संस्कृति का आधार है उसका ही आखं मूदंकर अनुकरण किया जाये इससे मै सहमत नही। साथ ही मै इस धारणा के भी विरूद्ध हॅू कि जो कुछ पुराना है वह पूरी तरह रूढिवादी है , विकास विरोधी है और उसे आंख मुदकर बदल देना चाहिये । मै तो इस मत का हॅू कि हम शराफत और चालाकी की जगह समझदारी से काम ले अर्थात प्राचीन हिन्दू संस्कृति और वर्तमान भारतीय संस्कृति के सैद्धान्तिक गुण दोषो की विवेचना करके उन्हे व्यावहारिक धरातल की कसौटी पर कसा जाये। उसके बाद कोई मार्ग समाज को दिया जाये इस संबंध मे मेरा विचार यह है कि सबसे पहले पूरे भारत मे इस धारणा को विकसित किया जाये कि समाज सर्वोच्च है धर्म और राष्ट्र उसके सहायक या प्रबंधक है । परिवार को समाज की प्राथमिक और अनिवार्य इकाई माना जाये । अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी के साथ मिलकर सहजीवन मे जीवन जीने की शुरूआत करनी होगी । परिवार के बाद गांव को भी व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण इकाई माना जाये। भारतीय संविधान मे से धर्म और जाति की जगह परिवार ओर गांव को शामिल किया जाये।

व्यवस्था के मार्ग दर्शन का अंतिम अधिकार धर्मगुरूओ तथा राजनेताओ से निकाल कर संपूर्ण समाज की भूमिका महत्वपूर्ण की जाये। इसका अर्थ हुआ कि संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्र से निकालकर लोक को अथवा लोक द्वारा बनायी गई किसी व्यवस्था को दिया जाये जिसमे तंत्र से जुडी किसी इकाई का कोई हस्तक्षेप न हो । यहां से हम शुरूआत करे तो आगे आगे कुछ और मार्ग निकल सकते है जिसके परिणाम स्वरूप प्राचीन संस्कृति और वर्तमान संस्कृति के बीच का कोई संशोधित मार्ग निकल सकता है जो हमारे लिये आदर्श बने । नोट- मंथन का अगला विषय समाज मे बढता हिंसा पर विश्वास के कारण और निवारण

मंथन क्रमाँक-88 कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित

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कोई भी शासक अपने कर्मचारियों के माध्यम से ही जनता को गुलाम बनाकर रख पाता है। लोकतंत्र मे तो यह और भी ज्यादा आवश्यक है। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा संतुष्ट रखे। भारत में स्वतंत्रता पूर्व के शासक समाज को गुलाम बनाकर रखने के उद्देश्य से सरकारी कर्मचारियों को अधिक से अधिक सुविधाएॅं देने की नीति पर काम करते रहे। स्वतंत्रता के बाद भी शासन की नीयत में कोई बदलाव नहीं आया। इसलिये उनकी मजबूरी थी कि वे अपने कर्मचारियों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएॅं भी दें और संतुष्ट भी रखें।
प्रारंभिक वर्षों में सरकारी कर्मचारियों में असंतोष नहीं के बराबर था किन्तु जब उन्होंने देखा कि भारत का राजनेता सरकारी धन सम्पत्ति को दोनों हाथों से लूटने और लुटाने में लगा है तो धीरे धीरे इनके मन में भी लूट के माल में बंटवारे की इच्छा बढ़ी। सरकार के संचालन में राजनैतिक नेताओं के पास निर्णायक शक्ति होने के बाद भी उन्हें हर मामले में कर्मचारियों की सहायता की आवश्यकता होती थी क्योंकि संवैधानिक ढांचे के चेक और बैलेन्स सिस्टम में कर्मचारी भी एक पक्ष होता है। अतः व्यक्तिगत रूप से कर्मचारी लोग नेताओं के भ्रष्टाचार के सहायक और हिस्सेदार होते चले गये। किन्तु यदि हम भ्रष्टाचार की चर्चा न भी करें तो शासकीय कर्मचारी अपने पास अधिकार होते हुए भी एक पक्ष को इस तरह अकेले अकेले खाते नहीं देख सकता था। अतः उसने धीरे धीरे दबाव बनाना शुरू किया। दूसरी ओर सरकार ने भी नये नये विभाग बनाकर इनकी संख्या बढ़ानी शुरू कर दी और ज्यों ज्यों सरकारी कर्मचारियों की संख्या आबादी के अनुपात से भी कई गुना ज्यादा बढ़ने लगी त्यों त्यों उनकी ब्लैकमेलिंग की क्षमता भी बढ़ती चली गई। इस तरह भारत में लोक और तंत्र के बीच एक अघोशित दूरी बढ़ती चली गई जिसमें सरकार समाज की स्वतंत्रता की लूट करती रही, नेता भ्रष्टाचार के माध्यम से लूट लूट कर अपना घर भरते रहे और शासकीय कर्मचारी ब्लैकमेल करके इस लूट के माल में अपना हिस्सा बढ़ाते रहे।
किसी सरकारी कर्मचारी को इस बात से कोई मतलब नहीं कि उसकी जरूरतें क्या हैं? न ही उसे इस बात से मतलब है कि भारत के आम नागरिक का जीवन स्तर क्या है। उसे इस बात से भी मतलब नहीं कि उसी के समकक्ष गैर सरकारी कर्मचारी के वेतन और सुविधाओं की तुलना में उसे प्राप्त वेतन और सुविधाएॅं कितनी ज्यादा हैं। उसे तो मतलब है सिर्फ एक बात से कि लोकतांत्रिक भारत में जो धन और अधिकारों की लूट मची है उस लूट में उसकी भी सहभागिता है। उस लूट के माल में हिस्सा मांगना उसका न्यायोचित कार्य है। यदि ठीक से सोचा जाये तो उसका तर्क गलत भी तो नहीं है। कर्मचारी लोक का तो भाग है नहीं। है तो वह तंत्र का ही हिस्सा। फिर वह अपने हिस्से की मांग से पीछे क्यों रहे? कुछ प्रारंभिक वर्षों में शिक्षक और न्यायालयों से संबद्ध लोग ऐसा करना अनुचित मानते थे किन्तु अब तो वे भी धीरे धीरे उसी तंत्र के भाग बन गये हैं। न्यायपालिका और विधायिका का वर्तमान टकराव तथा न्यायपालिका मे आपसी टकराव स्पष्ट प्रमाणित करता है कि सब जगह पावर या धन के अतिरिक्त समाज सेवा का नाम सिर्फ ढोंग है जो समय समय पर लोक को धोखा देने के लिये उपयोग किया जाता है।
सरकारी कर्मचारी अपना वेतन भत्ता बढ़वाने के लिये कई तरह के मार्ग अपनाते हैं। उसमें मंहगाई का आकलन भी एक है। भारत में स्वतंत्रता के बाद के सत्तर वर्षों में रोटी, कपड़ा, आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में औसत साठ पैसठ गुने की वृद्धि ही हुई है लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि स्वतंत्रता के बाद छियानवे गुनी मूल्य वृद्धि हो चुकी है। छियानवे गुनी वेतन वृद्धि तो इनकी जायज मांग मान ली जाती है। यदि भारत में आवश्यक वस्तुओं के औसत मूल्य पांच प्रतिशत बढ़ते हैं तो सरकारी आंकड़े उन्हें सात आठ दिखाते हैं क्योंकि आंकड़े बनाने में कुछ और भी अनावश्यक चीजें शामिल कर दी जाती हैं। इसके बाद भी कई तरह के दबाव बनाकर इनके वेतन और सुविधाओं में वृद्धि होती ही रही है। स्वतंत्रता के बाद आज तक समकक्ष परिस्थितियों में सरकारी कर्मचारी का वेतन करीब दो सौ से ढाई सौ गुना तक बढ़ गया है। उपर से प्राप्त सुविधाओं को तो जोड़ना ही व्यर्थ है। समाज इस पर उंगली उठा नहीं सकता क्योंकि जब नेता ने अपना वेतन भत्ता इनसे भी ज्यादा बढ़ा लिया तथा नेता ने अपनी उपरी आय भी बढ़ा ली तो कर्मचारी बेचारा क्यो न बढावे? सरकार और नेता सरकारी कर्मचारियों की ब्लैकमेलिंग से बचने के लिये कभी निजीकरण का मार्ग निकालते हैं तो कभी संविदा नियुक्ति जैसा। तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर कर्मचारी भी किसी न किसी रूप में इन तरीकों की काट खोजते रहते हैं। और यदि शेष समय में कर्मचारी दब भी जावे तो चुनावी वर्ष में तो वह अपना सारा बकाया सूद ब्याज समेत वसूल कर ही लेता है। अभी कुछ प्रदेशो और केन्द्र के चुनाव होने वाले हैं। कर्मचारी लंगोट कसकर चुनावों की प्रतीक्षा कर रहा है। चुनावों से एक वर्ष पूर्व ही उसकी सांकेतिक हड़ताल और अन्य कई प्रकार के नाटक शुरू हो जायेंगे। प्रारंभ में सरकार भी उन्हें दबाने का नाटक करेगी। कुछ लोगों का निलम्बन और कुछ की बर्खास्तगी भी होगी। समझौता वार्ता भी चलेगी और अन्त में कर्मचारियों की कुछ मांगे मान कर आंदोलन समाप्त हो जायेगा। हड़ताल अवधि में की गई सारी प्रशासनिक कार्यवाही वापस हो जायेगी क्योंकि सभी नेता जानते हैं कि कर्मचारी चुनावों में जिसे चाहें उसे जिता या हरा सकते हैं। यद्यपि कर्मचारियों की कुल संख्या मतदाताओं की तीन प्रतिशत के आस पास ही होती है किन्तु उनके परिवार, उनके गांव गांव तक फैलाव और उनके एकजुट प्रयत्नों को मिलाकर यह अन्तर सात आठ प्रतिशत तक माना जाता है। आम तौर पर शायद ही कोई नेता हो जो इतना अधिक लोकप्रिय हो कि इतना बड़ा फर्क झेल सके अन्यथा दो तीन प्रतिशत का फर्क ही हार जीत के लिये निर्णायक हो सकता है। नेता को हर पांच वर्ष में जनता का समर्थन आवश्यक होता है जबकि सरकारी कर्मचारी को किसी प्रकार के जनसमर्थन की जरूरत नहीं। चुनावों के समय नेताओं के दो तीन गुट बनने आवश्यक हैं जबकि ऐसे मामलों में सभी कर्मचारी एक जुट हो जाते हैं। फिर उपर से यह भी कि कर्मचारियों को सुविधा देने से नेता को न व्यक्तिगत हानि है न सरकारी क्योंकि अन्ततोगत्वा सारा प्रभाव तो जनता को झेलना है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नेता स्वयं अपनी सब प्रकार की सुख सुविधाएॅं बढ़ाता जाता है तो उसका नैतिक पक्ष भी मजबूत नहीं रहता। यही कारण है कि कर्मचारियों का पक्ष जनविरोधी, अनैतिक ब्लैकमेलिंग होते हुए भी नेता झुककर उनसे समझौता करने को मजबूर हो जाता है।
अधिकांश कर्मचारी नौकरी पाते समय ही भारी रकम देकर नौकरी पाते हैं। बहुत कम ऐसे होते हैं जो बिना पैसे या सिफारिश के नौकरी पा जायें। स्वाभाविक है कि उनसे इमानदारी या चरित्र की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो व्यक्ति घर के बर्तन या जमीन बेचकर एक नौकरी पाता है वह भ्रष्टाचार भी करेगा और ब्लैकमेलिंग भी करेगा। यदि नहीं करेगा तो परिवार से भी तिरस्कृत होगा और अन्य कर्मचारियों में भी मूर्ख ही माना जायेगा। ऐसी विकट परिस्थिति आज सम्पूर्ण भारत की है। चाहे केन्द्र सरकार के कर्मचारी हों या प्रदेश सरकार के। सबकी स्थिति एक समान है। चाहे हवाई जहाज के पायलट हो या बैंक कर्मचारी या कोई चपरासी। चाहे दस हजार रूपया मासिक वाला छोटा कर्मचारी हो या लाख दो लाख रूपया मासिक वाला सुविधा सम्पन्न कर्मचारी। सबकी मानसिकता एक समान है, सबकी एक जुटता एक समान है, सब स्वयं को तंत्र का हिस्सा मानते हैं। लोक को गुलाम बनाकर रखने में भी सब एक दूसरे के सहभागी हैं और लोक को नंगा करने में भी कभी किसी को कोई दया नहीं आती।
कोई भी सरकार चाहे कितना भी जोर लगा दे चुनाव के समय उसे कर्मचारियो के समक्ष झुकना ही पडेगा । 130 करोड की आबादी मे 127 करोड लोक के लोग है तो 3 करोड तंत्र से जुडे। इसमे भी नेताओ की कुल संख्या कुछ लाख तक सीमित है। ये ढाई करोड कर्मचारी तो परिस्थिति अनुसार एक जुट हो जाते है किन्तु पचास लाख राजनेता चुनावो के समय दो गुटो मे बट जाते है। इस समय उन्हे न देश दिखता है न समाज । इस समय उन्हे न न्याय दिखता है न व्यवस्था । उन्हे दिखता है सिर्फ चुनाव और किसी भी परिस्थिति मे वे मुठठी भर संगठित कर्मचारियों का समर्थन आवश्यक समझते है। यही कारण है कि 127 करोड का लोक इन नेता और कर्मचारी के चक्रव्यूह से अपने को कभी बचा नही पाता।
विचारणीय प्रश्न यह है कि इस स्थिति से निकलने का मार्ग क्या है? नेता चाहता है कि जनता सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ खड़ी हो। यह संभव नहीं क्योंकि जनता ने तो नेता को चुना है और नेता द्वारा बनाई गई व्यवस्था द्वारा सरकारी कर्मचारी नियुक्त होते हैं। कर्मचारियों की नियुक्ति में जनता का कोई रोल नहीं होता। जनता जब चाहे कर्मचारी के विरूद्ध कुछ नहीं कर सकती जब तक उसका काम नियम विरूद्ध न हो। दूसरी ओर नेता को जो शक्ति प्राप्त है वह जनता की अमानत है। जनता जब चाहे नेता को बिना कारण हटा सकती है। ऐसी स्थिति में कर्मचारियों के विरूद्ध जन आक्रोश का कोई परिणाम संभव नहीं। उचित तो यही है कि इस विकट स्थिति से निकलने की शुरूआत नेता से ही करनी पड़ेगी। यदि कर्मचारी ब्लैकमेल करता है तो उसका सारा दोष नेता का है। नेता ही समाज के प्रति उत्तरदायी है। यही मानकर आगे की दिशा तय होनी चाहिये।
यह स्पष्ट है कि नेता कर्मचारी का गठबंधन टूटना चाहिये और अनवरत काल तक कभी टूटेगा नही । यदि नेता चाहे भी तो टूट नही सकेगा। इसका सबसे अच्छा समाधान सिर्फ निजीकरण है। अनावश्यक विभाग समाप्त हो राज्य सुरक्षा और न्याय तक सीमित हो कर्मचारियो की संख्या अपने आप कम हो जायेगी। राज्य रोजगार और नौकरी की अबतक चली आ रही परिभाषाओ को बदले । राज्य का काम रोजगार के अवसर पैदा करना होता है न कि नौकरी के माध्यम से रोजगार देना । यह तो गुलामी काल की परिभाषा थी जिसे अबतक बढाया जा रहा है। मौलिक परिवर्तन की आवश्यकता है और इसके लिये जनजागरण करना होगा । कोई भी सरकारी कर्मचारी जान दे देगा किन्तु निजीकरण नही होने देगा। कोई भी नेता भले ही निजीकरण की बात करे किन्तु घुमफिर कर निजीविभागो पर अनावश्यक नियंत्रण करके उन्हे परेशान करेगा जिससे वे तंत्र के चंगुल मे बने रहे। समस्या विकट है समाधान करना होगा और इसके लिये जनजागरण ही एक मात्र मार्ग है।

मंथन क्रमांक 87 पर्दा प्रथा

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कुछ प्राकृतिक सिद्धान्त है जो समाज द्वारा मान्य है।
1 दुनिया के कोई भी दो व्यक्ति सभी गुणो मे कभी एक समान नही होते। सबमे कुछ न कुछ असमानता अवश्य होती है।
2 संपूर्ण मनुष्य जाति मे महिला और पुरूष की जन्मदर लगभग बराबर होती है। किसी प्रकार का असंतुलन होने पर प्रकृति स्वयं संतुलन बना लेती है।
3 प्रत्येक महिला और पुरूष के बीच एक प्राकृतिक आकर्षण होता है जिसकी तुलना लोहा और चुम्बक से होती है।
4 प्रत्येक व्यक्ति मे लोहा और चुम्बक दोनो की मात्रा अवश्य होती है भले ही वह अलग अलग और असमान होती है चाहे महिला हो या पुरूष।
5 सवर्णो या धनवानो मे यौन शुचिता को आर्थिक प्रगति की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता हैं जबकि गरीबो और अवर्णो मे आर्थिक आवश्यकता को यौन शुचिता से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
6 आजतक यह निश्चित नही हो सका कि सैद्धान्तिक रूप से महिला और पुरूष के बीच दूरी घटनी चाहिये या बढनी चाहिये। दूरी का घटना बढना व्यक्ति की शारीरिक आवश्यकता पारिवारिक वातावरण, तथा सामाजिक व्यवस्था के सम्मिलित मापदंड से बनती है।
स्पष्ट है कि महिला और पुरूष के बीच यदि दूरी घटेगी तो यौन शुचिता से आंशिक मझौता करना ही पडेगा । यदि यौन शुचिता अधिक महत्वपूर्ण है तो दोनो के बीच दूरी बढाना आवश्यक है। इसीलिये समाज मे कभी भी यह नियम नही बना कि दोनो के बीच दूरी घटनी चाहिये या बढनी चाहिये। सिद्धान्त रूप से यह स्वतंत्रता प्रत्ये्यक्ति को अथवा परिवार को प्राप्त है। कोई अन्य स्वतंत्रता मे बाधक नही बन सकता। स्त्री और पुरूष के बीच आकर्षण इतना अधिक तीव्र होता है कि उसकी गति प्रकाश या बिजली की गति से भी अधिक मानी जाती है। इस आकर्षण को कभी बल पूर्वक नही रोका जा सकता। यह अवश्य है कि इसे परिस्थिति अनुसार अनुशासित किया जा सकता है। इसी अनुशासन की प्रथा के रूप मे विवाह और पर्दा प्रथा प्रचलित हुई। पर्दा प्रथा इस तीव्र आकर्षण के बीच एक कुचालक का काम करती है। इस तरह पर्दा प्रथा कोई कुव्यवस्था नही है । न ही कोई सामाजिक कुरीति है क्योकि यह बाध्यकारी नही है, नियमानुसार नही है और कानून सम्मत भी नही है। अपनी अपनी परिस्थिति अनुसार स्वैच्छिक है।
कुछ लोगो का यह मानना है कि प्राचीन समय मे पर्दा प्रथा नही थी बल्कि यह मुगल काल से भारत मे आयी क्योकि मुगलो मे पहले से पर्दा प्रथा थी और मुगल अन्य महिलाओ पर तुलनात्मक रूप से अधिक लालायित होते थे। इसलिये सुरक्षा की दृष्टि से पर्दा प्रथा विकसित हुई। मेरे विचार से यह धारणा गलत है क्योकि मुगलो के पूर्व भी उच्च वर्ण मे यह धारणा थी कि बालिग या वयस्क भाई-बहन, मां-बेटा अथवा जेष्ठ और बहू भी कभी एकांत वास न करे न ही कभी अनावश्यक एकांत बात चीत करे बल्कि दोनो के बीच एक संतुलित दूरी रहनी चाहिये। स्पष्ट है कि यही से पर्दा प्रथा का अस्तित्व समझ मे आता है।
यौन शुचिता के आधार पर ही समाज मे यह धारणा विकसित हुई कि उच्च वर्ग की महिलाओ को बिना किसी सुरक्षा के अकेले मे बाहर नही निकलना चाहिये। उसके साथ साथ उचित पर्दा और सामान्य ड्रेस की भी सलाह दी जाती थी। उच्च वर्ग के बीच महिलाओ को कभी रोजगार मे लगाना भी अच्छा नही माना जाता था क्योकि पर्दा प्रथा के कारण उनका रोजगार करना भी कठिन था तथा बच्चो की जन्मदर अधिक होने के कारण उन्हे बाहर निकलने के अवसर भी कम मिलते थे। परिस्थितियां बदली जब भारत मे पश्चिम की गुलामी आयी तब यहां यौन शुचिता को कम महत्व दिया जाने लगा। महिला और पुरूष के बीच दूरी घटायी गई । बच्चो की जन्म दर कम की गई । महिलाओ को रोजगार मे लगाया गया। जब भारत साम्यवाद की तरफ बढा और साम्यवाद ने वर्ग समन्वय के स्थान पर वर्ग संघर्ष को अपना प्रमुख आधार बनाया, तब भारत मे महिला सशक्तिकरण का एक नया प्रयोग शुरू हुआ। इस तरह पर्दा प्रथा जो पहले स्वैच्छिक थी वह समाज सुधार के नाम पर एक नये व्यवासाय का आधार बन गयी। योजना पूर्वक पर्दा प्रथा को एक सामाजिक कुरीति के रूप मे प्रचारित किया गया। साथ ही महिला और पुरूष के बीच की दूरी भी घटाई गई। स्वाभाविक है कि ये दोनो प्रयत्न पश्चिम की संस्कृति के भी अनुकूल थे और साम्यवादी लक्ष्य की ओर भी बढाने वाले थे। यह नया व्यवसाय राजनैतिक आश्रय पाकर खूब फला फूला । अब स्वतंत्रता के बाद भी भारत इन दोनो बीमारियों से ग्रस्त है। अब भी पर्दा प्रथा को एक बुराई के रूप मे प्रचारित किया जाता है और महिला पुरूष के बीच दूरी कम करना भी एक सामज सुधार का कार्य माना जाता है । किन्तु इसके साथ साथ इसमे होने वाले दुष्परिणामो को भी बढा चढाकर एक गंभीर समस्या के रूप मे इस तरह पेश किया जाता है कि साम्यवादियो की एक मात्र इच्छा वर्ग संघर्ष से भारत के महिला और पुरूष किसी भी रूप मे बच न सके। मै किसी भी रूप मे पर्दा प्रथा का समर्थक नही हॅू । मै महिला और पुरूष के बीच दूरी घटाने या बढाने मे से भी किसी एक का पक्षधर नही हॅू । मेरे विचार मे प्रत्येक व्यक्ति परिवार या समाज को यह स्वतंत्रता होनी चाहिये कि वे इस संबंध मे अपनी अपनी परिस्थिति अनुसार निर्णय कर सके। किसी को यौन शुचिता की अपेक्षा धन की अधिक आवश्यकता है तो वह धन का उपयोग कर सकता है और किसी को यौन शुचिता महत्वपूर्ण लगे तो वह धन का मोह छोड सकता है। अपने अपने निर्णय की स्वतंत्रता होनी चाहिये। महिला और पुरूष के बीच दूरी या पर्दा प्रथा के मामले मे भी परिवारो को पूरी स्वतंत्रता दी जानी चाहिये। बलात्कार के गंभीर अपराधो को छोडकर अन्य किसी भी प्रकार के महिला पुरूष संबंधो पर राज्य को कोई कानून नही बनाना चाहिये। यहां तक कि छेडछाड की घटनाएं भी यदि सामाजिक नियंत्रण से बाहर न हो तब तक सरकारो को हस्तक्षेप नही करना चाहिये। यह नही हो सकता कि महिलाएं जान बूझकर महिला पुरूष के बीच की दूरियों को घटाती जाये और उसके स्वाभाविक आकर्षण रूपी परिणाम का दोष एक पक्ष पर डालते जाये। यह उचित नही है । मेरे विचार से पर्दा प्रथा एक पुरानी व्यवस्था है जिसमे परिस्थिति अनुसार सुधार किया जा सकता है किन्तु ऐसा सुधार स्वैच्छिक होना चाहिये । किसी कानून के आधार पर नही किसी अभियान के आधार पर नही। मंथन का अगला विषय कर्मचारी आंदोलन कितना उचित कितना अनुचित होगा

मंथन क्रमांक- 86 जालसाजी धोखाधडी

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किसी व्यक्ति से कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे धोखा देकर प्राप्त करने का जो प्रयास किया जाता है उसे जालसाजी कहते है। जालसाजी धोखाधडी ठगी विश्वसघात आदि लगभग समानार्थी शब्द होते है । बहुत प्राचीन समय से धोखाधडी का उपयोग होता रहा है। यहां तक कि देवताओ तक ने कभी जनहित मे तो कभी अपने व्यक्तिगत हित मे जालसाजी का उपयोग किया। जालसाजी धोखाधडी पूरी तरह अनैतिक कृत्य भी माना जाता है और आपराधिक कृत्य भी । दोनो के बीच की सीमा रेखा तय करना बहुत कठिन कार्य है। वैसे मिलावट और कम तौलना जैसे अपराध भी जालसाजी के साथ ही जुडे हुए होते है।
जालसाजी का पूरी दुनियां मे बहुत व्यापक प्रभाव है। व्यक्ति दो समूहो मे बटे हुए है। 1 भावना प्रधान 2 बुद्धि प्रधान। भावना प्रधान लोग शरीफ माने जाते है और बुद्धि प्रधान लोग चालाक । चालाक लोग शरीफ लोगो को धोखा देकर उनसे या उनको ठगने का प्रयास करते है तो बेचारे शरीफ लोग ऐसी ठगी मे फसकर अपना नुकसान उठाते है। धार्मिक मामलो मे ठगी का व्यापक उपयोग होता है। संतो का चोला पहनकर तथा आध्यात्म की भाषा बोलकर धूर्त लोग आसानी से धर्म प्रधान लोगो को ठग लिया करते है। धार्मिक अथवा सामाजिक कार्यो के नाम पर ठगी का प्रयास आमतौर पर पूरे भारत मे प्रचलित है। राजनीति मे तो जालसाजी का व्यापक उपयोग होता ही आया है। पुराने जमाने मे भी विष कन्याओ के माध्यम से अनेक गंभीर घटनाएं होती हुई पायी गई है । वर्तमान समय मे भी राजनीति मे धोखाधडी का खुला उपयोग होता है। यहाँ तक कि राजनीति मे तो इस कार्य को कूटनीति का नाम देकर सफलता का मापदंड बता दिया जाता है। सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर पूरे भारत मे लोग नौकरी के नाम पर ठगे जाते है। सोना-चांदी क्रय-विक्रय अथवा सोना चांदी के साफ सफाई के नाम पर ठगी गांव गांव तक प्रचलित है। भूत प्रेत के नाम पर भी ठगने वालो का कोई अभाव नही है। यहां तक कि नकली नोट, नकली स्टांप टिकट या नकली रेल की टिकट भी आमतौर पर बिकती रहती है। अच्छे अच्छे लोग यहां तक कि कभी कभी बैक भी नकली नोट को नही पहचान पाते। जमीनो के खरीद बिक्री मे आप धोखाधडी का व्यापक उपयोग देख सकते है। दूसरे देश के लोग दूसरे देश मे अपने जासूस भेजकर उनसे जो जानकारी इकठ्ठी कराते है उसमे भी कई बार जालसाजी और धोखाधडी का उपयोग होता है। क्या चीज असली है और क्या नकली यह पता लगाना भी कठिन होता जा रहा है। नकली इतिहास लिखा जा रहा है तो नकली धर्म ग्रन्थ तक प्रचारित हो रहा है। आमलोगो को ठगने के लिये असत्य को बार बार का सत्य के समान स्थापित किया जा रहा है। पूरे भारत मे मंहगाई गरीबी, दहेज, महिला उत्पीडन आदि का ऐसा झूठा आभास करा दिया गया है कि भारत का हर नागरिक इन अस्तित्वहीन समस्याओ से स्वयं को पीडित समझ रहा है। असत्य को बार बार बोलकर उससे लाभ उठाने वाले आपस मे भी प्रतिस्पर्धा करते दिखते है। चालाक लोग आपस मे भी एक दूसरे को ठगते रहते है । हर बुद्धि प्रधान व्यक्ति भावना प्रधान व्यक्ति को बेवकूफ बनाकर ठग लेना अपनी खास विशेषता मानता है। अधिक बुद्धि प्रधान कम बुद्धि प्रधान को ठग लेना अपनी सफलता मानता है।
यदि हम वर्ण व्यवस्था के आधार पर धोखाधडी जालसाजी की समीक्षा करे तो जो लोग ब्राम्हण प्रवृत्ति के है अर्थात विचारक है उन्हे किसी भी परिस्थिति मे कूटनीति का सहारा नही लेना चाहिये। असत्य बोलना या धोखा देना विचारको के लिये पूरी तरह वर्जित है चाहे वह धोखा जनहित मे ही क्यो न हो। किन्तु जब राजनीति की चर्चा शुरू होती है तो राजनीति मे कूटनीति को मान्य किया जाता है। अर्थात एक सीमा तक शत्रु को धोखा दिया जा सकता है। यह अलग बात है कि विपक्षी विरोधी और शत्रु की अलग अलग पहचान होनी चाहिये किन्तु शत्रु को धोखा देना योग्यता का मापदंड होता है। भगवान कृष्ण अथवा शिवा जी का उदाहरण स्पष्ट है। अन्य भी अनेक उदाहरण दिये जा सकते है जिसमे राजाओ ने जनहित मे जालसाजी और धोखाधडी का सहारा लिया । चाणक्य की तो सारी सफलता ही कूटनीति के दावपेंच पर निर्भर रही है। वैष्य प्रवृत्ति के लोगो को कूटनीति का सहारा लेना अनैतिक माना जाता है । लेकिन व्यापारिक प्रतिस्पर्धा मे आंशिक रूप से कूटनीति का उपयोग मान्य परंपरा है। श्रमजीवियो को किसी प्रकार की कोई जालसाजी धोखाधडी या ठगी की कोई आवश्यकता नही पडती। हो सकता है कि श्रमजीवी दूसरो के द्वारा ठगे भले ही जाते है किन्तु वे किसी को ठग भी नही सकते और वैसा करना उनके लिये उचित भी नही हैं
अपने व्यक्तिगत हित मे जालसाजी धोखाधडी ठगी या विश्वासघात हमेशा अनैतिक ही माने जाते है चाहे वह कोई भी क्यो न करे। किन्तु जनहित मे यदि ब्राम्हण छोडकर शेष लोग इनका उपयोग करते है तो इस उपयोग को अनैतिक नही माना जाता। इसलिये जालसाजी और धोखाधडी की भी परिस्थिति अनुसार समीक्षा करके उनकी सीमाए समझनी चाहिये। आवश्यक नही है कि हर धोखाधडी अनैतिक ही हो। साथ ही आवश्यक नही है कि हर प्रकार की धोखाधडी नैतिक ही हो । प्रायः हर आदमी अपने किये गये अनैतिक कार्य को नैतिक सिद्ध करने का प्रयास करता है। किन्तु समाज के विचारक वर्ग का कर्तब्य है कि वह ऐसी अनैतिकता को नैतिक स्वरूप प्रदान न होने दे ।
स्पष्ट है कि इस प्रकार के किसी भी अनैतिक कार्य मे उसकी नीयत देखी जाती हैं। यदि उसकी नीयत खराब है तो किसी भी प्रकार की जालसाजी धोखाधडी अनैतिक और आपराधिक कार्य माना जाना चाहिये। किन्तु यदि नीयत ठीक है तब ऐसा कार्य अनैतिक नही भी मान सकते है।
जालसाजी और धोखाधडी पर नियंत्रण बहुत कठिन कार्य है। क्योकि बचपन से ही बच्चो को डराने के लिये भूत या पुलिस का झूठा सहारा लिया जाता है और धीरे धीरे उसके संस्कार मे असत्य और चालाकी का समावेश शुरू हो जाता है। इसलिये उससे बचना बहुत कठिन कार्य है।
आज दुनियां का प्रत्येक व्यक्ति दुहरा चरित्र जी रहा है। हर भावना प्रधान व्यक्ति किसी को धोखा देना गलत समझता है किन्तु उसमे स्वयं की इतनी क्षमता नहीं कि वह दूसरों द्वारा धोखा देने से स्वयं को बचा सके। वैसे तो धर्म के नाम पर बहुत अधिक जालसाजी और ठगी होती रही है किन्तु सबसे ज्यादा जालसाजी और ठगी राजनीति के नाम पर हुई है। धर्म के नाम पर तो सिर्फ व्यक्ति ठगे जाते है समाज नही किन्तु राजनीति सम्पूर्ण समाज को ही गुलाम बना लेती है। धर्म के नाम पर किसी को ईश्वर बनाकर उसके प्रति श्रद्धा पैदा की जाती है किन्तु राजनीतिक व्यवस्था तो एक संविधान बनाकर उसे भगवान सरीखे मानने के लिये संपूर्ण समाज को बाध्य कर देती है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि अन्य किसी प्रकार की धोखाधडी की तुलना मे राजनैतिक व्यवस्था सबसे अधिक विकृत हो गई है। सारी दुनिया शुरू से जानती रही है कि साम्यवादी धोखा देने के मास्टर माइन्ड होते है। जहां ये कमजोर होते है वहां मानवाधिकार की सारी चिंता करने का ठेका सिर्फ साम्यवादियों के पास ही सुरक्षित रहता है किन्तु जहां वे ताकतवर हुए वहां मानवाधिकार नाम की कोई चीज रही ही नहीं। साम्यवाद का पूरा इतिहास जानते हुए आज भी बडी संख्या मे लोग इनसे धोखा खाते है। दूसरी बात यह भी है कि हर आदमी धोखा खाने के मामले मे अक्षम होते हुए भी स्वयं को इतना सक्षम समझता है कि वह किसी से धोखा खा नही सकता। वह शराफत का ऐसा प्रबल पक्षधर बन जाता है कि वह कभी समझदार बनने का प्रयास ही नही करता। हर धूर्त शराफत का प्रबल समर्थक होता है और हर शरीफ तो शराफत का पक्षधर होता ही है इसलिये इस समस्या से निपटना और भी कठिन है। समस्या बहुत विकराल है । समाधान कठिन है। एक ऐसा वातावरण बनाने की जरूरत है कि हर आदमी शराफत छोडकर समझदारी की ओर बढने का प्रयास करे तभी समस्या पर नियंत्रण संभव है। समाज को धूर्तता ठगी चालाकी जालसाजी से बचाना भी आवश्यक है । इसके लिये कानूनी प्रावधान तो है ही किन्तु समाज मे भी जन जागृति आवश्यक है। समाज मे नैतिकता का पक्ष प्रबल होना चाहिये और अनैतिक लोगो की पहचान का तरीका खोजा जाना चाहिये। यदि समाज के लोग आपस मे मिल बैठकर विचार करने की आदत डाले तो कुछ हद तक इस समस्या का समाधान हो सकता है। वैसे इसके लिये चौतरफा प्रयास करने की आवश्यकता है। नोट – मंथन का अगला विषय पर्दा प्रथा होगा १

मंथन क्रमांक- 85 “मुस्लिम आतंकवाद”

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पिछले कुछ सौ वर्षो से दुनियां की चार संस्कृतियो के बीच आगे बढने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। 1 भारतीय 2 इस्लामिक 3 पश्चिमी 4 साम्यवादी। भारतीय संस्कृति विचारो के आधार पर आगे बढने का प्रयास करती है जिसे ब्राम्हण संस्कृति कहा जाता है। इस्लामिक संस्कृति संगठन शक्ति के बल पर आगे बढती है जिसे छत्रिय संस्कृति कहते है। इसाई या पश्चिमी संस्कृति धन को आधार बनाती है और वैश्य संस्कृति कही जाती है। साम्यवादी संस्कृति अव्यवस्था को आधार बनाती है और शुद्र संस्कृति मानी जाती है। इन चारो संस्कृतियो मे भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति हिंसा को अंतिम शस्त्र मानती है तो इस्लामिक और साम्यवादी संस्कृति हिंसा को पहला शस्त्र मानती है। ये दोनो संस्कृतियां किसी न किसी रूप मे राजनैतिक शक्ति के साथ भी तालमेल बनाकर रखती है जबकि अन्य दो दूरी बनाकर रहती है।
उग्रवाद और आतंकवाद के बीच थोडा फर्क होता है। उग्रवाद हिंसक विचारो तक सीमित होता है। कोई प्रत्यक्ष क्रिया नही करता जबकि आतंकवाद प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय होता है । वर्तमान समय मे संघ परिवार को उग्रवादी कह सकते है और आतंकवादी मुसलमानो और नक्सलवादी साम्यवाद को आतंकवादी कहा जा सकता है। इस्लाम एक विचारधारा है और मुसलमान उसे मानने वाले। धार्मिक मुसलमान कभी न तो उग्रवादी होते है न ही आतंकवादी किन्तु संगठित मुसलमान उग्रवादी तो होता ही है आतंकवादी भी हो सकता है। आम तौर पर सूफी मत मानने वाले अधिक मात्रा मे धार्मिक होते है तो अन्य मत मानने वाले मुसलमानो मे धार्मिक कम और उग्रवादी अधिक होते है। यदि हम साम्यवाद की चर्चा करे तो साम्यवाद मे कोई भी व्यक्ति शान्तिप्रिय हो ही नही सकता। या तो उग्रवादी होगा या आतंकवादी । किन्तु साम्यवाद अब विशेष चर्चा का विषय नही है क्योकि साम्यवाद पूरी दुनिया से हट गया है और भारत मे आंशिक रूप मे नक्सलवाद के रूप मे अंतिम सांस गिन रहा है। फिर भी साम्यवादी विचारधारा के कुछ लोग अब भी बचे हुए है। सिद्ध हो चुका है कि पूरी दुनियां मे साम्यवादी सर्वाधिक चालाक होते है और मुसलमान या संघ के लोग सर्वाधिक भावना प्रधान। साम्यवादी आमतौर पर मोटीवेटर होते है तो मुसलमान या संघ परिवार के लोग मोटिवेटेड। स्वाभाविक है कि भारत का साम्यवाद अब उग्रवादी मुसलमानो के कंधो का सहारा लेकर स्वयं को आगे बढा रहा है। फिर भी अब प्राथमिकता के आधार पर नक्सलवाद या साम्यवाद की चर्चा करना व्यर्थ है। अब तो इस्लामिक उग्रवाद और आतंकवाद की ही चर्चा उचित है। दुनिया मे जहां भी संगठित मुसलमान है वे किसी अन्य को कभी भी शान्ति से नही रहने देते क्योकि शान्त रहना उन्होने बचपन से सीखा ही नही है। उन्हे बचपन से सिखाया गया है कि कुरान ही अंतिम सत्य है और हजरत मोहम्मद ही अंतिम पैगम्बर । उन्हे यह भी बताया गया है कि संगठन ही शक्ति है और शक्ति ही सफलता का एकमात्र आधार। ये पूरी तरह भावना प्रधान होते है। इसलिये ये अपनी कुरान की शिक्षाओ से अलग जा ही नही सकते। ये कभी सहजीवन मे विश्वास नही करते । इनका सहजीवन अपने संगठन तक सीमित है । इनका व्यक्तिगत जीवन संगठन प्रधान होता है । यही कारण है कि इनमे से कुछ अतिवादी लोग आतंकवाद की दिशा मे चले जाते है।उग्रवाद को तो कुछ सीमा तक समझाया जा सकता है और सामाजिक या प्रशासनीक आधार पर डराया भी जा सकता है किन्तु आतंकवाद को सिर्फ नष्ट ही किया जा सकता है। न उन्हे समझाया जा सकता है न डराया जा सकता है। इसलिये आतंकवाद के साथ कोई अन्य तरीके का प्रयोग करना घातक होता है। दुनियां मे जहा भी संगठित मुसलमान है वे न स्वयं शान्ति से रहेगे न दूसरो को रहने देंगे। यहां तक कि यदि उन्हे लडने के लिये अन्य संस्कृतियो के लोग नही मिलेंगे तब वे आपस मे ही अपने इस्लमिक संगठनो के साथ लडेंगे किन्तु लडेंगे अवश्य । वे कभी शान्त रह ही नही सकते। सारी दुनियां अब तक साम्यवादी खतरे से निपटने मे लगी थी । इसलिये इनका विस्तार होता रहा। अब साम्यवाद के समापन के बाद पूरी दुनियां की पहली प्राथमिकता इस्लामिक आतंकवाद को समाप्त करने की है भले ही उसके लिये अनैतिक अमानवीय तरीको का उपयोग क्यो न करना पडे। संगठित मुसलमानो को भयभीत करना ही होगा। भले ही उसके लिये सांप का प्रयोग न करके रस्सी को ही सांप क्यो न बताना पडे। दुनियां एक जुट हो रही है। भारत और भारतीय संस्कृति इस्लामिक आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित है। सबसे अधिक खतरा भारत को है इसलिये भारत को ही इस मामले मे अधिक सावधान रहना है। भारत दुनियां की एकता मे निरंतर अपना प्रभाव बढा रहा है। आतंकवाद को रोकना पहली प्राथमिकता बनती जा रही है। पश्चिमी देशो के साथ पूरा तालमेल बनाया जा रहा है तो साम्यवादी देशो के साथ भी अच्छे सम्पर्क के प्रयास हो रहे है क्योकि संगठित इस्लाम ने अपने स्वभाव के अनुसार साम्यवादिया को भी चीन या रूस मे अशांत कर रखा है।हम भारत मे इस्लामिक उग्रवाद और आतंकवाद के खतरे से निपटने की चर्चा करे। 70 वर्षो तक उनकी संगठन शक्ति का लाभ उठाते हुए लगभग सभी राजनैतिक दलो ने उनके साथ तालमेल किया । उक्त कालखंड मे रडार पर साम्यवाद पहले था इसलिये इस्लामिक उग्रवाद का ज्यादा महत्व नही था। अब पहली प्राथमिकता इस्लामिक कटटरवाद से निपटना है इसलिये नरेन्द्र मोदी के आने के बाद इस दिशा मे सक्रियता बढी हैं। कांग्रेस पार्टी तथा अन्य विपक्षी दल भी इस दिशा मे सोचने को मजबूर हुए है। लगता है जल्दी ही कटटरपंथी मुसलमानो को इस पार या उस पार मे से एक को चुनना पडेगा। अब उन्हे दुनियां के अन्य देशो से समर्थन या सहयोग मिलने से रहा। भारत के विपक्षी दल भी अब उनकी ब्लैकमेंलिग से सतर्क हो गये है। साथ ही संघ परिवार येन केन प्रकारेण इनका मनोबल तोडने के लिये सक्रिय है। अन्य शान्ति प्रिय हिन्दू भी यह उचित समझते है कि इस्लामिक उग्रवाद को भयभीत करने के लिये संवैधानिक अथवा असंवैधानिक का विचार किये बिना समर्थन किया जाये। कुछ दिनो के लिये नैतिकता को भी किनारे रखा जा रहा है। मै जानता हॅू कि यह बात हिन्दुत्व की मूल विचारधारा से बिल्कुल विपरीत होकर इस्लामिक विचारधारा के समकक्ष है किन्तु हिन्दुओ मे आम धारणा यही बनती जा रही है कि संगठित इस्लाम को सदा सदा के लिये समाप्त ही कर देना चाहिये भले ही कुछ अनैतिकता का सहारा क्यो न लेना पडे। आज खुले मे नमाज अथवा अलीगढ युनिवर्सिटी मे जिन्ना की मूर्ति जैसे अप्रासंगिक विषय उठाकर जन जागरण किये जाने को भरपूर समर्थन मिल रहा है। वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अब भारतीय मुसलमानो को धर्म और संगठन मे से एक को चुनना होगा। अब न्यायपालिका से भी वामपंथी विचारो के लोग हटते जा रहे है विधायिका मे भी अब पहले की स्थिति नही बची है। कार्यपालिका भी निरंतर रूख बदल रही है। उचित है कि भारतीय मुसलमान अपनी 1400 वर्ष की जारी नीतियों पर फिर से विचार करे। मेरी अपने मुसलमान भाइयो से कुछ अपेक्षाए है । 1 वे कश्मीर का भारत मे पूर्ण विलय मान ले और कश्मीर मे टकरा रही उग्रवादी विचारधारा को बल पूर्वक कुचले जाने का आंख मूंदकर समर्थन करे। 2 वे रोहिग्या मुसलमानो का किसी भी आधार पर समर्थन करके विश्वास को खतम न होने दे। 3 वे कुरान को अंतिम सत्य मानने की धारणा को स्वयं तक सीमित रखे। उस आधार पर किसी तरह की क्रिया मे संलग्न न हो कुरान के धार्मिक अंश का अनुकरण करे तथा संगठनात्मक अंश को छोड दे। 4 संघ परिवार चाहे जितना भी उत्तेजित करने का प्रयास करे हमारे मुसलमान भाई किसी भी परिस्थिति मे जरा भी उत्तेजित न हो । किसी भी परिस्थिति मे हिन्दू मुसलमान का धु्रवीकरण मुसलमानो के लिये घातक होगा। 5 अल्प काल के लिये शुक्रवार की नमाज मे नमाज के बाद होने वाली तकरीर से अपने को दूर कर ले। 6 संगठन की जगह सहजीवन को महत्वपूर्ण स्थान दे ।मै एक हिन्दू हॅू। मै संघ परिवार की गतिविधियों और कार्य प्रणाली को कभी हिन्दूत्व की विचार धारा के साथ नही देखता। फिर भी मै मानता हॅू कि इस्लामिक कटटरवाद को समाप्त करने मे यदि संघ परिवार कुछ अनैतिक भी करता है तो हमे चुप रहना चाहिये क्योकि नैतिकता की उम्मीद नैतिक लोगो के साथ ही करने का समय आ गया है। यदि अनैतिक लोगो के साथ कोई अनैतिक व्यवहार करता है तो हमे बीच मे नही कूदना चाहिये। वैसे तो मुस्लिम आतंकवाद पूरी दुनियां के लिये सबसे बडी समस्या है किन्तु भारत के लिये यह और भी अधिक खतरनाक है। वर्तमान परिस्थितियां अनुकूल है। भारत को इस समस्या से समाधान के लिये पहल करनी चाहिये। इस्लामिक आतंकवाद और उग्रवाद के बीच एक गठजोड सरीखा है। इसलिये आतंकवाद से तो सरकार निपट रही है किन्तु इस्लामिक उग्रवाद से भी हम सब लोगो को एक जुट होकर निपटना होगा। प्रज्ञा पुरोहित असीमानंद गलत थे या नही यह प्रश्न वर्तमान समय मे अनावश्यक है सच्चाई जो हो किन्तु वर्तमान परिस्थिति मे हमे चाहिये कि हम ऐसे प्रश्नो को उठाकर समाधान को नुकसान न पहुंचावे। कश्मीर या नक्सलवाद से सरकार ठीक निपट रही है। मेरे विचार से तो और कठोरता से निपटा जाना चाहिये। जो लोग वार्ता की सलाह दे रहे है उनकी नीयत खराब है। ऐसे लोगो को कठघरे मे खडा किया जाना चाहिये। साथ ही हमे व्यावहारिक दृष्टिकोण भी अपनाना चाहिये। सभी मुसलमान एक समान नही है । नरेन्द्र मोदी के बाद धार्मिक मुसलमानो की संख्या धीरे धीरे बढ रही है । उचित होगा कि हम धार्मिक मुसलमानो के साथ अच्छा व्यवहार करे। प्रयत्न करे कि हम उनके साथ सामान्य से भी अधिक अच्छा व्यवहार करे जिससे धार्मिक और संगठित मुसलमानो के बीच एक साफ साफ विभाजन रेखा दिख सके ।मै देख रहा हॅू कि अब भी वामपंथ प्रभावित लोग किसी न किसी बहाने दुनियां को एक जुट होने के विरूद्ध कुछ न कुछ लिखते बोलते रहते है। ऐसे लोगो मे बडी संख्या मे तो वामपंथ प्रभावित लोग है किन्तु साथ ही कुछ उच्च नैतिकता का मापदंड रखने वाले हिन्दू भी उनकी हां मे हां मिलाते है। इस संबंध मे हमारी रणनीति साफ होनी चाहिये । हम इस मामले मे पूरी तरह भारत सरकार के हर कदम का समर्थन करते है। भले ही इस मामले मे अमेरिकन गु्रप के साथ मोर्चा बनाने का प्रयत्न ही क्यो न हो। इस मामले मे संघ परिवार यदि उचित कदम उठाता है तो हम उसका समर्थन करे किन्तु यदि संघ परिवार कोई अनुचित कदम उठाता है जो अनैतिक और अन्यायपूर्ण है तब भी उस परिस्थिति मे हमे चुप रहना चाहिये क्योकि विशेष परिस्थिति मे शत्रु का शत्रु मित्र होता है और इस्लामिक आतंकवाद हमरा सबसे बडा शत्रु है।
मै मानता हॅू कि यदि हम सोच समझकर आगे बढे तो भारत से इस्लामिक आतंकवाद सदा सदा के लिये समाप्त होना संभव है।नोट-मंथन का अगला विषय जालसाजी धोखाधडी होगा 1

मंथन क्रमांक 84 चोरी, डकैती और लूट

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प्रत्येक व्यक्ति की स्वतंत्रता उसका मौलिक अधिकार होता है। ऐसी स्वतंत्रता मे कोई भी अन्य किसी भी परिस्थिति मे तब तक कोई बाधा नही पहुंचा सकता जब तक वह स्वतंत्रता किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बाधक न हो। कोई भी व्यवस्था किसी भी स्वतंत्रता की उस व्यक्ति की सहमति के बिना कोई सीमा नही बना सकती। इस तरह अपराध सिर्फ एक ही होता है और वह होता है किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बाधा पहुचाना । अपराध दो प्रकार के होते है। 1 बल प्रयोग 2 धोखाधडी तीसरा कोई कार्य अपराध नही होता । मौलिक अधिकार भी चार प्रकार के होते है। 1 जीने की स्वतंत्रता 2 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 3 सम्पत्ति की स्वतंत्रता 4 स्व निर्णय की स्वतंत्रता । इन चारो स्वतंत्रताओ की कोई सीमा उसकी सहमति के बिना तब तक नही बन सकती जब तक किसी अन्य की स्वतंत्रता मे बाधक न हो। अपराध भी पांच प्रकार के होते है । 1 चोरी डकैती और लूट। 2 बलात्कार 3 मिलावट कमतौल 4 जालसाजी धोखाधडी 5 हिन्सा और बल प्रयोग। इन सबमे भी हिंसा बल प्रयोग और धोखाधडी के बिना कोई कार्य अपराध नही होता।चोरी डकैती और लूट एक ही प्रकार के अपराध होते है जिसमे किसी व्यक्ति की सम्पत्ति का कोई भाग छिपकर अथवा बल प्रयोग द्वारा अपने अधिकार मे कर लिया जाता है किन्तु चोरी आम तौर पर छिपकर की जाती है और डकैती या लूट बल प्रयोग के द्वारा। डकैती और लूट मे कोई विशेष फर्क नही होता। यदि लुटेरे पांच से कम है तो उसे लूट कहते है और पांच या उससे अधिक है तो डकैती।स्वतंत्रता के बाद आबादी करीब चार गुनी बढी है । सरकारो की आर्थिक अथवा तकनीकी सुविधाए आबादी की तुलना मे कई गुना अधिक बढी है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन स्तर बहुत सुधरा है। भीख मागने वाले का भी स्तर उंचा हुआ है। इस तरह अपराधो का ग्राफ बहुत कम होना चाहिये था किन्तु आबादी की तुलना मे कई गुना अधिक बढ गया है। चोरी डकैती और लूट भी स्वतंत्रता के समय की तुलना मे पचीस गुना तक अधिक कह सकते है । ये अपराध निरंतर बढते ही जा रहे है। प्रश्न उठता है कि जब भारत भौतिक उन्नति के मामले मे दुनियां से कम्पीटिशन कर रहा है और विकास शील की जगह विकसित राष्टो की श्र्रेणी मे शामिल हो रहा है तब ये चोरी डकैती के अपराध स्वयं क्यो नही रूक रहे अथवा सरकारे सफल क्यो नही हो रही।इस गंभीर प्रशा पर गंभीरता से विचार मंथन हुआ। आम तौर पर लोग भय के कारण अपराधो से दूर रहते है। भय तीन प्रकार का हो सकता है। 1 ईश्वर का 2 समाज का 3 सरकार का । ईश्वर का भय निरंतर घटता जा रहा है। समाज को इस प्रकार छिन्न भिन्न किया गया कि समाज का अस्तित्व रहा ही नही। कुल मिलाकर सरकार का भय ही एक मात्र आधार बचता है जिससे चोरी डकैती रूक सकती है। हम सरकार की अगर समीक्षा करे तो सरकार का भय भी इन अपराधो को रोकने मे सफल सिद्ध नही हो रहा है।भारत नकल करने के लिये प्रसिद्ध हो गया है। दुनियां के विकसित राष्ट अपराध नियंत्रण करने के बाद जन कल्याण के कार्य करते है तो भारत अपराध नियंत्रण को छोडकर भी जन कल्याण के कार्यो मे सक्रिय हो जाता है । स्पष्ट है कि बलात्कार और डकैती दोनो ही अपराध होते है। दोनो मे ही बल प्रयोग होता है । किन्तु डकैती की तुलना मे सरकारे बलात्कार को अधिक गंभीर अपराध मानती है। जबकि डकैती अधिक गंभीर अपराध होता है। डकैती मे किसी व्यक्ति के स्वामित्व की कोई वस्तु छीनकर उसपर अपना स्वामित्व बना लिया जाता है। बलात्कार मे ऐसा नही होता । इसी तरह किसी धर्म ग्रन्थ का अपमान एक भावनात्मक मुददा है किन्तु उसे भी गंभीर अपराध बना दिया गया है। अवैध बंदूक और पिस्तौल किसी भी परिस्थिति मे रखना गंभीर अपराध होना चाहिये किन्तु बंदूक और पिस्तौल बिना लाइसेन्स के भी रखना छोटा अपराध है और गांजा अफीम रखना गंभीर अपराध । किसी आदिवासी हरिजन को गाली दे देना बहुत बडा गंभीर अपराध बना दिया गया है। कोई व्यक्ति किसी की सहमति से वर्षो तक शारीरिक संबंध बनाकर उससे अलग होना चाहे तो वह बलात्कार का दोषी मान लिया जाता है। मै आज तक नही समझा कि यह बलात्कार की कौन सी परिभाषा है। काष्टींग कौच को भी बलात्कार सरीखा अपराध मानने की चर्चा चल रही है जबकि वह शुद्ध सौदेबाजी है। सामाजिक बुराईया रोकने का काम समाज का है। सरकार का नही। सरकार का काम सिर्फ अपराध नियंत्रण है लेकिन सरकारे सब प्रकार की सामाजिक बुराईया भी रोकने का प्रयत्न करती है। एक सिद्धान्त है कि किसी दायित्व की मात्रा जितनी ही बढती जाती है उसकी गुणवत्ता की क्षमता उतनी ही घटती जाती है।सरकारो की शक्ति सीमित है । यदि सरकारे ओभर लोडेड होती है तो स्वाभाविक है कि उसकी गुणवत्ता घटेगी । सरकारे वास्तविक कार्यो को छोडकर वर्ग संतुष्टी के कार्यो को प्राथमिकता के आधार पर करना शुरू कर देती है जबकि उन्हे अपराध नियंत्रण पहले करना चाहिये था। जब तक जान बुझकर बुरी नीयत से किसी की भावनाओ को चोट न पहुंचाई जाये तब तक भावनाओ को चोट लगना किसी भी प्रकार का कोई अपराध नही माना जा सकता है। नीयत का महत्व है भावनाओ का नही। सरकारे भावनाओ का महत्व समझती है, नीयत से मतलब नही रखती है। इसका दुष्परिणाम होता है कि चोरी डकैती सरीखे अपराध बढते चले जाते है। दुख की बात है कि हत्या आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधियो के मुकदमे बीस बीस वर्ष चलते रहते है तो बलात्कार के मुकदमे मे त्वरित निपटारो की मांग और प्रयत्न हो रहे है। यहां तक मांग हो रही है कि बलात्कार को हत्या की तुलना मे भी अधिक गंभीर अपराध बना दिया जाये।एक तरफ तो न्यायपालिका ओभर लोडेड है । चोरी डकैती हत्या के मुकदमे कई दशक तक चलते रहते है तो उत्तर प्रदेश मे खुलेआम अपराधियो को गोली मारने का भी आदेश क्रियान्वित किया जा रहा है। ये दोनो क्रियाए पूरी तरह एक दूसरे के विपरीत है। अच्छा तो यह होता कि न्यायिक प्रकृया के अंतर्गत गंभीर अपराधो मे छः महिने के अंदर निर्णय करना अनिवार्य कर दिया जाता तो गोली मारने की आवश्यकता ही नही पडती। किन्तु सरकारे न्यायिक प्रकृया को लंबा करते जाती है और यदाकदा जनहित मे अलोकतांत्रिक तरीके अपना लिये जाते है। मेरे विचार से चोरी डकैती लूट का अस्तित्व हमारे लिये एक कलंक है। छुआछूत से भी ज्यादा, गांजा और अफीम से भी ज्यादा। इसे हर हालत मे रोका ही जाना चाहिये। सरकारो को और समाज को भावना और बुद्धि के बीच के अंतर को समझना चाहिये । इस आधार पर अपनी प्राथमिकता तय करनी चाहिये। बिना विचारे दुनिया की नकल करना हमारे लिये आदर्श स्थिति नही है। इससे बचा जाना चाहिये।गंभीर अपराधो की प्राथमिकताएं तय करते समय कुछ मापदंडो पर विचार होना चाहिये। 1 अपराध अपराधी की आवश्यकता थी अथवा इच्छा । 2 अपराध भावना वश हुआ या योजनापूर्वक 3 अपराध के द्वारा अपराधी को कोई भौतिक लाभ हुआ या नही। 4 पीडित पक्ष को भावनात्मक क्षति हुई अथवा भौतिक । इस तरह की अनेक प्राथमिकताओ पर विचार करने के बाद यह धारणा बनती है कि चोरी चकैती और लूट अन्य भावनात्मक अपराधो की तुलना मे अधिक गंभीर अपराध है। वर्तमान समय मे मेरा कथन कुछ विपरीत दिख सकता है किन्तु इस विषय पर चर्चा होनी चाहिये।मंथन का अगला विषय मुस्लिम आतंकवाद होगा 1

मंथन क्रमांक-८३ बाल श्रम

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दुनियां भर मे राज्य का एक ही चरित्र होता है कि वह समाज को गुलाम बनाकर रखने के लिये वर्ग विद्वेष वर्ग संघर्ष का सहारा लेता है। भारत की राज्य व्यवस्था भी इसी आधार को आदर्ष मानकर चलती है। बांटो और राज करो की नीति बहुत पुरानी है जो अभी तक चल रही है। इसी वर्ग विद्वेष के आठ उपकरणो मे उम्र के नाम पर फैलाया गया वर्ग विद्वेष भी शामिल है। बालक, युवक और वृद्ध के नाम पर तीन अलग अलग समूह बनाकर तीनो के बीच मे भेद भाव पैदा करना राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकताओ मे से एक है। इस महत्वपूर्ण कार्य मे राजनैतिक दलो का आपसी भेद भाव भी नही है न्यायपालिका भी लगातार इस कार्य को महत्वपूर्ण समझती है और कार्यपालिका तो सक्रिय रहती ही है। बालक युवा और वृद्ध कभी भिन्न नही होते क्योकि प्रत्येक व्यक्ति एक निश्चित उम्र तक बालक मध्य काल मे युवक और अंतिम काल मे वृद्ध होता है। परिवार मे रहते हुए भी बालक, युवक, वृद्ध तीनो प्रकार के लोग एक साथ संयुक्त रहते है। अपवाद स्वरूप ही कुछ बालक, युवक या वृद्ध के रूप मे माने जा सकते है जो नितांत अकेले हो या संयुक्त परिवार से अलग हो।
प्राकृतिक या मौलिक अधिकार सबके समान होते है जिसमे बालक, युवक और वृद्ध का कोई अंतर नही होता। पारिवारिक सामाजिक और संवैधानिक अधिकारो मे कुछ भिन्नता हो सकती है। बालक जब तक बालिग नही हो जाता तब तक परिवार उसका संरक्षक होता है, मालिक नही। परिवार मे बालक समाज या राज्य की अमानत नही होता बल्कि परिवार का एक सहभागी सदस्य होता है। इसका अर्थ हुआ कि बालक की भी परिवार के सभी प्रकार के लाभ हानि मे बराबर की हिस्सेदारी होती है, भले ही सक्रियता के नाम पर उसकी अन्य सदस्यो से कम ही भूमिका क्यो न हो। समाज बालक का अभिरक्षक माना जाता है और राज्य उसका अनुरक्षक। इसका अर्थ हुआ कि राज्य सिर्फ बालक के मौलिक अधिकारो की सुरक्षा की चिंता करता है। साथ ही राज्य का यह भी दायित्व है कि परिवार बालक के संरक्षक होने की अपनी सीमाएं तोड तो नही रहा। इसका अर्थ हुआ कि परिवार यदि अपनी सीमाएं तोडकर मालिक के समान व्यवहार करता है तब राज्य हस्तक्षेप कर सकता है। समाज तभी हस्तक्षेप करता है जब परिवार बालक के संरक्षक के कर्तब्य नही करता। इस तरह तीनो की भूमिका अलग अलग होती है। राज्य या समाज विशेष परिस्थितियो मे ही परिवार के आंतरिक मामलो मे हस्तक्षेप कर सकता है अन्यथा सामान्य स्थिति मे नही कर सकता।
साम्यवादी देश पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था के विरोधी होते है तो पश्चिम के देश पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण नही मानते। भारतीय और इस्लामिक व्यवस्था मे परिवार और समाज व्यवस्था को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है। भारत जब पष्चिम का गुलाम हुआ और स्वतंत्रता के बाद जब साम्यवादी विचार धारा की तरफ बढता चला गया तब स्वाभाविक था कि भारत की राज्य व्यवस्था मे भी परिवार और समाज व्यवस्था को तोडने या अमान्य करने की बुरी आदत शुरू हुई। वैसे भी भारत नकल करने के लिये प्रसिद्ध है। इतिहास से प्रमाणित है कि भारत का संविधान बनाने मे भी असल का कोई शब्द भी शामिल नही है। संविधान मे जो कुछ भी लिखा गया है वह सब नकल ही नकल है। इसी नकल के परिणाम स्वरूप भारत मे भी बालिक युवा और वृद्ध के अलग अलग कानून बनने लगे, जबकि परिवार मे तीनो का कोई अलग अस्तित्व होता ही नही है। भारत मे भी पेशेवर लोग, मानवाधिकार, बाल श्रम, पर्यावरण, जल संरक्षण, बंधुआ मजदूरी आदि के नाम पर विदेषी एजेंट के रूप मे दुकाने खोलते रहे है और मानवाधिकर पर्यावरण बालश्रम आदि के नाम पर अच्छा काम कर रही सामाजिक संस्थाओ को किनारे करते जा रहे है। इन पेशेवर लोगो को पश्चिम के देशों से बडी बडी अंतराष्ट्रीय सम्मानजनक पहचान भी दे दी जाती है और इन्हे गुप्त रूप से आर्थिक मदद भी इसलिये दी जाती है कि ये समूह भारत मे बाल श्रम पर्यावरण और मानवाधिकार के नाम पर वर्ग विद्वेष फैला सके, परिवार व्यवस्था और समाज व्यवस्था मे टूटन पैदा कर सके। ऐसे पेशेवर लोगो से भारत सरकार भी प्रभावित रहती है और उन्हे सम्मान देने के लिये मजबूर रहती है भले ही वे भारत के लिये सामाजिक कलंक ही क्यों न हो ।
भारत के आम नागरिको को अब तक नही पता कि भारत मे बने कानून के अनुसार परिवार अपने बच्चे से अपने घर या दुकान का काम भी नही करवा सकता । यहां तक कि उसकी सहमति से भी नही। पहली बार नरेन्द्र मोदी सरकार ने जब इस कानून को शिथिल कराने की कोशिश की तो कुछ निर्लज मानवाधिकार प्रेमियो ने तो ऐसे प्रयत्न को रोकने का भी प्रयास किया। मोदी सरकार ने दृढ इच्छा षक्ति के सहारे ऐसे सुधार को स्वीकृति दी। फिर भी बाल श्रम के नाम पर अनेक ऐसे कानून भारत मे बने हुए है जो विकास मे भी बाधक है और पारिवारिक व्यवस्था को भी छिन्न भिन्न करने वाले है। ऐसी परिवार तोडक अंतर्राष्ट्रीय लावी भारत मे भी इतनी मजबूत है कि नरेन्द्र मोदी सरीखा सक्षम प्रधानमंत्री भी अभी उन पर हाथ डालने की हिम्मत नही कर पा रहा। विपक्ष को तो मोदी विरोध के अतिरिक्त उचित अनुचित से कोई मतलब ही नही है। ऐसा प्रमाणित किया जा रहा है जैसे बालक सिर्फ राष्ट्र की सम्पत्ति हो और परिवार उसकी अमानत की सुरक्षा तक सीमित हो। बालिग होने के बाद परिवार बालक को राष्ट्र को समर्पित करने के लिये मजबूर होगा ऐसी अवधारणा मूलतः गलत है। किन्तु भारत की संवैधानिक मान्यता ऐसी ही बनी हुई है। आदर्श स्थिति ऐसी नही मानी जा सकती कि बालक पर राष्ट्र का ही सर्वोच्च अधिकार है। या तो बालक पर परिवार समाज और राज्य का संयुक्त अधिकार माना जा सकता है अन्यथा उसमे परिवार का आधा और समाज राज्य का आधा । यह नही हो सकता कि राज्य बालक के मामले मे सर्वे सर्वा बन जाये। इस लिये व्यक्तिगत रूप से मै इस मत का हॅूूू कि पूरे भारत मे बालश्रम संबंधी बने किसी भी प्रकार के कानून का पूरी तरह विरोध होना चाहिये। साथ ही बालश्रम के नाम पर पेशेवर दुकानदारो का भी पूरा विरोध होना चाहिये चाहे वे कितने भी सम्मानित क्यों न हों।

मंथन क्रमांक-82 गाय गंगा और मंदिर या समान नागरिक संहिता

Posted By: kaashindia on February 19, 2020 in Uncategorized - Comments: No Comments »

भारतीय जीवन पद्धति अकेली ऐसी प्रणाली है जिसमे कुछ बुद्धिजीवी सामाजिक विषयो पर अनुसंधान करते है और निष्कर्ष भावना प्रधान लोगो तक इस तरह पहुंचता है कि वह निष्कर्ष सम्पूर्ण समाज के लिये सामाजिक कर्तब्य बन जाता है । प्राचीन समय से यही परिपाटी चलती आ रही है। भारतीय जीवन पद्धति विज्ञान और धर्म के संतुलन के रूप मे विख्यात है। गाय गंगा मंदिर पीपल के पेड या तुलसी को पौधो को समाज मे यथोचित सम्मान मिलना इसी प्रणाली का प्ररिणाम है। गाय एक ऐसा उपयोगी पशु है जिसकी उपयोगिता पर अब भी नये नये शोध हो रहे है। गाय को माता के समान स्थान दिया गया। गो हत्या को निशिद्ध कार्य मे सम्मिलित किया गया। गंगा नदी की वैज्ञानिक उपयोगिता देखकर ही उसे अधिकतम पवित्र और साफ रखने की धार्मिक व्यवस्था हुई। गंगा नदी को पार करते समय उसमे तांबे का पैसा फेकना भी एक वैसा ही प्रयत्न माना जाना चाहिये। मंदिरो को आस्था का केन्द्र माना गया। गाय गंगा मंदिर जैसे वैज्ञानिक प्रतीको को आम लोगो के जन मानस मे इस तरह शामिल किया गया, जैसे वह उनके जीवन मरण का प्रश्न हो । विचारवान लोग तर्क के आधार पर रिसर्च करते थे और उस रिसर्च के परिणाम भावना प्रधान समाज तक श्रद्धा के माध्यम से पहुचाते थे। विचार और श्रद्धा के बीच एक अदभूत तालमेल था।चाहे गाय गंगा मंदिर हो या पीपल का पेड सभी एक बेहतर सामजिक व्यवस्था के लिये उपयोगी थे। मनुष्य एक मात्र ऐसा जीव था जिसे मौलिक अधिकार प्राप्त हुए । गाय की सम्पूर्ण उपयोगिता और श्रद्धा होते हुए भी गाय को पशु माना गया क्योकि उसे मौलिक अधिकार प्राप्त नही थे। इसी तरह गंगा को पवित्र नदी तथा मंदिर को एक पवित्र उपासना केन्द्र के रूप मे स्वीकार किया गया। मै स्पष्ट कर दू कि सिर्फ मनुष्य को ही मौलिक अधिकार प्राप्त होते है क्योकि मनुष्य सम्पूर्ण विश्व समाज के साथ जुडा हुआ है और गाय गंगा या मंदिर का अब तक वैसा स्थान प्राप्त नही है । इसका अर्थ हुआ कि गाय हमारे लिये आस्था का केन्द्र हो सकती है और किसी दूसरे के लिये नही भी हो सकती है । भारतीय जीवन पद्धति मे अपनी आस्था को किसी दूसरे पर बल पूर्वक नही थोपा जा सकता । जिस तरह गाय के नाम पर व्यक्तियो की हत्याए हो रही है अथवा गंगा के नाम पर जल के अन्य उपयोग मे रूकावट के आंदोलन हो रहे है वे भारतीय संस्कृति के हिस्से नही है क्योकि ये सुविचारित नही है, तर्क संगत नही है, विज्ञान विरूद्ध है तथा पूरी तरह भावनाओ पर आधारित है। बल्कि कभी कभी तो ऐसा लगता है कि गाय गंगा मंदिर का मुददा सुविचारित तरीके से राजनैतिक हथकंडे के रूप मे उपयोग करने का प्रयत्न हो रहा है।स्पष्ट तथ्य है कि भारत मे भारतीय संस्कृति मे निरंतर गिरावट आ रही है । हिन्दुओ की संख्या लगातार घट रही है और गाय गंगा मंदिर विरोधियो की बढ रही है। यदि हिन्दूओ की संख्या घटती गई तो गाय गंगा मंदिर भी नही बचेगा । किन्तु यदि हिन्दू और हिन्दुत्व बच गया तो गाय गंगा मंदिर खत्म होने के बाद भी फिर से विस्तार पा सकते है। इसका अर्थ हुआ कि गाय गंगा और मंदिर की सुरक्षा की तुलना मे हिन्दुत्व की सुरक्षा अधिक महत्वपूर्ण है किन्तु हमारे रणनीति कार गाय गंगा मंदिर को हिन्दुत्व की तुलना मे अधिक महत्वपूर्ण मानने का प्रयत्न कर रहे है। वास्तविक स्थिति यह है कि भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति मे गाय गंगा मंदिर की तुलना मे समान नागरिक संहिता की अधिक उपयोगिता है, क्योकि भारतीय जीवन पद्धति इतनी अधिक सुविचारित और वैज्ञानिक आधार पर स्थापित है कि कोई अलग उसका मुकाबला नही कर सकेगा। समान नागरिक संहिता की तुलना मे हिन्दू राष्ट्र शब्द पूरी तरह घातक और अनुपयुक्त है क्योकि विचार धाराए वैज्ञानिक तथ्यो पर विस्तार पाती है। भावनात्मक प्रचार पर नही। पिछले तीन वर्षो से मै देख रहा हॅू कि हमारे समान नागरिक संहिता के पक्षधर अनेक मित्र भी हिन्दू राष्ट अथवा गाय गंगा मंदिर को अधिक प्राथमिक मानने लगे है। कुछ लोगो ने समान नागरिक संहिता शब्द का अर्थ भी बदलने का प्रयास किया। उन्होने समान नागरिक संहिता को समान आचार संहिता बना दिया जबकि दोनो एक दूसरे के विपरीत है। यदि भारत मे समान नागरिक संहिता लागु हो जाये तो भारत की अधिकांश समस्याए अपने आप सुलझ जायेगी तथा भारत दूनिया मे मानवाधिकार के नाम पर अग्रणी देशो मे गिना जाने लगेगा । जबकि गाय गंगा और मंदिर आंदोलन कुछ लोगो के अहम की तुष्टि भले ही कर दे लेकिन दुनियां मे भारतीय जीवन पद्धति अथवा हिन्दू धर्म का सिर उंचा नही हो सकेगा।जो मित्र गाय गंगा मंदिर के नाम पर कटटर पंथी इस्लाम से टकराने के पक्षधर है वे भूल रहे है कि भावनात्मक मुददो पर टकराव टिकाउ नही हो सकता। ऐसे मुद्दो पर विश्व समर्थन भी नही मिल सकेगा। भारत की राजनैतिक सत्ता के लिये भले ही ऐसे मुद्दे उपयोगी हो किन्तु विश्व व्यवस्था मे इनका उपयोग नही हो सकता। दूसरी ओर समान नागरिक संहिता एक ऐसा विषय है जिसपर भारत के मुसलमान सहमत भी नही होंगे और विरोध भी नही कर सकेगे। विश्व जनमत भी समर्थन कर सकता है। यदि जल छिटने से साप मर जाये तो लाठी डंडे गोली बंदूक की आवश्यकता क्या है। गाय गंगा मंदिर जैसे मामलो मे सरकार को किसी प्रकार का कोई कानूनी हस्तक्षेप नही करना चाहिये। जिस तरह सत्तर वर्ष बीत गये उस तरह दो चार वर्ष और बीत सकते है।मै फिर से निवेदन करता हॅू कि हमे भावनाओ मे बहकर तथा जोश मे आकर कुछ करने की मूर्खता छोड देनी चाहिये और वैचारिक तथा होश मे आकर एक मात्र समान नागरिक संहिता के पक्ष मे वातावरण बनाना शुरू करना चाहिये।

मंथन क्रमांक- 81 ग्राम संसद अभियान क्या, क्यो और कैसे?

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हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही हैं। भावना और बुद्धि के बीच भी अंतर बढता जा रहा है। शरीफ लोगो की संख्या भी बढती जा रही है तो चालाक और धूर्त लोगो की संख्या भी बढ रही है। शरीफ और धूर्त के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है और समझदारी निरंतर घट रही है । हर धूर्त यह प्रयत्न कर रहा है कि अन्य लोग समझदार न होकर शरीफ बने अर्थात भावना प्रधान हो । विचार प्रचार बहुत तेज गति से हो रहा है और विचार मंथन की प्रकृया लगातार घट रही है। विपरीत विचारो के लोग अलग अलग गिरोहों मे बंटकर संगठित हो रहे है तो विपरीत विचारो के लोग एक साथ बैठकर कभी समस्याओ की न तो चर्चा करते है न समाधान सोचते है । यहां तक कि पूरे विश्व मे विपरीत विचारो के लोग एक दूसरे के विरूद्ध बिना विचारे इतने सक्रिय हो जाते है कि उसका लाभ धूर्त उठाते है। हर कार्य मे आम नागरिको की सक्रियता बढती जा रही है भले ही वह एक दूसरे के विरूद्ध ही क्यों न हो।
यदि हम भारत की समीक्षा करें तो भारत दुनियां की तुलना मे कुछ अधिक ही समस्या ग्रस्त है। राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुडने का प्रयास कर रहे है तो सभी शरीफ समाज के साथ इकठ्ठे हो रहे है। राज्य सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषाए बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियो को विशेष सुरक्षा दी जा रही है तो न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतो के बीच टकराव बढाया जा रहा है। परिणाम स्वरूप समाज के शरीफ लोगो द्वारा सुरक्षा और न्याय के लिये अपराधियो की मदद लेना मजबूरी बन गया है। राज्य पूरी शक्ति से वर्ग समन्वय को समाप्त करके वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है। धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर किसान मजदूर शहरी ग्रामीण आदि के नाम पर समाज मे अलग अलग संगठन बनाकर उनमे वर्ग विद्वेष का कार्य योजना बद्ध तरीके से राज्य कर रहा है । शिक्षा और ज्ञान के बीच भी लगातार असंतुलन पैदा किया जा रहा है। शिक्षा को योग्यता का विस्तार न मानकर रोजगार के अवसर के रूप मे बदलने का लगातार प्रयास हो रहा है। परिणाम हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है। पूरे भारत मे हिंसा के प्रति विश्वास बढता जा रहा है। अनेक असत्य धारणाए सत्य के समान स्थापित हो रही है। अच्छे अच्छे विद्वान नहीं बता पाते कि व्यक्ति और नागरिक मे क्या अंतर है, समाज राष्ट्र और धर्म मे कौन अधिक महत्वपूर्ण है, शिक्षा और ज्ञान मे क्या अंतर है, अपराध गैर कानूनी और अनैतिक मे क्या अंतर है, कार्यपालिका और विधायिका मे क्या अंतर है आदि आदि। स्पष्ट है कि समस्याए दिख रही है और समाधान नहीं दिख रहा । समस्याओ का अंबार लगा है। समाधान कहां से शुरू करें यह समझ मे नही आ रहा ।
तंत्र की नीतियां गलत नही है बल्कि नीयत गलत है। तंत्र समाज को गुलाम बनाकर रखने की नीयत से सारे अधिकार अपने पास समेट रहा है। तंत्र ने संविधान रूपी एक पुस्तक लिखकर उसे समाज मे धर्म ग्रन्थ या भगवान के रूप मे स्थापित कर दिया है और तंत्र जब चाहे उसमे मनमाने संशोधन करने का अपना अधिकार सुरक्षित रखता है। हमारे लिये भगवान और तंत्र के लिये गुलाम । लोकतंत्र की परिभाषा लोक नियंत्रित तंत्र से बदलकर लोक नियुक्त तंत्र कर दी गई है। तंत्र को लोक का प्रबंधक या मैनेजर होना चाहिये था किन्तु वह अपने को शासक अर्थात सरकार मानता भी है और कहता भी है। कैसी विडंबना है कि लोक शासित है और तंत्र शासक। इसलिय यह निष्कर्ष निकलता है कि सम्पूर्ण विश्व की राजनैतिक व्यवस्था मे आमूल परिवर्तन होना चाहिये जिसकी शुरूआत भारत से हो।
हमे भारत मे दो दिशाओ मे एक साथ काम करना चाहिये । 1 समाज सशक्तिकरण 2 राज्य कमजोरीकरण। राज्य और समाज के बीच जो असीमित दूरी राज्य के पक्ष मे बढ गई हैं उस दूरी को समाज के पक्ष मे करना ही व्यवस्था परिवर्तन है। समाज सषक्तिकरण का कार्य ज्ञान यज्ञ परिवार राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पूर्वक कर रहा है। राज्य कमजोरीकरण का कार्य ग्राम संसद अभियान ने अपने उपर लिया है।
स्वराज्य का अर्थ है सम्पूर्ण विश्व के संविधान के निर्माण और संशोधन मे प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका तथा अपने कानून बनाने और क्रियान्वित करने की स्वतंत्रता। इसे ही हम लोक स्वराज्य कहते हैं। भारत मे भी लोक स्वराज्य का अर्थ वही है अर्थात भारतीय संविधान के निर्माण तथा संशोधन मे भारत के प्रत्येक व्यक्ति की सम्पूर्ण भूमिका । सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ हैं भारत की अव्यवस्थित राजनैतिक, सामाजिक, संवैधानिक, धार्मिक, पारिवारिक, आर्थिक, तथा अन्य सभी प्रकार की व्यवस्थाओ मे अब तक आये पतन से मुक्ति। लोक स्वराज्य ही सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का आधार बन सकता है। चूकि यह कार्य बहुत अधिक कठिन है इसलिये संशोधित रूप मे व्यवस्था परिवर्तन को आधार बनाया जा सकता है। व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ है संविधान के निर्माण और संशोधन मे भारत के प्रत्येक नागरिक की महत्वपूर्ण भूमिका। कई वर्षो तक प्रयत्न के बाद महसूस हुआ कि व्यवस्था परिवर्तन की तुलना मे कुछ और लचीला मार्ग अपनाया जाये। यह सोचकर ग्राम संसद अभियान को आधार बनाकर जन जागरण शुरू किया गया। ग्राम संसद अभियान का अर्थ है, प्रत्येक ग्राम या वार्ड सभा को राष्ट्रीय संविधान संशोधन मे महत्वपूर्ण भूमिका तथा अपने आंतरिक कानून बनाने और क्रियान्वित करने की स्वतंत्रता । इसका अर्थ हुआ कि वर्तमान तंत्र यदि संविधान मे कोई संशोधन करता है तो उसे ग्राम सभाओ की स्वीकृति अनिवार्य होगी । यदि ग्राम सभाएं अस्वीकृत कर दें तब या तो संविधान संशोधन नही होगा अथवा जनमत संग्रह कराना होगा।
मै मानता हॅू कि ग्राम संसद अभियान समस्याओ का समाधान नही है बल्कि वर्तमान अव्यवस्था से एक समझौता मात्र है। आदर्श स्थिति यह है कि संविधान निर्माण और संशोधन मे लोक की ही एक मात्र भूमिका होनी चाहिये, किन्तु ग्राम संसद अभियान इस मामूली से प्रयत्न के आधार पर जन जागरण कर रहा है कि संविधान संशोधन के अंतिम अधिकार तंत्र तक सीमित न हो और उसमे लोक की भी कोई भूमिका हो।
यदि कोई अन्य समूह व्यवस्था परिवर्तन अथवा सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन की दिशा मे काम करता है तो हम उसका पूरा समर्थन या सहयोग करेंगे। यदि संविधान संशोधन के लिये जनमत संग्रह अथवा परिवारों को भी कोई भूमिका दी जाती है तो हम उसका पूरा समर्थन सहयोग के लिये तैयार हैं। यदि तंत्र जनता द्वारा निर्वाचित किसी लोक संसद को भी संविधान निर्माण और संशोधन मे कोई भूमिका के लिये तैयार हो तो हमारा समर्थन और सहयोग होगा । ऐसी स्थिति न देखकर ग्राम संसद अभियान अपनी एक सूत्रीय मांग पर जन जागरण कर रहा है। मै इतना और स्पष्ट कर दूं कि यदि चर्चा के माध्यम से तंत्र ने आंशिक सहमति की इच्छा जताई तो आवश्यकतानुसार ग्राम संसद अभियान गांवो को अपने कानून बनाने और क्रियान्वित करने की मांग को अल्प काल के लिये स्थगित भी कर सकता है, किन्तु संविधान संशोधन मे ग्राम और वार्ड सभाओ की भूमिका की मांग स्थिर है । हमारे भगवान रूपी संविधान को तंत्र के जेलखाने से मुक्त कराना हमारा पहला लक्ष्य है
ग्राम संसद अभियान का कार्यालय दिल्ली से संचालित होता है। पूरे देश को 99 लोक प्रदेशो मे बांटकर प्रत्येक लोक प्रदेेश मे ग्राम संसद अभियान की कमेटियां बन रही है। सभी लोक प्रेदशो मे बैठको का क्रम एक साथ चल रहा है। 20 अगस्त से नवम्बर तक सभी लोक प्रदेशो मे ऐसी बैठकें हो जायेगी, जो लोक प्रदेश सम्मेलनो की योजना बनायेगी। अक्टूबर से मार्च तक के छ महिनो मे सभी लोक प्रदेशो मे ग्राम संसद अभियान के सम्मेलन पूरे करने की योजना है। इन सम्मेलनो मे कुछ लोगो का चयन करके एक राष्ट्र स्तरीय सम्मेलन रखा जायेगा जिसमे आगे की योजना पर विचार किया जायेगा। मुझे विश्वास है कि ग्राम संसद अभियान वर्ष 2024 तक अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे सफल हो सकेगा। मै जानता हॅू कि यह कार्य भी संविधान संशोधन से ही संभव है और ग्राम संसद अभियान का निश्चय है कि हम कोई कानून नही तोडेेगे बल्कि संवैधानिक तरीके से ही तंत्र की गुलामी से संविधान को मुक्त कराने का जन जागरण जारी रखेंगे । इसके लिये दो मार्ग दिखते हैं या तो इन विचारो के लोग संसद मे 2 तिहाई बहुमत बनाकर संविधान संशोधन कर दें और नई व्यवस्थानुसार नये चुनाव करा दे अथवा इतना प्रबल जनमत खडा हो कि वर्तमान तंत्र इस छोटे से संषोधन के लिये सहमत हो जाये । क्या होगा यह पता नही। दोनो ही प्रयत्नो मे जन जागण की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिये ग्राम संसद अभियान संगठित रूप से अपने को जन जागरण तक सीमित रख रहा है। जन जागरण के बाद कौन सा मार्ग आगे आयेगा वह लोक तय करेगा ग्राम संसद अभियान नही। आम नागरिको से अपेक्षा है कि वे इस संगठन के साथ जुडकर जनजागरण मे सक्रिय होंगे।
मै समझता हॅू कि ज्ञान यज्ञ परिवार तथा ग्राम संसद अभियान के संयुक्त प्रयासों से सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तन का मार्ग खुल सकता है।

मंथन क्रमांक 80 ज्ञान यज्ञ क्यो, क्या और कैसे?

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हम पूरे विश्व की समीक्षा करें तो भौतिक विकास तेज गति से हो रहा है और लगभग उतनी ही तेज गति से नैतिक पतन भी हो रहा है। भौतिक समस्याओ का समाधान हो रहा है और चारित्रिक पतन की समस्याएं विस्तार पा रही हैं। भावना और बुद्धि के बीच भी अंतर बढता जा रहा है। शरीफ लोगो की संख्या भी बढती जा रही है तो चालाक और धूर्त लोगो की संख्या भी बढ रही है। शरीफ और धूर्त के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है और समझदारी निरंतर घट रही है । हर धूर्त यह प्रयत्न कर रहा है कि अन्य लोग समझदार न होकर शरीफ बने अर्थात भावना प्रधान हो । विचार प्रचार बहुत तेज गति से हो रहा है और विचार मंथन की प्रकृया लगातार घट रही है। विपरीत विचारो के लोग अलग अलग गिरोहों मे बंटकर संगठित हो रहे है तो विपरीत विचारो के लोग एक साथ बैठकर कभी समस्याओ की न तो चर्चा करते है न समाधान सोचते है । यहां तक कि पूरे विश्व मे विपरीत विचारो के लोग एक दूसरे के विरूद्ध बिना विचारे इतने सक्रिय हो जाते है कि उसका लाभ धूर्त उठाते है। हर कार्य मे आम नागरिको की सक्रियता बढती जा रही है भले ही वह एक दूसरे के विरूद्ध ही क्यों न हो।यदि हम भारत की समीक्षा करें तो भारत दुनियां की तुलना मे कुछ अधिक ही समस्या ग्रस्त है। राज्य और समाज के बीच शक्ति संतुलन मालिक और गुलाम सरीखा हो गया है। सब प्रकार के धूर्त राज्य के साथ निरंतर जुडने का प्रयास कर रहे है तो सभी शरीफ समाज के साथ इकठ्ठे हो रहे है। राज्य सुरक्षा और न्याय न देकर भौतिक उन्नति को अधिक महत्व दे रहा है। सुरक्षा और न्याय की परिभाषाए बदली जा रही है। मानवाधिकार के नाम पर अपराधियो को विशेष सुरक्षा दी जा रही है तो न्याय के नाम पर कमजोरो और मजबूतो के बीच टकराव बढाया जा रहा है। परिणाम स्वरूप समाज के शरीफ लोगो द्वारा सुरक्षा और न्याय के लिये अपराधियो की मदद लेना मजबूरी बन गया है। राज्य पूरी शक्ति से वर्ग समन्वय को समाप्त करके वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष और वर्ग संघर्ष को प्रोत्साहित कर रहा है। धर्म जाति भाषा क्षेत्रियता उम्र लिंग गरीब अमीर किसान मजदूर शहरी ग्रामीण आदि के नाम पर समाज मे अलग अलग संगठन बनाकर उनमे वर्ग विद्वेष का कार्य योजना बद्ध तरीके से राज्य कर रहा है । शिक्षा और ज्ञान के बीच भी लगातार असंतुलन पैदा किया जा रहा है। शिक्षा को योग्यता का विस्तार न मानकर रोगजार के अवसर के रूप मे बदलने का लगातार प्रयास हो रहा है। परिणाम हो रहा है कि शिक्षा और श्रम के बीच असंतुलन बढता जा रहा है। पूरे भारत मे हिंसा के प्रति विश्वास बढता जा रहा है। अनेक असत्य धारणाए सत्य के समान स्थापित हो रही है। अच्छे अच्छे विद्वान नहीं बता पाते कि व्यक्ति और नागरिक मे क्या अंतर है, समाज राष्ट्र और धर्म मे कौन अधिक महत्वपूर्ण है, शिक्षा और ज्ञान मे क्या अंतर है, अपराध गैर कानूनी और अनैतिक मे क्या अंतर है, कार्यपालिका और विधायिका मे क्या अंतर है आदि आदि। स्पष्ट है कि समस्याए दिख रही है और समाधान नहीं दिख रहा । समस्याओ का अंबार लगा है। समाधान कहां से शुरू करें यह समझ मे नही आ रहा ।इन सब परिस्थितियों का आकलन करके ही बासठ वर्ष पूर्व हम कुछ मित्रो ने रामानुजगंज शहर मे ज्ञान यज्ञ की शुुरूआत की । रामानुजगंज मे बासठ वर्षो से प्रतिमाह की एक निश्चित तारीख को आधे घंटे की धार्मिक प्रक्रिया से प्रारंभ करके दो घंटे की एक पूर्व निश्चित विषय पर चर्चा होती है जो अबतक सफलता पूर्वक जारी है। अबतक करीब तीन सौ अलग अलग विषयो पर स्वतंत्र चर्चा हो चुकी है । अन्य नये विषय भी शामिल होते है। सोचा गया था कि एक शहर यदि समस्याओ के समाधान मे आगे बढकर आदर्श प्रस्तुत करेगा तो अपने आप देश पर उसका प्रभाव पडेगा । रामानुुजगंज शहर मे इस प्रयत्न को अच्छी सफलता भी मिली किन्तु धीरे धीरे वे सफलताए रामानुजगंज से बाहर विस्तार नही कर सकीं क्योकि बाहर के लोगो को शराफत से आगे निकालकर समझदारी की ओर ले जाने का हमने कोई प्रयास नही किया। बल्कि उसका दुष्परिणाम हुआ कि रामानुजगंज पर भी बाहर की हवाओ का प्रभाव धीरे धीरे पडने लगा। बाहर के सभी शरीफ और धूर्त इकठ्ठे होकर रामानुजगंज की व्यवस्था के विरूद्ध सक्रिय हो गये। वहां भी साम्प्रदायिकता अथवा जातिवाद के नाम पर संगठन बनने लगे । वहां भी राजनैतिक टकराव आंशिक रूप से पैर फैलने लगा । कर्मचारियो और नागरिको के बीच की एकता कमजोर होने लगी। अब तो ऐसा भी दिख रहा है कि वहां धीरे धीरे अपराधियो का भी प्रवेश शुरू हो जायेगा । चोरी डकैती गुंडा गर्दी दादागिरी से अभी तक तो सुरक्षित है किन्तु जब सामाजिक एकता ही छिन्न भिन्न हो जायेगी तो कब तक बचा सकेंगे।स्पष्ट है कि हम प्रयोग मे सफल होकर भी असफल हुए, क्योकि ऐसे वैचारिक प्रयोग किसी एक क्षेत्र से सफल नही हो पाते । इसलिये यह सोचा गया कि अब ज्ञान यज्ञ का विस्तार राष्टीय स्तर पर हो । साथ ही हम समस्याओ का समाधान करने का प्रयत्न न करे। हम वर्ग विद्वेश मे सक्रिय समूहो का विरोध न करके सामाजिक एकता की एक और अधिक बडी लकीर खीचने का प्रयास क्यो न करें। इसका अर्थ हुआ कि हम जाति धर्म भाषा आदि के नाम पर बने संगठित समूहो का विरोध न करके एक संयुक्त समूह की ओर बढने का प्रयत्न करे जैसा रामानुजगंज मे प्रारंभ मे किया गया था। अर्थात ज्ञान यज्ञ के नाम से एक प्रकार के लोग एक साथ बैठने की आदत डाले । भले ही वे किसी भी संगठन के सदस्य क्यो न हो।ज्ञान यज्ञ की विधि बहुत सरल है। पूरा कार्यक्रम यदि तीन घंटे का है तो आधा घंटा यज्ञ यथवा किसी अन्य भावनात्मक धार्मिक कार्यक्रम से श्रद्धा पूर्वक शुरूआत करनी चाहिये। यह समय पूरे कार्यक्रम का एक/छः से अधिक न हो । दो घंटा किसी एक पूर्व निश्चित विषय पर स्वतंत्र विचार मंथन होना चाहिये जिसमे विपरीत विचारो के लोग अपनी बात स्वतंत्रता पूूर्वक कहने की हिम्मत कर सके और दूसरे लोग विपरीत विचारो को सुनने की अपनी सहन शक्ति जागृत कर सकें । अंतिम आधा घंटा मे स्वराज्य प्रार्थना तथा प्रसाद वितरण आदि का कार्य होता है। आयोजक अपनी श्रद्धा अनुसार धार्मिक क्रिया के लिये स्वतंत्र है। चर्चा का विषय भी चुनने के लिये आयोजक स्वतंत्र है। किन्तु वक्ता की स्वतंत्रता को किसी भी परिस्थिति मे बाधित नही किया जा सकता भले ही वह किसी की भावनाओ के विरूद्ध ही क्यो न हो। ज्ञान यज्ञ के बैनर तले कोई सामूहिक निष्कर्ष निकालना प्रतिबंधित है । सब लोग व्यक्तिगत निष्कर्ष निकालने को स्वतंत्र हैं । ज्ञान यज्ञ के बैनर तले न कोई भी अन्य सक्रियता हो सकती है न ही योजना बन सकती है। अर्थात ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य व्यक्तिगत रूप से अथवा अन्य बैनर तले बाढ सहायता राष्ट्रीय संकट मे मदद या भूखो को भोजन आदि सेवा कार्य करने को स्वतंत्र है, किन्तु ज्ञान यज्ञ के नाम से पूरी तरह प्रतिबंधित है। ज्ञान यज्ञ की केवल एक ही सक्रियता है कि भिन्न विचारो के लोग एक साथ बैठकर स्वतंत्रता पूर्वक विचार मंथन कर सके तथा भावना और बुद्धि के बीच विवेक एंव शराफत और चालाकी के बीच समझदारी का विस्तार हो सके। मै समझता हॅू कि ज्ञान यज्ञ परिवार वर्ग निर्माण वर्ग विद्वेष को रोकने का प्रयास छोडकर वर्ग मुक्त वर्ग खडा करने का जो भी प्रयास करेगा वह अपने आप स्वाभाविक रूप से समाधान होगा । समस्याओ का समाधान करने मे तो भारत मे गली गली मे लोग मिल जायेगे किन्तु ज्ञान यज्ञ का प्रयास यह है कि समस्याओ की प्राकृतिक रूप से आधोशित तरीके से कम होने की प्रणाली विकसित की जाये । ज्ञान यज्ञ एक ऐसी ही सफल प्रणाली है जिसमे ज्ञान यज्ञ परिवार पूरे राष्टीय स्तर पर सक्रिय हो रहा है। ज्ञान यज्ञ परिवार मे जुडने के लिये एक ही शर्त है कि ऐसे व्यक्ति को कम से कम वर्ष मे एक बार ज्ञान यज्ञ मे शामिल होने की प्रतिबद्धता स्वीकार करनी चाहिये। ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को हम ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य मान रहे है। इस सदस्यता मे कोई जाति धर्म का भेद नही है। अपराध निरपराध का भी भेद नही है। राष्टीयता का भी भेद नही है। प्रत्येक मनुष्य ज्ञान यज्ञ परिवार का सदस्य बन सकता है। इस सदस्यता का न कोई शुल्क है न कोई अन्य प्रतिबद्धता। मै समझता हॅू कि विनोबा जी ने ऐसे कार्य को नाहक मिलन शब्द से स्थापित किया था । मुझे तो पूरा विश्वास है कि ज्ञान यज्ञ के माध्यम से हम समाज सशक्तिकरण की दिशा मे तेजी से कदम बढा सकेंगे और समाज सशक्तिकरण अनेक समस्याओ का समाधान करने मे सफल होगा । हमारे कुछ मित्र ग्राम संसद अभियान के माध्यम से राज्य कमजोरी करण का जो अभियान चला रहे है उनकी सफलता के लिये भी हम ईशवर से प्रार्थना करते है। अपनी बासठ वर्ष की सक्रियता तथा अनुभव के आधार पर मै आश्वस्त कि भारत की सभी समस्याओ के समाधान की शुरूआत ज्ञान यज्ञ विस्तार के माध्यम से हो सकती है। जब भिन्न विचारो के लोग अपने अपने संगठनो मे रहते हुए भी एक साथ बैठकर चर्चा करने की आदत डालेगे तो परिणाम अवश्य ही अच्छे होंगे । इसी आधार पर हम ज्ञान यज्ञ परिवार का राष्टीय स्तर पर सफलता पूर्वक विस्तार कर रहे है। कुछ लोग मानते है कि इसका कोई बडा लाभ नही होगा । हो सकता है ऐसा हो किन्तु मै आश्वस्त हॅू कि इस प्रयत्न का कोई नुकसान नही होगा। जो लोग अन्य प्रयत्नो मे लगे है उनके किसी प्रयत्न मे ज्ञान यज्ञ परिवार जरा भी बाधक नही है। वे अपने प्रयत्नो मे सफल हो इससे हमे कोई कठिनाई नही। ज्ञान यज्ञ परिवार नये तरीके से समाज सशक्तिकरण का कार्य कर रहा है। मंथन का अगला विषय ग्राम संसद क्यो क्या और कैसे ?

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क्या हमारे पास वोट देने के अलावा ऐसा कोई अधिकार है जिन्हें संसद हमसे छीन सकती है?

संसद अपनी आवश्यकता अनुसार जब चाहे हमारे सारे अधिकार छीन सकती है जैसा की इन्द्रा जी ने आपातकाल लगा कर किया था|

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